Sunday, 30 August 2020

" काहे आग मूतते हैं"!

             "आग मूतना"  कला नहीं कैरेक्टर की पराकाष्ठा है। कमाल ये है कि मूतने वाले को भी आग नजर नही आती और भुक्त भोगी चिल्लाता फिरता है- ' जल गया - जल गया मेरे दिल का जहां !' तो,,,,, पता ये चला कि आग मूतने से दरअसल जलता क्या है! वैसे, सत्य वचन बोले तो,,, मैंने आज तक किसी को आग मूतते नहीं देखा- अलबत्ता सुना बहुत है। बचपन में मेरे सगे चच्चा अक्सर मुझे धमकाते हुए कहते थे- ' बहुत आग मूत रहे हो, आने दो भइया को !'
         गांव में अक्सर शरारती बच्चे को ये सुनना पड़ता था! पहली बार जब मुझे अपनी इस खासियत का पता चला तो घबरा गया ! सोचने लगा, ' पेट में इतनी आग लेकर घूम रहा हूं, तेरा क्या होगा भारती '! ( बाद में आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ !) लेकिन शहर आकर पता चला कि आग मूतने का उम्र से कोई लेना देना नही है!. इस कला में कई दीर्घायु वालों ने नार्मल आग मूतने वालों को मीलों पीछे छोड़ रखा है!
     गौरवशाली वर्तमान देखता हूं तो आग मूतने के मामले में कुछ महापुरुषों का स्टेमिना देख कर दंग रह जाता हूं। कुछ बुद्धिजीवी प्राणियों ने तो सोशल मीडिया  को यूरिनल समझ लिया है - सारी आग यहीं निकालनी है! कुछ विद्वानों ने कोरोना की आड़ में आग मूती तो कुछ ने सीधे दिल की रिफाईनरी को ही मशाल दिखा दी ! कई चैनल्स के डिबेट आग मूतने के अखाड़े बन गए!
     शरारती बच्चे सबको अच्छे लगते हैं,पर आग मूतने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता, चाहे वो समाज में मूत रहा हो या सियासत में! उनके खिलाफ भी आवाज़ उठनी चाहिए, ' गधे के पूत- यहां मत मूत '!

         ,,,,, कि मैं कोई झूठ बोल्या !!

Thursday, 27 August 2020

"चलो इश्क लड़ाएं" !

         मेरी मानसिक स्थिति पर शंका न करें ! मैं भी जानता हूं कि लड़ाई झगडे में कुछ नहीं रखा है ! मैं तो ये  भी जानता हूं कि इश्क कोई तीतर बटेर या मुर्गा भी नहीं है कि जिसे लड़ाया जा सके ! वैसे मैं नेता भी नहीं हूं जो इश्क को लड़ाई झगडे में खींचू ! इश्क को कैसे लड़ाया जाता है, मुझे तो अभी ठीक ठीक पता भी नहीं है! राहत इंदौरी कहते थे कि ७० साल के बाद आदमी इश्क  के लायक होता है! ( क्योंकि इस उम्र में इश्क के अलावाऔर कुछ होता भी नहीं !)

   तो,,, मै १२ साल पहले क्या करूं?
     मेरा दुर्भाग्य देखिए, मै फर्स्ट फ्लोर पर रहता हूं, मुझसे नीचे ग्राउंड फ्लोर पे एक युवा कवि आया है! कवि की बीवी गांव गई है , और युवा कवि ने तीन दिन से नींद उड़ा रखी है! कोरोना काल में मंच मुक्त चल रहा कवि रात में घातक हो जाता है ! कल दिन भर अलाप लगाता रहा,  " चलो इश्क लड़ाएं ! चलो इश्क लड़ाएं,,,"! मुहल्ले वालों के कान खड़े हो गए ! युवा पत्नियों वाले  पति सावधान हो गए ! दो दिन शान्त रहने के बाद आज रात ठीक बारह बजे एक नए गीत के साथ कवि ने मेरी नींद उड़ा दी " अनामिका तू भी तरसे,,,,!"
      मै घबरा गया , क्या कवि अपनी नव विवाहित पत्नी को श्राप दे रहा हैै! विरह ने उसके दिमाग पर घातक असर डाला था! पहले तो मै खुश हुआ कि चलो अब कवि की रचना में इन्कलाब पैदा होगा, फिर उसके स्वर की तीव्रता में मुझे विरह में बारूद की गन्ध मिलने लगी। कवि अपनी प्रियतमा पर आरोप लगा रहा था," तुझे बिन जाने बिन पहचाने मैंने हृदय से लगाया,,,!"                  रात के चार बज चुके हैं, कवि विद्रोह रस में डूबा हुआ गा रहा है " जल गया जल गया मेरे दिल का जहां"!  मुझे लगा कि कवि गैस लाइटर लेकर सिलेण्डर पर बैठ चुका है। मै घबरा कर  पसीना पोछ रहा हूं और नीचे कवि पड़ोसियों पर निशाना साध रहा है, " सांस लेता हूं जब मुंह से निकले धुआं"! मै घबरा कर सोचने लगा , कहीं गुस्से में आकर कवि कपड़ा उतार कर चूल्हे पर तो नहीं बैठ गया !

