Wednesday, 14 February 2024

(व्यंग्य 'चिंतन') "अमृतकाल के "बाबा"

              "व्यंग्य "चिंतन"

       अमृतकाल के "बाबा "

       अब मैं क्य़ा बताऊँ, मैं तो खुद कंफ्यूज हूँ! देश में बुद्धिजीवी कम और बाबा ज़्यादा नज़र आने लगे हैं, जहाँ जाइयेगा हमें पाइएगा - जैसी उपलब्धता है। सड़क से संसद तक बाबाओं की भरमार है! वो  दिन हवा हुए जब बाबा जंगलों में तपस्या किया करते थे! अब उन्होंने कॉलोनी को ही जंगल बना लिया है ! अब बाबा मुसीबत की तरह हर जगह उपलब्ध हैं ! एक ढूंढ़ो हजार मिलते हैं! जनहित में अवतार लेकर गद्दी पर बैठे हैं ! पत्नी समेत आइए ( क्योंकि अकेले आने पर 'मोक्ष' की सुविधा संदिग्ध  है !) शनि मुक्त कुंडली और स्वर्ग की गारन्टी  सरकार भी नहीं दे सकती !
      इन  बाबाओं ने समाज को खेत और जनता को फसल समझ लिया है ! शहर से लेकर गाँव तक जनकल्याण की पंजीरी बांट रहे हैं  ! ये मंदिर मस्जिद में भेद नहीं रखते, बस पर्स में 'आस्था' होनी चाहिए ! अधिकांश बाबाओं की रुकी हुई कृपा 'युवा महिला भक्तों' को देखते ही रिलीज होने लगती है ! नर भक्तों का भी स्वागत है,शर्त बस इतनी है कि भक्त अपनी बुद्धि घर छोड़कर आए !     यदि भक्त घर की सुंदर और युवा महिलाओं को साथ ले कर आए तो बाबा के शीघ्र दर्शन पाने में विलंब और बाधा नहीं होती !  कई साल पहले हमारे गाँव में एक मुस्लिम बाबा रेगुलर आया करते थे ! महिला भक्तों को देखते ही उनके पैरों में अज्ञात दर्द शुरू हो जाता था ! विचित्र दर्द था जो युवा महिलाओं के  पैर दबाने से ही दूर होता था !
        ज्यादातर "बाबा" मोह और माया से मुक्त होते हैं , इसलिए वो भक्तों को भी यही सुझाव देते रहते हैं ! भक्त घर की  माया को ले जाकर बाबा को देता रहता है! बाबा का आश्रम भव्य होने लगता है और भक्त का घर 'नरिया खपड़ा' से फिसलकर छपरा पर आ जाता है ! माया दूर और मोक्ष नज़दीक आने लगता है !
        बाबा नाना प्रकार के होते हैं, हरि अनंत हरि कथा अनंता,,,,! कुछ बाबा दयनीय होते हैं, कुछ दबंग ! कुछ एकान्तप्रिय होते हैं, कुछ लोकप्रिय ! कुछ बाबा सिर्फ भोले भाले लोगों को ही ठगते हैं,लेकिन कुछ  सेवन स्टार बाबा अंग्रेज़ी बोलकर हाई क्लास  लोगों को ठग लेते हैँ ! ऐसे सुपरस्टार  बाबाओं  की सेवा में कई कुपोषित और गरीब बाबा इस उम्मीद में होते हैं कि कभी तो ये मरेगा !मोह माया से मुक्त ऐसे ग्लोबल बाबाओं के इर्द गिर्द दर्ज़नों 'मादा बाबा' पाई जाती हैं! उन्हीं को देख कर बेकारी के मारे युवा बाबा भी "मोह" और "माया" से मुक्त होने की दीक्षा लेने लगते हैं ! विचारधारा की बात करें तो  ज्यादातर बाबा भयंकर रूप से सेकुलर होते हैं,( क्योंकि इन्हें हर सम्प्रदाय को बग़ैर भेदभाव के लूटना होता है!) इसलिए ये मॉनसून देख कर राम रहीम की शाल ओढ़ लेते हैं! शहर से लेकर गाँव तक , जहाँ जाइयेगा -इन्हें पाइएगा !
       कुछ प्राणी ऐसे भी होते हैं जो चाह कर भी बाबा नहीं हो पाते, लेकिन वो 'शहीद' और 'विलुप्त' हो चुके बाबाओं को  ढूंढ  निकालने में माहिर होते हैं ! वो आसपास की आबादी के हिसाब से शहीद बाबा, पहलवान बाबा, धमसा माई, पीर बाबा, बाबा पीपल शाह, पांचपीर बाबा , नौ गजी बाबा, जिन्नात शाह बाबा , दंगली बाबा, अनजंते शहीद बाबा आदि को ढूढ़ निकालते हैं  !  (फरिश्ते और देवदूत रजिस्टर चेक करके सकते में आ जाते हैं कि आखिर ये 'बाबा'  कब शहीद हुआ ? ईश्वर के रिकॉर्ड में उनके जन्म और मृत्यु दोनों का डाटा गायब ! ज़मीन के नीचे वाले "शहीद बाबा" की आत्मा अपने नामकरण  को लेकर अलग बेचैन है ! उधर ज़मीन के ऊपर उनके घर वापसी की प्रक्रिया चालू है ! ज़मीन के ऊपर बैठा भक्त उनके नाम पर रसीद छपवा कर चंदा और ईटा मंगवाने में लगा है ! उर्स और भंडारा की डेट फाइनल हो रही है!
       'बाबा' पाप प्रूफ होते हैं ! वो पाप करें तो - 'कोई कारण होगा !आम आदमी से गुनाह हो जाए तो पाप मुक्त होने की प्रक्रिया इतनी खर्चीली है कि  अगले जन्म में कौआ होने का ऑप्शन भी सस्ता लगता है !  वैसे तो बाबा सांसारिक नहीं होते, किन्तु उनका धंधा सांसारिक प्राणियों के कारण ही फलता फ़ूलता है! बाबा सियासत से दूर होते हैं किन्तु सियासत उनका पिंड नहीं छोड़ती ! और अब तो बाबाओं के प्रयास से अमृतकाल की वापसी हो गई है ! ऐसा इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि सियासी घडियाल जनता के  बीच  कम और  इनके सानिध्य में ज्यादा रहते हैं !
          कायर शख्स खुद्दार होने का जोखिम नहीं उठाता ! ऐसे बुद्धिजीवी कामयाब चारण साबित होते हैं ! चारण सिर्फ राजदरबार मे ही नहीं होते, समाज, सियासत औऱ साहित्य में भी भरे पड़े हैं ! 
मानसून देखकर कुछ चारण पत्रकार बन बैठे तो काफ़ी पत्रकार चारण बन गए,- तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो ! तुम्हीं हो अब्बा- चचा तुम्हीं  हो-!!  दूरदर्शन के अर्जुन को सिर्फ़ सरकार का सतयुग    दिखाई देता है ! जब रेगिस्तान में नागफनी के फूल देख कर सरसों की अनुभूति हो तो समझ लें कि आत्मा रीढ़ विहीन हो चुकी है और शरीर बेताल को ढोने के लिए बिलकुल उपयुक्त है ! बाबाओं को भी ऐसे ही वाहन पसंद हैं!
       बाबा नाम का ये परजीवी हर सम्प्रदाय में पाया जाता है, कहीं कम कहीं ज़्यादा ! ये धर्म के पेड़ से लिपटे हुए वो मनीप्लांट हैँ जो केवल खून पीकर ऊपर चढ़ते हैँ ! कालांतर में भक्त लोग बाबा को ही धर्म समझ लेते हैँ !

