Wednesday, 30 September 2020

" इश्क कमीना"!

          मुझे सचमुच नहीं मालूम था कि इश्क और गिरगिट में इतनी समानता होती है!अब देखिए ना, सतयुग में जो इश्क "इबादत" हुआ करता था, कलियुग में रंग बदल कर "कमीना" हो गया ! इश्क  का इतना अवमूल्यन तो भारतीय रुपये का भी नहीं हुआ ! पूजा,और इबादत से फिसलकर इश्क जीडीपी की तरह गिर गया ! ये प्यार मुहब्बत में संक्रमण की पहली शुरुआत थी !  इश्क मेें कमीनापन और रिश्तों में बाज़ारवाद उतार कर इश्क का वायरस समाज से कहता है , " आ गले लग जा "! इश्क का कमीना वायरस  कोरोना से ज्यादा स्पीड से इन्फेक्शन फैलाता है। इस इन्फेक्शन से पीड़ित जीव अपनी खाल नोचकर खुजली जैसे आनंद की अनुभूति पाता है ! ( वैसे, आजकल के आशिकों के इश्क और खुजली में कोई खास फ़र्क नहीं होता !)
      सतयुग बीता कलियुग आया ! जब सभ्यता गुफा युग से निकल कर एवरेस्ट पर चढ़ रही थी और डार्विन चच्चा बंदरों को पूंछ डिलीट करते और इंसान होते देख रहे थे, तब इश्क सात्विक हुआ करता था ! साइंस और सभ्यता ने इश्क को कमीना बनाने में कामयाब पहल की है ! साइंस ने तेज़ाब दिया और सभ्यता ने गर्लफ्रेंड का कॉन्सेप्ट ! लिविंग रिलेशनशिप की आज़ादी ने इश्क में प्रदूषण फैलाने वाले कमीनो को ऑक्सीजन दे दिया ! इसके बाद तो मुहब्बत के 72 टुकड़े होने ही थे! ( ऐसे आशिकों के भी 100 टुकड़े होने चाहिए ! ) कैसे कैसे गानों ने जन्म लिया है, - मुश्किल  कर  दे  जीना  इश्क कमीना -! अरे भैया काहे आग में हाथ डालते हैं! कमीने इश्क़ से दूर रहिए न ! काहे इश्क के चूल्हे में दिल को उपले की तरह सुलगाते हैं ! आप तो - जान  जले  जिया  जले - जैसी हालत में हैं ! आपको इश्क नहीं, बर्नाल की ज़रूरत है-!

       इश्क आखिर है क्या ? इस बारे में विद्वानों और भुक्तभोगियों की एक राय नहीं है!  जाकी रही भावना जैसी  वाला मामला है। सरमद का इश्क हकीकी था, सरमद की खाल खींची गई। किसी ने इश्क को आग का दरिया बताया तो किसी ने गुड़ भरी हसिया ! आज का आशिक लैला मजनू, शीरीन फरहाद और हीर रांझा को इश्क का लीजेंड तो मानता है पर कुर्बानी को अवॉयड करता है ! ये शातिर आशिक़ कुर्बानी वाले कालम में कामिनी लिख देते हैं ! इश्क कमीना हो जाए  तो आशिक के हरामीपन की सहज कल्पना की जा सकती है ! इस गाने ने हरामीपन को काफी प्रमोट किया है ! चरित्र की नई गाइड लाइन और चरित्र निर्माण का वर्तमान सेंटर बॉलीवुड है ! उनका परोसा हुआ यूनिफॉर्म सिविल कोड और कल्चर ही युवा पीढ़ी को भाता है! अब खुलेपन का रोना काहे रोते हो ! मन मंदिर में ऐसे 'आदर्श' होंगे तो पैदा होने वाला  'इश्क कमीना' ही होगा ! 
