Saturday, 25 January 2025

[पुस्तक समीक्ष]      "शब्द हमारे घायल हैं'

    'यह किताब,आम आदमी के दर्द का आइना है'!
                                  ,,,, सुलतान 'भारती',,,,,,
 
       मेरा देश प्रतिभाओं का देश हैं ! इन प्रतिभाओ ने देश से लेकर विदेश तक अपनी अपनी विधा में 'सर्वोत्तम' का लोहा मनवाया है! हर क्षेत्र और हर विधा मे प्रतिभावान शख्सियत ने लगातार दबदबा बनाया हुआ है ! अगर साहित्य की बात करें तो आंकङे गर्वित करते हैं! विश्व की विशालतम आबादी के अनुसार इस देश में साहित्यकार भी बहुत हैँ! दुबई की जितनी आबादी होगी,  उससे ज़्यादा हमारे देश में साहित्यकार होंगे ! प्रतिस्पर्धा सदैव सर्वश्रेष्ठ को आगे लाती है ! इसलिये मेरे मुल्क में सर्वश्रेष्ठ होने के लिए कला को लगातार धार देना पड़ता है ! लेकिन भारत में कुछ भी असंभव नही, कभी-कभी किसी और फन में महारत हासिल कर चुके महारथी को स्वंय अनुभूति होती है कि उसके अंदर एक और विधा की ऊर्जा छुपी है, और वो उसे जन्म देने की तीव्र व्याकुलता महसूस करता है !
      मिर्जापुर [यूपी ] के प्रख्यात समाजसेवी और कॉंग्रेस विधायक (पूर्व), भगवती प्रसाद चौधरी के साथ हूबहू ऐसा हुआ। 
          युवावस्था से 6o साल की उम्र तक वो समाज सेवा और सियासत में डूबे रहे और फिर अचानक उनके अंदर कोई और अंकुर फुटा ! अचानक चौधरी साहब महसूस करने लगे कि, समाज की पीङा,व्यवस्था परिवर्तन से उपजा जन आक्रोश,सामूहिक बेचैनी, साम्प्रदायिकता का फैलता जहर, उनसे शब्द मांग रहे हैं ! उन्होंने अपने निकटतम मित्रों से अपनी अनुभूति साझा की, और लिखने लगे ! वर्ष 2024 में उनकी पहली पुस्तक,,,,,,,का मिर्जापुर में भव्य विमोचन हुआ ! समारोह में आये दर्ज़न भर विख्यात साहित्य सितारों ने किताब की जम कर प्रशंसा की !  भगवती जी को हिम्मत मिली तो यह नई रचना 'श्रद्धा सुमन'/'शब्द  हमारे घायल हैं'- का जन्म हुआ ! प्रकृति का नियम है कि बेटियों का अपने बाप की तरफ ज्यादा अनुराग होता है, और बेटों का अपनी मां की तरफ ! प्रस्तुत रचना ,,,,,,, एक ममतामयी मां की असीम कुर्बानियो के प्रति एक ज़िम्मेदार बेटे की 'खिराज ए अकीदत' है , भावुक, भावनात्मक और भावपूर्ण !,,,,,

पूरे परिवार की श्रद्धा है उस देवी के चित्र चरण मे।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  ,,,,,,,,, कृपा है माता 'रम्पा' का।

      भगवती जी ऐसे साहित्यकार हैं,जो साहित्य सृजन मे विधा की लीक पर चलने की बजाय अपनी तराशी हुई साहित्यिक पगडंडी पर चल पङते हैं! अभिव्यक्त के इस नये प्रयोग ने उन्हे सबसे अलग पहचान दिलाई ! वो मंच और मुशायरे के व्यवसायिक चेहरे बेशक न बने,  पर अपनी रचनाओं में वो आम आदमी की पीडा और शोषण के अलमदार नज़र आते हैं ! अपनी इस सशक्त  नुमांइदगी से वह बेहद संतुष्ट हैं ! एक संघर्षशील परिवार में जन्म लेकर समाज और सियासत में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बावजूद भगवती और उनकी रचनाएँ अपनी ज़मीन से ही जुड़ी रहीं ! इस नई पुस्तक,,,,,,,,,,"शब्द हमारे घायल हैं",,,,,की अधिकांश रचनाओ  में भी रचनाकार- आम आदमी के दर्द, शोषण, व्यव्स्था,भ्रष्टाचार, किसान,खेत आंदोलन, मंहगाई,बेरोजगार, मंदिर, मस्जिद आदि ज्वलंत मुद्दों के साथ खङा नज़र आता है ! वो जैसा सोचते और महसूस करते हैं, हूबहू काग़ज़ पर उतार देते हैँ !  पीङा को काट-छांट कर बेहतरीन शब्दो  में परोसना उन्हे नही आता ! बानगी देखिए,,,,,
देश को बर्बाद और मित्रों को आबाद किया !
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  ,,,,,,,,,,अमीरो से संवाद किया !!34

