Thursday, 29 June 2023

(व्यंग्य भारती)। "आस्था ही तो है"

"व्यंग्य भारती"

    "आस्था ही तो है"

           अपने देश में आस्था भी है और अमृतकाल भी ! सौभाग्य से दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं! बस - साधारण आंखों से नज़र नहीं आती,- जिन खोजा तिन पाइयाँ -! अमृतकल है लेकिन विरोधी और विपक्ष को बिलकुल दिखाई नहीं देता ! कारण - जाकी रही भावना जैसी -! भावना तो है किंतु उसमे आस्था नहीं है ! भावना में आस्था न हो तो मोतियाबिंद हो जाता है ! अमृतकाल का रसपान करना है तो आस्था पैदा करो ! फिर तो,,, तेरे द्वार खड़े भगवान भगत भर ले रे झोली -! आस्था नहीं है तो झोला उठा कर चलते बनो ! आस्था ने प्रगति करने में सबको पीछे छोड़ दिया है, ( कलि) "काल" का सारा "अमृत" आस्था की बदौलत है !
            पहले आस्था सात्विक और शाकाहारी हुआ करती थी, बाद में मोनोपॉली बरकरार रखने के चक्कर में आस्थाओं में टकराव पैदा हुआ और आस्था में हिंसा की घुसपैठ हो गई ! फिर आस्था ने आस्था पर हमला बोल दिया, -' भला उसकी आस्था मेरी आस्था से श्रेष्ठ कैसे -'! वो और होंगे जो जियो और जीने दो - जैसे रूढ़िवादी विचारधारा पर अमल करते हैं, हम एक म्यान में दो आस्था नहीं रखने वाले ! तुम अपनी आस्था को लेकर पाकिस्तान चले जाओ ! ये हमारी आस्था का देश है, इस मामले में, एक बार मैने जो कमेंटमेंट कर दिया तो फिर हम संविधान की भी नहीं सुनते ! आस्था और बलि का पुराना रिश्ता रहा है ! पहले सरकारी पुल बनाने में भी लोहा,सीमेंट और बालू से ज़्यादा आस्था का ख्याल रखा जाता था, इसलिए नीव में मसाले से ज्यादा मानव बलि का ध्यान रखना पड़ता था ! जब से आस्था रहित पुल और फ्लाईओवर बनने लगे, आए दिन गिरने लगे हैं ! 
        आस्था आहत हो रही है, चोटिल हो रही है और प्रचंड हो रही है ! कभी कभी तो ये आस्था किसी खास समुदाय वाले सिंगल पर्सन को देखने पर आगबबूला भी हो जाती है ! पिछले हफ्ते हरिद्वार में गंगाघाट पर कुछ दाढ़ी वाले युवकों को घूमते देख कर भी आस्था को क्रोध आ गया था ! अच्छा हुआ कि " एंटी आस्था एलिमेंट" वक्त की नज़ाकत को भांप कर वहां से हट गए, वरना चोटिल आस्था की टोह लेने वाले मीडिया के '        महावीर ' माइक लेकर पूछ रहे होते, - ' क्या तुम को पता नहीं कि तुम्हें देखने मात्र से आस्था आहत होने लगी है, फिर भी यहां चले आए! इस साज़िश में और कौन कौन शामिल है ! अपना नाम बताइए?"
        आस्था को लेकर मल्ल युद्ध जारी है ! डिबेट में आने वाले बुद्धिजीवी अगर मारपीट करने में अक्षम और अनुभवहीन हैं तो उनका लाइव चीरहरण तय है ! पिछले दिनों एक योद्धा को महिला द्वारा - बडे़ बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले - से गुजरते देखा गया ! पहले कभी आस्था इतनी सेंसेटिव नहीं थी ! आज वाली आस्था में सहिष्णुता की मलाई नही है!
      अब सियासत के भीष्म पितामह की समझ में आ गया है कि जनता को क्या चाहिए! अब आस्था में विकास की गति देख कर जनता खुश है ! बाकी विकास अभी पाइप लाइन में हैं! हॉर्न बजाते रहो, जगह मिलने पर साइड दी जाएगी! विकास की वरीयता क्रम में अभी आस्था के बाद दूर दूर तक कोई नहीं है ! पहले और अब की आस्था में बहुत अंतर है ! वर्तमान आस्था मोनोपोली चाहती है। इसलिए तमाम धर्म वैज्ञानिक फावड़ा लेकर दूसरों के धर्म की खुदाई में लग गए हैं! सारा गेहूं घुना हुआ साबित करना है ! नकली इतिहास खुरच कर हटाना है और असली को खोद कर निकालना है ! इतिहास के मर्मज्ञ फावड़ा लेकर काम में लग गए हैं, दुनियां हमारी जागरूकता देख कर हीनभावना के चलते सकते में है।
    अब तो सियासत और समाज दोनो आस्था से चल रहे हैं ! अब तो आस्था ही पंचवर्षीय योजनाओं का मेरुदंड है ! आस्था  सत्ता की नाभि का कल्याणकारी अमृत है, और आस्था ही सबसे बड़ा विकास !  इसलिए, धर्म की जय हो ! विश्व का विकास हो ! ( हमारा जो होना था हो गया!)  सभी मानव एक हों ! ( यहां रुकावट के लिए खेद है!)  तमसो मा ज्योतिर्गमय है -! ( अंदर का धर्मयोद्धा जाग रहा है, सारे घर के बदल डालूंगा !)

           विगत दस दिन से अब मेरी सारी आस्था यूनिफॉर्म सिविल कोड के बर्मुडा त्रिभुज मेें गोते खा रही है !!