               आशिक के इश्क में कमीनेपन  का टपकना था कि फिल्मों में गीत का मुखड़ा बदल गया ! पहले इश्क का इज़हार करते हुए आशिक कितनी तहज़ब  के साथ फरियाद करता था,- ' तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं ''-! आज के आशिक़ के पास इजहारे इश्क के लिए इतना फालतू वक्त नहीं है ! वो तो माशूका के मामले में भी आत्मनिर्भर  है ! उसके गुल्लक में तीन तीन गर्लफ्रैंड  हैं। वो प्रेमिका से डायरेक्ट कहता है " दे दे प्यार दे, प्यार दे, प्यार दे दे , हमे प्यार दे !" महबूबा धर्मसंकट में है, दरअसल घर से आते वक्त जल्दी में फोन लेकर  आ गई, प्यार वहीं छूट गया !
          इश्क़ थोड़ा और कमीना हुआ तो आशिक राहजनी पर उतारू हो गया । प्रेयसी से  इश्क फरमाने का उसका तरीका बिलकुल राहजनी जैसा है , " चुम्मा चुम्मा दे दे "! ( जितना भी पर्स में है सब दे दे!) कुछ आशिक तो शराफत की आख़िरी सीढ़ी पर खड़े हो जाते हैं, " अब करूंगा गन्दी बात "! पहले इश्क की भट्ठी में तपकर लोग शायर, कवि और लेखक हो जाया करते थे ! अब इश्क़ में कमीना  होकर तेज़ाब डाल देते हैं! आज कल फेसबुकिया इश्क की मण्डी में आशिक कम जेबकतरे ज़्यादा हैं। इनके कट पेस्ट आशिकी में कंक्रीट कम है कमीनापन ज्यादा ।
        विलियम वर्डस्वर्थ के एक कविता की लाइन है, ब्रैव मेन वर्क्स व्हाइल ऑदर स्लीप ( बहादुर लोग तब काम करते रहते हैं, जब बाकी सो जाते हैं)! हर मोहल्ले में ब्रेव मैन रतजगा कर रहे हैैं । जब बाप आटे का कनस्टर घर में रख कर सो जाता है तो युवा बेटा फ़ोन उठाकर दुनियां मुट्ठी में भर लेता है। कॉलोनी का चौकीदार चिलम पीकर सो रहा है ! उसे पता है मोहल्ले के आधा दर्जन कुंआरे युवा फ्रेंड रिक्वेस्ट की वैतरणी में तैर रहे हैं ! चौकीदार अपने स्मार्ट फोन से इलाके के चोर को मैसेज भेज रहा है, - ' साब जी, पांच और सात बजे के बीच में आना ! अभी लौंडे गर्लफ्रेंड के चक्कर में रतजगा कर रहे हैं ! आज रात तक पांच सौ वाला रिचार्ज करा देना, ढाई जीबी वाला पैक-' ! चोर , सबका साथ सबका विकास - पर अमल करता है ! बस अब चोर और चौकीदार दोनो पांच बजे तक सोएंगे और लौंडे रात भर जाग कर पांच बजे सोएंगे !  लौंडे इश्क़ के कमीनेपन में एक और साल गवायेंगे! तब तक चोर की अर्थव्यवस्था थोड़ा और मजबूत हो जाएगी  !