        उनकी रचनाएँ सद्योजात बच्चे की तरह कोमल और प्राकृतिक सौंदर्य के एहसास से मुअत्तर होती हैं ! जैसे ताज़ा ताजा जमीन से बाहर आया कोई कोमल अंकुर,,,,,,,मिट्टी की गंध लिए ! जैसे ओस की बूंद में अलहाई गेंहू की बालियों से अभी अभी बाहर आया गेहूं का कोई दाना ! उनकी रचनाएँ किसी कवि या शायर की तर्वियत का परिणाम नही हैं! (वैसे उनके मित्र मंडल मेें साहित्यकारों की कमी  नहीं है !) वह बहुत आम शब्दो में बेहद खास संदेश दे जाते हैं! वो  आम लोगों के बेहद खास कवि हैं, उनकी कुछ रचनाएँ दिल पर ऐसा गहरा निशान डाल जाती हैं गोया  बांस की कांटेदार छङी नंगी पीठ पर पड़ी हो,- बानगी पेश है,,,,,,,

मजदूर हूं साहब सुबह को शाम करता हूँ, 
आपकी ज़िंदगी की मुश्किलें आसान करता हूं!
,,,,,,,,,,,,,,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,, , (पेज 5 )

         भगवती प्रसाद शहर में रहकर विशालतम ग्रामीण भारत में अपनी रचना का खमीर तलाशते हैं!किसान आंदोलन होता है तो वो अपने शब्दो के साथ किसानों के शाना ब शाना खङे नज़र आते हैं!
उनकी कलाम में स्याही नहीं दिल  के कोमल एहसास होते हैँ - सीधा रूह में उतर जाने वाले,,,,  
अब तो सावन में भी न दिखता सावन,
कहां  खो  गए  अपने  वो रिश्ते पावन !
,,,,,,,,,, 
,,,,,,, ,,,,,,,,,,( पेज 14 )
   

         बेशक, वो अपने साहित्यक सफर के अभी शुरूआती दौर में हैं, और खामियों की इस पगडण्डी से हर कलमकार गुजर कर सुर्खरू होता है ! लेकिन चूंकि  उन्हें कई उच्च कोटि के साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त है , इसलिए उन्हें अँगूठा लेने वाले किसी द्रोणाचार्य को नही ढूँढ़ना पड़गा ! बाकी,,,वक़्त,हालात और तजुर्बे खुद इन्सान को उस्ताद बना देते हैं! मैं उनकी कामयाबी के लिए मुसलसल दुआ गो  रहूगा !
     आखिर में,  इस किताब  की चार बेहतरीन पंक्तियाँ,,,,,चलते चलते-----

'धूप'   का   अपहरण  हो   गया ,
निष्क्रिय    उपकरण   हो   गया !
ख्वाब      सारे    धरे    रह  गए ,
विनाश ही जब  विकास हो गया !   [पेज 9 ]


              सुलतान 'भारती'  (पत्रकार)            ('मुंशी प्रेम चंद साहित्य सम्मान'-से सम्मानित लेखक)
                            

Thursday, 16 January 2025

व्यंग्य चिंतन.

[व्यंग्य चिंतन]

