Wednesday, 21 January 2026

[व्यंग्य चिंतन] 'सखि, वैलेंटाइन आयो रे'

(व्यंग्य चिंतन)   'सखि वैलेंटाइन आयो रे'

         असमंजस मेें पङी कोयल बसंत की सुगंध पाकर भी कूकने की बजाए मुहं पर फेसमास्क लगाए अमराई मेें खामोश बैठी है ! उधर,,,गले में पांच पांच तोला सोने की मोटी चेन डाले कौए अमराई का चक्कर काटते हुए गा रहे हैं, - ' आजा मेरी गोदी मेें बैठ जा ! ' दूसरे कौए गैंग लीडर के कैरेक्टर को फॉलो कर रहे हैं,  -' तू है मेरी क,,,क,,,क,,,किरन '!
    इस छिछोरेपन के कारण आम के पेडों पर "बौर" तक नहीे आ रहे ! मौसम का नेटवर्क उङा हुआ है , सिर्फ कौए ही बसंत और वैलेंटाइन का टॉवर कैच कर रहे हैं ! बौर आ रहा है न गेहूं मेें बाली, सबको कोयल की कूक का इन्तजार है ! किसान चिंतित हैं, कौए मगन ! सियासत के अमृतकाल का रहस्य सिर्फ कौवों के समझ में आया है ! 
         बसंत से पूरी तरह अपरिचित किंतु वेलेंटाइन की धीमी आंच  मेें पूरी तरह पका हुआ शहर के कवि को  गांव वाला बसंत दिसंबर मेें ही साक्षात् नजर आ रहा है, - 'ओ कामदेव ओ कामदेव !
                       तन मन सुलगे कृपा हो देव !
          पीङादायक आया बसंत !
          पत्नी विहीन तङपें अनंत !
           कविता में मेंढक बोल रहे !
              बादल दावानल डोल रहे
         तेरी आराधना करू देव !
          एक गर्लफ्रेंड तो भेज देव ! 
    चुनाव खत्म हो चुका है, विजयश्री से उत्साहित एक नेता  विकास की टोह लेने के लिए समर्थकों की मीटिंग में पूछ रहा है ,- अपने अपने इलाके की मुख्य समस्या बताइये,ताकि हम समझ सकें कि सबसे पहले प्राथमिकता किसे देना है !'
      लोगों ने प्रथमिकता के आधार पर बताना शुरू कर दिया,-'  विधायक जी,  हमारी कॉलोनी में पानी बराबर नही आता-'!
   -   " पास में स्कूल नही है, बच्चो को बहुत दूर जाना पङता है '!
     -    " पिछ्ल बरसात में  सङक बह गयी थी, तबसे मरम्मत भी नही हुई -'!
- ' मेरे इलाके मे एक भी डिस्पेंसरी नही है, मगर दारू की तीन तीन दुकाने खुल गई हैं "!
    तभी एक दिव्य  सुझाव आया- ' साहब जी, आपके विधानसभा का नाम 'कबीरनगर' बिलकुल ठीक  नही है' !
      " क्यों?"
   ' साहब जी, कबीर मुसलमान थे, इसलिए इसका नाम बदलकर  ' संतनगर' कर दिया जाये '-!
    सन्नाटा छा गया ! सब एक दूसरे का मुह देखने लगे !आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास,,,! लेकिन यह क्या, अचानक विधायक जी चिल्लाए, -' तालियां !! तालियां !!!'
      सब घबराकर ताली बजाने लगे , विधायक जी ने खङे होकर सहर्ष घोषणा किया,-'  क्षेत्र के विकासक्रम मे आप देव तुल्य लोगों ने सर्व सम्मति से  जिस वकास का आदेश दिया है,वो मेरे सिर माथे पर ! ये बहुत कठिन काम है,और आप सबको तन मन धन से तैयार रहना होगा ! पन्द्रह दिन बाद धरना प्रदर्शन और भूख हड़ताल की शुभ शुरुआत करेंगे! तब तक आप लोग तैयारी करो, मैं भी अभी तीर्थ यात्रा पर दुबई जा रहा हूं- ! आमरण अनशन के लिए कुछ बलिदानी लोगों  को भी तैयार कर लेना -'!
        इतना कहकर विधायक जी अंदर चले गये ! 