        
        

Sunday, 18 June 2023

"व्यंग्य भारती"। 72 हूरों का पैकेज

(व्यंग्य "चिंतन")

              " 72 हूरों  पर बवाल "

               मीडिया का कब्ज इस बार हूरों की बदौलत दूर हो रहा है ! कुछ लोगों के लिए तो हूर का ज़िक्र ही झंडू पंचारिष्ठ का काम करता है और अगर मामला इकट्ठा 72 हूरों का हो तो महान लोग  स्वर्ग की अप्सराओं का मोह छोड़ कर हूरों के हवनकुंड में कूदने आ जाते हैं ! इस स्वादिष्ट शास्त्रार्थ में चैनल के मीडिया प्रभारी कुछ अधेड़ "हूरों" को भी शामिल कर लेते हैं ताकि बूढ़े दर्शकों की भी आस्था बनी रहे। हूरें सदैव से आकर्षण का केंद्र रही हैं, अब बहस इस बात को लेकर है कि किसी सम्प्रदाय विशेष को ऐसा बड़ा पैकेज क्यों ! ये तो ईश्वर द्वारा किया गया  सरासर तुष्टिकरण का केस है ! ज़िंदगी में चार हूरों का पैकेज और मरने के बाद 72 हूरों का ! इस तुष्टिकरण के खिलाफ चैनलों ने जेहाद छेड़ दिया है! ऊपरवाला बरामद नहीं हो रहा है, इसलिए नीचे दाढ़ी वालों के पीछे माइक लेकर दौड़ रहे हैं!
       चैनल वाले लिफाफा में 'पंजीरी' भी देते हैं, इसलिए दोनों संप्रदाय के धर्मयोद्धा डिबेट में आ जाते है ! देवपुरुष से ज़्यादा , डिबेट में आईं (एक्सपायरी डेट छूती) हुरें गुस्सा हैं ! एक हूर कुपित होकर दाढी वाले पर गुस्सा निकाल रही है, - ' तुम मर्दों के लिए बहत्तर हूरें, हमारे लिए क्या -!'
     दाढी वाले सन्न ! बुढ़ापे के दहलीज़ पर खड़ी "हूर" जन्नत में मिलने वाले पैकेज को लेकर अभी से चिंतित है ! चिंता वाजिब भी है , कहीं स्वर्ग के संविधान में हूरों के पैकेज में पृथ्वी की तरह ब्वॉयफ्रेंड और लिव इन रिलेशनशिप की सुविधा न हुई तो ,,,! ( क्या जीना तेरे बिना -!) हूरों पर हुंकार भरते लोग और फुफकार मारती टीआरपी देखकर हर चैनल ने व्हिप जारी कर दिया, - ' मंहगाई, अपराध और समंदरी तूफ़ान जैसे सांसारिक विषय में कोई प्रोटीन नहीं है ! सारे लोग कैमरा और माइक लेकर मुस्लिम मोहल्लों में फेरी लगाओ, मस्जिदों की परिक्रमा करो !  सारे सवाल 72 हूरों को लेकर पूछो ! मगर सावधान, पढ़े लिखे से नहीं अनपढ़ और मज़दूर लोगों की बाइट ज़्यादा लेना ! हमारी टीआरपी और तुम्हारी सेलरी का फाइबर वहीं से आएगा , वरना यू आर फायर्ड -'!
     दिव्य पत्रकारों की अक्षौहिणी सेना कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान कर गई ! ठेले पर आम बेचते एक दाढ़ी वाले को देख कर एक पत्रकार ने अपना माइक संभाला, -' क्या नाम है आपका?' 
       ' कलीम नाम है, सब कल्लू कहते हैं '!
          " हूर के बारे में क्या कहना है?"
      कल्लू भाई ने समझा कि कोई नए नस्ल का आम आया है , - ' मंडी में ढूंढ लो बाबू, अभी शायद गोदाम से निकला नहीं । वैसे मेरे पास तोतापरी है, बढ़िया जायका है -'!
     " हूर आम की नस्ल में नहीं आती ! मैं उस हूर की बात कर रहा हूं जो आप लोगों को मरने के बाद जन्नत में मिलती हैं -'!
       " तब तो मेरे दादा ही बता सकते हैं आपको, चलिए मैं उनकी कब्र दिखा देता हूं, आप खुद ही पूछ लेना - ! मुझे तो बहुत गाली देते थे -'!
        एक पत्रकार अपने केमरामैन के साथ पंचर बनाने वाले अब्दुल की दूकान पर जा पहुंचा ! लंच का वक्त था कल्लू भाई बिरयानी खा रहे थे! भूखे पत्रकार ने अब्दुल से पूछा,- ' अब्दुल भाई, बडे़ की बिरयानी है क्या?'
    ' बड़े की बिरयानी तो बडे़ लोगों को नसीब होती है बाबू जी ! हम तो पंचर जोड़ने वाले छोटे लोग हैं, बकरा और मुर्गा से ही काम चला लेते हैं '!
      ' हैसियत'  की ऐसी कबीर वाणी सुन एंकर हीनता के चलते सदमे में आ गया ! थोड़ी देर में खुद को संभाल कर अब्दुल से पूछा, -'  बहत्तर हूरों के बारे में कुछ बताएंगे -?'
      " हां हां बिल्कुल !"
एंकर ने चैन की सांस ली, -' सुना है कि मरने के बाद बहत्तर हूरें मिलती हैं आप लोगों को ! कैसी होती हैं देखने में -?'
    " काहे जल्दी मचा रहे हैं बाबू जी ? मरने के बाद हूरें मिलती हैं न ! पहले मरने तो दीजिए -! अभी से परेशान हो , चलिए ऑक्सीजन आने दीजिए -'!
     गली में रद्दी पेपर खरीदने वाले अच्छन मियां से एक पत्रकार ने पूछा, - ' ये बहत्तर हूरों का क्या मामला है मियां जी ?' 
     " पता नहीं बाबू! हमारे मोहल्ले में सत्तार मियां ही अकेले ऐसे मर्द हैं जो "दो" हूरों को झेल रहे हैं ! हालांकि चार हूरों की छूट है, पर दो हूरों के सिलबट्टे में पिस कर पहलवान सत्तार मियां दस साल में पचासी किलो से पचास किलो  पर  आकर अटके हैं ! बड़ा कलेजा है भाई का, पिसे जा रिया है !"
        पत्रकार बहत्तर हूरों तक पहुंच ही नहीं पा रहा था !  अच्छन मियां बता रहे थे, -' मुहल्ले के जो नवजवान लौंडे चार शादियों का नमकीन ख्वाब देखते थे, अब सत्तार मियां का हस्र देखकर तौबा तौबा करते हैं ! पर मियां तुम बताओ ये बहत्तर हूरों वाला कौन मर्द मुजाहिद है, अभी जिंदा है क्या?'
      एक यू ट्यूबर सब्जी बेचने वाले बाबू मियां से पूछ रहा था, -'  ये हूरें दिखने में कैसी होती हैं खां साहब?'
    "बिल्कुल टमाटर की तरह सुर्ख़ रंग , मूली के पत्ते की तरह हरी आंखें, शहतूत जैसे होंठ ,तरोई जैसी पतली कमर,  गरदन जैसी कोई सब्जी फिलहाल दूकान में नहीं है! कुल मिलाकर ये समझो बाबू जी, कि उनमें कोई आदत हमारी बीवियों जैसी नहीं होगी, कि घर में घुसे नहीं कि जेब पर डाका पड़ा -'!
          " तुम्हें तो मरने के बाद 72 हूरें मिल जाएंगी, औरतों को क्या मिलेगा ?'
      " यहां की दुनियां में ज़्यादा से ज़्यादा चार हूरों की इजाजत है, वहां ये आंकड़ा बहत्तर तक है ! पर न तो यहां हर कोई चार हूरों के साथ चैन से जीता है न वहां बहत्तर के साथ जन्नत में जी पाएगा।  बाकी मैं तो ठहरा जाहिल, मौलाना साहब  सही जानकारी देंगे आपको -'!