         चुनाव : सोना लइ जा  रे 

        अब का बताएं झुरहू काका ! दिल्ली की हर गली और कूचा में,,,छाई बहार है, जिया बेकरार है!  दिसंबर वाले सारे सांता क्लॉज़ चुनावी बसंत में  जनता का दरवाज़ा पीट रहे हैँ- 'खोलो प्रियतम खोलो द्वार' ! अंदर लेटे प्रियतम के घर 5 किलो के हिसाब से 6 वोटरों का अनाज आ चुका है,  अब जीते जी इस से बड़ा विकास घर में रखने की न जगह है न दिल में चाहत ! विकास की पराली में सपनों की हरियाली झुलस गयी है ! विकास पुरूष जनता को सर्दी में वही विकास देते हैं, जो - देखन में 'पौवा' लगे- वार करे गंभीर -'! और उसके साथ मुर्गे के 5 टोकन मिल जाए तो सांसारिक विकास की मोह माया में कौन पड़े ! अंदर घर में लेटे हुए झुरहू चाचा जानते हैँ कि चुनाव के बाद ये सभी सारस 5 साल  के लिए कोमा में चले  जाएंगे !
        सभी सांता क्लॉज़ विकास का गोदाम जनवरी में ही खाली करने में उतारू हैँ ! विकास की ऐसी आतुरता 5 साल में एक ही बार आती है,-फिर उसके बाद चिरागो में रोशनी न रही-! विकास जनता को बांट कर निर्लोभी प्राणी तपस्या पर निकल जाते हैं-!  फ़िलहाल इस वक़्त तो कॉलोनी में ज़बरदस्त मधूमास उतरा हुआ है! अगले साल प्रदेश में चुनाव है और फरवरी में ही वेलेन्टाइन आता है ! वेलेन्टाइन की महक मिलते ही  संस्कार को इस विदेशी फफून्द से बचाने के लिए धर्मयोद्धा गोलबंद हो जाते हैँ! खास इसी दिन (14 फरवरी) को संस्कार पर 'कोरोना' का खतरा होता है ! अगले दिन [15 फरवरी  ] संस्कार को अपने आप 'जेड सुरक्षा' मिल जाती है! वेलेन्टाइन और धर्म योद्धा अपने अपने खेमे को लौट जाते हैं!
       दिल्ली में भी ग़ज़ब की ठंढ है और नगर-निगम का चुनाव भी करीब है! जनता सोना चाहती है, नेता दरवाज़ा पीट रहे हैँ, - 'तेरे द्वार खड़े भगवान ! भगत भर ले रे झोली',,,! भगत पिछले शाम को ही 'विकास' की पूरी बोतल पीकर रात से ही खर्राटे मार रहे हैँ ! भगत ने तीन बोतल 'विकास' जमा कर लिया है, और अब माया मोह दोनों से उनका लगाव लगभग हाशिए पर है ! पड़ोस के बुद्धिलाल जी नें सर्दी को देखते हुए एक नए उम्मीदवार से बिलकुल नए किस्म का विकास मांग लिया था,- ' चौधरी साहब ! बहुतै ठंढ है ,अगर एक ट्राली सूखी लकड़ी और एक बोरी गंजी (शकरकंद) भेज  देते, तो  पूरे  मोहल्ले  का  वोट  आपको जाएगा-'!  अगले ही दिन ट्रैक्टर  पर लकड़ी के साथ तीन 'कुंटल विकास' आ गया ! पूरे मुहल्ले में विकास का सुरूर साफ-साफ नज़र आ रहा है!
        दिल्ली की सड़कों का निर्माण नए तरीके से करने की घोषणा की गयी है! जब विकास देने वाले ज़्यादा हों और लेने वाले कन्फ्यूज, तो विकास लीक से हट कर आता है!  'हिंसा'- चुनाव की विशेषता है या आवश्यकता ,इस पर बहस हो सकती है पर इनकार नहीं ! लगभग हर चुनाव में इसका दर्शन होता है, पर पब्लिक को कभी नहीं पता चलता कि दोषी कौन था ! दरअसल दोषी कोई होता ही नहीं, और नेता के मामले में पुलिस ज्यादा सर नहीं खपाती ! ऐसे सियासी टकराव में पुलिस को 'पंचामृत' भी नहीँ प्राप्त होता ! विगत दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की कार पर 'हमला' और केजरीवाल की  कार का 'दौड़ कर' भाजपा कार्यकर्ताओं के पैरो पर चढ़ने की खबर है! कार पर पत्थर मारा गया तो कार को गुस्सा आना स्वभाविक था !
         चुनाव के मौसम में हर पार्टी के तारणहार का प्रथम प्रयास 'कच्ची कालोनी में पहले 'विकास' बाँटने की होती है ! पक्की और पाश कालोनी के निवासी बग़ैर विकास के ही वोट देते रहते हैं! वो विदेशी दारू पीते हैं और शेयर बाजार में इनवेस्ट करने के लिए टायलेट मे अखबार को घंटे भर चाटते है और मतदान के रोज अक्सर वोट देने भी नहीँ जाते ! कई तो बड़े गर्व से कहते हैं, - western electoral system is more better than ours, you know?' लगता है इनके बाप दादा नें अपनी झुग्गी महारानी विक्टोरिया के घर के पिछवाङे ही डाल रखी थी !
        दिल्ली में चुनाव और सर्दी का सेंसेक्स ऊपर जा रहा है ! जनता टीवी और अलाव दोनों को  समय दे रही है! दिल्ली के किनारे आबाद गांवो में विकास बांटनें वाली गाड़ी रात में आती हैं ! आज कल मुहल्ले में अजीब अजीब आवाजें सुनाई पड़ती हैं,-" इस बार - ये  'हाथ' हमें दे दे ठाकुर-!" 
कोई ऑफर दे रहा है,- आजा मेरी  'हाथी' पे बैठ जा' -! कोई बुजुर्ग महिला का पैर पकड़ कर  फरियाद कर रहा है- ' फूल' तुम्हें भेजा है माते , 'भूल' के कुछ  न  अपनाना ! राम विरोधी 'झाड़ू'  'पंजा', उनके धोरे मत जाना' -!! जो आजाद उम्मीदवार हैँ,  उनके पास बिलकुल लेटेस्ट ऑफर है, -'  इस विधानसभा में इंटर मीडिएट की शिक्षा देने वाला एक भी स्कूल नहीं है,  मैं जीता तो एक यूनिवर्सिटी बनवा दूँगा-'! सड़क, सुरक्षा, हॉस्पिटल और बैंक खोलने वाले तो कई हैँ !
      चौधरी इस बार कॉंग्रेस के 'गैल' है ! चौधरी अपनी पसंद और नापसंद कभी छुपाता नहीँ, आज उसने सुबह मुझे चेतावनी भी दे दी,- ' उरे कू सुण भारती , कॉंग्रेस के अलावा इब किसी के धोरे विकास बचा कोन्या ! इब के पंजा कू वोट गेरना -'!
        'पिछली बार तुमने "झाडू"  के बारे में भी यही कहा था-'!
    " पर पाछे पांच साड़ उन्ने विकास किया कोन्या ! उल्टे मेरी एक भैंस कू ऐसी नज़र लगी, अक् दूध देना बंद कर दई , धंधा कती मंदा हो गयो !"
    "जहाँ कहोगे वहीं वोट जाएगा, बस तुम भी मेरे 'विकास' का ख्याल रखना "!

