Tuesday, 6 October 2026

(व्यंग्य 'चिंतन') 'डर'

( व्यंग्य 'चिंतन')
    ' डर '
          अब किसे समझाऊं,और कैसे समझाऊं कि डर क्या होता है ! जो  रात में भी रोशनी जला कर सोते हैं सिर्फ़ उन्हें - डर के आगे जीत- नज़र आती है ! सुखद कल्पनाएं अंततः बहुत तकलीफ़ देती हैं, खासकर तब,,,जब हवाओं में परवाज करते ख़यालात के साथ हमारे पैर ज़मीन से लगते हैं ! डर के आगे जीत किसी ने देखी है ? ज्यादातर डर के आगे जीत नहीं, मुकम्मल डर होता है जो किश्तों की शक़्ल में किस्मत पर नाजिल हो कर किश्तों में  हमें आक्सीजन देता  है ! जिनके डर के आगे जीत बताई जाती है, दरअसल  वहाँ डर नहीं,  डर से सेटलमेंट होता है ! इलाके में अवैध दारू बेचने वाले को थाने का डर होता है ? नो,,, थाने से सेटलमेंट ! बलात्कार करने से पहले फांसी की सजा का डर नज़र आता है? नेवर ! क्योंकि बलात्कारी को अपनी जीत पहले से कन्फर्म है ! तो,,,इसमें डर कहां है ? डर के आगे जीत नहीं है, बल्कि बगैर किसी डर के जीत है ! 
   डर हमारा,जीत तुम्हारा,,,,मिले सुर मेरा तुम्हारा !         हमारा मुल्क वीरों से भरा पड़ा है! वो दिन हवा हुए जब समाज और देश के दुश्मनों से लड़ने और शहादत लेने वाले को वीर कहा जाता था ! अब समाज में कई वैरायटी के वीर अंकुर ले चुके हैं ! माफ़ीवीर की चर्चा आये दिन होती है,नफ़रत वीर रक्तबीज की तरह बढ़ गए हैं ! इसी दौर में बिना नेम प्लेट के  कथित पुलिस वीर भी देखे जा रहे हैँ ! सोशल मीडिया के वीर सबसे आगे हैं ! इनके वीरोचित कामों से कौन वाकिफ़ नहीं ! आये दिन लोग थोक में गालियां देते रहते हैं! और अगले दिन यह फिर सोशल मीडिया पर नफ़रत की राई छींटते नज़र आते हैं ! ऐसी, समाज और संविधान विरोधी पोस्ट डालते वक़्त भी वह जीत के प्रति कंफर्म होते हैं, उनके और जीत के बीच में कभी डर खड़ा ही नहीं दिखा ! यहां 'डर' को भी डर लगता है !
       आजकल ज्ञानेश कुमार को लेकर हंगामा है यूं बरपा ! 13 करोड़ वोट काट दिए ! संविधान, नियम या न्यायपालिका,,,किसका डर लगा ? अलबत्ता वो शरीफ लोग ही डरे हुए हैं,जिनका वोट कट गया है, 'पता नहीं क्या खता हुई-' ! आप आदमी के साथ बहुत झाल झमेला है! उसके सामने इतने डर होते हैं कि  'जीत' कभी दिखाई ही नहीं देती ! कभी-कभी तो वो जीत को भी डर समझ कर हाथ नहीं लगाता ! बाढ़ में भी वो जल्दी घर नहीं छोड़ता कि कोई उसके झुग्गी का दरवाज़ा न निकाल लें ! प्रोफेशनल लोग सूखा और बाढ़ दोनों की राहत सामग्री झटक लेते हैँ और झुरहू के साथ जमालू का नाम विचाराधीन में आ जाता है !गरीब डर के प्रति आश्वस्त होता  है और  जांच अधिकारी जीत के प्रति ! रघुकुल रीति,,,!