धर्म लहू-लुहान है और मनी प्लांट हरा भरा ! नागफनी के फूल देख कर सरसों की अनुभूति में भावविभोर होकर एक सरकारी कवि गा रहा है,-'

प्रिय! अमृत काल महोत्सव आया !
नागफनी मेें  शहद   समाया !
खामनेई से  'ट्रंप'  घबराया !
कविता  सुन  डागी  गुर्राया  !
अमृत जग को रास न आया !   
            डार्लिंग ! आन मिलों 'केएफसी' में !!

( किन्तु  "डार्लिंग" नागफनी को सरसों मानने का रिस्क नहीं ले रही है !)

Friday, 2 February 2024

अग्नि दृष्टि "दीप जलाता हू एकता का"

( समीक्षा )
दीप जलाता हूं एकता का 

        अपना देश प्रतिभाओं की कहकशां है! फिर चाहे वो प्रतिभा टेक्नोलॉजी की हो या फिर साहित्य की! अगर हम साहित्य की बात करें तो  इस देश की समृद्ध मिट्टी ने इतने साहित्य सितारे दिए हैं जो सदियों तक कहकशां को रोशन करते रहेंगे! सीमित और असीमित की गणना हम नहीं करते पर मुंशी प्रेमचंद, असदउल्लाह खान (ग़ालिब) इस्मत आपा, कृष्ण चंदर, आचार्य चतुर्सेन,  सआदत हसन मंटो जैसे गौरवशाली नाम अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि रखते हैं!
और ये परंपरा शाश्वत चल रही है!
         साहित्य की रचना उम्र के आधीन नहीं है। ये ईश्वरीय संकेत की प्रतिध्वनि है! न जाने किस उम्र में किसे ये संकेत हासिल हो जाए! विश्वविख्यात रूसी किताब 'हाउ द स्टील वास टेम्पर्ड' के लेखक निकोलाई आस्ट्रोवस्की ने युद्ध मे आंख गवां देने के बाद ये किताब बोल बोल कर किसी से लिखवाई थी! भगवती जी की ये प्रथम पुस्तक है ! वरिष्ठ साहित्यकार इसकी रचनाओं के कला पक्ष से बेशक कम प्रभावित हों, किन्तु पुस्तक का भाव पक्ष लाजवाब है और कई बार उसे पढ़ते हुए पाठक के सामने मुंशी जी और अदम गोंडवी की रचनाएं याद आ जाती हैं-, एक बानगी देखिये,,,,
जिनके चेहरों पर लिखी थी  जेल की  ऊँची फ़सील
रामनामी ओढ़ कर संसद के अंदर आ  गए !! (अदम गोंडवी)
भगवती प्रसाद कहते हैं,,,;;

Thursday, 25 January 2024

(व्यंग्य चिंतन) डॉक्टर यमराज दोऊ खड़े,,,!

('व्यंग्य चिंतन')

डॉक्टर- यमराज दोऊ खड़े,,,,!