         कुछ लोगों के लिए अभी भी दुविधा वाली स्थिति बनी हुई है, - बसंत वैलेंटाइन दोऊ खङे- काके लागूं पांय ! आम आदमी पूरी जिंदगी मात्र दर्शक होकर गुजार देता है-, विकास, बसंत और   वैलेंटाइन मेें से कुछ भी नही मिलता !  किस्मत में बौर आते ही नही ! जवानी अमृतकाल की तरह ऐसे दबे पांव आकर चली जाती है कि पता ही नही चलता ! सहमी हुई फ़रवरी आ चुकी है ! बसंत और वैलेंटाइन दोनो एक दूसरे को धकियाते हुए कह रहे हैं,  - पहले आप,,,पहले आप -'! पहले आकर कौन रिस्क ले ! अब 14 फरवरी तक धर्म योद्धा त्रिशूल के साथ पार्कों मेें वैलेंटाइन के प्रेम पगे युवा जोडों को ढूंढ ढूंढ कर रक्षा बंधन  मनवाएंगे ! ऐसा करने से वैलेंटाइन का हीमोग्लोबिन कम होगा, और  संस्कृति तथा सभ्यता  का इंडेक्स हमारी अर्थववस्था की तरह मजबूत होगा ! 
         15 फ़रवरी तक वैलेंटाइन का वायरस विलुप्त हो चुका होगा, और सभी संस्करी धर्म योद्धा साल भर के लिए शीतनिद्रा में चले जायेंगे !

      Sultan bharti (journalist)
              
        


       

Wednesday, 19 November 2025

[व्यंग्य चिंतन] खड़क सिंह जिंदा है

               [ व्यंग्य चिंतन  ]
 " खड़क सिंह' ज़िंदा है "  