        .चौधरी मुझे घूरता रहा,  क्योंकि विकास के मामले में उसे बंटवारा बिलकुल पसंद नहीं !

   .....     ...   [सुल्तान भारती] ------'
         

Sunday, 22 December 2024

(व्यंग्य 'चिंतन') सांता क्लॉज़ की प्रॉब्लम

( व्यंग्य चिंतन)   "सांता क्लॉज़ की प्रॉब्लम"

      अपना चौधरी है न,  नए साल के आने से पहले ही स्वागत की तैयारी में लग जाता है! उसे 'न्यू ईयर' को हर हाल में  'हैप्पी' देखना जो होता है ! इसलिए 31 दिसम्बर से पहले ही दो चार बोतल 'हैप्पी' का जुगाड़ कर लेता है, ताकि हैप्पी होने के रास्ते में कोई रुकावट न पैदा हो ! इस मामले में वो किसी से किसी किस्म का सहयोग नहीं चाहता! तबेले से लगे हुए कमरे में टीवी लगा कर वो 25 दिसम्बर से ही  हैप्पी होना शुरू हो जाता है !
         25 दिसंबर की सुबह मैं चौधरी से मिला तो मुझे देखते ही उसने चेतावनी दी, - ' उरे कू सुन भारती ! नए साड़ में हैप्पी होने खातर तू कित ज्या गा  ? घणी चुप्पी लगा रखी सै -'!
       'सोच रहा हूं, इस बार थारे गैल मना लूँ नया साड़ ! क्या खिलाओगे -?'
      'नो भई नो ! मैं  केले ही ठीक सूं ! अर इब थारे गैल दोस्ती खत्म समझो-'!
   मैं हैरान था, -' मैंने तो सारी उधारी भी चुका दी थी , क्या वर्मा जी ने फिर कान भरे हैँ ?
       'बुद्धि लाल नू बता रहो, अक् मैं सनातनी सूं- अर् मन्ने मुसलामान ते दूर रहना चाह '!
    मैं हैरान था. ,-' तुम सनातनी हो गये और मुझे पता भी नहीं चला-!'
    "इब तक मन्ने भी पता न चल्या ! लाल बुद्धि वाड़ा नू सलाह दे रहो अक् मुझे सनातनी होकर अपनी भैंस कौ दूध मुसलामानन कू नहीं बेचना चाह-"!
     " कोई बात नही , कल से मुझे राम खिलावन की भैंसों का दूध खरीदना है ' !
   ' क्यों?'
   " क्योंकि साठ साल के बाद तुम अचानक सनातनी हो गये जिसे मुसलामानों को दूध ही नहीं बेचना ,!
    "पर मुझे क्यों नहीं लगता अक् मैं सनातनी बन गया ! नू बता भारती, तू सनातनी कद बनेगो ?"
     " पहले तुम सनातनी बन लो,  पीछे मैं भी बन लूँगा "!
      ' पर पहले कदी बना कोन्या!" 
      चौधरी को उलझन में देख मैंने विषय बदल दिया,  - ' दरवाज़ा बंद कर सोना, कहीं रात में सांता क्लॉज़ एकाध भैंस लेकर भाग न जाए '!
        मैं घर की ओर लौट पड़ा !
   उधर पहाड पीछे वाले रास्ते से सैकड़ों साल बाद एक सांता क्लॉज़ अपनी गाड़ी से पास की बस्ती की ओर बढ़ रहा था ! हिरण तेजी से स्लेज गाड़ी खींचते हुए पास की बस्ती की ओर बढ़ रहे थे ! सांता क्लॉज़ हिरणों से कह रहा था,  सदियों के बाद मैं कोमा से बाहर आया हूँ,  सब कुछ कितना बदल गया! क्या पता बस्ती के लोग पहचान पाते हैँ या नहीं. ! खैर,,,अब चलो मिल कर-"जिंगल बेल'-  गाते हैँ!'
      सुनसान रास्ते में गीत की आवाज़ गूंज उठी! जंगल के भालू, भेड़िये, खरगोश और दरख्तों पर सोने वाले पंछी भी जाग कर जिंगल बेल गाने लगे! पूरी क़ायनात जैसे जाग उठी थी !
       आगे चेकपोस्ट थी , सुरक्षा गार्ड ने barriers लगा kar