      स्वर्ग से धरती पर झांकते लैला मंजनू इश्क का कमीना पन देख कर सकते मेें हैं! इश्किया लौंडे का  स्मार्टफोन देखकर मजनू को हीनता का अनुभव हो रहा है। गली में जाग रहा चौकीदार का कुत्ता भौंक कर मानो लड़के से कह रहा है, " ओ मेरे बाप ! या तो तू जाग लेे, या मुझे जागने दे! एक मुहल्ले में दो युवा कुत्ते ठीक नहीं होते"!
      

Tuesday, 29 September 2020

" विक्रम और बेताल रिटर्न' " (शेष)

     ( पेड़ से बेताल का शव लेकर आगे बढ़ते ही विक्रम को शपथ देकर बेताल ने मौन रहने पर विवश कर दिया था ! अब बेताल बोल रहा था और विक्रम सुनने पर विवश था! और,,,,अब आगे)

    बेताल कह रहा था , " मुझे बहुत मजा आता है,जब मै अपने मन की बात करता हूं , और आप ना चाहते हुए भी उसे सुनते हैं- बड़े दिनों में खुशी का दिन आया ! आप की जेब में रखा  " दिल धक धक " गुटखे  का पाउच मैंने निकाल लिया है। बुरा मत मानना, पिछले जन्म में बिहार पुलिस में हुआ करता था। ख़ैर, आप को कहानी सुनाता हूं, मगर चेतावनी देता हूं कि बीच में कुछ बोल कर मौन भंग किया तो मै  शव लेकर ऐसे उड़ जाऊंगा, जैसे सतयुग के हाथ से अच्छे दिन के तोते उड़ गए "! 
        विक्रम मन ही मन  गालियां दे रहा था और बेताल एक करेंट कहानी शुरू कर चुका था ," कलियुग को धकेल कर सतयुग आ चुका था! पूरे देश में चारण बधाई गीत गा रहे थे, -  दुख भरे दिन बीते रे भैया सतयुग आयो रे -! लेकिन अभी सतयुग बकैयां बकैया  चलना सीख ही रहा था कि दूध में  "कोरोना" टपक पड़ा!  एक्ट ऑफ गॉड का करिश्मा देखिए , रोगी नज़र आ रहे थे और रोग नदारद ! जैसे जैसे कोरोना मजबूत हो रहा था, उसी रफ्तार से अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी ।
  दुनिया दंग थी। सडक पर भय को हराकर भूख उतर पड़ी थी। देश के महानगरों को जोड़ने वाली सभी सड़कों पर पैदल चलने का मैराथन शुरू हो गया था। प्रशासन चाहता था कि - सर्वे भवन्तु सुखिन:.,,,,!और जनता सतयुग की भावना को  सम्मान देते हुए बसों को छोड़ कर पैदल चलने में आत्मनिर्भर होने में लगी थी ! चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी ! कोरोना सिर्फ अख़बार, न्यूज़ चैनल, अस्पताल और कबरस्तान में नज़र आ  रहा था।"
                                         थोड़ा रुक कर बेताल फिर शुरू हुआ, " राजन!  देश में कोरोना के बावजूद आत्मनिर्भर होने में किसी तरह की कमी नहीं पाई गई! चोर, गिरह कट , दुकानदार, प्राइवेट डॉक्टर, पुलिस सबको छुट्टा छोड़ दिया गया था। अब कारोबार और बेकारी के बीच  आत्मनिर्भरता भ्रमित होकर खड़ी थी कि जाएं तो जाएं कहां ! और  विपक्ष रामराज पर सवाल उठा रहा था , " हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है!
               - राजन मेरा सवाल है कि जब एन डी ए के साथ साथ देश के समस्त ऋषि ,मुनि , मीडिया और देवताओं को सतयुग साफ साफ़ नज़र आ रहा है तो विपक्षी दलों को क्यों नहीं नज़र आता ? जवाब जानते हुए भी तुम अगर मौन रहे तो तुम्हारा सर जनता दल की तरह टुकड़े टुकड़े हो जाएगा "!
                 आगे कुआं पीछे खाइं! मजबूर विक्रम को मौन भंग करना पड़ा,-' सियासत में एक पुरानी परंपरा है बेताल ! विपक्ष को कभी सत्तापक्ष का  "विकास" नहीं नज़र आता! हमारे देश के विपक्ष ने ये रूटीन बना लिया है कि सत्ता से बेदखल होते ही वो आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेता है । सत्ता पक्ष की अच्छाई और विकास ना देखने की इस  ' धृतराष्ट्र परंपरा" को बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया जाता है! इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग नहीं है। मेरा मतलब,,,,, सास भी कभी बहू थी "!
      विक्रम के मौन भंग करते ही बेताल शव के साथ उड़ा और फिर उसी पेड़ की डाल से, फौजदारी के पुराने मुकदमे के फैसले की तरह, लटक गया ! 
  
                                 विक्रम सर पकड़ कर बैठ गए ।  " दिल धक धक" गुटखे की पहली दुकान यहां से तीन किलोमीटर दूर थी।

Sunday, 27 September 2020

"बिक्रम और बेताल रिटर्न"!