          आप को  'बाबा भारती' और उनका घोड़ा 'सुल्तान' तो याद होंगे? जी हाँ वो कहानी जिसमें खड़क सिंह  'बीमार' बनकर बाबा को लूटता हैं! कालजयी कहानी की यही खूबी होती है कि ऐसी कहानी के पात्र कभी मरते नहीं ! और आजकल तो अमृतकाल चल रहा है ! इस दौर में तो ऐसे लोग भी भी कालजयी हो चुके हैं, जिनके मरने की जब जब दुआ की गईं , तब तब उनकी उम्र का फाइबर 5 साल और बढ़ गया !  मरने की कामना करते हुए अब तक कई वरिष्ठ भद्रपुरुष 'वीरगति' को प्राप्त हो चुके हैं  ! ( वर्तमान 'काल' का  'अमृत' सबको सूट नहीं  करता !)  इसलिए देश में तमाम 'खड़क सिंह' 'समस्याओं का स्वांग' लिए  " बाबा भारती" को ठग रहे हैं ! संविधान, समय और समाज के मुताबिक ये गिरगिट की तरह रंग बदल कर  परिवेश में घुलमिल जाते हैँ, औऱ अवसर पाते ही  "बाबा भारती" को इमोशनल कर उनकी जमापूजी  लूट कर  फरार हो जाते हैँ !  सतयुग में बाबा भारती की आबादी ज्यादा और खड़क सिंह कम हुआ करते थे,  इसलिए पहली लूट की न्यूज इतनी वाइरल हो गई थी !  आज तो उस आंकड़े में 180 डिग्री का इजाफ़ा हो चुका है !
     कदम कदम कदम पर आज खड़क सिंह टकरा रहे हैं, जो दरअसल बाबा भारती की तलाश में फेरी लगाते  रहते हैँ, - 'तू छुपा है कहां, ढूंढता मैं यहां-' !  कहावत है कि ढूढ़ने से भगवान भी बरामद हो जाते हैँ !  [हालांकि अब,,, वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था !]  सतयुग वाले खड़क सिंह को ज़्यादा मेहनत करनी पडी थी,  आज कलियुग तो इन्हीं खड़क सिंहों से हाउसफुल चल रहा है! ये घातक परजीवी अपने शिकार की रेकी करने के बाद उसके सगे बनने में देरी नहीं करते,  फिर उचित मॉनसून पाते ही  "बाबा भारती" को चर लेते हैँ।!
आजकल तो खड़क सिंह की संख्या इतनी बढ़ गई हैं कि बाबा भारती का आर्तनाद देख कर सरकार को अलग से साइबर थाना बनाना पड़ा ! आज का ओरिजिनल खड़क सिंह  आपके आस्तीन में घुसकर आपको निपटाते हैं !  
            विपक्ष की चिंता वोट चोरी को लेकर है !बाबा भारती का 'घोड़ा' आये दिन खड़क सिंह चुरा रहा है,उस पर कोई प्रदर्शन नहीं ! सतयुग वाला डाकू हयादार था, लिहाज़ करता था ! आज का खड़क सिंह,- शर्म, संस्कार, संस्कृति, इमोशन और दया जैसी दकियानूसी भावनाओं से मुक्त है ! पुराने वाले खड़क सिंह ने इमोशनल हो कर  घोड़ा लौटा दिया था ! आज के खड़क सिंह पहले घोड़ा चुराते फिर पुलिस के सहयोग से बाबा भारती की कुटी से 375 बोर का कट्टा बरामद  कराते और फिर बाबा को 'अंदर' करवा देते ! बाद में खुद खड़क सिंह बाबा की जमानत कराता और,,,गांजे की वज़ह से खराब हो रही अपनी किडनी के बदले बाबा भारती की किडनी ले  लेता ! जब तक 'बाबा भारती' की प्रजाति है,  खड़क सिंह  फलते फूलते रहेंगे!
      एक और 'खड़क सिंह'  इसी साल मई की गर्मियों में जंतर-मंतर पर मुझे बरामद हुए ! 26 अक्टूबर तक उनका खानदान और खलिहान दोनों हरा भरा रहा, फिर अचानक 27 अक्टूबर को उनका फ़ोन आया, -' भारती जी,  मेरी काफी बड़ी रकम कहीं फंस गई है,  परसों तक आ जाएगी, आज आनन फानन इन्तेजाम करना पड रहा है, वर्ना शिपमेंट वापस चली जाएगी।  बाकी रकम तो दोस्त दे रहे हैं, सिर्फ बीस हज़ार तुमसे चाहिए परसों मेरा पैसा आ जाएगा,  तुम्हें कुछ ज्यादा चाहिए तो भी बता देना' ! लेन देन में शर्म कैसी! बेझिझक मांग लेना-'!
       कुछ लोगों का कैरेक्टर उनके चेहरे पर छपा होता है, बस पढ़ने वाला चाहिए ! किंतु पढ़ने वाला अगर  'बाबा भारती' की प्रजाति का हो तो कुछ नही  हो सकता ! हालांकि मुझे  बार बार ऐसा लग रहा था कि उधर खड़क सिंह है, परंतु  उधर से उसकी दयनीय होती आवाज़ ने मुझे लुटने के लिए ललकारा, -'  अकाउंट में पड़े 1800 रुपये लेकर अमृतकाल पार करेगा क्या ! काहे का पत्रकार/साहित्यकार बना फिरता है बे ! पिछले हफ्ते भी तो बीबी के दिए पैसे में से पांच सौ रुपये बचे थे, फौरन उसे दे दे '!!
  " पांच सौ रुपये दे दूं ?'
   " दो हज़ारों रुपये ' ।
' पर वो तो बीस हज़ार मांग रहा है '!
  ' दाईं तरफ से एक जीरो कम कर !'
        ' मेरा क्या होगा?' 
"तुझको रक्खे राम तुमको अल्लाह रक्खे ' ! 
       मैंने फ़ोन पर  गिड़गिड़ा रहे मित्र से कहा, -'मेरे पास सिर्फ दो हज़ार हैं'!
      वो फौरन खिसक कर 20 हजार से 5 हज़ार पर आ गया, - ' कम से कम पांच तो कर दो,  परसों तो आप मेरे से चाहे जितना ले लो ! कारोबार में ऐसा होता रहता है '! 
    ' पांच नहीँ होगा, फ़ोन रखो ' !
" कोई बात नहीं भारती जी,  इस बार इतना ही सही ! ,एक मित्र का पेटीएम नंबर भेज रहा हूं,  तुरंत भेजिए! परसों आपके पैसे दूध में धुल कर आपको लौटा दूँगा '!
     आज 25 दिन हो गए ,अबहूँ न आए बालमा सावन बीता जाए! हमने तो सुना था- 'कल कभी नहीं आता'! उसने तो 'परसों' कहा था ! उसका सिर्फ what's app नंबर काम कर रहा है ! जिस पर उसके घर वाले  बताते रहते हैं कि -'वो कहीं गए हैं,  फ़ोन घर पर ही रखा है ' !.ऐसा बिल्कुल नहीं है कि वो फ़ोन उठाता नहीं , फ़ोन उठाने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि उस दिन उसे मेरी आवाज़ ही नहीँ सुनाई पड़ती! ये नेटवर्क नामुराद कभी बाबा भारती के फेवर में नहीं रहा ! लुटने पर जब भी कोई बाबा 'भारती' ने पुलिस को फ़ोन मिलाया,  उधर से एक ही शुभ सूचना आयी ,- इस रूट की सभी लाइने व्यस्त हैं'-!