       लोग तो यही कहेंगे , इसमें दिल का क्या कसूर !!
       

Monday, 24 August 2020

' साहित्यिक पुरस्कार '

                              आजकल पालक से पेट्रोल तक की कीमत में आग लगी हुई है !कोरोना ने आटा से लेकर अर्थव्यवस्था तक का मुंडन कर डाला है , पर साहित्यकार की प्रतिभा में सूनामी ना रोक पाया ! रचनाओं की वेगमती धारा ने कोरोना को भी तबीयत से लपेटा ! मार्च 2020 से जून २०२० तक का समय संक्रमण और साहित्य से मालामाल होता रहा ! ( अनुकूल जलवायु पाकर कुछ अस्पताल " किडनी" में भी आत्मनिर्भर हो गए !) लॉक डॉउन में पत्नी का अत्याचार झेल रहे अधिकांश रचनाकर साहित्य में नई नई सुरंग खोदने लगे ! साहित्य सृजन से संपदा कम और समस्या ज़्यादा आती है ! (  लेखक के पड़ोसियों की आपबीती ! इसलिए सुरक्षावश कई लोग रचनाकार और कोरोना दोनो से सोशल डिस्टेन्स बना कर चलते हैं !)
         अमूमन साहित्यकार की दो प्रजातियां पाई जाती है !  एक झेला जा सकता है, दूसरा लाईलाज ! पहले किस्म का रचनाकार टैलेंट की जगह जुगाड को आधार बनाता है ! ये जुगाड़ू साहित्यकार अक्सर टैलेंट वाले साहित्यकार के हिस्से की साहित्यिक पंजीरी चट कर जाते हैं ! जुगाड़ू रचनाकार की  बगैर रीढ़ वाली रचनाएं भी आसानी से छप जाती हैं, समीक्षा भी अखबारों में आ जाती है और पुरस्कार की संस्तुति भी हो जाती है ! इसके बरक्स - प्रतिभाशाली साहित्यकार कलम, स्वाभिमान, और क्रोध से लबालब होता है ! वो अपने और ईश्वर के बीच में किसी तीसरे के अस्तित्व को बर्दाश्त ही नहीं करता  ( कोई कोई तो ईश्वर को भी बड़ी मुश्किल से पास आने देता p है !) 
       कुदरती साहित्यकार के मित्र बहुत सीमित होते हैं ! ( झेलने की सहिष्णुता सबमें नहीं होती !) शादी के बाद आजीवन बीबी दुखी ! जिस कॉलोनी में घर हो , वहां के पडोसी दुखी ! ( मंच से बेदखल कई रचनाकार श्रोता की घात में रहते हैं !)  ज़माना खराब है , नकली साहित्यकार का बाज़ार पर कब्ज़ा है !  "श्री जुगाड चंद" दुबई तक पहुंच गए और  "बुद्धि लाल" जी को अपने ही शहर के कवि सम्मेलन में नहीं बुलाया जाता ! नियति के इसी छायावाद से प्रतिभा कुंठित है और कवि क्रुद्ध ! गधे एक सुर में घोड़ों के निष्कासन की वकालत कर रहें हैं ! साहित्य में गधा युग का प्रयास जारी  है! कई सभ्रांत परिभाषाओं की खालपोशी तय है !