         अगस्त 2020 ! रात के डेढ़ बजते ही महाराजा विक्रम महल से बाहर आए ! बाहर घनघोर खामोशी थी, गलियों में कुत्ते तक कवारेंटाइन होकर  कोरोना नियमों का पालन कर रहे थे ! थोड़ी देर पहले ही बारिश हुई थी और अब बादल सोशल दिस्टेंसिंग के बगैर आसमान में चहल कदमी कर रहे थे! महाराजा विक्रम काफ़ी रफ्तार के साथ नगर से जंगल को जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। महारानी के जागने से पहले ही उन्हें वापस महल लौट कर आना था !
                      थोड़ी देर बाद वो घने जंगल के रास्ते श्मशान की ओर बढ़ रहे थे ! विक्रम ने अपने  ' ओप्पो ' चाइनीज़ फ़ोन में टाइम देखा, रात के १.४५ हो चुके थे। आसमान में चांद बादलों के पीछे दुर्भाग्य की तरह मुस्करा रहा था । ओस की बूंदें नेताओं के आश्वासन की तरह टपक रहीं थीं! अंधेरे में जंगली जानवर इस तरह इधर उधर दौड़ रहे थे,जैसे कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल कर युवक पकौड़े का  "ठीया" तलाश रहे हों ! दूर किसी बस्ती में कोई कुत्ता बड़ा इरिटेट होकर भौंक रहा था, जैसे देहात का कोई कुत्ता शहर के कुत्ते से अपने रिश्तेदार का पता पूछ रहा हो !
                     महाराजा विक्रम तेज़ी से आगे बढ़े! अभी वो श्मशान के सामने पहुंचे ही थे कि ठिठक कर रुक गए ! बड़ा खौफनाक मंज़र था ! श्मशान के मेन गेट के सामने चटाई बिछाकर एक शेर बैठा था ! दोनों एक दूसरे को बड़ी देर तक ताडते रहे ! आखिरकार शेर ने मुंह खोला , " काहे नर्भसाए खड़े हो ? डरिए मत, ऊ का है कि अब हम भेजिटरियन हो गया हूं- टोटल शाकाहारी ! हमने तो अपने गुफा के सामने  नोटिस बोर्ड लगा दिया हूं कि  'कृपया गाय, बैल, भैंस, बकरा बकरी सब इहां से दूर जाकर चारा खाएं! चारा,,,,,मतलब घास "!
      महाराजा विक्रम की जान में जान आई, क्योंकि शेर खुद को शाकाहारी बता रहा था। विक्रम ने भोजपुरी बोल रहे शेर से पूछा ," एक्सक्यूज मी सर ! आप गौवंश का शिकार नहीं करते , वो बात समझ में आती है ! भैंस का शिकार नहीं करते, क्योंकि कई बार संख्या बल आप पर भारी पड़ता है ! पर,,,, बकरे के शिकार में क्या खतरा है! बकरे को काहे अवॉयड किया सर ?"
                                                                                           शेर ने माथा पीट लिया, - " कोरोना में एकदम बुडबक  हो गए हो का! सोशल मीडिया नहीं देखते ? आप का चाहते हो, कि हम बकरा का शिकार करूं और हमारा विरोधी लोग मीडिया से मिलकर ऊ बकरे को गाय साबित कर दें! हमरी तो हो गई "माब लिंचिंग" ! यही अनुष्ठान करवाना चाहते हो का ! हम कोई अजूबा वाली बात नहीं कह रहा हूं! ऐसा चमत्कार कई बार हो चुका है ! त्रिफला का चूर्ण है तुम्हारे पास ?"
    " वो क्या करेंगे सर ?"
 " का बताएं, परसो  डिनरवा  में बगैर सत्तू मिलाए चारा खा लिया था, तब से पेट अपसट है! ख़ैर अब आप जाइए, हम योगा करूंगा! आप जाकर कहानी सुनिए! पूरा देश बेताल से कहानी ही सुन रहा है ! रोज नई नई कहानी ! इतने दिन से रोज कहानी सुन रहे हो,पर लगता है कि अभी तक आत्मनिर्भर नहीं हुए ! बहुत ढीले हो! कुछ लेते क्यों नहीं !"
    शर्मिन्दा हो कर विक्रम श्मसान की ओर बढ़ गए जहां चिताएं विपक्ष के अरमानों की तरह जल रही थीं। एक बड़े बृक्ष की ऊंची डाल पर बेताल का शव , सुशांत सिंह राजपूत के संदिग्ध हत्यारे के गिरफ़्तारी के उम्मीद की तरह, लटका हुआ था । विक्रम ने पेड़ के नीचे से बेताल को आवाज़ दी, " तू जीडीपी की तरह नीचे आएगा या बेरोजगारी की तरह मै ऊपर आऊं ?" 
    बेताल रोज़गार की तरह ख़ामोश था ।
                          अब विक्रम पेड़ पर डॉलर की तरह चढ़ा, और बेताल के शव को कंधे पर लाद कर चीन के चरित्र की तरह नीचे आया ! अभी बिक्रम ने मुश्किल से दो चार कदम बढ़ाए थे कि शव में स्थित बेताल बोल पड़ा, " राजन ! तेरा धैर्य मायावती जी की तरह प्रशंसनीय है! जिस निष्ठा, धैर्य और उम्मीद से तू मुझे ढो रहा है, उस तरह तो सतयुग मेंश्रवण कुमार ने अपने मां बाप को भी नहीं ढोया होगा ! ख़ैर, मै तेरी थकावट उतारने के लिए तुझे एक कहानी सुनाता हूं, मगर सावधान राजन ! अगर तुमने कुछ बोल कर मौन भंग किया तो शव लेकर मै वैसे ही उड़ जाऊंगा- जैसे बैंकों की इज्ज़त लूट कर  "विजय माल्या " उड़ गया  !"।       
         ( क्रमश:)
      
      ( मौन होकर कहानी सुनने पर विवश विक्रम को बेताल ने कौन सी कहानी सुनाई ! और,,,,, विक्रम ने उसके प्रश्न का जवाब क्या दिया !  ब्लॉग केअगले लाजवाब एपिसोड में पढ़ना ना भूलें मित्रों !)

Friday, 25 September 2020

" आज की बड़ी खबर "!