      उधर एक चैनल के डिबेट में दाढ़ी वाले एक युवक ने ये कह कर आग पर घी डाल दिया था, - ' जैसा अमल होगा वैसा ईनाम मिलेगा ! गीता में भी कहा गया है कि - जैसा करम करोगे वैसा फल देगा भगवान' -! बस फिर क्या था, डिबेट में बैठीं तीन अधेड़ "हूरों" ने इसे अपने "कर्म" पर कटाक्ष समझ कर दाढ़ी वाले पर सर्जिकल स्ट्राइक शुरू कर दी थी ! 

        दर्शकों में उत्साह छा गया , एक धर्मविशेष का चीर हरण देख कर विरोधियों को घर का कनस्तर बगैर आटे के भरता हुआ नज़र आ रहा था, देश आत्मनिर्भर हो रहा था और ऐसा लगता था कि विश्व गुरु होने के रास्ते की सारी बाधाएं अब जाकर दूर हुई हैं !   

   72 हूरों  के चलते प्रगति के कितने सारे मेगा प्रोजेक्ट रूक  गए थे !

       -  Sultan bharti - [Satirist]

 

Thursday, 15 June 2023

(व्यंग्य भारती) "सपनों का नया पैकेज "!

"व्यंग्य" भरती
                "सपनों का नया पैकेज"

     अब का बताएं भइया ! आम में भले बौर न आए, विकास मे भरपूर आता है! परसों मोहल्ले के नेता के बेटे का बर्थडे था, भूतपूर्व विधायक जी भी आए थे! ( भूतपूर्व होने के बाद प्राणी मुख्य धारा में आने के लिए कितना व्याकुल होता है!) मुहल्ले के लोगों को थोक में देख कर वो केक की जगह सपने बांटने लगे, -' आधा जून निकल गया,बारिश नहीं हुई! मैं जब विधायक था तो आंधी,तूफान, बारिश,आम का बौर हो या गोमती मे बाढ़ सब कुछ वक्त पर आती थी ! कोई समस्या हो तो बताएं?'
                    समवेत स्वर में कई समस्याएं पेश हुईं, -' आपने जितने फार्म भरवाए थे, किसी को पेंशन नहीं मिली '!
      ' अभी तक मुझे आवास नहीं मिला '! 
    ' गांव तक आने वाली जो सड़क विधायक फंड से बनवाया था, वो एक बरसात में बह गई  '!
    ' मनरेगा में काम तो हुआ लेकिन मजदूरी नहीं मिली'!
    ' पुष्टाहार योजना का चना नही मिल रहा '!
" बिजली बराबर नहीं आ रही '-!
    आख़िरी शिकायत में फाइबर था, नेता जी को ऑक्सीजन मिली, - ' देखिए, ये सरकार जन विरोधी है।देश को बाइसवीं सदी में ले जानें की जगह गुफा युग में ले जा रही है ! अगले साल आपको इनके षड्यंत्र से बाहर निकलना है"!
 मुहल्ले के एक बुजुर्ग ने नेता जी की दुखती रग पर हाथ रखा दिया, -'  नये विधायक ने कहा है कि वो आपकी जांच करवाएगा, किस चीज की जांच?"
    नेता जी को लगा केक का कोई टुकड़ा गले में फंस गया है, गुस्सा पीकर वो मुस्कराए,  -' सत्ता पक्ष का काम है विपक्ष पर झूठे आरोप लगाना, मैं इसका बुरा नहीं मानता ! अभी तीन साल बाकी है, तब तक जानें कितने आरोप लगेंगे! मैंने तो जनता के उद्धार के लिए ही अवतार लिया है -'!
        इस वक्त देश में अमृतकाल चल रहा है ! कहां से आया और क्यों चल रहा है, छोड़ो ये न पूछो ! इस वक्त विकास को लेकर परस्पर विरोधी 