     अजगर करे न चाकरी,,,,,! खड़क सिंह बग़ैर चाकरी किए गाड़ी से चलता है और  बाबा भारती 'सुल्तान' को खोकर पैदल चलते हुए अपनी शुगर नॉर्मल करते नज़र आते हैं ! यही विधि का विधान है!

               [ Sultan 'Bharti' ] 



     

       


        

Wednesday, 29 October 2025

[व्यंग्य चिंतन] हरियाला बन्ना आयो रे

        [व्यंग्य चिंतन]

"हरियाला बन्ना आयो रे " 

    असल में इस हेडिंग के पहले शब्द [ हरियाला ] को लेकर मुझे बचपन से ही  भ्रम बना हुआ है! अलबत्ता 'बन्ना' को लेकर कोई कोई दीर्घ या लघु शंका नहीं थी,  आज भी नहीं है ! बस ये समझ में आज तक नहीं आया कि दूल्हा हरियाला कब हो जाता है।  इस बारे में बीबी की प्रताड़ना के शिकार कई लेखकों के मत अलग अलग हैं! लघु कथा लेखकों में पहली कतार में बैठे मेरे एक मित्र का  कहना है,-' शादी तक तो सभी 'बन्ने' हरियाला  होते हैं-'
         'और,,,, शादी के  बाद '?
  ' फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी न रही '!
         ' तो,,,,, इसका मतलब हमें शादी नहीं करना चाहिए,  है  न?
  'मुझे भी लोगों ने यही समझाया था, पर तब वो लोग मुझे कोरोना के लार्वा लग रहे थे ! '
   मैंने लंबी सांस खींची, गोया दिल का कोई पुराना दर्द उभर आया हो ! मेरे मित्र ने मेरा दर्द भांपते हुए सवाल किया, - ' इक तुम ही  नहीं तन्हा, इस दर्द की बस्ती  में,,,,!'
 मैं  पीड़ित से पत्रकार हो गया, -' एक अच्छा भला बन्ना शादी के कितने दिनों बाद - 'हरियाला ' नज़र आने लगता है?'
    " ये बन्ना की सहनशीलता पर निर्भर करता है! अगर आप एक सफल स्ट्रीटडॉग की तरह पेशेंस वाले हुए तो बन्ना होने का भ्रम कई साल तक बरकरार रहता है! औऱ अगर बीवी से  बहस वाली  अंताक्षरी में उलझे तो आये दिन तबीयत 'हरी' और आप का 'हरियाला' होना शुरू '!
       " बिल्कुल समझ गया,  बस एक ठो लघुशंका रह गई, हरियाली बन्ना हमारे यूपी में क्यों नहीं पाए जाते हैं' ?
    ' तुम्हारे यूपी में हरियाली की कोई कमी नही,  इसलिए वहां साठ साल वाले बुजुर्ग को भी पाठा कहा जाता है! यूपी वाला बन्ना, बड़ा 'कटखन्ना' होता  है-!  राजस्थान में हरियाली की भारी कमी है, इसलिए वहां का बन्ना तक हरियाला होने की कोशिश करता है ! कोशिश करना हमारे हाथ में है,  मॉनसून तो दिल्ली सरकार के भी हाथ में नहीं'!
     'थोड़ा थोड़ा समझ में आया'!
  ' ज्यादा हरियाली ठीक नहीं, इस उम्र में कैरेक्टर के अंदर इतनी हरियाली घातक होती है! हरी सब्जी खाया करो, किसी का भेजा नहीं ! खाली जेब होकर भी हरियाला बन्ना होने का ख्वाब देख रहे हो-!' 