      आज की  "बड़ी खबर" ! इतनी बड़ी कि दिमाग़ नाप ना सके। मगर सुनने में, - पिद्दी ना पिद्दी का शोरबा ! आप खबर देख कर सोच रहे हैं - ये कब से बड़ी खबर में आ गई! इधर काफ़ी दिनों से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर ' बड़ी खबर ' का कलेवर बदल गया है ! इस सांचे में ऐसी ऐसी खबरें आ रही हैं कि सुन कर श्रोता सदमे में आकर सोचने लगता है कि मैंने इतनी बड़ी खबर देखी ही क्यों ! कई  "बड़ी खबर " तो इतनी बड़ी हो चुकी हैं कि जून से अब तक खत्म नहीं हो पाईं !
                                            हर चैनल की अपनी  'बड़ी खबर '  है , जो एक बार बड़ी हो गई तो महीनों उसका द इंड नहीं आता ! ऊब कर दर्शक ही कभी कभी टीवी से सन्यास ले लेता है। आप देखो या भाड़ में जाओ, मगर बड़ी खबर आपका पिंड नहीं छोड़ सकती ! सुबह हो गई मामू! कोशिश कर के भी आप सारी रात सोए नहीं! रोज़गार, आत्मनिर्भर होने की तलाश, गरीबी रेखा के नीचे जाता भविष्य, किसान आंदोलन में भ्रमित दिन की शरूआत ! आप बड़ी उम्मीद से सुबह टीवी ऑन करते  हैं, बस,,,फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी ना रही।
       स्क्रीन पर एक अतृप्त आत्मा की शक्ल में एंकर नमूदार होता है! वो एक सड़क पर बदहवास सा लगभग दौड़ता हुआ चीख रहा है, - ' आज की सबसे बड़ी खबर, इस वक्त आप देख रहे हैं मुंबई की वो सड़क जिस पर से होकर "गांजा गैंग" की हीरोइन अपनी कार से गुजरने वाली है ! अभी गोवा से आने वाला उनका चार्टर्ड प्लेन वहां से रवाना नहीं हुआ है । तब तक सात आठ घंटे बने रहिए आप हमारे साथ! अभी आप इस सड़क को बनाने वाले ठेकेदार गिट्टीलाल से मिलिए जो खुद सुबह चार बजे से कंबल ओढ़े फुटपाथ पर बैठे हैं कि कब हीरोइन की कार निकलेगी '!
      अगले चैनल पर और  भी  'बड़ी खबर ' आ रही थी ! यहां एंकर ने गांजा को बाकायदा अध्यात्म से जोड़ दिया है। !. गांजा और चरस के गूढ़ रहस्यवाद पर बहस के लिए एक से एक कोलंबस आमंत्रित हैं ! आज की बड़ी बहस का मुद्दा है ,  " गांजा विमर्श"! इस गूढ़ विषय से अध्यात्म की गुठली निकालने के लिए आमंत्रित मुख्य वक्ता हैं , ' बाबा चिलमानंद जी ' ! एंकर सफाई दे रहा था, " गांजा विमर्श" पर बहस कराने के पीछे गांजे का प्रचार नहीं, ड्रग्स का गंभीर विरोध है ! गांजा,चरस दोनों जनहित में कितने अहितकर हैं, इसे बताने के लिए अब बाबा चिलमानंद जी  ज्ञान की गठरी खोलेंगे "!
      बाबा शायद गांजा पर डिप्लोमा लेकर आए थे। उनका गांजा विमर्श आख्यान- भूतो न भविष्य यति था! वो डकार लेे कर बोले, ' महीनों से गांजा गाथा चल रही है, पर किसी को गांजे का गधा बराबर ज्ञान नहीं! मै यूपी का ठहरा ! बचपन से ही देसी गांजा और नेपाली गांजे का अंतर जानता था ! यूं कहें कि गांजा और चिलम के साथ ही खेल कर बड़ा हुआ ! पत्ती में कितना अध्यात्म मिलता है और कली में कितना रहस्यवाद , यें अनाड़ी लोग क्या जाने! मेरे जैसे परम ज्ञानी ही जानते है कि दूसरी फसल के गांजे की कली को चिलम में डाल कर एक टान मारने पर कोरोना सहित तमाम दैहिक दैविक भौतिक रोग से मुक्ति मिल जाती है ! हमारे यूपी में तो एक कहावत है , जो ना पिए गांजे की कली ! उस लौंडे से लौंडिया भली !! कैसी कहीं?'
      बड़ी खबर जारी है ! देश नशा मुक्त हो रहा है! हर चैनल अपने अपने तरीके से सतयुग की संरचना में लगा है। देश कांग्रेस मुक्त ना  सही - नशा मुक्त हो जाए, यही बहुत है! इस महान लक्ष्य में महाराष्ट्र बाधा बन गया । कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि देवताओं के देश में इतने गंजेहडी निकल आएंगे ! और,,, फ़िल्म इंडस्ट्री, वहां के लोग तो तीन साल पहले देवताओं के वंशज हुआ करते थे! एक दम से वंशावली बदल गई !

    आंची मुंबई ! सतयुग के लिए तू तो हानिकारक है!!

Wednesday, 23 September 2020

कहो ना ' चोर ' है

            (व्यंग्य 'चिंतन')