Saturday, 20 May 2023

"व्यंग्य भारती" दो हजार का नोट

"व्यंग्य" भारती

              दो हज़ार का नोट

         आज सुबह ही सुबह चौधरी ने आकर मुझे टटोला, - ' उरे कू सुण भारती ! तेरी तो लुटिया ही डूब गी , इब के करेगो !'
      मैं हैरान था, मेरी लुटिया डूब गई थी और मुझे बिल्कुल पता नहीं था! मैंने हैरत से बताया, - ' कैसे डूब गई, जब कि मेरे पास तो एक भी लुटिया नहीं थी -! फिर भी मुझे उसके डूबने का अफसोस है -!'
      " घणा पत्रकार बना हांड रहो, अर इतनो भी ख़बर नो है अक दो हज़ार कौ लोट बंद हो गयो, इब के करेगो '!
      " सरकार को धन्यवाद दूंगा ! सच कहूं आंखों को ठंढक पहुंचाने वाली ख़बर सुनाई है तुमने! कंबख्त को मैं फूटी आंख भी नहीं देखना चाहता था ! जब भी किसी को वो गिनते हुए देखता तो मन ही मन सोचता, काश उसकी उंगलियां जकड़ जाएं या जेब में आग लग जाए-'!
      " क्यों" 
   " क्यों कि मेरी जेब में लाल रंग के ये क्रान्तिकारी नोट कभी आये ही नहीं ! मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये नोट निकाला ही क्यों जो सबका साथ सबका विकास के अनुकूल न हो ! सामने वाले को गिनते देख हमेशा हीनता आ जाती थी! पचास रुपए से ऊपर का नोट छपना ही नही चाहिए, तभी डिजिटल इंडिया बन पाएगा -'!
   " कूण बना रहो डिजिटल इंडिया -'?
  ' कई लोग इस काम में लगे हैं! तुम्हें तो दूध का दही बनाने से फुर्सत मिले तभी तो डिजिटल इंडिया बनाओगे! तुम तो हर चुनाव में बेवकूफ बनते रहो,बस !'
       " के करूं, मने कदी बनाया कोन्या ! लोग उधार खा खा कर उल्लू बना दें! अच्छा याद दिलाया तने, कद चुका रहो पिछले साड़ की उधारी"?
        " इस साल उधारी की नहीं, प्यार मुहब्बत की बात करो, सुना नहीं, उधार प्यार की कैंची है! हमें तो कैंची का जिक्र भी नहीं करना चाहिए, खैर अब ये तो बता दो कि घर में दो हज़ार वाले कितने पड़े हैं? उन्हें देख कर घबराना मत, मैं हूं न !"
       " अच्छा याद दिलाया, नू बता, वो सीआईडी वाड़ा के मामला हा ?"
      " सीआईडी वाला ! मैं समझा नहीं?"
     " वर्मा नू बता रहो अक - बंद हुए दो हजार वाड़े नोट में सरकार ने सीआईडी फिट किया हा "!
     " अच्छा, तुम्हारा मतलब चिप्स ! हां, सुना तो मैने भी था, पर टटोल कर कभी देखा नहीं "! 
      " पर लगाया किस लिए था ?"
    " सरकार ने चिप्स लगा कर नोट को छोड़ दिया था, कि जहां जहां नोट जाएगा, सरकार को ख़बर लग जाएगी कि उस नोट के इर्द गिर्द कितने काले धन वाले नोट हैं ! चिप्स की आपसी बात चीत रिकॉर्ड होते ही ईडी वाले जाकर जमाखोरों को पकड़ लेने वाले थे "।
    " जमाखोर कूण सै "? 
     " कैसे बताऊं ! ऐसा समझ लो जैसे किसी दूध बेचने वाले के धौरे बगैर हिसाब के नोट आ जाए और वो फिर भी शरीफ़ लोगों से उधारी वसूलने की चिन्ता में दुबला होता रहे ! साठ साल की उम्र में तो  मोह माया से दूर रहना चाहिए "!
    चौधरी ने घूर कर देखा, - ' जो पूछ रहा, वो बता दे ! जिब नोट बढ़िया काम कर रहा था, फेर बंद करने की के ज़रूरत पड़   गी "?
     " वही तो रोना है चौधरी, नोट नाकारा साबित हुआ ! बिलकुल बिलल्ला !!"
        "  कैसे ?"
     " नोट को इसलिए स्पेशल बनाकर छोड़ा गया था कि वो काले धन को ख़त्म करेगा, पर वो खुद काले धन कुबेरों के साथ गलबहियां डाल कर गाने लगा, -' हम बने तुम बने इक दूजे के लिए -'!
    " कती धोखेबाज लिकडा -"!
  "जमाना घणा बुरा सै चौधरी! कितने लाड प्यार और उम्मीद से पाल पोस कर उसे मिशन में लगाया गया था, पर - सब धन धूल समान- ! इसलिए महाबली के आदेश पर नोट की किडनी निकाल ली गईं, और उसे  देश निकाला दे दिया गया - चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना -- "!
    " काड़े धनवाड़ा ?"
  " उसे पकड़ने के लिए कोई नया नोट और नया तरीका निकाला जायेगा! वैसे देखा जाए तो बड़ी विकट समस्या है, जिसे काले धनकुबेर पर लगाम लगाने के लिए भेजा जाता है, वही अपनी पीठ पर काठी लगा कर उनके सामने हिनहिनाने लगता है "!
    " कितै छुपा बैठो है यू काड़े धन वाड़ा ?"
एक बारगी तो मेरे मन में आया कि 'वर्मा जी' का नाम ले लूं, फिर सोचा कि तीनों का संडे खराब हो जायेगा ! मैंने चौधरी को समझाया, -' सरकार ने नोट बंद कर के सर्जिकल स्ट्राइक तो कर दी है!"
   " के    मतबल !!"
   " काले धनकुबेरों के लिए काला धन ही ऑक्सीजन है, ऑक्सीजन बंद तो सांस बंद! इस वक्त काले धन वालों को दिन रात हिचकी आ रही है, क्योंकि सरकार ने दो हज़ार का नोट बंद करके उनकी ऑक्सीजन सप्लाई रोक दी! वैसे तुम्हारे पास लाल रंग वाला कितना काला धन है '?
   ' कटे घाव पे कटहल मत गिरा ! किस्मत में काड़ा सफेद कैसा भी नोट कोन्या ! देखने कू कती तरस गयो ! किस्मत कती खराब सै, तीस साड़ पहले तू आयो अर तीन साड़ ते कोरोना ! जिब ते कुंडली की सांस उखड़  गी ! लोग नू कहें अक उधार देने ते बरकत उड़ ज्या! आखिरकार तेरी उधारी के चलते दो हज़ार का नोट उड़ गया -! चल इब लौटा दे बरकत नै -!"

  चौधरी को उधारी की हिचकी शुरु हो गई थी , मैने चुप हो जाना ही बेहतर समझा !

        ( Sultan bharti)




Tuesday, 2 May 2023

व्यंग्य भारती "मैं बपुरा बूडन डरा,,,!"

(व्यंग्य भारती)

     मैं बपुरा बूड़न डरा,,,,,,"!