       अब यही कन्फ्यूजन है दुरंत,- "काके लागू पायं"! यमराज और डॉक्टर मुझे सहोदर से दिखने लगे हैं ! ऐसा अमृत काल के चलते नहीं हुआ, बल्कि ये दिव्य अनुभव बहुत पुराना है! पहले डॉक्टर और यमराज को मैं दो अलग अलग जीव मानता था, सौभाग्य से अब ये भ्रम दूर हो चुका है! आज पता चला कि दिशा भ्रम था, दर-असल दोनों दो जिस्म एक जान हैं ! दोनों का मंत्रालय और मक़सद एक है,- आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाना ! यमराज के इस दुरूह काम को  स्पीड पोस्ट की रफ़्तार देता है डॉक्टर ! कई बार तो ऐसा होता है कि प्राणी की एक्स्पायरी डेट दूर होती है किन्तु जीव- 'और लंबी उम्र' की कामना में- डॉक्टर के पास चला जाता है ! इस अक्षम्य अपराध के चलते अंततः वो यमराज का अपॉइंटमेंट ले बैठता है !
        का  करें  ! अच्छी तरह कुंडली देखे बग़ैर हम किसी भी प्राणी को भगवान जो घोषित कर बैठते हैं ! इस परम्परा के चलते कई ऐसे प्राणी भगवान मान लिए  गए जो ठीक से इंसान भी नहीं हो पाए थे ! ( वैसे भी, आज के दौर में इंसान होने की अपेक्षा भगवान होना ज्यादा आसान है !) भगवान होते ही डॉक्टर अपने फॉर्म में आ गए ! 'जीवन' तो दे नहीं सकते थे, अलबत्ता उसे छोटा करने का तरीका वो जानते थे! ये वो नीम हकीम डॉक्टर हैं, वो  नर मरीज़ को नाशवान और (युवा) महिला मरीज़ को पकवान समझने लगे ! घुटना बदलने, वॉल्व लगाने और स्टंट लगाने के काम में जीते जी "मोक्ष" हासिल करने लगे ! मरीज़ इन्हें भगवान समझते और ये मरीज़ को नाशवान! कालांतर में  इन भगवानों से प्रेरणा लेकर छोटे मोटे हास्पीटल के जूनियर भगवानों ने मरीज़ों को मोक्ष देने की ठान ली, मैं भी शिकार होते होते बचा !
            तंबाकू,बीड़ी, पान, गुटखा,सिगरेट से मुक्त नीरस जीवन जीने का परिणाम यह हुआ कि मेरे दाँतों को पायरिया हो गया ! डॉक्टर टूथपेस्ट बदलते रहे और हमदर्द दोस्त सुझाव ! चौधरी का सुझाव था, - " तुझे अल्कोहल पीना चाहिए, पेट अर् दांत के सभी कीड़े मर ज्यां गे '!
वर्मा जी इस ख़बर को लेकर बेहद खुश दिखे,-' दाँतों का रोग आदमी के पाप की निशानी है! मेरे दांत में कोई रोग नहीं है ! ख़ैर,,, उम्र से ज्यादा कौन जीता है , कहा सुना माफ़ करना भाई-"!
    क्या बताऊँ, मैंने भरसक कोशिश की कि दांत दर्द से मुक्ति मिल जाये ! मैं रूट कैनाल की मांग करता मगर डॉक्टर उखाड़ने पर अडिग होते! दांत उखाड़ कर ( शुगर में भी) आइसक्रीम खाने की सलाह देते रहे ! कुछ ही सालों में मेरे दोनों जबड़ों में पतझड़ नज़रे आने लगा! मगर ये तो बड़ी मुसीबत का छोटा ट्रेलर था !
          12 जनवरी 2024 की सुबह विगत 4 साल से हिल रहा बिल्कुल सामने का एक दांत जीडीपी की तरह गिर गया ! ये दांत सामने का था और इस उम्र में भी मुझ में जवान होने के भ्रम को बनाए हुए था ! इसे हर हाल में बरकरार रखना ज़रूरी था ! इस बार अपने  दोनों शुभचिंतकों से सलाह लिए बग़ैर मैं नई दिल्ली के एक अर्ध सरकारी अस्पताल चला गया ! यहां पर सब कुछ नजर आने के बाबजूद एक्सरे अनिवार्य सा है ! चालीस रुपये का पर्चा बनवाकर मैं अंदर गया! एक जूनियर डॉक्टर ने पूछा ,- ' क्या हुआ है?'
 " सामने का दांत टूट गया है, दांत लगवाना है "!
उसने सामने टूटे हुए दांत के दाएं बायें साबुत खड़े दाँतों को ठोकते हुए कहा,- ' इन्हें भी निकालना पड़ेगा-!'
    " क्यों?"
 " " यह भी हिल रहे हैं "!
  " बिल्कुल नहीं हिल रहे "!
मेरा कॉन्फिडेंस देख जूनियर डॉक्टर हिल गया ! वहां दांत निकालने और लगाने पर दोहरी कमाई थी ! डॉक्टर अब मुहं खुलवा कर अंदर झांकने लगा ! वो दांतों को औजार से बजाता और लिखता रहा ! पूरे सात मिनट बाद उसने कहा, -' अंदर के पांच दांत ख़राब हैं !"
       " मुझे तो उन से कोई प्रॉब्लम नहीँ है-"!
   " उन्हीं से सारी प्रॉब्लम है "!
मुझे गुस्सा आ गया- ' मेरी प्रॉब्लम ये सामने का टूटा हुआ दांत है-!'
वो अपने सीनियर डॉक्टर को बुला लाया ! डॉक्टर ने मुझसे पूछा,-" क्या प्रॉब्लम है-"?
   " इस टूटे हुए दांत की जगह मुझे नया दांत लगवाना है-"!
   "उसके लिए अंदर के पांच दांत निकालने पड़ेंगे "!
                 मैं जैसे आसमान से गिरा ! एक दांत लगवाने के बदले 5 दांत की शहादत !! डॉक्टर मुझे साक्षात यमराज नज़र आने लगा ! मगर मैं कहां आसानी से काबू आने वाला था! मैंने कहा,-" इस दांत के लगने 
में पीछे के दांत कैसे अड़चन डाल रहे हैं?"
      " जब तक पीछे के ये दांत निकाले नहीं जायेंगे, नया दांत मजबूती नहीं पकड़ेगा !"
    डॉक्टर मजबूती का एक ऐसा फॉर्मूला बता रहा था जिसने मुझे सकते में डाल दिया !! मैंने हैरत से 
   पूछा -" मगर क्यों?"
   " इसकी जड़ उन्हीं दांतों ने दबा रखी है ! उन्हें निकालने के बाद नया दांत मजबूती पाएगा, -!"
मैं अड़ गया-' मुझे नहीं लगवाना नया दांत -"!

    मैं वापस आ गया ! टूटे हुए दांत को बार बार देख कर घनघोर चिंता में हूँ ! एक मित्र ने खबर दी है कि उनकी पत्नी ने संगम विहार के डॉक्टर से एक दांत लगवाया है ! दाम पूछा तो पता चला, सिर्फ 5000 रुपया ! सुनकर ऐसा लगा गोया छाती पर पहाड़ गिरा हो ! नौकरी विहीन प्राणी के लिए अमृत काल ठीक वैसे है जैसे मायावती के लिए 2024 का आम चुनाव ! न एनडीए और न इन्डिया ! न  खुदा ही मिला न विसाल ए सनम,,,!( ओ दूर जाने वाले! हमको भी साथ ले ले रे! हम हो गए अकेले !!)
तो,,,,मित्रों,,,,,
 दांत लगवाने आखिर,,,, जाऊँ तो जाऊँ कहाँ !! 


Sunday, 14 January 2024

('व्यंग्य' चिंतन) शर्मलेस हो जाने का सुख

("व्यंग्य" चिंतन) 