    
       

Wednesday, 11 December 2024

[व्यंग्य चिंतन] क्या आप भी एक शरीफ आदमी हैं

                    ['व्यंग्य' चिंतन]
  'क्या आप भी एक शरीफ आदमी हैं!'

      मनसा, वाचा कर्मणा मैं शरीफ आदमी हुआ करता था , पूरी तरह गांधी वादी ! (अल्बत्ता एक थप्पड खाने के बाद दूसरा गाल कभी आगे नहीं किया,  क्योंकि मैं जनता था कि पीटने वाला एक गाल से कभी संतुष्ट नहीं होगा !) मैं शरीफ तो था, पर इतना नहीं कि कोई भी मेरे कुरते में  नाक पोंछ कर भाग जाए ! दरअसल शरीफ आदमी  दूध देने वाली उस लावारिस गाय की तरह होता है जिसे हर आदमी दुहनें की घात में होता है! हमारे गाँव के जमालू भाई ऐसे ही शरीफ लोगों में आते हैं ! हालाकि वो आदमी हैं, मगर लोग उन्हें अक्सर लावारिस गाय समझ लेते हैं,  कई लोग काम लेकर उन्हें मजदूरी कम देते हैँ या रोक लेते हैं ! शोषण या पीडा हद से बढ़ जाए तो शब्द भी समाधान की तरह विलुप्त हो जाते हैँ ! ऐसे में इंसान चाह कर भी रो नहीे पाता,   आँसू भी दर्द को बहाने से मना कर देते हैं ! जमालू भाई के एक भी खेत नहीं हैँ, मगर चार बेटियाँ हैँ ! दो बेटियाँ व्याह दी,  दो की फिक्र में आज कल शहर में रिक्शा चलाते हैं! सवारी जो दे दे,  ले लेते हैँ !  सवारी कहीं नाराज़ न हो जाए , इसी शराफत नें उनकी ज़िंदगी की ज्यादातर खुशियों से सारे रंग छींन लिए हैं,  शराफत की अधिकता अभिशाप भी बन जाती है !
       मैंने शरीफ लोगों पर गहन रिसर्च किया तो जाना कि यहाँ भी नकली माल ज़्यादा है ! चेहरे पर फर्जी मुस्कराहट के साथ बेहद गर्मजोशी से मिलने वाला हर शख्स  शरीफ नहीं होता ! ज़रूरत से ज्यादा गंभीर नज़र आने वाला शख्स भी शराफत की जगह , 'केजरीवाल' को  अपना आदर्श मानता है !  (बच के रहना रे बाबा,,,!) मिलावट का माल बेचने वाला जिस कॉन्फिडेन्स और गंभीरता  के साथ मिलावटी सामान के शुद्धता की गारंटी देता है,उसे सुनकर तो असली माल को भी हीनता का  एहसास होनें लगता है ! डुप्लीकेट माल किस कदर हिट है कि अगर भैंस अथवा गाय के सामने डिटर्जेंट से बना दूध की बाल्टी  रख दें, तो दोनों ही अपने दूध को फ़र्जी बता देंगी ! फर्जी और डुप्लीकेट माल की बढ़ती क्रेज का ही परिणाम है कि आये दिन बाजार में फर्जी आईएएस,पीसीएस और डाक्टर तक बरामद हो रहे हैं ! ( हर कोई अपने अपने ढंग से 'विश्वगुरू' होने में लगा है!) इस बाधा दौङ मेें हीनता के चलते शरीफ आदमी बेचारा क्वालीफाई  नही कर पाता !
  ये सारे काम शरीफ आदमी के बस  का कहां ! वह तो  व्यापार के कुरुक्षेत्र में उतरते ही पाप पुण्य के माया मोह में उलझ कर गांडीव फेंक देता है,- 'पाप की रोटी  खाकर  मुझे  नर्क  में नही जाना-'! शरीफ आदमी पर धर्म का तिलिस्म सवार होता है ! वो सत्य,दया,शील, त्याग, संतोष में परम सुख और दान में आनंद की तलाश में रहता है ! इन्हीं दिव्य अनुभूति की खोज में ज़िंदगी खर्च कर देता है, और एक दिन अपनी आक्रोशित और असंतुष्ट पत्नी को मझधार में छोड़ कर दुनियां से चल देता है  ! शरीफ होना और खुशहाल होना दो परस्पर विरोधी उपलब्धिया हैं! (अपवाद से इनकार नहीं!)