     अब क्या बताऊं कि मैं लीगल काम करने में भी कितना डरता हूं ! मैं विचार करने में उम्र खर्च करता रहा और भद्र जन विकास करते रहे ! जितनी देर मैं आत्मनिर्भर होने के बारे में सोचता हूं, उतनी देर में लोग एन जी ओ बनाकर दूसरों को आत्मनिर्भर करने में लग जाते हैं ! शायर लोगों ने मेरी इसी लेट लतीफी पर एक शेर भी कहा है, -' कारवां निकल गया गुबार देखते रहे -'! अब भैया क्या बताऊं, इतनी बार गुबार को देखा कि आंख और दिल दोनों में मोतियाबिंद का खतरा  है !
     2020 के बाद जब रोटी रोजी में कोरोणा लगा तो मेरे जैसे लोग आपदा में घिर गए, लेकिन साहसी लोग अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने लगे । यही वो लोग थे जो आपदा और अवसर दोनों का मर्म समझते थे ! ऑक्सीमीटर से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक एक दम से उड़ गए, तो यही वीर पुरूष संजीवनी बूटी ढूंढ कर लाते रहे! ऐसे ही वीरों के बारे में साहित्यकारों ने कहा है, - वीर भोग्या वसुंधरा -! (कलियुग में कुछ लोगों ने इन वीरों की प्रगति से कुपित होकर उन्हें  "कालाबाजारी" करने वाला तक कह दिया ! का करें, लोग तो संतो को भी नहीं बख्शते!) 
          जो प्राणी आपदा की आहट पाकर ही पसीने पसीने हो जाता हो , वो क्या ख़ाक अवसर का लाभ उठाएगा! यहां तो अवसर का विज्ञापन देख कर आपदा की गंध महसूस होती है ! परसों शाहीन बाग के बस स्टॉप पर - ' प्रतिदिन 1200/ से 3500/तक कमाएं -' का विज्ञापन देखा ! बेकारी का पतझड़ झेल रहे शख्स के लिए ये बहुत बड़ी रकम थी ! फौरन दिए हुए नंबर पर फ़ोन मिलाया ! उधर से बताया गया कि मैं बड़ा भाग्यशाली हूं, क्योंकि अब सिर्फ़ एक ही सीट बची है -!' कायदे से तो मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन मुझे अवसर और ऑफर की जगह मछली फांसने का कांटा नजर आने लगा ! उधर से एक लडकी बेहद मधुर आवाज़ में बता रही थी,-' मैं फर्म का एकाउंट नंबर व्हाट्स ऐप कर रही हूं, आप सिक्योरिटी के तौर पर सात हजार पांच सौ रुपया फौरन डिपॉजिट करवा दो, आपका अपॉइंटमेट लेटर भेज दिया जाएगा ! हैव ए गुड डे सर -'! 
         एक बार फिर मैं खुद को अवसर के ऑउटर पर खड़ा हुआ देख रहा था !
             किसी के पास घर न हो और उसे ये विज्ञापन नज़र आ जाए तो,,,,,,- दिल्ली से बीस मिनट की दूरी पर ग्रेटर नोएडा में अपना आशियाना बनाएं, सिर्फ 4500/ प्रति गज के रेट पर! दस हज़ार देकर  कब्जा  पाएं, बाकी  आसान किश्तों पर -! इस सादगी पे कौन न लुट जाए ऐ खुदा ! पढ़ते ही खाट समेत घर नज़र आने लगता है। फिर भी मैं बपुरा बूडन डरा,,,! तमाम सवाल कांटों की तरह हलक उग आए, - ' ये सतयुग वाला प्रॉपर्टी डीलर कौन आ गया ! दिल्ली से बीस मिनट के फासले पर ? पैदल या बुलेट ट्रेन से बीस मिनट !!
कनॉट प्लेस से बीस मिनट या कड़कड़डूमा से बीस मिनट !! पैतालीस सौ का रेट तो तुगलकाबाद किले के अंदर भी नही है -!'  अपने आप से इतने सवाल !! एक बार फिर मैं वीर भोग्या वसुंधरा - का अवसर खो बैठा था।
       बेहद सज्जन आदमी और भेड़ में बड़ी समानता होती है, दोनों ही नियमित रूप से मूंडे जाते हैं ! देश में कभी पब्लिशर प्रचुर मात्रा में थे, लेखक कम थे ! आज लेखकों की सुनामी आई हुई है,मगर फ्री में छापने वाले देसी घी की तरह दुर्लभ हैं ! कैफियत ये है कि लेखक - हरि अनंत हरि कथा अनंता - की तरह हर मोहल्ले में व्याप्त है, किंतु कैश की जगह कंटेंट के आधार पर रचना छापने वाला प्रकाशक , ईश्वर की तरह होते हुए भी, नज़र नहीं आता ! फिर  कालिकाल  में  अचानक ही  मामला, - बरसे कंबल भीगे पानी - जैसा सरल हो गया ! यानि जो लेखक पहले प्रकाशक को ढूंढ रहे थे, उन्हें अचानक प्रकाशक पुकारने लगे, - आवाज़ दो कहां हो -! सोशल मीडिया पर बरसीम की तरह पब्लिशर उगने लगे ! ये प्रकाशकों की वो दिव्य प्रजाति थी जो हर ' निरहुआ' को "नामवर"  बनाने  पर उतारू थे ! लगभग हर प्रकाशक हर रचना को एक सौ पैंसठ देशों में बेचने का दावा कर रहा है , साथ में सौ फीसदी रॉयल्टी वाला थैला ! मेरा मन भी ज्वालामुखी में फौरन कूद पड़ने को आतुर था, पर 2999 रूपए का पैकेज देखकर एक बार फिर हलक में सवाल उग आए, और एक बार फिर मैं - "सौ प्रतिशत रॉयल्टी और विश्व विख्यात"- होने से महरूम हो गया ! कारण,,,,,?
   मैं बपुरा बूड़न डरा ! ये जो बुद्धिजीवी होते हैं न! ये कभी रिस्क नहीं लेते ! आपदा में खुश रह लेंगे, लेकिन डूबने का रिस्क नहीं लेंगे ! अपनी शादी को छोड़ कर हर अवसर को  शक  की  नजर  से देखते हैं !  2999रुपए का पैकेज देखते ही जहां नया लेखक फौरन विश्वविख्यात होने को व्याकुल हो जाता है, वहीं बुद्धिजीवी लेखक सवाल खड़ा कर देता है, इतनेकम पैसे में - कागज़, टाइपिंग, प्रिंटिंग, प्रूफ रीडिंग, पैकिंग,,, ! ज़रूर कुछ घपला है ! अब आप खुद सोचो, भला इतने शक्की साहित्यकार को इस दौर का सतयुग कैसे सूट करेगा ! इसलिए ऐसे खुन्नसी लेखक सत्तर साल की उम्र में भी वरिष्ठ और विख्यात होने से वंचित होते हैं,और एक दिन उन्हीं बागी तेवरों के साथ "वीरगति" को प्राप्त होते हैं ! और फिर,,,, उनके विरोधी भी मंच पर उन्हें "महान" घोषित करते हुए ऐलान करते हैं,- ' खुदा  बख्शे, बहुत  सी  खूबियां  थीं  मरने  वाले में - !'