'शर्मलेस,- हो जाने का सुख 

         अब इसमें मैं क्य़ा कर सकता हूं, मुझे आजकल शर्म नहीं आ रही है ! अच्छा भला अमृत काल इन्जॉय कर रहा था कि- अचानक  'शर्मप्रूफ' हो गया ! बस अचानक ऐसा लगा गोया कैरेक्टर का प्लग फ्यूज हो गया हो ! चरित्र से 'शर्म' नाम की फीलिंग डिलीट हो चुकी थी,  थोड़े दिन बड़ा अज़ीब सा लगा, फिर आनंद आने गया ! ( धीरे धीरे अमृत काल में एडजस्ट हो रहा हूं ! ) पहले तो इस तामसी परिवर्तन को लेकर खुद पर शक हुआ ,और खुद से सवाल भी पूछा,-'अबे, ये क्या किया ! बेहया होकर खुश नज़र आ  रहा है ! दिले नादां तुझे हुआ क्या है-?' अंदर से आवाज़ आई- 'मूर्ख ! अमृत काल में भी शर्म का बोझ उठाए घूम रहा है ! कितना पिछड़ा प्राणी है !! ज़माने के साथ चलना सीख, वर्ना इस दकियानूसी गुणों के कारण तुझे गुफ़ा युग में धकेल दिया जायेगा'-!
       ये क्या हुआ-जिसको समझा था खमीरा वो भकासू निकला ! पहले मैं शर्म आने को लेकर बड़ा गर्वित हुआ करता था ! ( ये तब की बात है जब शर्म जैसी बहुत सी 'रूढ़िवादी' संवेदनाओं पर लोग गर्व किया करते थे) आज  शर्मलेस  होकर शंकित हूँ ! पड़ोस के 'वर्मा जी' मुझे  लताड़ रहे हैं ,- ' शर्म अब  आउट ऑफ डेट हो चुकी है! शर्म और समाज में से किसी  एक  को चुन  ले ! समय रहते अपडेट  हो  जा ' -!  शर्मलेस  होने से पहले मैं पांचू लाला से मिला, जो खाने के मसालों में मिलावट के लिए जाने जाते थे! मुझे उम्मीद थी कि वो अपने कुकृत्य पर ज़रूर शर्मिन्दा होंगे ! मैने सीधे पूछ लिया,- ' लोगों का इल्ज़ाम है कि आप हल्दी और धनिया पाउडर में घोड़े की लीद मिलाते हैं? आपको शर्म आनी चाहिए _!"
         " अब तक तो आई नहीं , शर्म ही क्यों, मुझे तो खाने के बाद डकार भी नहीं आती ! वैसे एक बात बताओ, मुझे धनिया की वज़ह से शर्म आनी चाहिए या लीद की वज़ह से?"
     " मिलावट की वजह से !"
     " वो घोड़े की गलती से हुआ है ! जहां मसाले तैयार होते हैं, वहीं मेरा घोड़ा बंधा था ! ये घोड़े के अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा मामला है! लोग तो मिर्ची के पाउडर में ईंट पीस कर मिला देते हैं! और वैसे भी सच में झूंठ मिला कर बोलने में किसी को एतराज़ नहीं है! मेरा मासूम घोड़ा बेचारा,,,,वो तो हल्दी मिर्ची कुछ नहीं खाता ! घास खाता और लीद देता है-"!
       उपदेश लेकर मैं लौट आया। पांचू लाला काफ़ी पहले लोक लाज के बंधन से मुक्त हो चुके थे और अब मुझ से भी ज्यादा खुद को हल्का और पाप मुक्त महसूस कर रहे थे !  लाज,पाप,दया,भय जैसी अपराध बोध कराने वाली मानवीय संवेदनाओं से परे होकर वो साक्षात देवदूत होने के निकट थे ! उनके परिवर्तन की मैथेमेटिक्स देख मैं हीन भावना से सिकुड़ा जा रहा था !
    उस दिन बड़ी मुश्किल से मैंने उन का मुरीद होने से खुद को रोका था !
        शर्माने से ज्यादा मुश्किल काम है शर्म से मुक्त हो पाना ! लोग बड़ी कठिन साधना के बाद इस अवस्था को प्राप्त होते हैं ! भिखारी होने के लिए शर्म से मुक्त होना प्रथम शर्त है, अभिनय दूसरी अनिवार्यता है।इस कला के माहिर कृत्रिम दर्द की ऐसी ऐसी आवाजें निकालते हैं कि प्राणी पत्नी की नज़र से छुपा कर रखा हुआ पचास का  आखिरी नोट भी पर्स से निकाल कर दे देता है ! उसे लगता है कि आज उसने जेब की 'माया' को बहुत सही जगह इनवेस्ट किया है, जो उसके और मोक्ष के बीच में स्पीड ब्रेकर बनकर खड़ा था ! 
     कार रोक कर आदमी सड़क के किनारे बैठे तोते वाले ज्योतिषी को हाथ दिखाता है! ज्योतिषी हाथ देखते ही समझ जाता है कि बड़ा लम्पट आदमी है! घर में एक सुंदर और टिकाऊ बीबी होने के बावजूद फील्ड में 3-3 वैलेंटाइन  रखी हुई  है! उसने पिंजरा खोलते हुए तोते से कहा,- ' महाराज ! इस दिव्य पुरुष की कुंडली निकालिये-!'
     तोता चिल्लाया,- ' कुत्ता ! कमीना !! हरामी"!! 
              कार वाले ने घबराकर कर पूछा-' ये क्या कह रहे हैं महराज जी ?'
    "आशीर्वाद दे रहे हैं ! जितनी ज़्यादा गाली  उतना बड़ा आशीर्वाद ! तुमने ज़रूर कोई बड़ा पुण्य का कार्य किया हैं ! महाराज जी !अब इनका भाग्य कार्ड निकालिये !'
  " खुद निकाल ले, मैं चोंच गंदी नहीं करूंगा-!  तीन दिन से एक तोती इस पेड़ पर आकर बैठ रही है और तू दस मिनट के लिए भी मुझे पैरोल पर नहीँ छोड़ता, कामी, क्रोधी लम्पट !!' तोता चिल्लाया !
    लगातार झूठ बोल बोल कर बेकारी का मारा ज्योतिषी सालों पहले सच और शर्म से मुक्त हो चुका  मुस्करा था ,-'"महाराज कह रहे हैं कि वो तुम्हारी क्षति ग्रस्त कुंडली के लिए आज एक विशेष अनुष्ठान करेंगे , क्योंकि शनि की वक़्र दृष्टि से घबराकर मंगल निकल भागा है-!'
     " मुझे क्या करना होगा सर !"
 ज्योतिषी ने समझ लिया कि पिछले कई दिनों से चल रहा अकाल आज सुखद मानसून की शक़्ल में  वापस लौट आया है !
     सियासत औऱ शर्म में अक्सर विलोम संबंध पाया गया है ! इस पंक पयोधि में आने के बाद संत महात्मा भी संक्रमित पाए गए हैं ! प्राचीन काल में शर्म,दया और हया जैसे मानवीय गुणों वाले शख्स को संस्कारी माना जाता था, किन्तु अमृत काल में हुए  ताज़ा रिसर्च में बलात्कारी भी संस्कारी होते पाए गए हैं ! इस नई खोज के बाद जेलों में बंद कई विभूतियों के 'संस्कार' समेत बाहर आने की उम्मीदें बढ़ गई हैं ! बिलकीस बानो के केस में एक दो नहीं पूरे 11 बलात्कारी संस्कार से ओतप्रोत पाए गए !अब संविधान में भले हत्या और बलात्कार के लिए कठोर दंड हो, पर अमृत काल में 'संस्कारी' को सजा देना तो कबूतर को कत्ल करने जैसा है ! लिहाज़ा सभी संस्कारी मुक्त कर दिए गए और लाठी की जगह समाज ने उन्हें लड्डू खिलाए ! 
         21 वर्षीया बिलकीस बानो के बयान से तब पता चला कि ज्यादातर 'संस्कारी' उसके पड़ोसी थे जिन्हें वो चाचा या अंकल कहती थी, लेकिन उसे क्या पता था कि वो सभी दया ,शर्म ,भय और भविष्य की सोच से मुक्त होकर अब 'संस्कारी' हो चुके हैं! जेल से बाहर आने पर उनके (कु) कर्म पर माला डाली गई, लड्डू खिलाए गए !  संस्कारी घरों की महिलाओं ने शायद गीत भी  गाये हों , -' मोरा पिया घर आया  हो राम जी'-! 
         ( मगर,,,, अचानक इस हरे भरे बसंत में पतझड़ टपक पड़ा ! सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जांच में संस्कार के पीछे छुपा उनका जुर्म देख लिया और  उन की "घर वापसी" का आदेश दे दिया है ! )