      मैं सिकुड़ कर खाल में आ गया ! अमृत काल में ज़्यादा सवाल घातक हो सकता है!
  
                 ( Sultan bharti)
        
 
 

Friday, 29 August 2025

[व्यंग्य चिंतन] आवाज दो कहां हो ,,,,,, !

                    व्यंग्य 'चिंतन'

                ( व्यंग्य चिंतन)
वो जूता,,, जो अब नही रहा 
 
        अब का बताई भैया, वो कुंभ के बगैर खो गया था ! मैं आज भी सकतै मेें हूं! तुम्हें बताता हूं!
अभी मुश्किल से 3 महीने पहले ही  तो मिला था ! चमकता हुआ और खूबसूरत , पहली नजर में ही दिल तक उतर जाने वाला ! वो कुछ इस कदर मनभावन था कि देख कर ही आँखों को आराम और सुकून हासिल हुआ धा ! मैंने तो ख्वाब में भी नही सोचा था कि महज तीन महीने बाद ही वो इस तरह मेरी नजरों से अचानक ओझल हो जायेगा ! इस  आकस्मिक  घटना से  मैं अभी भी सकते मेें था !   बीती रात ठीक से नींद नही आई ! बार बार उसकी मोहिनी तस्वीरआंखों के सामने आती रही !  मेरे दिल दिमाग पर  कितनी गहरी ठेस पहुंची थी ! अभी मुश्किल से 24 घंटा पहले की तो बात है!
       असल में वो मेरा नया जूता था, जो  परसों एक  मस्जिद के सामने से चोरी हो गया ! 
        मस्जिद की सीढियों पर जूते उतार कर मै 'जुहर' की नमाज पढ़ने अन्दर गया' और जब वपस आया तो मेरे जूते, सुखमय भविष्य की तरह, गायब थे ! जब जूते उतारे थे, तब मै पुतिन की तरह युवा लग रहा था, और अब जूताविहीन होकर  जेलेन्स्की  की तरह जबर्दस्ती सामान्य नज़र आने की असफल कोशिश कर रहा था !   पैर मे मौजूद सफेद मोजे जैसे मेरा मज़ाक उडाते हुए मुझ पर तंज कर रहे थे,- "मियां ! तुम तो पत्रकार हो ! और लिखो स्मैकियों के खिलाफ-! लगता है जैसे इस जूते के अलावा बैंक एकाउंट में कोई मोह माया नही' थी " ! मेरे सामने विकट समस्या घर लौटने की थी ! हालाकि मस्जिद और मंदिर दोनों नज़दीक थे, किन्तु मुझे  जूता तो क्या, पुरानी चप्पल तक चुराने का तजुर्बा नहीं था ! सिर्फ मोजा के साथ घर  लौटना,,, सरेआम  अपना जुलूस निकालने  जैसा था ! कॉन्फिडेन्स, कबीर के कंबल की तरह लीक हो रहा था ! जूता खोकर मै ऐसा महसूस कर रहा था, गोया 50% टेरिफ का सारा असर पहले ही दिन मुझ पर ही आ गया हो ! 
        मै दुआ मांग रहा था कि घर का दरवाजा आज बेगम न खोलें ! मगर किस्मत इतनी बढिया होती तो जूते पैर मेें होते ! दरवाज़  खुला, अस्त व्यस्त, पसीने मे तरबतर मुझे देखकर वो दंग ! हालात ऐसे जैसे मैं किसी गंदे नाले का उद्घाटन करके लौटा हूं ! उस वक्त मैं सुदामा की तरह दीन और पत्नी कृष्ण जी की तरह 'दीनदयाल' लग रही थी !(धोती फटी सिलटी दुपटी, अरु पैर उपानह,,, की सजीव झांकी थी !)  पत्नी ने ऊपर से नीचे तक मेरी दुर्गति का एक्स रे करते हुए हैरत से पूछा, -'तुम्हारे जूते किसने छीन लिए-?'
   मैने सफाई दी, -' मस्जिद के सामने से चोरी हो गये, नमाज पढने गया था" ! 