            कहो ना  'चोर'  है


                       मेरे गांव में चोर को चोर नहीं कहा जाता ! कैसे कहें- चोर बुरा मान जायेगा ! फिर गांधी जी ने कहा भी है कि बुरा मत मत कहो , बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो ! गांव वाले अक्षरशः पालन करते हैं - चोरी करते देख कर लोग आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेते हैं ! चोर को बुरा कहने की जगह पीड़ित की गलती निकालते हैं ! चोर के अतीत और वर्तमान पर कुछ इस तरह अध्यात्म छिड़कते हैं, " वो अगर चोर है तो इसके लिए वो नहीं उसके " हालात" कुसूरवार हैं ! चोर को नहीं हमें उसके हालात की निन्दा करनी चाहिए "! पाप और पापी का ये रहस्यवाद पंरा गांव निगल रहा है है ! अब आगे से जब भी चोरी होगी , चोर की जगह हालात को पकङा जाएगा ! अपराध की इस नई नियमावली से सबसे ज्यादा स्थानीय पुलिस वाले  ख़ुश हैं !
        गांव वाले जानते हैं कि वह चोर है पर संस्कार से मजबूर हैं , चोर को चोर नहीं कह सकते ! चोर को चोर कहने के लिए जो नैतिक साहस चाहिए वो अब ऑउट ऑफ डेट हो चुका है ! उल्टे गांव के लोग चोर से बडे़ सम्मान के साथ पेश आते हैं ! चोर - भय बिन होय न प्रीत - की हकीक़त जानता है ! कई लोग उसके फन से भयभीत होकर इसके पक्के समर्थक बन गए हैं ! उनमें से कई उसके चौपाल में चिलम पीने भी पहुंच जाते हैं !  चोर का जनाधार बढ़ रहा है मगर गांव बट रहा है ! समर्थक उसके पक्ष में चमत्कारी दलील दे रहे हैं, ' वो चोर नहीं दरअसल संत है ! विरोधियों को चोरी नहीं करने दे रहा है इसलिए वो लोग एक संत को चोर कह रहे हैं ! संत के आने के बाद विरोधियों की आपदा बढ़ गई और चोरी करने का अवसर गायब हो गया !"
        चोर का एक और समर्थक आध्यात्म का सहारा ले रहा है , "- हमे चोर से नहीं चोरी से घृणा करना चाहिए ! क्या पता कब चोर का हृदय परिवर्तन हो जाए ! अंगुलिमाल पहले डकैत थे - बाद में संत हो गए ! ये जो चोर और डाकू होते हैं न,  उन्हें " संत" होते देर नहीं लगती ! हमें तो भइया पूरा यकीन है कि सिद्ध प्राप्ति का कठिन मार्ग चोरी और डकैती  से ही निकल कर जाता है ! अपन तो कभी भी उसे चोर नहीं मानते, क्या पता कब चोर और भगवान  दोनों बुरा मान जाएं !  भगवान तो मान भी जाते हैं पर चोर की नाराज़गी अपन अफोर्ड नहीं कर सकते ! क्या पता कल आंख खुले तो तो मेरा भी घर " स्वच्छ भारत अभियान " से गुजर चुका हो !)
         गांव के दो चार मुहल्ले अभी भी विरोध में हैं, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुने !   खुलकर चोर को 'संतं घोषित करने की तैयारी अंतिम चरण में है ! सुबह  देर  से  पहुंचा  एक समर्थक चोर को सूचना दे रहा है, - " पिछली रात सुकई चाचा के घर में चोर घुसा और सब कुछ लूट लिया ! ग़लती सरासर सुकई की है , उसे आंख खोल कर सोना चाहिए था "! ( काश, सुकई को आंख खोल कर सोने की कला आती!)
       चोर ने मुंह खोला, -" मै तो गांव हित में सोता ही नहीं ! पूरी रात चिंतन, मनन और खनन में बीत जाती है ! ख़ैर, पोलिस भी आई होगी ?"
    "  हां, आई थी और चोरी के जुर्म में सुकई को पकड़ कर थाने ले गई ! दरोगा जी कह रहे थे , " ज़रूर तूने इस गांव के किसी संत को फसाने के लिए अपने घर में चोरी की होगी  ! जब तक जुर्म कबूल नहीं करेगा - छोड़ूंगा नहीं "!
           'दरोगा जी अच्छे आदमी हैं'!
          " और क्या ! पिछले हफ़्ते जगेसर के घर में चोरी हुई और चोर अपनी सीढ़ी छोड़ गया ! पूरे गांव में किसी ने सीढ़ी को नहीं पहचाना कि उसका मालिक कौन है ! दरोगा जी ने तीसरे दिन जगेसर को पीट कर थाने में बंद कर दिया ! शाम होते होते जगेसर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने घर में चोरी की थी"!
                    कुछ प्रशंसक तो बाकायदा चारण हो गए हैं , हर जगह चोर के शौर्य,सदाचार और सत् चित् आनंद का गुणगान करते रहते हैं , -" अगर वो कभी चोर था तो वो उसका अतीत था ! वर्तमान में वो संत है- हमें उस पर गर्व करना चाहिए !" चोर को अपने फन पर गर्व है ! कभी कभी वो चोरी और गर्व साथ साथ कर लेता है ! गांव के कुछ चारण तो उसके ' फन ' में भी रहस्यवाद ढूंढ़ रहे हैं ! चाय की गुमटी के पास शाम को एक चारण गांव बालों से कह रहा था ,- 'संत और फकीरों की बातें वही जानें !उनके हर काम के पीछे दूरदृष्टि या कोई दिव्य मकसद होता है ! प्रथम दृष्टया जो हमें चोरी लग रही है,  वो जन कल्याण भी हो सकता है' ! ( जैसे सुकई और जगेसर के दिन फिरे !) गांव वाले बहुमत का रुझान देख कर भी कन्विंस नहीं हो रहे हैं ! ये वो लोग हैं जिन्होंने कई बार रात के अंधेरे में चोर को  ' जन कल्याण' से फारिग होकर लौटते हुए देखा है ! 
              