            हमें झूठी प्रशंसा की दीमक लग गई है ! कई बार आपके द्वारा की गई झूठी प्रशंसा को रचनाकार सच मान लेता है ! सोचिए ! अगर कोई रचनाकार गलती से साहित्य के दरिया ए आतिश में उतर आया है और उसकी दुखी आत्मा उसे घर वापसी की सलाह दे रही हो , और ऐसे में कोई दुश्मन उसकी बेजान रचना को "कालजयी" कह दे तो क्या होगा ! वो तो आक्रामक तरीके से साहित्य सृजन की शपथ ले लेगा ! ऐसे में रचना कालजयी हो न हो , रचनाकार के परिवार का  ' काल कवलित ' होना तय है ! कुछ लोगों को प्रशंसा करने का ऐसा रोग होता है कि उन्हें मौक़ा दिया जाये तो वो मक्खी में भी मिनरल्स और विटामिन ढूंढ लेंगे ! 
             हर लेखक का सपना होता है - पुरस्कार हासिल करना ! सबको सपना देखने की आज़ादी है ! लेकिन प्रॉपर चैनल से पुरस्कार पाना बहुत कठिन है ! अपने देश की एक विचित्र साहित्यिक रवायत है ! यहां साहित्यकार की उम्र पचास साल के बाद शुरू होती है ! दस किलो आर्टिकल्स लिखने के बाद लेखक " वरिष्ठ " होना शुरू होता है ! सत्तर साल का होते होते वो " विख्यात " मान लिया जाता है ! ( स्मरण रहे, ज़्यादातर मामलों में वरिष्ठ या विख्यात होने के लिए "टेलेंट" की बाध्यता नहीं है !) प्रतिभा के बावजूद हर रचनाकार साठ साल की उम्र में वरिष्ठ मान लिया जाये , इसकी भी कोई गारंटी नहीं ! ऐसा भी हो सकता है कि ' वरिष्ठ ' और ' विख्यात ' होने की  प्रतीक्षा में साहित्यकार सीधे  "वीरगति" को प्राप्त हो जाए ! ( वैसे मरने के बाद रचना कार को ज़्यादा सम्मान मिलता है ! विरोधी   भी कहते हैं, - " खुदा बख्शे ! बहुत सी खूबियां थीं मरने वाले में !)
                               मुझे याद है, जाने माने पत्रकार और " राष्ट्रीय विश्वास " अख़बार के कार्यकारी संपादक लतीफ़ किरमानी साहब ने आठ साल पहले यूपी के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार ' यश भारती ' के बारे में मुझसे कहा था , ' व्यंग्य विधा के स्थापित स्तंभकार हो !. इस बार अप्लाई करो ! तुम डिजर्व करते हो !' मै भी बहकावे में आ गया , सोचा  पुरस्कार का नाम    ' यश भारती ' और  मै  ' सुलतान भारती ' ! हो ना हो , इस पुरस्कार की प्रेरणा सरकार को मेरे ही नाम से मिली होगी ! अप्लाई करने के अगले ही दिन से अख़बार देखने लगा ! अगले महीने जब लिस्ट आईं तो आसमान से गिरा - पता चला कि '  अबहुं ना आए  बालमा सावन बीता जाए -' !  

                अब मैं ऐसी गलती नहीं करता ! क्योंकि,,,, पुरस्कार हासिल करने वाले ' पाइथागोरस  का प्रमेय ' कुछ कुछ समझ में आने लगा है !!

.... Sultan bharti

Wednesday, 12 August 2020

"मिले सुर मेरा तुम्हारा"