   मस्जिद और नमाज के नाम से मुझे जैसे पैरोल   मिली ! नहा धोकर अभी सुकून की साँस भी नहीे ले पाया था कि वर्मा जी आ गये ! उनकी आंखो में खुशी और चेहरे पर जबर्दस्ती ओढ़ी हुई मायूसी देखते ही मै समझ गया कि उन्होंन बगैर जूतों के मुझे घर लौटते हुए देख लिया था ! पास में बैठते हुए बोले,- ' पड़ोसी और मित्र से दुख बांटने से मन हल्का होता है, बाई द वे,,,,हुआ क्या था' ?
     " कुछ नही' !
   वो बङी क्रूरता से मुस्कराये, -' जब भाभी जी तुम्हें डांट रही थीं,  मै  नीचे सीढियों  पर ही खङा था ! लोगाें ने सिर्फ जूता ही छीना था, या पकडकर मारा भी था' ?
    " ऐसी कोई बात नही, मैंने अपना सफेद नाइक ब्रांड जूता एक दुबले पतले गरीब भिखारी को दान दे दिया, बेचारा बहुत दिनो से काले रंग की पूरानी चप्पल पहनकर घूम रहा था ! उस गरीब की मदद तो  जरूर करनी चाहिए जो दुआ की बजाए बद्दुआ देने आता हो "!
     वर्मा जी अपनी काली चप्पल पहन कर गर्म लू की तरह  बगैर कुछ बोले निकल गये ! मैं अपने अतीत के एल्बम टटोलने लगा !  जूतों को लेकर मेरा अनुभव कभी सुखद नही रहा ! पिछले 30 साल  से जाने कितनी बार महफिलों में  मेरे जूते बदलते रहे ! मै कही भी अपने जूते उतारता,  कोई न कोई अपना छोड़ कर मेरा उठा ले जाता ! कई बार मुझे अपने फटेहाल जूते के बदले बेहतरीन जूते मिल जाते थे ! ( अक्सर चुनावी मौसम मे शाम के वक्त कॉलोनी में' होने वालीं जनसभा मे ये हादसे होते थे, जहाँ जूता बाहर उतार  कर  फर्श पर बैठते थे !) एक बार तो गजब हुआ ! रात नौ बजे मीटिंग खत्म  हुई, मै भीङ से बाहर आया, जल्दी से अपना जूता उठाया पहना और इत्मीनान की सांस ली ! किन्त  एक हफ़्ता बाद जब जूता पालिश करवाने गया तो मोची ने कहा,-' इस बार सिर्फ आपके  दायें पैर का जूता बदला है ' !
      मेरी इस समस्या का निदान किसी के पास नही
 है ! जो सुझाव आते भी हैं, उनमें जोखिम बहुत है ! मेरे अजीज दोस्त चुन्ननखान की सलाह है -" ऐसी महफिल में आपको  घर से नंगे पैर जाना चाहिए , और वापसी में थोडा पहले,   पैरों को आत्मनिर्भर करके घर लौटना चाहिए -' !
     जो भी कहूगा सच कहूगा,  जूता बराबर भी झूठ नहीे बोलूँगा ! ये जूता मेरी लाइफ  मेें  अब तक  का सबसे मंहगा जूता था !  मैंने कभी एक हजार रुपये से  ऊपर का जूता  पहना ही नही , शौक भी नही था ! दरअसल मेरे बेटे [ इंजी.  सैयद अमान अली ने अपनी पहली सेलरी  पर मुझे ये जूता गिफ्ट दिया था, वर्ना ऐसी मंहगी और नश्वर चीज़ें दूर ही रहे तो अच्छा ! 
        लेकिन,,,,'घनिष्ठ' मित्र अभी भी कलेजा छलनी करने वाली 'हमदर्दी लेकर आ रहे हैं । आज  चौधरी आ गया, -' उरे कू सुण भारती ! तमै किसी का जूता लेकर भागने की  के जरूरत पङ गी' ?
मैं आसमान से गिरा,- ' कौन कह रहा था ?"
   " नाम मत नै पूछ भारती ! देख, वर्मा ने कसम दे रखी सै, अक मै किसी कू उसका नाम नहीे  बताऊंगा  ! इसलिए नाम कू परे कर, अर नू बता, अक मामला के  है"?
     मैने सारी बात साफ-साफ बता दी !
        चौधरी ने मेरी पीठ पर हाथ मारा, - " जाण दे यार ! मेरठ ते मैं दो जोङी जूता लाया सूं , इब एक तू ले ले -'!
     'शुक्रिया भाई, पर मेरे पास दो जोङी जूते हैं -'! 