      मैं खुद बड़ा शरीफ हूं ! शराफत के बारे में 'कबीर' का अनुभव और भी खतरनाक था,- जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ - ! बहुत नुकसान उठाने के बाद कबीर को ये ज्ञान प्राप्त हुआ होगा ! तब तक तो बाबा "भारती" का घोड़ा कई बार 'खड़कसिंह' लेकर भाग चुका था !  मैं अक्सर सोचता हूँ कि शरीफ आदमी शातिर क्यों नहीं होता! उसकी फितरत में आक्रमण न सही बचाव तो होता ! अति सरल और सज्जन आदमी किस अजाब में जीता है ! दूसरी तरफ,,समाज का खलनायक राष्ट्रीय चैनल पर शरीफ आदमी को धमकाता है, नरसंहार का आह्वान करता है और बेफिक्र होकर सोता  है!
       दुनियां में सज्जन और शरीफ लोगों की आबादी ज्यादा है, तभी दुष्ट और 'खल' प्रकृति के प्राणी फलफूल रहे हैँ ! हमारे एक मित्र हैँ,  सरवर उज्जैनवाल, कई बार लोगों ने ठगा ! हर बार सरवर भाई नें कसम खाई कि अब शराफत के नज़दीक नहीं जाऊँगा,  कोई जिये या मरें ! मगर जनाब, वो कहावत है न- आखिरी वक़्त में क्या खाक मुसलमां होंगे-! संस्कार और शराफत छोड़ पाना  कौन सा आसान काम है ! जब बदमाशी आपके जीन्स में ही नहीं है,  खलनायक बनेगे कैसे ! हमारे अवध में ऐसे नौसिखिया के बारे में भी कहावत है,- तुमसे न हो पायेगा बचवा-! आखिरकार चोरी करना भी एक कला है और गुंडई करना तो उससे भी बड़ी कला ! तो,,,आज भी सरवर भाई अपने शरीफ होने की किश्त भर रहे हैँ ! समाज हो या सियासत, शरीफ आदमी हर जगह घाटे में है !
     मैं 15 साल की उम्र से अखबार में छपने लगा था !.शराफत मेरे खून में थी, इसलिए संपादक फायदा उठाते रहे ! दिल्ली के एक दैनिक अखबार नें पूरे 50 आर्टिकल का पेमेंट डकार लिया ! दो चार आर्टिकल का पैसा डकार लेना तो संपादक का जन्मसिद्ध अधिकार होता है ! शरीफ आदमी को किसी की जेब से पैसे निकालने की कला भी नहीं आती, बस लुटना आता है ! उसे अजनवी नहीं, नजदीकी रिश्तेदार और मित्र लूटते हैं! कई बार तो वो ऐसे आदमी से ठगा जाता है, जिसके बारे में उसके मित्र भी सावधान कर चुके होते हैं कि- ' वो कई लोगों के पैसे खा चुका है-' ! लेकिन शरीफ आदमी,- आ बैल मुझे मार- की आदत से ग्रस्त होता हे, ठगे जाना  उसकी नीयति है!
      शराफत छोड़ना चाहता हूं, पर कैसे छोड़ना है, वो भी नहीँ आता, 62 साल पुरानी शरीफ होने की बीमारी  केजरीवाल  की खांसी जैसी जिद्दी है ! सच तो यह है कि ज़्यादातर शरीफ आदमी को सही या गलत आदमी को परखने का शऊर ही नहीं होता ! लुटेरे और ठगो की बढ़िया जीविका चलती रहे, इसका विशेष ध्यान रखते हुए 'तारणहार' ने दुनिया में प्रचुर मात्रा में 'शरीफ आदमी' पैदा किया है ! हरी भरी मखमली घास की तरह ,,प्रोटीन और विटामिन की शराफत से भरपूर हरा भरा शरीफ आदमी ! देखते ही लुच्चे,लफंगे, ठग और जेबकतरा के मुंह से बरबस निकल पङे, -' क्या जीना तुम्हारे ( लूटे) बिना-'!  
  इसलिए,,, आप हमे बरसीम समझ कर चरो ! हम बेहद शरीफ हैं, विरोध और आक्रोश विहीन जीव ! ओ, भयमुक्त खलनायक प्राणियों ! जब तक और जहा तक चर सको,,,चरते रहो ! हमारे अंदर न तुम्हें पहचान पाने का शऊर है न रोकने की शक्ति ! 