            आत्मनिर्भर  " संत"  अब " सरपंच " होने की ओर अग्रसर है !.मगर गांव का दुर्भाग्य देखिए , कि "संत" की मौजूदगी के बाद भी गांव और गांव वाले ग़रीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं !

               ( सुलतान भारती )
             

Sunday, 20 September 2020

" ड्रग " डार्लिंग" और " मासूम सैयां"!

     अपना मीडिया महान ! इतना महान कि अकबर, अशोक और अलेक्ज़ेंडर जैसी महान्  शख्सियत अगर मीडिया के सामने पड़ जाएं तो हीनता  के चलते पानी पानी हो जाएं ! हीनता इस बात की कि उनके "महान" होने का क्या फ़ायदा, अगर उन्हें " गांजे" के बारे में कुछ  नहीं पता ! जीवन अकारथ गया, वह महान बनने के चक्कर में  "चरस" से वंचित रहे ! अब तीनो स्वर्ग में बैठे अपने दुर्लभ "बौद्धिक क्षति" का आकलन करके कह रहे होंगे  " काश , हमारे दौर में भी ये मीडिया होती"!
      दुर्भाग्य से मुझे भी गांजा चरस के बारे में पहले इतना गहरा ज्ञान नहीं था। भांग को तो खैर हमारी आस्था से भी 'एन ओ सी"  मिली हुई है! गांजा और चरस को मै पहले अंडर स्टीमेट कर देता था ! हाई लेवेल के ड्रग के बारे में मै घोर अज्ञानी था। अब कैफियत ये है कि पिछले पंद्रह दिन से  ड्रग के ऊपर बैठी मीडिया की खाप पंचायत देख कर पहली बार मुझे मालूम हुआ कि "गांजा ज्ञान" मै अभी नाबालिग हूं ! ( मेरी जगह कोई हयादार आदमी होता तो अब तक चुल्लू भर पानी में,,,,,,!)
      ड्रग के आभामंडल में तीनों की अपनी अपनी भूमिका देखिए,  'डार्लिंग' अपने निर्दोष और मासूम प्रेमी के लिए ड्रग का जुगाड करती है !  चरित्रवान ब्वॉयफ्रेंड गांजा ज़रूर पीता है लेकिन -  ड्रग्स के सेवन के बावजूद वो निर्मल और निर्दोष है,- ( चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग।) "डार्लिंग" के दबाव में मासूम प्रेमी गांजा पी कर गा रहा है, - मुश्किल कर दे जीना इश्क कमीना !' सारी गलती इश्क के कमीनेपन की है !श्रद्धालु जनता तो कोरोना से लगभग कुंठित हो चुकी बुद्धि के चलते  ये फैसला करने में भी असमर्थ कि  अगर अपने प्रेमी की डिमांड पर ड्रग का जुगाड करने वाली डार्लिंग गुनाहगार है तो गांजा पीने वाला प्रेमी क्यों नहीं ?
     ड्रग पर डमरू बजा रही मीडिया पिछले दो महीने से असली " क़ातिल" को बेनकाब करने में समुद्र मंथन में लगी है,पर अमृत की जगह हलाहल बरामद हो रहा है ! गांजा के साथ डार्लिंग अंदर गई मगर कातिल अब तक बरामद नहीं! प्रेमी गांजा पी कर भी मासूम- और प्रेमिका गांजा खरीद कर ड्रग पैडलर ! बरसे कम्बल भीगे पानी का मौसम देखिए, दानव ही देवता को संस्कार की दीक्षा दे रहे हैं !
       पिछले कुछ दिनों के मीडिया मंथन से मुझे ये यकीन हो गया कि  पृथ्वी पर अगर कहीं "राक्षस" हैं तो सिर्फ  '  महाराष्ट्र' में हैं ! ( पहले नहीं थे, एक दम से धर्म परिवर्तन हुआ है!) अब तो पब्लिक को भी यकीन हो गया है कि जहां जहां राक्षस हैं, वहां वहां "कोरोना" का कलियुग है, जहां  "देवता" सत्ता में हैं, वहां सतयुग है! ख़ास कर महाराष्ट्र के कोरोना के कहर की खबरें सुन सुन कर तो  ऐसा लगने लगा है कि वहां आदमी तो आदमी शायद खुद कोरोना  को  अपनी इज्जत बचाने में दिक्कत आ रही होगी ! ये कोरोना की हिम्मत है जो ऐसे राक्षस राज़ में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है!
          दो दिन से जबलपुर में हूं, मीडिया , रिया और कंगना के ऐतिहासिक संघर्ष से अपडेट नहीं हूं! ये प्रसन्नता का विषय है कि गांजा, चरस, हशीश , हेरोइन जैसे ड्रग्स से महाराष्ट्र मुक्त हो रहा है ! (बाकी देश में ऐसी कोई प्रॉब्लम नहीं है।)  वैसे उद्धव ठाकरे चाहें तो जनहित में इस्तीफा देकर भी वो महाराष्ट्र को  "ड्रग मुक्त" बना सकते हैं! भ्रष्टाचार, अपराध, माफिया और कोरो ना से संपूर्ण मुक्ति के लिए यही रामबाण विकल्प है!