       "हम्बे,,,! किस्मत में लिखे हों तो जूते राह चलते बगैर मांगे मिल जाते हैं-'!
  [ इस बार हम दोनों एक साथ हंस पङे !

  [ जूता सचमुच चोरी हुआ है यार !]
,,,,,,,,,,,      [सुलतान  'भारती']     ,,,,,,,,,,,,,,

Thursday, 31 July 2025

[व्यंग्य 'चिंतन'] मिले सुर मेरा तुम्हारा

        (व्यंग्य  ' चिंतन ')

" मिले सुर मेरा तुम्हारा"

      अब मैं क्य़ा कहूँ ,आदमी सामाजिक प्राणी है,  माने,,,सोशल क्रिएचर ! समाज में रहता है और जाने अनजाने सियासत के छींटे खाता है !  उसे बग़ैर मांगे उपदेश दिया  जाता है कि- संघे शक्ति कलियुगे -!  संघठन ही सियासत की संजीवनी है और सत्ता की सीढ़ी ! इसलिए जब  कोर्ट महा मानव समाज सेवा से सियासत की दाण्डी यात्रा शुरू करता है तो उसका पहला प्रयास और प्रवचन- मिले सुर मेरा तुम्हारा-को लेकर होता है! और हो भी क्यूँ न ! सत्ता में ताजपोशी और बनवास का सारा क्रेडिट सुर के संगम पर ही टिका हुआ  है, बुरा मानो या भला!
      सुर से सुर मिल जाए तो अल्पमत वाली सरकार भी 5 साल चल जाती है ! वहीं अगर सरग़म से सुर निकल भागे तो प्राणी मुख्यमंत्री होते होते मायावती होकर रह जाता है! सुर का सुर से मिलना बहुत ज़रूरी होता है ! कभी कभी कुंडली के सितारे सत्ता का राजयोग दिखाते हैँ लेकिन सरग़म के कुछ  सुर  'हृदय परिवर्तन' के संक्रमण का शिकार होकर तराजू से कूद जाते हैँ ! ऐसी  ग्रहदशा में अक्सर सत्ता का बनवास काट रहे कई सुर बहुमत की सरकार बना बैठते हैं! ऐसे मधुमास का श्रेय लेने वाले सियासत के महारथी  को  कुछ लोग  'मौसम वैज्ञानिक' भी कहते हैं!  सरग़म से सुर निकाल कर नया सत्ता सरगम का निर्माण करना कोई आसान काम नहीं है,  बड़े खतरे हैं इस राह में ! दांव उल्टा पड़ा तो,,,"मोह माया" की जगह कुंडली में'मोक्ष'  की इंट्री भी संभव है !
          सियासत के इस शतरंज में हर पार्टी शह और मात के  चौसर बिछाती रहती है ! सभी सशक्त, सजातीय, मजबूत और टिकाऊ सुरों की तलाश में रहते है ! बहुमत न आने पर विपक्षी पार्टियों के बिकाऊ विधायक/सांसद को ऑफर दिया जाता है, -  'खुला है मेरा पिंजरा आ मोरी 'मैना' - !  'आत्मनिर्भर' मॉनसून पाते ही प्राणी सरगरम से निकल कर सशरीर 'सूटकेस   में समा जाता है ! कुछ तो भाव विह्वल हो कर  गाने में ही संकेत देने लगते हैं, - 'आप जैसा कोई मेरी जिन्दगी में आये,,,और  पेट्रोल पंप दे जाये - ! 
      लेकिन,,,, छोड़ो कल की बातें,,,,ये उस दौर की बातेँ हैं जब देश में सतयुग नहीं आया था और,  पता नहीं किसके आदेश से सूरज पूर्व से ही उगा करता था ! विकास पुरूष अवतार ले चुके थे, मगर अज्ञातवास में चल रहे थे ! फिर आया 2014 और जगह जगह आकाशवाणी होने लगी कि - अब वतन आज़ाद है'- ! गांधी जी ने कहा था,  पापी से नहीं पाप से नफ़रत करो -! वर्तमान सतयुग में उसे साक्षात प्रैक्टिकल किया जाने लगा ! पाप से घनघोर नफ़रत और तमाम अंगुलिमाल,गैंगस्टर, क़ातिल, ठग, भ्रस्टाचारी,डाकू, स्मगलर,दंगाई मुख्य धारा में आ गए ! अलबत्ता पाप से नफ़रत करने में आज भी कोई कसर नहीं है ! ऐसा परिवर्तन देख स्वर्ग में बैठे गांधी जी सकते में हैं ! इससे प्रेरणा पाकर समूचे बैंक को गठरी में बाँध कर लोग देश से भागने लगे ! अज्ञानी जनता सन्नाटे में थी और ज्ञानी लोगों ने 'आपदा में अवसर' का गूढ़ अर्थ समझ लिया था ! मिले सुर मेरा तुम्हारा- से  विकास का सारा तिलिस्म खुल जा सिम सिम के करीब था !
    आज प्रचंड विकास की सभी योजनाएं मिले सुर मेरा तुम्हारा, पर आधारित हैं,  फिर भी सुर का सुर से मिलना आसान कहां है! कुछ लोग सुर मिलाने से पहले सुर की बड़ी जांच पड़ताल करते हैं ! जल्दबाजी में कहीं दूसरे सम्प्रदाय के सुर से सुर न मिल जाए , आजकल वैसे भी लव जिहाद और भगवा जेहाद का  'लू' चल रहा है । आस्था इतनी सेंसिटिव हो गई है कि रोड के किनारे ढाबे के बोर्ड पर दूसरे धर्मावलंबी के नाम देख कर ही भूख  मर जाती है ! चुनाव की पुरवाई बहते ही  आस्था सेकुलर हो जाती है, और सभी जाति के वोटर   पूज्यनीय,,, इसलिए जाति कुजाति न देख कर- 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' का नाद शुरू हो  जाता है ! चुनाव परिणाम के बाद  वाणी का शुद्धीकरण कर लिया जाता है  !