                                     मै भी सुर से सुर मिलाना चाहता हूं, लेकिन करूं क्या! दिल है कि मानता नहीं! मैं 
प्रगतिशील और अवसरवादी मित्रों को सफाई देता हूं, - " जाने दीजिए, दिल तो बच्चा है जी !" ( मित्र मन ही मन बद्दुआ देकर कोरोना का वर्तमान स्कोर देखने के लिए टीवी खोल लेते हैं !) मै दिल से पूछता हूं, - दिले नादां तुझे हुआ क्या है ! दो तीन बार पूछने पर अंदर से फुफकारती हुई आवाज़ आई ,- ' अबे ओ मंच से ठुकराए हुए कवि ! हालात- ए  हाजरा- से सुलह कर , वरना किचन तेरा विधवा हो जाएगा ! सुर से सुर मिलाना सीख बेसुरे! वरना वक्त तुझे डस्टबिन में डाल देगा '!
           जानता तो मै भी हूं कि  सुर से सुर का मिलना कितना ज़रूरी है ! अब देखिए ना, सुर से सुर मिल जाए तो सरकार बन जाती है! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी " मुख्य मंत्री"  से सीधे  " कमलनाथ" होकर रह जाता है! सुर की महिमा अपरम्पार! अब देखिए ना, अगर असुर भी प्रशासन से सुर मिला लेे तो थाने के अंदर विधायक को गोली मार कर ज़मानत पा सकता है,लेकिन सरगम बिगड़ जाए तो अच्छी भली धीमी गति के समाचार की रफ़्तार से चलती स्वस्थ गाड़ी भी उलट कर प्राणी को " विकास दूबे" बना देती है !
         कांग्रेसी नेताओं को सुर की इम्पोर्टेंस का पता था, तभी वो इतनी देर तक रेगिस्तान में नाव चलाते रहे। वो जानते थे कि ये विभिन्न सुरों वाले महापुरुषों का देश है, इसलिए सबके सुरों का ध्यान रखते थे! ( दंगे और विकास दोनों में गज़ब का तालमेल था!)  उनके नेताओं का कांफिडेंस इतना गज़ब था कि जनता को असंभव स्लोगन सुनकर भी हैरानी नहीं होती थी । कांग्रेस शासनकाल में एक नारा आया, - चार कदम सूरज की ओर ! जनता ने बिलकुल नहीं पूछा ,- कैसे! ( जब कि उस वक्त उनकी पार्टी में कुछ नेता इतने वयोवृद्ध थे कि ठीक से चला नहीं जाता था !)
    सुर का सुर से मिलना कितना ज़रूरी होता है, इसका अनुभव ' आसाराम ' और राम रहीम ' से ज़्यादा किसे होगा ! जब तक सरगम से मधुर मोहिनी का जादू चला नेता चरणों में लोट पोट करते रहे,कुंडली  " सद्कर्मों ' से लबालब होते ही नेता सरगम से निकल भागे, ' हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है!' 
       सुर से सुर मिल जाए तो अस्थिर सरकार भी ५ साल चल जाती है ! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी "जीतन राम मांझी " होकर रह जाता है। सुर का सुर से मिले रहना कितना ज़रूरी होता है, इसे कोई अशोक गहलोत से पूछे; जो आजकल विधायकों का पूरा पिंजरा उठाए इस होटल से उस होटल भागते हुए नजर आ रहे हैं! ( फिर भी पक्का पता नहीं कि सुर असुर के बीच चल रहे इस समुद्र मंथन से " अमृत" बरामद होगा या  कड़वा "हलाहल" !)
               सुर मिलाने में सावधानी जरूरी है, वरना जीवन भर इंसान को ये सदमा सदमा सोने नहीं देता , - दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनियां बनाई!' मैरिज के मामले में भी सुर से सुर के मिलाप से पहले दिल को दड़बे में डाल कर दिमाग़ का इस्तेमाल करना चाहिए , वरना जीवन भर  'के एल सहगल'  के स्वर में गाना पड़ सकता है, जब दिल ही टूट गया- तो जी के क्या करेंगे "! ( अबे, किसी और से सुर मिला ना !)
     सुर मिलाने के  शूरवीरों का क्या कहना! अगर इस कला में महर्षि हो गए तो,,,,, बकवास को ही विकास समझाया जा सकता है।बेकारी को रोज़गार और खाली जेब को आत्मनिर्भर  समझने वाली नस्ल टीवी देख कर दीक्षित हो रही है । कोरोना  और विकास के इस ऑड - ईवन  में कोरोना आगे चल रहा है ! दिल जलता है तो जलने दो !  सितारों से आगे जहां और भी हैं,,,,,, पहले 'विश्व गुरू' होना ज़रूरी है!
           बेकारी बे काबू है और किचन क्रिटिकल! आपदा को  "अवसर" बनाने की खबरें चारों ओर से आ रही हैं ! ( लोग अपने अपने तरीके से आत्मनिर्भर हो रहे हैं !) अब जब कि कोरो ना संक्रमित मरीज की तादाद 50000( 24घंटे में) पार कर गई है तो कहीं राशन किट नहीं बट रही है। सारे कोरोना योद्धा  सर्टिफिकेट चोंच में लिए शीतनिद्रा में जा चुके है।

   जागो मोहन प्यारे जागो !!