          गोसाई जी [ तुलसीदास] ने तो मुगल काल में ही कहा दिया था कि,,,- भय (डर) बिन होय न प्रीत-! इसका मतलब यह है कि,,,प्रीत के लिए भय फर्टिलाइजर का काम करता ! बाबा तुलसीदास ने जो कुछ कहा था वो आज अमृतकाल में ईडी के भय से उपजी प्रीत में देखा जा सकता है ! पार्टी में आधा जन्म निकाल कर खास चुनाव के वक़्त पार्टी छोड़ने वाले को कोई डर नहीं सताता,  बल्कि कंफर्म जीत सूँघ कर ही वो कुलांचे भर भरकर विरोधी पार्टी की विरूदावलि गाता है !
     मैं अपनी आदत से मज़बूर हूँ ! बहुत सी ऐसी कहावतें मेरे गले में अटकी पडी हैं ! कई तो ऐसी हैं,जिन्हें एक्जामिनेशन में लिख कर मैंने वाहवाही लूटी थी  !अब मैं उनके घोर विरोध में हूँ ! डर के आगे जीत को वह लोग भी बड़े गौरव से दुहराते हैं जिनके पास जाड़े की अंधेरी रात में  घर से बाहर जाकर 'सफलता पूर्वक' पेशाब करने का  भी उदाहरण नहीं है ! ऐसे लोग भी डींग मारते हैं कि--डर के आगे जीत है-! 
    आज दस अक्टूबर 2026 है !जंतर-मंतर के आसपास इतनी पुलिस खड़ी कर दी गई कि कॉकरोच के समर्थक और नेता पर न मार सकें ! ट्रेन बंद, मेट्रो बंद, रास्ते बंद! आजतक पर एक तंदुरस्त  नेता प्रदर्शन करने वालों को प्रगति में बाधक बता रहे हैं ! (पता नहीं उनका इशारा कौन सी प्रगति की ओर है!) आजकल प्रगति देखने का सबका अपना अपना चश्मा है ! जैसी रही भावना जिसकी, प्रगति वैसी ही नज़र आएगी। वर्मा जी को जेठ और सावन दोनों में  नज़र आती है ! इधर दिल्ली में,  राहुलऔरउनके सियासी सखा अखिलेश को आकाशवाणी में बैठ कर भी प्रगति नज़र नहीं आयी और सात्विक भावना वाले हेमंत विश्व शर्मा को बंगाल का भी विकास नज़र आ रहा है! कभी कभी भय के  कारण भी आंखों में दिव्य दृष्टि पैदा हो जाती है!
       डर की बात करें तो,, कुछ लोगों को थप्पड से नहीं, प्यार से डर लगता है ! अपना अपना डर है ! वैसे ज्यादातर लोग डर को लेकर झूठ बोलते हैं, बताते ही नहीं कि कि वह किस से डरते हैं और क्यों लेकिन इस बारे में मेरा मानना है कि अमीर नहीं डरता और गरीब को सबसे डरना पड़ता !अमीर आदमी, सर्दी में गर्मी और गर्मी में सर्दी का आनंद ले सकता है ! वहीं गरीब को आँधी, बाढ़, बिजली, सूखा सभी से डर लगता है ! उसके इस डर के आगे कभी कोई 'जीत' नहीँ होती, बल्कि एक कालजयी और मुकम्मल डर बना रहता है,,,जीवन भर  !!