      आजकल एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ सुर मिलाने पर कई बेसुरे पसीना बहा रहे हैं ! उधर विदेश में, अपने खटारा सुर को लेकर पूरी पंचायत मे बदनाम हो चुके, ट्रंप के खिलाफ वैश्विक व्यापार मंडल के काफी दूकानदार सुर उठा रहे हैं ! नाटो के गिने चुने चाटुकारों के अलावा सभी उन्हे असुर मान बैठे हैं!वो लाख आफर दें,  ' मिले सुर मेरा तुम्हारा-' ! पर दूसरी तरफ सन्नाटा को तोड़ती एक ही आवाज सुनाई देती है,- ' चुप बैठ रहो तुम बूढे हो '!
          ट्रंप का सठियाना जारी है !

  ( सुलतान 'भारती')

Monday, 21 July 2025

[व्यंग्य चिंतन] तुम्हारे लिए खुशखबरी है'

(व्यंग्य चिंतन)      'तुम्हारे लिए खुशखबरी है'

[व्यंग्य चिंतन]
             " तुम्हारे लिए खुशखबरी है बबुआ "

    प्रचंड कलिकाल की बेला है! विकास की बयार चल रही है,  किंतु, विरोध में आस्था रखने के कारण, विपक्ष उसे मृग मारीचिका बता रहा है! अच्छे दिन के चबूतरे पर खड़ा सत्ता पक्ष  विकास का सूर्योदय देख रहा है और विपक्ष उसे ग्रहण बता रहा है! 'विकास पुरूष' आपदा में भी अवसर की वकालत कर रहे हैं, और सत्ता का वनवास काट रहे विपक्ष को अपना आपदाकाल दीर्घायु होता नज़र आ रहा है! अवसर है कि कुंडली में आता ही नहीं ! इस आपदा और अवसर के चक्रव्यूह में पिसकर पब्लिक मोह माया से मुक्त होकर  निर्गुण गा रही है