  तो,,,,पहुंची वहीं पे खाक  जहां का  खमीर था !

    Sultan bharti 

Sunday, 23 April 2023

("व्यंग्य"भारती) अब किसी बात पर नही आती

"व्यंग्य" भारती

,,,,"अब किसी बात पर नहीं आती"

         अब का बताएं भैया, मेरी हंसी खो गई है ! कोरोना के दौरान भी हंसी का ऑक्सीजन लेवल ठीक था ! हंसी तब भी क्रिटिकल नहीं थी जब यदा कदा डॉक्टरों ने मरना शुरू किया था ! जब मरणासन्न नींबू 280 रुपए किलो बिक रहे थे, तब भी मैं गाहे ब गाहे हंस लेता था ! जब विपक्ष बाढ़, सूखा और चक्रवातीय समुद्री तूफान के पीछे सत्तारूढ़ दल को जिम्मेदार ठहरा रही थी तो भी मेरी हंसी आत्मनिर्भर थी ! जब खेतों में गेहूं की फसल बारिस में तबाह होने पर भी मीडिया खाद्यान व्यवस्था को पहले से ज्यादा मजबूत बता रही थी, तो मेरी हंसी भी अर्थव्यवस्था की तरह मजबूत हो रही थी ! जब धार्मिक जुलूस के बाद उपद्रव से भाईचारा मजबूत हो रहा था ,तो भी हंसी में कोई इन्फेक्शन नहीं पैदा हुआ !
      लेकिन अब,,,, गज़ब भयो रामा जुलम भयो रे !
ऐसा लगा जैसे हंसी कोमा में चली गई! सारे टोटके आजमा लिए, हंसी नहीं आ रही ! वैसे मेरे घनिष्ट मित्रों में ऐसे ऐसे 'शुभचिंतक' हैं जो मुझे हंसता हुआ देख लें तो उनका 200 ग्राम खून जल जाए ! मैने सोचा, क्यों न उन्ही से किसी एक से शुरूआत करूं! सबसे पहले मैने वर्मा जी से ही दुख बांटना बेहतर समझा, मैंने जान बूझ कर काफ़ी गमगीन लहज़े में कहा, -" मेरे ऊपर तो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है -"!
         'मेरे ऊपर मुसीबत'- शब्द सुनते ही वर्मा जी के चेहरे की रौनक और चमक एक दम से बढ़ गई, फिर अचानक ही जबरदस्ती मायूस होने की नाकाम कोशिश करते हुए बोले, -" भगवान की जैसी मर्जी ! होनी को कौन टाल सकता है, तो,,,यह  पहला हार्टअटैक था क्या?"
     " नहीं "! 
   " ओह, तो दूसरा था  ! सद अफ़सोस !! अब सिर्फ़ एक अटैक और पेंडिंग है! भाई कहा सुना माफ़ करना ! जीवन चला चली का मेला है!'
   " वो बात नहीं है -'!
वर्मा जी की आंतरिक खुशियों पर जैसे नींबू की पहली बूंद गिरी हो ! थोड़ा शंकित होकर उन्होंने पूछा, -" तो,,, क्या है -?"
    "पिछले हफ्ते से मुझे हंसी नहीं आ रही है !"
      ऐसा लगा जैसे उनकी आखों में क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा हो ! अपनी खुशियों की भ्रूण हत्या होती देख वो क्रोध में दुर्वासा ऋषि नज़र आने लगे, - " तुझे हंसी नहीं आ रही और मुझे अब अपने आप पर रोना आ रहा है ! मुझे पता होता तो मैं कभी दरवाज़ा न खोलता -!"
  " तो गोया आप मेरे आकस्मिक मृत्यु से खुश होने वाले थे ?"
   अब वर्मा जी को लगा कि उन्होंने खुशी प्रकट करने की जल्दबाजी में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती, खुद को संभालते हुए उन्होंने मामले पर मिट्टी डाली, - ' तुम्हारे बारे में दुखद खबर सुनकर मेरा हार्ट अटैक हो जाता तो,,,?'
     मैं जानता था कि उनकी सुखद कल्पनाओं पर वज्रपात हो चुका है , कुछ देर और रुक कर मैं उनके घाव पर नींबू नहीं टपकाना चाहता था! मैने अपने दूसरे मित्र चौधरी के पास जाकर अपनी समस्या बताई, -' मुझे हंसी नहीं आ रही है -'!
 ' पर मन्ने त घणा रोना आ रहो ! कूण सा बुरो बखत हा, जिब थारे बगल आके बस गयो! कोरोना कती पीछा न छोड़ रहो! आजकड़ सेहत अर खुशी सिर्फ डॉक्टरन के धौरे मिलेगी -'!
  " हंसी के लिए मैं डॉक्टर को अफोर्ड नहीं कर सकता "!
    अचानक ही चौधरी को कुछ याद आ गया, -'उरे
कू सुन भारती! यू सतपाल मलिक कूण सै?'
     " गृहमंत्री ने पत्रकारों से एक सवाल पूछ कर सतपाल मलिक की सारी इमेज को ही कटघरे में खडा कर दिया कि अगर वो इतने बड़े सत्यवादी हैं तो इतने दिन खामोश क्यों थे? अब कुर्सी से हटने के बाद सत्यवादी होने की क्यों सूझी !! खैर, मैं क्या करूं, मुझे हंसी नहीं आ रही है ?'
      " तेरी वजह ते बहुतों को हंसी न आ रही, भगवान के घर देर है, पर अंधेर कोन्या -!'
       वहां से निकल कर मैंने पड़ोस के ही एक छायावादी कवि से समस्या साझा की,-' क्या करें,- '
पहले आती थी हाले दिल पे हंसी!
अब  किसी  बात  पे  नहीं  आती !!'
      उनके मुरदार चेहरे पर ग्राहक पाने वाली खुशी नज़र आई  ! वो चहक कर बोले - " बहुत दिनों के बाद इतनी विलक्षण क्रान्तिकारी कविता का सृजन हुआ हुआ है, तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम सही मुहूर्त में आए हो "!
            न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि मैं दलदल में फंसने वाला हूं ! कवि का मुझे देखते ही इतना खुश होना,,,,मुझे शक हो रहा था। कवि तुरंत बगल वाले कमरे में घुसा, मैने समझा नाश्ता लाने गया है, परंतु उसे एक रजिस्टर के साथ लौटते देख मेरा शक भय में बदल गया ! रजिस्टर खोलते हुए कवि मेरी तरफ़ देख कर मुस्कराया, - ' मुझे पूरा यकीन है  कि मेरी कविता सुनकर आपकी खोई हुई हंसी वापस लौट आएगी "!
       मेरा गला सूख रहा था, मैंने धड़कते दिल के साथ पूछा, -' ये कविता संग्रह है क्या ?'
       ' और नहीं भाई, ये एक ही कविता है, एक सौ पैंसठ पेज लंबी ! इसे गिनीज़ बुक में ले जाना है, किंतु कोई सुनने को राज़ी नहीं है ! देखिए, आज़ आप  हत्थे चढ़ गए ! ख़ैर,,,इस कविता का शीर्षक है  "मय्यत" !
    सुनकर  मेरी आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया ! मेरे दो घंटे का जनाजा उठने वाला था ! कवि मेरे सामने इस तरह बैठा था कि मैं भाग भी नही सकता था ! कवि ने अभी पहला पेज खोला ही था कि दरवाज़ा धड़ाक से खुला और चौधरी अंदर आया ,  -' उ रे कू सुन भारती ! दूध अर घी दोनों तोल दिया है, इब चलकर  ठा ले "!
     मैं जान बचा कर भागा ! कवि मेरी तरफ़ ऐसे देख रहा था गोया, किसी ने बिल्ले के मुंह से कबूतर छीन लिया हो ! रास्ते में  चौधरी  मुझसे कह रहा था, -' थारी किस्मत अच्छी थी , अक मन्ने तुझे कवि के घर में घुसते देख लिया हा, वरना आज तू ढाई घंटे ते पहले लिकड़ न पाता ! कवि कू घने दिन ते या कविता सुनने वाड़ों की तलाश सै ! एक दिन वा ने दो लाइनें मेरी भैंस कू सुना दी, भैंस नै दूध देना कती बंद कर दिया ! उसे नॉर्मल होने में हफ्ता लिकड़ गया ! कदी मैं फंस जाऊं त फिर तू भी मेरो ध्यान रखियो' - ! 

