' डर '
अब किसे समझाऊं,और कैसे समझाऊं कि डर क्या होता है ! जो रात में भी रोशनी जला कर सोते हैं सिर्फ़ उन्हें - डर के आगे जीत- नज़र आती है ! सुखद कल्पनाएं अंततः बहुत तकलीफ़ देती हैं, खासकर तब,,,जब हवाओं में परवाज करते ख़यालात के साथ हमारे पैर ज़मीन से लगते हैं ! डर के आगे जीत किसी ने देखी है ? डर के आगे जीत नहीं, मुकम्मल डर होता है जो किश्तों की शक़्ल में किस्मत पर नाजिल हो कर किश्तों में हमें आक्सीजन देता रहता है ! जिनके डर के आगे जीत होती है, दरअसल वहाँ डर नहीं डर से सेटलमेंट होता है! इलाके में अवैध दारू बेचने वाले को थाने का डर होता है ? नो,,, थाने से सेटलमेंट ! बलात्कार करने से पहले फांसी की सजा का डर नज़र आता है? नेवर ! क्योंकि बलात्कारी को अपनी जीत पहले से कन्फर्म है ! तो,,,इसमें डर कहां है ? डर के आगे जीत नहीं है, बग़ैर किसी डर के जीत है !
डर हमारा,जीत तुम्हारा,,,,मिले सुर मेरा तुम्हारा ! हमारा मुल्क वीरों से भरा पड़ा है! वो दिन हवा हुए जब समाज और देश के दुश्मनों से लड़ने और शहादत लेने वाले को वीर कहते हैँ! अब समाज में कई वैरायटी के वीर अंकुर ले चुके हैं ! माफ़ी वीर की चर्चा आये दिन होती है,नफ़रत वीर रक्तबीज की तरह बढ़ गए हैं ! इसी दौर में बिना नेम प्लेट के कथित पुलिस वीर भी देखे जा रहे हैँ ! सोशल मीडिया वीर सबसे आगे हैं !इनके वीरोचित कामों से कौन वाकिफ़ नहीं! आये दिन लोग थोक में गालियां देते रहते हैं! और अगले दिन यह फिर सोशल मीडिया पर नफ़रत की राई छींटते नज़र आते हैं! ऐसी, समाज और संविधान विरोध पोस्ट डालते वक़्त भी वह जीत के प्रति कंफर्म होते हैं, उनके और जीत के बीच में कभी डर खड़ा ही नहीं दिखा ! 'डर' को भी डर लगता है !
आजकल ज्ञानेश कुमार को लेकर हंगामा है यूं बरपा ! 13 करोड़ वोट काट दिए! संविधान, नियम या न्यायपालिका,,,किसका डर लगा ? अलबत्ता वो शरीफ लोगों ही डरे हुए हैं,जिनका वोट कट गया है, 'पता नहीं क्या खता हुई-' ! आप आदमी के साथ बहुत झाल झमेला है! उसके सामने इतने डर होते हैं कि 'जीत' कभी दिखाई ही नहीं देती ! कभी-कभी तो वो जीत को भी डर समझ कर हाथ नहीं लगाता ! बाढ़ में भी वो जल्दी घर नहीं छोड़ता कि उसके झुग्गी का दरवाज़ा न निकाल लें! प्रोफेशनल लोग सूखा और बाढ़ दोनों की राहत सामग्री झटक लेते हैँ और झुरहू के साथ जमालू का नाम विचाराधीन में आया जाता है !गरीब डर के प्रति आश्वस्त होता है और जांच अधिकारी जीत के प्रति ! रघुकुल रीति,,,!
गोसाई जी [ तुलसीदास] ने तो मुगल काल में ही कहा दिया था कि,,,- भय (डर) बिन होय न प्रीत-! इसका मतलब यह है कि,,,प्रीत के लिए भय फर्टिलाइजर का काम करता ! बाबा तुलसीदास ने जो कुछ कहा था वो आज अमृत काल में ईडी के भय से उपजी प्रीत में देखा जा सकता है! पार्टी में आधा जन्म निकाल कर खास चुनाव के वक़्त पार्टी छोड़ने वाले को कोई डर नहीं सताता, बल्कि कंफर्म जीत सूँघ कर ही वो कुलांचे भर भरकर विरोधी पार्टी की विरूदावलि गाता है !
मैं अपनी आदत से मज़बूर हूँ! बहुत सी ऐसी कहावतें मेरे गले में अटकी पडी हैं! कई तो ऐसी हैं,जिन्हें एक्जामिनेशन में लिख कर मैंने वाहवाही लूटी थी !अब मैं उनके घोर विरोध में हूँ! डर के आगे जीत को वह लोग भी बड़े गौरव से दुहराते हैं जिनके पास रात के अंधेरे में घर से बाहर जाकर 'सफलता पूर्वक' पेशाब करने का भी उदाहरण नहीं है ! वो भी डींग मारते हैं कि--डर के आगे जीत है-!