Wednesday, 11 December 2024

[व्यंग्य चिंतन] क्या आप भी एक शरीफ आदमी हैं

                    ['व्यंग्य' चिंतन]
  'क्या आप भी एक शरीफ आदमी हैं!'

      मनसा, वाचा कर्मणा मैं शरीफ आदमी हुआ करता था , पूरी तरह गांधी वादी ! (अल्बत्ता एक थप्पड खाने के बाद दूसरा गाल कभी आगे नहीं किया,  क्योंकि मैं जनता था कि पीटने वाला एक गाल से कभी संतुष्ट नहीं होगा !) मैं शरीफ तो था, पर इतना नहीं कि कोई भी मेरे कुरते में  नाक पोंछ कर भाग जाए ! दरअसल शरीफ आदमी  दूध देने वाली उस लावारिस गाय की तरह होता है जिसे हर आदमी दुहनें की घात में होता है! हमारे गाँव के जमालू भाई ऐसे ही शरीफ लोगों में आते हैं ! हालाकि वो आदमी हैं, मगर लोग उन्हें अक्सर लावारिस गाय समझ लेते हैं,  कई लोग काम लेकर उन्हें मजदूरी कम देते हैँ या रोक लेते हैं ! शोषण या पीडा हद से बढ़ जाए तो शब्द भी समाधान की तरह विलुप्त हो जाते हैँ ! ऐसे में इंसान चाह कर भी रो नहीे पाता,   आँसू भी दर्द को बहाने से मना कर देते हैं ! जमालू भाई के एक भी खेत नहीं हैँ, मगर चार बेटियाँ हैँ ! दो बेटियाँ व्याह दी,  दो की फिक्र में आज कल शहर में रिक्शा चलाते हैं! सवारी जो दे दे,  ले लेते हैँ !  सवारी कहीं नाराज़ न हो जाए , इसी शराफत नें उनकी ज़िंदगी की ज्यादातर खुशियों से सारे रंग छींन लिए हैं,  शराफत की अधिकता अभिशाप भी बन जाती है !
       मैंने शरीफ लोगों पर गहन रिसर्च किया तो जाना कि यहाँ भी नकली माल ज़्यादा है ! चेहरे पर फर्जी मुस्कराहट के साथ बेहद गर्मजोशी से मिलने वाला हर शख्स  शरीफ नहीं होता ! ज़रूरत से ज्यादा गंभीर नज़र आने वाला शख्स भी शराफत की जगह , 'केजरीवाल' को  अपना आदर्श मानता है !  (बच के रहना रे बाबा,,,!) मिलावट का माल बेचने वाला जिस कॉन्फिडेन्स और गंभीरता  के साथ मिलावटी सामान के शुद्धता की गारंटी देता है,उसे सुनकर तो असली माल को भी हीनता का  एहसास होनें लगता है ! डुप्लीकेट माल किस कदर हिट है कि अगर भैंस अथवा गाय के सामने डिटर्जेंट से बना दूध की बाल्टी  रख दें, तो दोनों ही अपने दूध को फ़र्जी बता देंगी ! फर्जी और डुप्लीकेट माल की बढ़ती क्रेज का ही परिणाम है कि आये दिन बाजार में फर्जी आईएएस,पीसीएस और डाक्टर तक बरामद हो रहे हैं ! ( हर कोई अपने अपने ढंग से 'विश्वगुरू' होने में लगा है!) इस बाधा दौङ मेें हीनता के चलते शरीफ आदमी बेचारा क्वालीफाई  नही कर पाता !
  ये सारे काम शरीफ आदमी के बस  का कहां ! वह तो  व्यापार के कुरुक्षेत्र में उतरते ही पाप पुण्य के माया मोह में उलझ कर गांडीव फेंक देता है,- 'पाप की रोटी  खाकर  मुझे  नर्क  में नही जाना-'! शरीफ आदमी पर धर्म का तिलिस्म सवार होता है ! वो सत्य,दया,शील, त्याग, संतोष में परम सुख और दान में आनंद की तलाश में रहता है ! इन्हीं दिव्य अनुभूति की खोज में ज़िंदगी खर्च कर देता है, और एक दिन अपनी आक्रोशित और असंतुष्ट पत्नी को मझधार में छोड़ कर दुनियां से चल देता है  ! शरीफ होना और खुशहाल होना दो परस्पर विरोधी उपलब्धिया हैं! (अपवाद से इनकार नहीं!)