ऑफ्टर ऑल,,,, मैं  एक शरीफ आदमी हूं न!
        एक शे'र मुलाहजा फरमाएं,.....
हमें किसी को परखने का भी शऊर नहीं !
हर एक शख्स पर एतबार कर लिया मैंने !!

      ......[ सुलतान 'भारती']




Sunday, 1 December 2024

[व्यंग्य चिंतन] "हम खोदनें आये हैं "

व्यंग्य चिंतन

हम 'खोदने' आये हैँ 

     अजी हम से बच कर कहां जाइयेगा ! जहाँ भी जाएंगे, हमें फावड़े के साथ खड़ा पायेगे ! हम खोदने का प्रण कर चुके हैँ ! जायज नाजायज मेरा विषय नहीं है! जब जहाँ खोदने का 'ईश्वरीय' आदेश आएगा, हम फावड़ा चला देंगे ! हमारे पास खोदने की लंबी लिस्ट है,  सारे घर को खोद डालूँगा ! ऊपर जो है,  वो ( सच) नहीं है ! जो ( नीचे) है वही सच है ! हम सच खोद कर ऊपर लाएंगे,  क्यों कि हम सत्य खोदक है! [ वैसे  बता दूँ, खोदना हमारा कर्म है ! सत्य बरामद हो या न हो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता  ! किसी का दिल टूटे या भरोसा, फावड़ा नहीं टूटना चाहिए ! फावड़ा है तो मुमकिन है ! लोग अज़ीब अज़ीब सवाल पूछते हैँ, - जो नीचे है, वो कैसे नज़र आ गया ! अरे बाबू , जाकी रही भावना जैसी,,,,! अब तो फावड़ा उठा लिया है, हट जा ताऊ पाछे ने-!
     काम बहुत है, समय कम ! कुछ खोद डाला है, बहुत कुछ खोदना बाकी है !  67 साल के 'दानव शासन ' में लिखे गये इतिहास को  इतने कम समय में खोदना आसान नहीं था, फिर भी हमने लक्ष्य को प्राप्त किया ! जब हम इतिहास खोद रहे थे, तभी हमारे आर्किटेक्ट नें देख लिया था, किसके नीचे क्या है! हम तभी से कुदाल और गैंती का इन्तेज़ार करने लगे थे! शुक्र है कि अब इतिहास हमारा है,  नई नस्ल को "सम्प्रदाय विशेष" के इन्फेक्शन से बचाने का व्यापक प्रबंध हो गया है ! अब अगर  बंटे तो काट दिए जाओगे ! अज्ञान काल में देश का जो  इतिहास  लिखा गया था, उसमें फाइबर नही था ! वामपंथी लेखक- विभिन्नता में एकता, सौहार्द, भाईचारा,गंगा जमुनी संस्कृति और जाने क्या क्या वाहियात चीज़ को बनाने में लगे थे ! हमने उसे खुरच दिया, और इतिहास को उबाल कर शुद्ध कर लिया है! जब हमने इतिहास को खोदना शुरू किया तो लोगों नें  बड़ा चिल्ल पो मचाया , लेकिन हमारे प्रचंड बहुमत के आगे ढेर हो  गये !
     बताया न हमारी लिस्ट लंबी है, इतिहास खोद कर नए सिलेबस का पौधा रोप दिया है! अब दूसरे सम्प्रदाय की आस्था खोदने की बारी है ! विधर्मियों में हमारी कोई आस्था नहीं है! हमें पता चला है कि उनके हर आस्था केंद्र के नीचे हमारी आस्था दबी हुई है ! हमें खोद कर अपनी आस्था बाहर निकालना है ! फावड़ा लेकर हम उसी रेस्क्यू ऑप्रेशन में लगे हैं ! पिछले नारे को अब और धारदार बना दिया है, - सब कुछ खोद के जाएंगे !
      .                        नया     सवेरा      लाएंगे !!