Sunday, 2 August 2020

"मिले सुर मेरा तुम्हारा"

                                     मै भी सुर से सुर मिलाना चाहता हूं, लेकिन करूं क्या! दिल है कि मानता नहीं! मैं 
प्रगतिशील और अवसरवादी मित्रों को सफाई देता हूं, - " जाने दीजिए, दिल तो बच्चा है जी !" ( मित्र मन ही मन बद्दुआ देकर कोरोना का वर्तमान स्कोर देखने के लिए टीवी खोल लेते हैं !) मै दिल से पूछता हूं, - दिले नादां तुझे हुआ क्या है ! दो तीन बार पूछने पर अंदर से फुफकारती हुई आवाज़ आई ,- ' अबे ओ मंच से ठुकराए हुए कवि ! हालात से सुलह कर , वरना किचन तेरा विधवा हो जाएगा ! सुर से सुर मिलाना सीख बेसुरे! वरना वक्त तुझे डस्टबिन में डाल देगा '!
           जानता तो मै भी हूं कि  सुर से सुर का मिलना कितना ज़रूरी है ! अब देखिए ना, सुर से सुर मिल जाए तो सरकार बन जाती है! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी " मुख्य मंत्री"  से सीधे  " कमलनाथ" होकर रह जाता है! सुर की महिमा अपरम्पार! अब देखिए ना, अगर असुर भी प्रशासन से सुर मिला लेे तो थाने के अंदर विधायक को गोली मार कर ज़मानत पा सकता है,लेकिन सरगम बिगड़ जाए तो अच्छी भली धीमी गति के समाचार की रफ़्तार से चलती स्वस्थ गाड़ी भी उलट कर प्राणी को " विकास दूबे" बना देती है !
         कांग्रेसी नेताओं को सुर की इम्पोर्टेंस का पता था, तभी वो इतनी देर तक रेगिस्तान में नाव चलाते रहे। वो जानते थे कि ये विभिन्न सुरों वाले महापुरुषों का देश है, इसलिए सबके सुरों का ध्यान रखते थे! ( दंगे और विकास दोनों में गज़ब का तालमेल था!)  उनके नेताओं का कांफिडेंस इतना गज़ब था कि जनता को असंभव स्लोगन सुनकर भी हैरानी नहीं होती थी । कांग्रेस शासनकाल में एक नारा आया, - चार कदम सूरज की ओर ! जनता ने बिलकुल नहीं पूछा ,- कैसे! ( जब कि उस वक्त उनकी पार्टी में कुछ नेता इतने वयोवृद्ध थे कि ठीक से चला नहीं जाता था !)
    सुर का सुर से मिलना कितना ज़रूरी होता है, इसका अनुभव ' आसाराम ' और राम रहीम ' से ज़्यादा किसे होगा ! जब तक सरगम से मधुर मोहिनी का जादू चला नेता चरणों में लोट पोट करते रहे,कुंडली  " सद्कर्मों ' से लबालब होते ही नेता सरगम से निकल भागे, ' हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है!' 
       सुर से सुर मिल जाए तो अस्थिर सरकार भी ५ साल चल जाती है ! सुर से सुर निकल भागे तो प्राणी "जीतन राम मांझी " होकर रह जाता है। सुर का सुर से मिले रहना कितना ज़रूरी होता है, इसे कोई अशोक गहलोत से पूछे; जो आजकल विधायकों का पूरा पिंजरा उठाए इस होटल से उस होटल भागते हुए नजर आ रहे हैं! ( फिर भी पक्का पता नहीं कि सुर असुर के बीच चल रहे इस समुद्र मंथन से " अमृत" बरामद होगा या  कड़वा "हलाहल" !)
               सुर मिलाने में सावधानी जरूरी है, वरना जीवन भर इंसान को ये सदमा सोने नहीं देता , - दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनियां बनाई!' मैरिज के मामले में भी सुर से सुर के मिलाने से पहले दिल को दड़बे में डाल कर दिमाग़ का इस्तेमाल करना चाहिए , वरना जीवन भर  'के एल सहगल'  के स्वर में गाना पड़ सकता है, जब दिल ही टूट गया- तो जी के क्या करेंगे "! ( अबे, किसी और से सुर मिला ना !)
     सुर मिलाने में माहिर  शूरवीरों का क्या कहना! अगर इस कला में महर्षि हो गए तो,,,,, बकवास को ही विकास समझाया जा सकता है।बेकारी को रोज़गार और खाली जेब को आत्मनिर्भर  समझने वाली नस्ल टीवी देख कर बालिग हो रही है । कोरोना  और विकास के इस ऑड - ईवन  में कोरोना आगे चल रहा है ! दिल जलता है तो जलने दो !  सितारों से आगे जहां और भी हैं,,,,,, पहले 'विश्व गुरू' होना ज़रूरी है!
           बेकारी बे काबू है और किचन क्रिटिकल! आपदा को  "अवसर" बनाने की खबरें चारों ओर से आ रही हैं ! ( लोग अपने अपने तरीके से आत्मनिर्भर हो रहे हैं !) अब जब कि कोरोना संक्रमित मरीज की तादाद 50000( 24घंटे में) पार कर गई है तो कहीं राशन किट नहीं बट रही है। सारे कोरोना योद्धा  सर्टिफिकेट चोंच में लिए शीतनिद्रा में जा चुके है।