                 [  Sultan Bharti   'Satirist' ]
        

Friday, 25 September 2026

( व्यंग्य चिंतन) कि मैं कोई झूठ बोल्या !

       (व्यंग्य चिंतन) 
कि मैं कोई झूठ बोलिया ?
         मैं सफेद दूध की कसम खाकर कहता हूं कि आज  शनिवार है, इसलिए जो भी कहूँगा  सच कहूँगा, सच के अलावा कुछ नहीं कहूँगा ! [ रोज रोज झूंठ बोलते और सुनते हुए तुम्हें कौन सा सच की पहचान है! ] सतयुग की पुरवाई चल रही है, कलियुग को धकेल कर अमृत काल आ चुका है, अब इस बसंत में झूठ का क्या का क्या  काम ! फुल बेकारी और हाफ एनकाउंटर का मारा आदमी चरित्र निर्माण में लगा है ! बुजुर्गों ने कहा है कि 'सच' दरअसल चरित्र निर्माण में पेट्रोल का काम करता है ! सच, चित और आनंद के मिलन से सिर्फ़ 'बाबाओं' को ईश्वर की प्राप्ति होती है, 'झुरहू'  जैसों को कुछ नहीं मिलता  ! 
          जो झूठ की झील में एक पैर पर खड़े होकर तैरते हैं,वही मजदूरों के बखरी का धान सालों साल चर जाते हैँ ! भैंस बैल, गाय बकरी का 'चारा' चतुर सुजान चरते चरते जेल गये और वापस आ गए ! क्योंकि किसी ने देखा ही नहीं ! सबूत हो या  अदालत  में  किसी भैंस या बकरी ने गवाही दी होती ! ऐसे में कुरान या गीता पर हाथ रख कर प्रोफेशनल 'सदगुरु' जो बोल दें वही सच है ! और  ये पूरी तरह संविधान के दायरे में होता है, जो  कहता है,- '100 गुनाहगार भले बरी हो जाएं, किंतु किसी बेगुनाह को सजा न मिले-'! जांच के इसी चक्रव्यूह से महारथी बाहर आ जाते हैं और खौफ़जदा बेकसूर झुरहू अंदर चले जाते हैँ ! कोई चारा खाता है, कोई 'चारा' बन जाता है !
       धर्म का निर्माण भले ईश्वर ने किया हो,लेकिन कापीराइट तो पृथ्वी वालों के  पास है ! इतना बड़ा कारोबार ! धर्माधिकारी का ही महात्म है जो भगवान और भक्त दोनों को असुविधा नहीं होने देता ! इन धर्माधिकारियो से कोई धर्म अछूता नहीं ! धर्म में लगे सभी अंधविश्वास के भुन्गे इन्हीं की बदौलत है ! धर्म के इन्हीं कोलंबसों को शहीद बाबा को मीठा मलीदा से और पहलवान बाबा के लाल लंगोट की पसंद का पता होता है! ये गोरखधंधा उच्च कोटि के झूठ और भय के के बग़ैर फलता फूलता नहीं ! सत्यमेव जयते का अलख लगाकर झूठ का  कारोबार  बड़ी जल्दी  फसल  देने लगता है ! 
          झूठ ही सत्य है, झूठ अमृतकलश है, झूठ,  सच की छाती पर बैठा दूध पीने वाला नाग है ! झूठ स्वादिष्ठ कलाकंद है !सच तो कड़वा होता है, कसैला होता है! सच में प्रोटीन नहीं होता ! उल्टे सच के बारे में कहा गया, - सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात् ! अब ये कैसे होगा मान्यवर! जब सच कड़वा होता है तो मीठा कैसे बोलें ! यह काम तो इस कलिकाल में सिर्फ  नेता कर रहे हैं ! मकान,  दुकान, कब्रिस्तान ,बैंक, खेत और खलिहान छीन कर विलाप की जगह जनता से तालियां बजवा लेते हैँ !पूरे देश को SIR की परिक्रमा में लगा कर विकास की उपलब्धियों गिनाना हंसी खेल नहीं है !
       सोशल मीडिया देख कर डर लगने लगा है! फेसबुक पर सुबह सुबह कोई न कोई धर्मयोद्धा नफ़रत की राई छींट देता है और कौरव पांडव दोनों खेमे की विद्धान सेनाएं अंताक्षरी में लग जाती हैं ! दुनियां की बुद्धि भ्रष्ट है जो अंतरिक्ष और समुद्री गहराई में पलने वाले जीवों के रिसर्च पर पैसा फूंक रहे हैं!इसी घटिया सोच के चलते आज तक दुनिया का कोई भी देश विश्वगुरू के लिए क्वालीफाई नहीं हो पाया ! योग्यता इसी को कहते हैं, हम विश्व गुरू बन गए और अमेरिका, रूस चीन अभी भी सदमे और सकते में हैं ! बाकी छुटभैये देश इस खोज बीन में लगे हैं कि ऐसा होने की वजह से कोई उपग्रह अपनी कक्षा से इधर उधर तो नहीं सरक जाएगा !
       इधर दिल्ली एक तरफ़ ज्ञानेश कुमार से मांगे जा रहे इस्तीफ़ा से दुखी है,वहीं दूसरी तरफ दीवाली के नज़दीक हलवाई व्यापरियों पर पड़ने वाले छापों से ! दीवाली नजदीक आते ही नकली खोवा, नक़ली घी, नकली रंग पकड़े जाने लगते हैँ ! पता चला है कुछ व्यापारी तो इतने टैलेंटेड निकले कि मुर्दा गाय, भैस से भी घी बना लेते हैं! वो जीवन मरण का सत्य जान चुके हैं ! उन्हें मौका मिला तो अपने बूढे माँ बाप हड्डी से कैल्शियम निकाल कर जनहित में बेंच देंगे ! अभी वो गाय और भैंस पर रिसर्च कर रहे हैं, माँ बाप, अगर सौभाग्यवश मर  चुके हैं, तो दोस्तों  से काम चला लेंगे, बच के रहना रे बाबा,,,तुझ पे नज़र है!
     कुछ लोग न कभी विकास करेंगे न उनका सपोर्ट करेंगे जो विकास कर रहे हैं ! वो इस्तीफ़ा मांगते हुए इस दुनियां मैं आये हैं, और इस्तीफ़ा मांगते हुए दुनियां से चले जाएंगे ! अब चाहे उनके खाने की थाली में साक्षात अमृतकाल ही परोस दिया जाए, वो यही कहेंगे,-' थाली में थोड़ा इस्तीफ़ा भी डाल देते तो अंचार समझ कर साथ में यह सब खा लेता ! दरअसल मेरी आंतों को इस्तीफ़ा के अलावा किसी और चीज़ की हाजत नहीं है'-!
        अब यही समस्या है दुरंत,,,!
        