    हम क्रांतिकारी हैं, धर्म योद्धा हैं ! हम विश्ववत् कुटुम्बकम में यक़ीन करते हैं,  इसलिए मौक़ा मिला तो सारी दुनियां खोदेंगे ! जहाँ जहाँ 'राक्षस राज'  है, हम खुदाई करेंगे ! हमारे 'दिव्य'  वैज्ञानिक मस्जिद देखते ही ताड़ लेते हैँ कि इसकी नीव के नीचे क्या है! कुछ लोग अज्ञानता के चलते विरोध करते हैँ, और मारे जाते हैँ ! पुलिस हमारी आस्था के साथ खड़ी है ! वो पूरी श्रद्धा से गोली चला रही है ! हम धर्मकार्य  करने को आतुर, कुछ लोग मरने को आतुर ! हम जानते हैँ- कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ेगा ! पाना हमें है,  खोना उन्हें ! खोदनें से महंगाई और बेरोजगारी विकलांग होती है और आस्था उर्वर - मन लागा राम फकीरी मा ! फावड़ा लेकर हम कितना महान काम कर रहे हैँ ! कुछ लोगों को इस धर्म क्रांति में फाइबर ही नहीं नज़र आ रहा ! घनघोर  कलियुग है!
        खैर,  खुशी की बात है कि बड़ी मीडिया नें हमारी खुदाई के प्रति आस्था दिखाई है,  वो हमारे फावड़े के साथ खड़े हैं ! धर्म के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा देख कर कुछ लोग सकते में हैं ! कुछ चैनल तो सतयुग  लाने की जल्दबाजी में 24×7 को ही खुदाई परिचर्चा में लगा दिया है ! हमें क्या पता कि शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, सुरक्षा और संवाद सभी  महकमो में हमारे इतने शुभचिंतक भरे हैं ! खैर,  मीडिया में बैठे भक्तों नें हमारी प्रचंड धर्म क्रांति को बारूद मुहैया कराने में जो योगदान दिया है, उसे इतिहास याद रखेगा ! खोदनें की जितनी जल्दी हमें है,  उससे हजार गुना ज्यादा जल्दी सोशल मीडिया के विद्वानो को है ! उनकी आतुरता - काल्ह करे सो आज कर- पर विश्वास करती है! अच्छा है कि हमारे समर्थक आस्था के मामले में 'तर्क को तुर्क'  समझ कर डील करते हैँ ! कई चैनलों नें अपने न्यूज रूम को खोद कर अखाड़ा बना दिया है,जहाँ दिन रात 72 हूरो पर रिसर्च और गाली गलौज दोनों चल रहा है ! यहां आस्था को धोबी पाट लगा कर चित किया जाता  है !
           इतनी प्रचुर मात्रा में ऐसी प्रचंड आस्था- भूतो न भविष्यति- ! अब तो बाबा लोग भी देश को "दानव मुक्त" बनाने निकल पड़े हैं! सतयुग लाने की ज़िम्मेदारी संतों के कंधो पर है! 'विश्व का कल्याण हो'- की शुरुआत देश में शुरू हो चुकी है ! बग़ैर खेत खोदे किसी फसल के विकास का अंकुर नही फूटता , इसलिए खोदना बहुत ज़रूरी है! हम महा विकास के प्रथम चरण में खड़े हैँ, हमें पूरी दुनियां खोदना है ! अभी तो,,, इब्तदा-ए- इश्क है रोता है क्या ! विकास के इस महायज्ञ में-कोई रोके नहीँ कोई टोके नहीं हम- विश्ववत कुटुम्बकम- में गंभीर आस्था रखते हैँ  !दुनियां हमारा कुटुम्ब है, तो कुटुम्ब को खोदनें का विरोध कैसा ! 
            हमें खोदने दें, तभी विश्व का कल्याण होगा ! कोई रोके नहीं कोई टोके नहीं ! कुछ लोग हमें याद दिलाने में लगे है कि दुनियां आसमान में पानी खोज रही है और हम ज़मीन के नीचे मंदिर ढूंढ रहे हैँ ! अरे भैया, ज़मीन के ऊपर जो पानी है,उसे छोड़ कर मंगलग्रह  पर  पानी  क्यों ढूंढ रहे हो ? तुम्हारे पास तर्क है हमारे पास फावड़ा ! मुझे कोई बहस नहीं करना ! तुम्हें ऊपर मंगल ग्रह पर जाना है तो जाओ, - हमें तो फावड़ा समेत मस्जिद के नीचे जाना है !

           [ Sultan Bharti]