      तब से, 'संस्कारी' से लगभग 'पूज्यनीय' हो रहे सभी बलात्कारी घरों से गायब हैं ! अतीक की लापता पत्नी की खोज में सर से पैर तक चिन्तातुर नज़र आने वाले मीडिया मुगल इस - "सामूहिक लापता कांड"- की जगह,-गाज़ा,हिज्बुल्लाह , हूती और एपस्टीन जैसे हरामी पर चिंता  व्यक्त  कर  रहे हैं ! परिभाषाएँ बदलाव के चक्रवात मेें धूल धूसरित हैं, तुम को रक्खे राम,,,तुमको अल्लाह रक्खे !
 

     ।।।      सुलतान 'भारती'   

         

    

(शख्सियत) मुहम्मद यामीन खान

हिम्मत-ए-मर्दा मददे खुदा' इस मुहावरे से जिस शख्सियत की ज़िंदगी या कहें जीवन-संघर्ष को शब्दों में बाँधने की कोशिश कर रहा हूँ उसका नाम है यामीन खान। भावुकता, संघर्ष, सेवा और संकल्प ही है जिनकी पहचान। आजकल ये शिल्पकारों के शिल्पी माने जाते हैं, उनके बीच तो मसीहा ही समझे जाते हैं। यामीन के मुताबिक, उनकी ज़िंदगी की जंग जोश से भरे एक युवा होते 16 वर्षीय किशोर के रूप में देश की राजधानी दिल्ली से शुरू हुई। वह नवम्बर'84 की जलती हुई दिल्ली थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ यामीन की मानें तो खासकर सिखों के खिलाफ एक उन्माद दिल्ली की सड़कों पर सैलाब की तरह उमड़ रहा था। शायद एक खास कौम के बरख़िलाफ़ उठे सत्तादल के भटके युवाओं के उन्माद की वजह यह थी कि इंदिरा को उन्हीं के आवास के गेट पर गोलियों से भूनकर शहीद करने वाले उनके अपने ही अंगरक्षक सिख थे। फिर क्या था, कुछ ही घण्टों के बाद उस वक्त के अंध-जोशीले कांग्रेसी और इसीतरह के और नौजवान शिखों के घर जलाने, उन्हें मारने-काटने, घर जलाने में मुब्तिला हो गये, उस सनक में उन्हें बूढ़े, बच्चे, महिला, जवान में कोई फर्क नहीं दिख रहा था (भले ही बाद में पछतावा हुआ हो)। अपने दिल-दिमाग से ज्यादा जोश और दोस्त(जो उनके मुताबिक उस समय के आरएसएस के लोग थे) को सही समझने वाले आम  लड़कों की तरह जोश में होश खो देने वाली उस भीड़ में यामीन भी शामिल हो गये। लेकिन एक अनाथ सरदारनी जो उन (इंदिरा के) हत्यारों को बराबर गालियां और श्राप दे रही थी, उसकी बातें सुनकर यामीन की इन्सानियत जाग गई। अचानक उस सादा दिल जवान के ज़मीर को झटका लगा कि 'आखिर इन बेकसूर लोगों को किसी एक की गलती की सज़ा ये उन्मादी युवा क्यों दे रहे हैं, और बिना कान देखे कौए को खदेड़ने वालों की तरह हम भी इनमें जोश में शामिल हो गये हैं।' इन्सानियत जागते ही वहशीपन भागता नज़र आया। अब यामीन इन निर्दोष लोगों के साथ खड़े थे। –शायद उन्हें उस वक्त प्राइमरी की किताबों में पढ़ी सिद्धार्थ (गौतम) की कथा में कही  ' मारने वाले से बचाने वाला बड़ा (महान) होता है '–बात का मर्म समझ में आ गया। मानो हृदयपरिवर्तन हो गया हो। न केवल कई लोगों / परिवारों को बचाया, बल्कि हिम्मत-साहस, जज्बे के साथ युवा सिखों के जत्थे तलवारें लेकर निकले तो यह खुद उस हिंसक भीड़ का सामना करने के लिए सीना तानकर खड़े हो गए। पुलिस की मंशा के विपरीत सिखों के बचाव में भीड़ पर यथाशक्ति हमलावर होने की वजह से पुलिस के डंडे खाए, हवालात तक पहुंचे। उनके एक खास करीबी की मानें तो, 'हवालात का दरवाज़ा अन्य 'पुलिसिया आरोपों' की वजह से भी देखने का 'सु-अवसर' प्राप्त हुआ। हालांकि वे खुद इस सवाल को 'बचपना' कहकर टाल देते हैं, लेकिन समझने की कोशिश करें तो जवाब मिल ही जाता है। 
खैर, उनसे हुई बातचीत के मुताबिक, 84 के दंगे से उपजे जनसेवा के भाव ने उनकी जिंदगी बदल दी। उसे  इंसानियत की राह पर चलने का मुकद्दस मकसद दे दिया। कुदरती होनी में विश्वास करने वाले, खुर्जा (अलीगढ़) के  बरका गाँव में जन्मे, बचपन बिताए यामीन खान के समाजी जिंदगी की राह आसान की 1986 में उनकी शरीक-ए-हयात ने। बकौल खान, 'मैं इस बात के लिए उनका एहतराम करता हूँ कि वे बहुत डिमांडिंग लेडी नहीं रहीं, शुरुआती दौर में उनके त्याग, सन्तुलन और सन्तोष ने मुझे समाज सेवा के काम में आगे बढ़ने का हौसला दिया। जितना भी मिला उसी में घर और बच्चों की सलीके से परवरिश कर हमें उस तरफ़ से बे-फिक्र किया।'.. और वे चल पड़े ऐसे काम की तलाश में, जिसमें सेवा और दोनों हो...इस बीच करीब एक दशक तक उन्होने समाजसेवा के जुनून में लोगों, संस्थाओं से जुड़ते-टूटते रहे। कुछ गलत लोगों की संगत के बायस पुलिस के हत्थे चढ़े, तो अच्छे काम व बर्ताव के नाते अनेक सामाजिक और पत्रकार साथियों से मदद मिली। पत्रकारिता का क्रेज देखकर उधर हाथ भी आजमाया । एक वक्त आया, जब उन्हें लगा कि आजकल समाजसेवा की लम्बी पारी 'एकला चलो रे' की तर्ज़ पर खेलना 'बहुत कठिन है डगर पनघट की' जैसा है। बिना किसी संस्था के यह काम कर पाना आसान नहीं होता। 