  अब कैफियत ये है कि जब भी भैंस को देखता हूं, बेशाख्ता हंसने लगता हूं !

  

Friday, 7 April 2023

(व्यंग्य "भारती") " तीन एंकर "

( व्यंग्य "भारती")

              तीन एंकर

      महानगर में दंगा हो गया! पूरी रात शहर दंगाईयों के कब्जे में रहा ! गरीबों को लूटने और घर जलाने के साथ साथ मस्जिदों में तोड़ और आगजनी भी की गई ! दंगाईयों ने हथियार लहराते हुए पीड़ितों पर ईट पत्थर फेंके, मस्जिदों पर हमला किया, नमाजियों के साथ मार पीट की और एक प्राचीन मदरसे में आग लगा दी ! अगले दिन दोपहर  तक मीडिया के लोग सक्रिय हो गए। एक एंकर जलाए गए मुहल्ले में, दूसरा उस मस्जिद मे जिसके नमाजियों को घुस  कर पीटा गया था, और तीसरा एंकर जलाए गए प्राचीन मदरसे में जा पहुंचा !
               ( पहला एंकर )
   ' मैं उस मुहल्ले में हूं , जहां 'कथित' रूप से लूटपाट और आगजनी हुईं है ! हर्ष का विषय है कि  भीड़ ने किसी को जान से नहीं मारा ! इसका अर्थ है कि अभी भी अपने देश के लुटेरों में दया, भाईचारा और सहिष्णुता का अभाव नहीं है ! किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है, -' दया समान धर्म नहीं दूजा -!   इस मोहल्ले में दंगाईयों ने लूटा पीटा, आग लगाया किन्तु दया और इंसानियत पर अटल रहे ! हमें उनसे सीख मिलती है कि दंगे के समय भी दया और मानवता नहीं त्यागना चाहिए -'!
       मीडिया को देखकर जले हुए घरों से कुछ लोग निकल कर देखने लगे थे, एंकर माइक लेकर एक महिला के पास जा पहुंचा , - ' धार्मिक जुलूस था, आप लोगों की तरफ से उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए पथराव किया गया था ! पहला पत्थर आप में से किसने फेंका था -'?
     " किसी ने नहीं !'
          पत्रकार की भावना को ठेस पहुंची,- ' ठीक से सोचो ! बगैर पथराव के दंगा कैसे हो सकता है ! लगता है सदमे की वजह से तुम्हारी याददाश्त जा चुकी है , अब तो अगले दंगे में ही याददाश्त वापस लौट पाएगी-!'
     'हम सब मज़दूर हैं, पथराव क्यों करते! जुलूस तो पिछले साल भी आया था- '!
   ' अच्छा! तो पिछले साल आप लोगों ने पथराव नहीं किया था, तो इस साल भी न करते ! चलिए अब उस मास्टर माइंड का नाम बताइए, जिसने पथराव और दंगे की प्लानिंग बनाई थी?"
   तभी एक और महिला चिल्लाई, -' मार दहिजरे को ! हमारा घर जला और हमारे ही आदमी जेल में बन्द किए गए,  ये घाव पर नमक छिड़क रहा है -'! 
   औरतों की भीड़ को पत्थर ढूढते देख एंकर और कैमरामैन भाग निकले! 
                 ( एंकर नंबर 2 )
      ये एंकर ठीक उस वक्त मस्जिद के अंदर पंहुचा जब लोग रोजा इफ्तार की तैयारी कर रहे थे। माइक और कैमरा देखकर कुछ बुजुर्ग नमाज़ी पास आ गए ! एंकर ने पूछा, -' परसों आख़िर हुआ क्या था ?'
     सर पर पट्टी बंधवाए हुए एक बुजुर्ग बताने लगे, -' हम लोग रोजा खोल रहे थे, तभी लाठी डंडे और लोहे की सरिया लेकर भीड़ अंदर आई और मार पीट शुरु कर दिया!"
     ' एफ आई आर में जिक्र है कि मस्जिद से पथराव हुआ था,आप लोग इफ्तारी में भी पत्थर लेकर बैठते हैं - ' ?
   ' हमारी इफतारी चेक कर लीजिए !'
' अगर आपने पथराव नहीं किया तो जुलूस वालों को चोट कैसे लगी! आपमें तो कोई घायल नहीं हुआ ?'
      ' शायद आपको हमारे सर पर बंधी पट्टी भी नज़र नहीं आ रही '-!