   वैसे,,,, इस विषय में ,- हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है!!
 

Wednesday, 16 September 2020

" क्या आप (दुर्भाग्य से) "लेखक" हैं"!

         आजकल फेसबुक पर प्रकाशकों का झुंड उतरा हुआ है। दर्जनों प्रकाशकों ने सोशल मीडिया पर कंटिया डाल रखी है, - ' मेरी छतरी के नीचे आ जा , क्या सोचे लेखक खड़े खड़े r' लेखक धर्मसंकट में  हैै , दिल चारा खाने से रोक रहा है और अंदर का "छपास रोग" उसे उकसा रहा है -.' चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम '!
राम की दख़ल के बाद उसने फौरन फ़ैसला कर लिया कि
अब उसे महान लेखक बन जाना चाहिए !
        अब थोड़ा लेखक के दर्द की क्रोनोलोजी समझिए!
वो प्रकाशकों का रेगिस्तान पार कर के आया है ! दुर्भाग्य से अपने लेखक होने का पता उसे शादी के फौरन बाद चला, फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी ना रही ! ज़िंदगी के २५वें बरस में बसंत उतरा था और २६ वें में पतझड़ के आसार नजर आ रहे थे! फरवरी में ही बैशाख के पसरने की नौबत आ रही थी ! सबने उसे लेखक होने से बचने की सलाह दी थी मगर , करम गति टारे नाहि टरे !
वो साहित्य जगत का उद्धार करने उतर पड़ा !
                       तो जनाब आपके अंदर प्रतिभा हो या ना हो, आपको बेस्ट सेलर लेखक बनाने वाले प्रकाशक आ चुके हैं।आपके अंदर लेखक होने की छटाक भर प्रतिभा भले ना हो, आप को ये प्रकाशक - हुड़ हुड़ दबंग दबंग - क़िस्म का लेखक बना देंगे ! सोशल मीडिया पर उतरे ये प्रकाशक इतने समाजवादी क़िस्म के हैं कि लेखक बनाने के लिए 'कालिदास और कल्लू मामा " में कोई भेद भाव नहीं मानते ! ( टैलेंट के आधार पर लेखक बने तो क्या बने !)
         फेसबुक पर तख्ती लेकर बैठे ये दिव्य प्रकाशक तुम्हारी पहली किताब को देश और दुनियां के ५००० हज़ार स्टाल पर बेचने को उतारू हैं! ( बेशक लतापत्र लेने के बाद वो २०० किताबें भी ना छापें!) आप के टैलेंट का वज़न पैकेज के भारीपन से तय होगा। जितना बड़ा बैंक बैलेंस इतना बड़ा लेखक ! 
     लेखक और वो भी हिंदी का, करेला और नीम चढ़ा ! एक बार आपने लेखक होने की कमेंटमेंट कर ली तो फिर आप अपने बाप की भी नहीं सुनते ! सोशल मीडिया पर  लाइक औरकॉमेंट बटोर कर हर कोई गलतफहमी के झूले पर झूल रहा है ! वो ६ महीने पोस्ट डालता है, आठवें महीने बुद्धिजीवी होने का मुगालता पाल लेता है। दसवें महीने "विश्व विख्यात" लेखक बनाने के विज्ञापन पर उसकी नजर पड़ती है और १२वें महीने साहित्य के क्षितिज पर एक  अल्पकालिक लेखक जन्म ले लेता है!
                          अब,,,,, लेखक होकर वो और दुखी है। विदेश की कौन कहे देश के किसी कोने से बधाई संदेश नहीं आ रहा है ! उसके टैलेंट की दियासलाई से साहित्य जगत में कहीं आग लगती नज़र नहीं आई ! अब लेखक का गुस्सा ईश्वर पर फूट रहा है , ' दुनियां बनाने वाले काहे को लेखक बनाया "! ताज़ी कैफियत ये है कि फेसबुकिया पब्लिशर्स से लगातार तीन नॉवेल छपवा कर  "अवसर"  से घोर "आपदा" मे आये लेखक ने अभी अभी ईश्वर को अपनी आखिरी इच्छा से अवगत कराने वाला पोस्ट डाला है। _ 

        " अगले जनम मोहे लेखक ना कीजो"!