      मैं खुद बड़ा शरीफ हूं ! शराफत के बारे में 'कबीर' का अनुभव और भी खतरनाक था,- जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ - ! बहुत नुकसान उठाने के बाद कबीर को ये ज्ञान प्राप्त हुआ होगा ! तब तक तो बाबा "भारती" का घोड़ा कई बार 'खड़कसिंह' लेकर भाग चुका था !  मैं अक्सर सोचता हूँ कि शरीफ आदमी शातिर क्यों नहीं होता! उसकी फितरत में आक्रमण न सही बचाव तो होता ! अति सरल और सज्जन आदमी किस अजाब में जीता है ! दूसरी तरफ,,समाज का खलनायक राष्ट्रीय चैनल पर शरीफ आदमी को धमकाता है, नरसंहार का आह्वान करता है और बेफिक्र होकर सोता  है!
       दुनियां में सज्जन और शरीफ लोगों की आबादी ज्यादा है, तभी दुष्ट और 'खल' प्रकृति के प्राणी फलफूल रहे हैँ ! हमारे एक मित्र हैँ,  सरवर उज्जैनवाल, कई बार लोगों ने ठगा ! हर बार सरवर भाई नें कसम खाई कि अब शराफत के नज़दीक नहीं जाऊँगा,  कोई जिये या मरें ! मगर जनाब, वो कहावत है न- आखिरी वक़्त में क्या खाक मुसलमां होंगे-! संस्कार और शराफत छोड़ पाना  कौन सा आसान काम है ! जब बदमाशी आपके जीन्स में ही नहीं है,  खलनायक बनेगे कैसे ! हमारे अवध में ऐसे नौसिखिया के बारे में भी कहावत है,- तुमसे न हो पायेगा बचवा-! आखिरकार चोरी करना भी एक कला है और गुंडई करना तो उससे भी बड़ी कला ! तो,,,आज भी सरवर भाई अपने शरीफ होने की किश्त भर रहे हैँ ! समाज हो या सियासत, शरीफ आदमी हर जगह घाटे में है !
     मैं 15 साल की उम्र से अखबार में छपने लगा था !.शराफत मेरे खून में थी, इसलिए संपादक फायदा उठाते रहे ! दिल्ली के एक दैनिक अखबार नें पूरे 50 आर्टिकल का पेमेंट डकार लिया ! दो चार आर्टिकल का पैसा डकार लेना तो संपादक का जन्मसिद्ध अधिकार होता है ! शरीफ आदमी को किसी की जेब से पैसे निकालने की कला भी नहीं आती, बस लुटना आता है ! उसे अजनवी नहीं, नजदीकी रिश्तेदार और मित्र लूटते हैं! कई बार तो वो ऐसे आदमी से ठगा जाता है, जिसके बारे में उसके मित्र भी सावधान कर चुके होते हैं कि- ' वो कई लोगों के पैसे खा चुका है-' ! लेकिन शरीफ आदमी,- आ बैल मुझे मार- की आदत से ग्रस्त होता हे, ठगे जाना  उसकी नीयति है!
      शराफत छोड़ना चाहता हूं, पर कैसे छोड़ना है, वो भी नहीँ आता, 62 साल पुरानी शरीफ होने की बीमारी  केजरीवाल  की खांसी जैसी जिद्दी है ! सच तो यह है कि ज़्यादातर शरीफ आदमी को सही या गलत आदमी को परखने का शऊर ही नहीं होता ! लुटेरे और ठगो की बढ़िया जीविका चलती रहे, इसका विशेष ध्यान रखते हुए 'तारणहार' ने दुनिया में प्रचुर मात्रा में 'शरीफ आदमी' पैदा किया है ! हरी भरी मखमली घास की तरह ,,प्रोटीन और विटामिन की शराफत से भरपूर हरा भरा शरीफ आदमी ! देखते ही लुच्चे,लफंगे, ठग और जेबकतरा के मुंह से बरबस निकल पङे, -' क्या जीना तुम्हारे ( लूटे) बिना-'!  
  इसलिए,,, आप हमे बरसीम समझ कर चरो ! हम बेहद शरीफ हैं, विरोध और आक्रोश विहीन जीव ! ओ, भयमुक्त खलनायक प्राणियों ! जब तक और जहा तक चर सको,,,चरते रहो ! हमारे अंदर न तुम्हें पहचान पाने का शऊर है न रोकने की शक्ति !

         एक शे'र मुलाहजा फरमाएं,.....

हमें किसी को परखने का भी शऊर नहीं !
हर एक शख्स पर एतबार कर लिया मैंने !!

      ......[ सुलतान 'भारती']




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