     1998 में आते-आते वे 'समझदार' हो गये और 'अल फ़लाह' संस्था (NGO) बनाई। लेकिन कार्यप्रणाली और उससे सम्बन्धित दांव-पेच सीखने, जज़्बे को राह देने के लिए यामीन नगीना धामपुर संस्था से जुड़े। संस्था के साथ जुड़कर उन्होंने उस दौरान उड़ीसा व गुजरात में आये भीषण भूकम्प के हताहतों/पीड़ितों को राहत/सेवा प्रदान की। नगीना धामपुर, बिजनौर से जुड़कर उन्हें सेवा करने और काम जानने का मौका तो मिला ही, उनके प्रदर्शनी/ शिल्प बाजार में सहयोगी होने के नाते गरीब कल्याण और कारीगरी को प्रोत्साहित करने वाली सरकारी योजनाओं का भी ज्ञान हुआ। इसके लिए वे संस्था के साथ ही प्रेरणास्रोत और मददगार रहे महिला गरीब कल्याण योजना से जुड़े दिल्ली सरकार के तत्कालीन अधिकारी ए.के. हांडा का आभार जताते हैं ।फिर क्या था? फ़लाह हैंडीक्राफ्ट सोसायटी का बेड़ा चल पड़ा। कहते हैं किसी व्यक्ति के आगे बढ़ने और ऊचाईयां छूने के पीछे किसी औरत का हाथ होता है। यामीन इसे क़ुदरत खास करम मानते हैं कि खुदा ने उन्हें ऐसी दो औरतें बख्शी। दूसरी पत्नी उन्हें मीडिया से जुड़ाव के दौरान मिलीं। उन्हें भी पत्रकारिता का शौक था। शौक और साथ के नाते दोनों करीब आये और एक-दूजे के हो गये। अब वे समाजसेवा और व्यवसाय में खासा सहयोग करने लगीं। कारोबार परवान चढ़ने लगा।
इस सवाल पर कि समाजसेवा और कारोबार एक साथ कैसे साधते हैं?---यामीन खान इसे जेनुइन सवाल करार देते हुए बताते हैं कि जब वे सरकार की गरीब, दस्तकारी, महिला कल्याण से जुड़ी योजनाओं/कार्यों के बारे में गहराई से जान गये, तो दिल्ली और आसपास के गरीब रहवासियों, झुग्गी बस्तियों में जाकर ऎसे लोगों की तालाश की, जिनके पास हुनर तो है, लेकिन अपने उत्पादों को बढ़ाने के लिए पूंजी और बेचने के बाज़ार नहीं है। जब वे इस तरफ़ बढ़े तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। अबतक न केवल सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, ख़ासकर शिल्पकारी, हथकरघा, पॉटरी, कुम्हारी, सिलाई-कढ़ाई (इम्ब्रायडरी), खिलौने, अचार, पापड़, मुरब्बा, समान्य कपड़े बनाने वाले कामों से जुड़े विभाग व उपक्रमों से सहायता दिलाकर अपनी देखरेख और सम्बन्धित सरकारी के सक्षम/सक्रिय निर्देशन में पिछले एक-डेढ़ दशक में दिल्ली के संगम विहार, फरीदाबाद और आसपास के तीन हज़ार से अधिक परिवारों के रोजी-रोटी का जुगाड़ किया, बल्कि करीब दो दर्जन प्रदर्शनी/शिल्प बाजार लगवा कर उनके उत्पादों को बाजार दिया और घरेलू महिलाओं को बाहर निकलने का मौका और मंच दिया। जड़ी-बूटियों को जंगलों से खोजकर आम व खास का इलाज करने वाले पुश्तैनी वैद्यों को भी उन्होंने मदद, व्यापार और बाज़ार दिया। वे फ़लाह हैंडीक्राफ्ट सोसायटी, जिसके कि वे कोआर्डिनेटर हैं, के हस्तशिल्प के विकास सम्बन्धी कार्यों को आगे बढ़ाने में सबसे ज्यादा श्रेय 'सिडबी' को देते हैं। उनके मुताबिक, सुल्तान भारती (अध्यक्ष), पूनम शाक्य (जनरल सेक्रेटरी), सुनीता आदि मेम्बरान का सबसे बड़ा गाइडेंस और सहयोग मानते हैं। यामीन बताते हैं कि अब उन्होंने अपने बच्चों को भी स्वतंत्र होकर कार्य करने का मौका दे दिया है।
हाल ही में दिल्ली के द्वारका में आयोजित दस दिवसीय नेशनल गांधी शिल्प बाज़ार की सफलता और उत्पादों की रिकार्ड बिक्री से उत्साहित यामीन खान से जब पूछा कि एक तरफ़ देशी संस्कृति को बढ़ावा, दूसरी ओर फ़ैशन शो जैसे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तरह फ़ैशन शो जैसे आइटम का इस्तेमाल करना, कितना उचित है? उन्होंने कहा, इसके पीछे भी घरेलू महिलाओं के भीतर की कला को उभारने के साथ ही अपने उत्पाद के प्रति आकर्षण बढ़ाना ही उद्देश्य है।
पूरे डेढ़ घंटे बाद जब मुहम्मद यामीन खान का साक्षात्कार ख़त्म हुआ तो अपनी मैग्ज़ीन ( उदय सर्वोदय) के ऑफिस की ओर लौटते हुए रह रह कर मेरे जेहन में अवध के शायर एम के "राही" का एक शे'र  गूंज रहा था-
कोई तन्हा मुसाफ़िर कारवाँ बन जाता है जिस दिन!
उसी  दिन  मुश्किलों  के  हौसले  भी  टूट  जाते हैं!!