Friday, 22 May 2026

'व्यंग्य चिंतन' कॉकरोच जनता पार्टी

 'व्यंग्य चिंतन' 
 कॉकरोच जनता पार्टी 

   अब इसे क्या कहेंगे ! सियासत का कॉकरोच या  कॉकरोच का सियासीकरण ! वो इन्फेक्शन की रफ्तार से आए और मंहगाई की तरह छा गये ! पहले लोग लाल हिट लेकर उन्हें ढूंढते थे, अब उन्हें गले लगा रहे हैं, गले में माला डाल रहे हैं, इमोजी बना रहे हैं ! रातो रात वो लोग उनके फॉलोवर बन गए  !इतनी बड़ी क्रांति, बीमारी के प्रतीक से परिवर्तन की उम्मीद बाँध बैठे ! गटर से शिखर तक  जाते देख कर आज चूहे, छछुदर और सांप को  कितनी हीनता हो रही होगी!
       रातो रात बीमारी की जगह उन से क्रांति का फौ वारा फूटता नज़र आने लगा 

Saturday, 18 April 2026

(व्यंग्य'चिंतन' ) ,,,,की ट्रेन कहीं छूट न जाये

व्यंग्य चिंतन  
ट्रेन कही छूट न जाए 

  आज सुबह से ही वर्मा जी के घर में  धमाचौकङी मची हुई थी ! पङोसी हैरान थे कि सुबह देर तलक सोने वाले वर्मा जी आज खुद ही सबको जगा रहू थे! खटापट से मेरी भी नींद  टूट चुकी थी