 " पट्टी से तो पता नहीं चलेगा कि पत्थर जुलूस की तरफ़ से आया या मस्जिद की तरफ से ! क्या पता आप किसी नमाज़ी के पथराव का निशाना बने हों! किसी नमाज़ी से कोई पुरानी रंजिश - ?'
    बुजुर्ग अपना बाल नोचता हुआ चीखा, -' खुदा के वास्ते मस्जिद से निकल जा ! वर्ना हम सब पागल हो जाएंगे -'!
   मस्जिद से बाहर आकर एंकर माइक पर व्यूअर्स को बताने लगा, -' दर्शक सीधी तस्वीरें उस मस्जिद की देख रहे हैं, जहां से परसों धार्मिक जुलूस पर पथराव हुआ था और भक्तों को गंभीर चोटें आईं थीं! मस्जिद में आज भी काफ़ी लोग जमा है, और पुलिस का दूर दूर तक कोई पता नहीं है ! ऐसे में कोई जुलूस निकला तो मस्जिद की तरफ से पथराव होना तय है ! कैमरामैन धृतराष्ट्र के साथ मैं कुमार दिव्य दृष्टि!"

                          ( तीसरा एंकर)

      यह एक जला हुआ प्राचीन मदरसा था जहां सैकड़ों दुर्लभ मजहबी ग्रंथ जला डाले गए थे! मदरसे के एक बुजुर्ग टीचर एंकर को दिखाते हुए बता रहे थे, -' ये इतना बड़ा नुकसान है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती "!
     '  क्यों ?'
" सैकड़ों साल पुरानी किताबें कहां से आएंगी!'
      ' आग लगाने वाले कौन थे '?
 ' हिंसक भीड़ थी, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता ! मदरसे की पहचान जिन किताबों के बदौलत दुनियां में थी, उसे जला दिया गया -'!
    ' ऐसा लगता है पड़ोसी राज्य बंगाल से उपद्रवी आए थे, आपका क्या कहना है?'
      ' मैं कैसे बता सकता हूं, ये तो जांच करने के बाद पता चलेगा -'!
   " बंगाल के लोग मछली बहुत खाते हैं,यहां चारों ओर मछली की गंध फैली हुई है! आप हमारे कैमरे पर बयान दीजिए कि दंगाई लोग पश्चिम बंगाल से आए थे -'!
 "ये महक मछली की नहीं , मिट्टी के तेल की है ! दंगाईयों ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई थी '!
   एंकर बिलकुल हताश नज़र आने लगा था, बुजुर्ग टीचर बता रहे थे, - ' मछली तो हम भी खाते हैं "!
      " तो फिर,,, हो सकता है, मदरसे में उस दिन मछ्ली पकाते हुए आग लगी हो ! याद कर के बताओ, उस दिन कौन सी मछ्ली पका पका रहे थे आप लोग -"?
     बुजुर्ग को बिलकुल गुस्सा नहीं आया, - " वो दूसरी इमारत है, जहां खाना बनता है, उसमें आग नहीं लगाई गई, आइए छत पर चलते हैं "!
         छत पर सीमेंट, ईट और रोड़ी पड़ी थी, देखते ही एंकर का मायूस चेहरा खिल उठा , -' तो,,, यही है वो गुप्त जगह, जहां से उस दिन धार्मिक जुलूस पर पथराव किया गया था ! कितने आदमी थे ? '
         " उस दिन कोई जुलूस नहीं निकला था , भीड़ आई थी जो लूटमार और आगजनी करके चली गई -'!
     " अच्छा ! मतलब आप लोगों ने जुलूस को निकल जाने दिया, पीछे चल रही भीड़ पर पथराव किया था ! पथराव करने में आप के साथ मदरसे के और कितने आदमी थे ?"
     बुजुर्ग टीचर गंभीर होकर बोला,-' मुझे तो पत्थर बाज़ साबित ही कर दिया तुमने, बाकी की पहचान भी तुम्हीं बता दो -! बस इतना और बता दो, कि इतना इल्म लाते कहां से हो  -'!!
       आधे घंटे बाद मदरसे से बाहर आकर एंकर अपने कैमरे  के सामने बोल रहा था, -' हर्ष का विषय है कि मदरसे की छत से हुए  पथराव से भीड़ को चोट नहीं लगी ! लगता है जैसे, पथराव से क्रुद्ध भीड़ ने ही मदरसे में आग लगाई थी ! अगर मदरसे के स्टॉफ और छात्रों पर सख्ती की जाए तो ईंट का ईंट और मछ्ली का मछ्ली पता चल जायेगा -' !!

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