                 (सत्य प्रकाश)


Friday, 5 January 2024

अफजल ka इंटरव्यू

शख्सियत 

" है राम के वज़ूद पर  हिन्दोस्तां को नाज़"
                                         अफजाल 
                 ( राष्ट्रीय संयोजक राष्ट्रीय मुस्लिम मंच)

         अगर आप भारतीय राजनीति से खुद को जरा भी अपडेट रखते हैं तो- मुस्लिम राष्ट्रीय मंच- से वाकिफ़ होंगे! 2006 में आरएसएस द्वारा गठित इस संघठन का मकसद था, देश के ज़्यादा से ज्यादा मुसलामानों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ना ! इसके सूत्रधार हैं  इन्द्रेश कुमार जी और राष्ट्रीय संयोजक हैं अफजाल जी ! विनम्र और संघर्षशील अफजाल के सतत संघर्ष  का ही नतीज़ा है कि विपरीत विचारधारा और परिस्थितियों में भी उन्होंने संगठन को अंकुर से वृक्ष की शक़्ल में खड़ा कर दिया !
     ठीक 1 जनवरी 2024 की सुबह तयशुदा प्रोग्राम के तहत एक कार नोएडा की तरफ से कश्मीरी गेट ( पुरानी दिल्ली) की ओर बढ़ रही थी ! इस पर मेरे अलावा उदय सर्वोदय पत्रिका के चीफ़ एडीटर तबरेज खान और सह संपादक अजय चौहान बैठे हुए थे ! पत्रकार अजय सिंह- मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सुप्रीमो इन्द्रेश और संयोजक अफ़जाल के काफी क़रीबी हैं ! आधे घंटे बाद हम लोग अफ़जाल भाई के घर में मौजूद थे! वहाँ पर अफजल के अलावा मंच के राजस्थान प्रमुख दादू खान और महबूब खान के अलावा संघ के वरिष्ठ प्रचारक महिरध्वजसिंह भी मौजूद थे ! उन सब को  किसी प्रोग्राम में जाना था, इसलिए बग़ैर किसी औपचारिकता के मैंने अफ़जाल  भाई से सवाल दाग दिया,-  " सारे ही चैनलों पर- राम मंदिर- की ही चर्चा है ! क्या लगता है, इसके आगे सारे मुद्दे गौण हो  गए हैं-?"

     " नहीं ऐसा नहीं है, विकास के सारे काम भी चल रहे हैं ! राम मंदिर का मुद्दा कोई आज का नहीं बहुत पुराना है ! महापुरुष किसी एक वर्ग या संप्रदाय के नहीं  होते ! मर्यादापुरुषोत्तम राम के बारे में किसी शायर ने कहा है-

है  राम  के  वज़ूद  पर  हिन्दोस्तां  को नाज़ !
अहले नज़र समझते हैं उनको इमाम ए हिंद !!

अगर निजाम ए मुस्तफा का ज़िक्र होता है तो हमें अच्छा लगता है, उसी तरह रामराज का भी स्वागत होना चाहिए।  रामराज यानि सब के लिए इन्साफ़, सबका विकास !"
,,,,,,,,( सवाल)- ' जिस लक्ष्य को लेकर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना की गई, क्य़ा वो लक्ष्य पूरा हो गया है-?'
   ( जवाब) - '  हमनें वो ज़माना देखा जब दूसरी सरकारें थीं और आए दिन देश में दंगा होता था, कर्फ्यू लगा होता था! महीनो लोगों की मुलाकात नहीं हो पाती थी ! आज देश में वैसा कुछ नहीं है! हमारी कोशिश है कि मुस्लिम नजदीक आयें, समझें और गलतफ़हमी से मुक्त हो कर प्रगति और निर्माण में भागीदारी निभाएं ! हमारे मंच को इस दिशा में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त हो रही है"!

,,,,,,,(सवाल)-" राम मंदिर के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबको पता है, मैं उस पर नहीं जाऊँगा ! मेरा सवाल है कि काशी और मथुरा का मुद्दा भी उसी ढर्रे पर है, आपका क्य़ा कहना है-?"
(जवाब)----" इस विषय में जनमत और संप्रदायमत  अलग अलग हो सकते हैं, इसलिए निर्णायक फैसले के लिए कोर्ट होता है ! एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में संविधान ही तय करता है कि फ़ैसला क्या हो ! तो,,,,,मैं यही कहूंगा कि कोर्ट का जो भी फ़ैसला हो, दोनों पक्षों को स्वीकार्य होना चाहिए- "!

(सवाल),,,,,,   " देश की जनता के नाम क्या संदेश देना चाहेंगे ?"
 (जवाब),,,,;" देश में रहने वाले सभी हिन्दू औऱ मुसलामान को संविधान का पालन करना चाहिए ! संविधान का जो भी फ़ैसला हो, सबको स्वीकार्य होना चाहिए! देश का मुसलमान कहीं बाहर से नहीं आया है! राम किसी के लिए पूज्य हैं तो  किसी के लिए श्रद्धेय ! पूज्य और श्रद्धेय में कोई ख़ास फर्क नहीं है!"

(सवाल),,,," पूज्य और श्रद्धेय में बड़ा बारीक फर्क है,- चलिए, यहां पर - मुस्लिम राष्ट्रीय मंच- के सह संयोजक हाजी दादू खान जोइया हैं जो राजस्थान हाई कोर्ट में एडवोकेट हैं- आपसे मेरा सवाल है कि राम मंदिर बनवाने में आपके संगठन का कितना योगदान है "?
(जवाब),,,,," हमारे संगठन ने माननीय राष्ट्रपति जी को पत्र लिखकर राममंदिर बनाने के लिये अनुरोध किया ! देश के हिन्दू मुसलामानों से सम्पर्क कर इस विषय में आम सहमति बनाने का सघन प्रयास किया! राम मंदिर निर्माण में सहमति बनाने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने भी  बढ़ चढ़ कर प्रयास किए हैं ! मंच का प्रमुख उद्देश्य है कि विवाद न हो और भाई चारा बना रहे -"!

(आखिरी सवाल),,,,," मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के एक और पदाधिकारी महबूब खान यहां पर हैं, जो राजस्थान के गंगा नगर से ज़िला संयोजक हैं ! महबूब खान जी, राम मंदिर निर्माण में मुसलामानों की क्य़ा रुख होना  चाहिए -"?
( जवाब),,,,; " मैं तो चाहता हूँ कि आपस में भाई चारा होना चाहिए और सभी हिंदू मुस्लिम भाइयों को मिल जुल कर  रहना चाहिए-"! 

     ( समाप्त)


Thursday, 21 December 2023

(व्यंग्य चिंतन) फ़िर भी, हैप्पी न्यू ईयर

(व्यंग्य चिंतन)

 फ़िर भी, हैप्पी न्यू ईयर 

          अभी नये साल के  "हैप्पी" होकर आने में कई दिन बक़ाया थे कि 24 दिसंबर को किसी ने दरवाज़ा खटखटाया! मैंने घबराकर  दरवाज़ा खोला तो सामने चौधरी खड़ा था ! मुझे लगभग एक तरफ धकेलते हुए मेरी बेड तक आया औऱ रज़ाई में घुसते हुए बोला, 'घनी ठंढ करवा दी तने ! इब खड़े खड़े के कर रहो,कुर्सी पै बैठ जा- वर्ना ठंढ लग ज्या  गी "!
         " पर  वो तो मेरी रज़ाई है "!
    " वसुधैव कुटुम्बकम  का पालन करने  की जगह रज़ाई के खातर जान दे रहो ! दूजी रज़ाई नो है तेरे धौरे ! कदी तू भी आत्मनिर्भर हो लिया कर !!'
      मैं अंदर से एक औऱ रज़ाई ले आया औऱ सोफ़े पर बैठता  हुआ बोला,- ' बड़ी जल्दी उठ गए !"
     " मैं तुझे चेतावनी देने आया हूं  अक् इस बार मोय - हैप्पी न्यू ईयर- मत कहना "!
      " क्यों "?
 " गए साड़ तूने हैप्पी न्यू ईयर कहा, - खरी, चोकर, भूसा,सबै महंगा हो गयो ! इस बार अपनी काड़ी जुबान पै कंट्रोल रखना ! कदी कोरोना न आ  ज्या दुबारा-"!
      " पर  बीमार तो मैं हुआ था ! तुम्हें तो  ज़ुकाम तक न हुआ -"!
    " नू लगे  अक् तमै भी किसी की हैप्पी न्यू ईयर  लग  गी। पूरे साड़  तुझे हैप्पी न देखा कती, फ़िर काहे का हैप्पी न्यू ईयर ! तूझे आगाह करने आया हूं अक् इस बार अपना हैप्पी अपने धौरे रखना "!
    " इतनी नाराज़गी ठीक नहीं, आखिरकार तू मेरा तीस साल पुराना दोस्त है, हम बने तुम बने इक दूजे के लिए-'!
     "पता नहीं वा कूण सा मनहूस दिन था जिब मैंने तेरे गैल दोस्ती करी, हैप्पी होण कू तरस गयो -'!
        " झूठ ! तीस साल पहले जब तुम आये तो तुम्हारे तबेले में सिर्फ ढाई भैंस थीं, दो भैंस औऱ एक उनका बच्चा ! आज अट्ठाइस भैंसों वाला एक आत्मनिर्भर तबेला है तुम्हारे पास " !!
    'परे कर तबेला ने, अर् नू बता अक यू 'पनौती' कूण सी चीज़ है?"
  " विपक्ष का मनोबल बढ़ाने वाला यह एक ऐसा 'कोरो वॉरियंट'  था, जो क्रिकेट विश्वकप के फाइनल में लॉन्च हुआ औऱ चार राज्यों मे हुए चुनाव परिणाम सुनने के बाद 'वीरगति' को प्राप्त हुआ-" !
    " मैं समझा  को न्या?"
   " पनौती का अर्थ कैसे समझाऊ , यूँ समझ लो कि कमज़ोर,रणछोड़ और सुखद कल्पना में जीने वालों की खोज का नाम है पनौती ! इसकी आड़ में वह अपनी नाकामी को कुछ समय के लिए छुपा लेते हैँ !"
       " पर मोय नू लगे अक् तू मेरी भैंसों के लिये पनौती है"!
          'क्या ऐसा किसी भैंस ने कहा ?'
 ' वो तो शराफत में  कुछ नहीं कहतीं, संस्कारी जो  ठहरी ! पर मैंने भाँप लिया "!
     " क्यूँ नहीं, भैंसों के साथ रहते थोड़ा संस्कार तो तुम्हारे अंदर भी आ गया है"!  
   अचानक चौधरी मुझे घूरता हुआ बोला,- ' इब थारे धौरे भी एकाध बूँद संस्कार बचा हो तो चाय मंगा ले!" 
    तभी मेरा युवा बेटा चाय नमकीन औऱ पकौड़ी लेकर आया और चौधरी को नमस्ते कर मेज पर रख दिया ! चौधरी बोला, -' जीता रह बेटा !' फिर मेरी तरफ घूर कर बोला,-" थोड़ा संस्कार इस बच्चे ते सीख ले भारती -"!
      25 दिसंबर की रात डेढ़ बजे फ़िर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया ! दरवाज़ा खोला तो सामने चौधरी की जगह सांता क्लॉज़ खडा था! उसकी हालत देख कर लगता था कि भागता हुआ आ रहा है ! पैंट नुचा हुआ था, एक तरफ की दाढ़ी लटक रही थी , मैंने पूछा,- 'ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं ?' 
     "पूरे चौदह इंजेक्शन लेना पड़ेगा, पर अभी तो कुत्ते पीछे पड़े हैं। मुझे दौड़ा दौड़ा कर काटा है!"
  " अंदर आ कर आराम से बैठो "!
   " रंग बिरंगे कपड़े देख कर कुत्ते नाराज़ हो गए घाव को डेटॉल से धोना पड़ेगा ! जाने उनको नए साल से क्या दुश्मनी है !" 
         ' नये साल से ? '
    " हाँ , इधर से गुजरते देख एक कुत्ते ने भौंक कर मुझे देखा, मैंने उसे हैप्पी न्यू ईयर कह दिया ! गुस्से में वो मेरे पीछे दौड़ पड़ा ! उसके पीछे आधा दर्जन और कुत्ते थे ! शायद वो इलाके का मुखिया था  !"
    बाहर ठंढ और घात में बैठे कुत्ते दोनों थे, सांता वहीं सो गया ! सांता क्लॉज़ जब खर्राटे ले रहा था तो चौधरी ने रज़ाई में छुपा कर रखी बोतल निकाल लिया ! वो 31 तारीख तक और इन्तेज़ार नहीं कर सकता था !  न्यू ईयर के ख़ातिर  उसने 4 दिन पहले ही 2 बोतल 'हैप्पी' का इन्तेजाम कर लिया था ! फ़िर हैप्पी होने में देरी क्यों !!

             हैप्पी न्यू ईयर,,,,, रस्म दुनियां भी मौक़ा भी है- दस्तूर भी है ! और,,,, वैसे भी  जनवरी 2024 को 24  कैरेट 'हैप्पी' करने के लिए सरकार युध्दस्तर पर लगी हुई है ! इस साल को हैप्पी होने से कोई नहीं रोक सकता ! राम मंदिर बनकर तैयार है । सारे चैनल  हैप्पी होकर गा रहे हैं,- "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो"-! कुछ मनहूस लोग इसके बाद भी विकास का रोना रो रहे हैं,- ' अबहूं न  आए बालमा सावन बीता जाये-'! नए साल को  सामने देख  विपक्ष हैप्पी होने की जगह आहत होकर कोरस में गा रहा है,- 'जाने कहाँ गए वो दिन,,,,'! 
    जिनकी कुंडली में  'बनवास' पसरा पड़ा हो, उनके लिए  'न्यू ईयर' भला "हैप्पी" कैसे हो सकता है ! ख़ैर,,, एक शे'र मुलाहिजा हो,,,,

झोपड़ी से महल तक आकाश से धरती तलक !
नफ़रतों  का खात्मा हो,  प्यार  जिन्दाबाद हो !!

           Sultan bharti 
             (Journalist)