   जागो मोहन प्यारे जागो !!

Tuesday, 21 July 2020

"आम आदमी" बनाम "ख़ास आदमी"!

           आम आदमी और ख़ास आदमी की काया एक जैसी होती है, लेकिन कुंडली डिफरेंट होती है। बनावट एक जैसी किस्मत  और कानून बिलकुल अलग । पैदा होने से परलोक सिधारने तक और क्रंदन से कब्र तक ढेरों फर्क! या इलाही ये माजरा क्या है !
      खास आदमी के पैदा होने की दो मख्सूस जगह होती है, वह प्राइवेट अस्पताल में पैदा होना पसंद करता है या प्राइवेट नर्सिंग होम में ! ( वैसे पैदा होने की उसकी पहली प्रायोरिटी विदेश में होती है, जिससे वो ग्रीनकार्ड का हकदार बन सके ! ) इसके मुकाबले आम आदमी को पैदा होने के लिए बेशुमार ऑप्शन होते हैं, सबै भूमि गोपाल की ! वो झाड़ी,जंगल,नदी,नाला, थर्ड क्लास ट्रेन का डब्बा,सड़क,खेत, खलिहान फैक्ट्री आदि कहीं भी पैदा हो सकता है!( बहुत किस्मत वाला हुआ तो सरकारी अस्पताल में आंख खोलता है।)
        आम आदमी के पैदा होने पर सिर्फ मा बाप खुश होते हैं! ( कभी कभी रिश्तेदार भी खुश होते हैं।) ख़ास आदमी के पैदा होने पर मां बाप से ज़्यादा अस्पताल का स्टाफ खुश होता है, भिखारी और मंदिर का पुजारी दोनोंखुश होते है,और कुछ पड़ोसी बाप से भी ज़्यादा खुश होते हैं ! आम आदमी की पढ़ाई सरकारी स्कूल और हिंदी मीडियम से शुरू होती है, और ख़ास आदमी की पढ़ाई प्राइवेट स्कूल और इंग्लिश मीडियम से ! ( जाने फिर क्यों सताती है दुनियां मुझे,,,,,,!!)
      अगला एपिसोड , पढ़ाई खत्म - आम आदमी मजदूर बनता है और ख़ास आदमी मिल मालिक ! आम आदमी की किस्मत में आम बीमारियां दाख़िल होती हैं- जैसे टीबी, खांसी, बुखार, हैजा ,हाथी पांव, भुखमरी, शोषण, खराद मशीन का बुरादा और अकाल मौत ! खास आदमी की बीमारी भी ख़ास और इंपोर्टेड होती है, जैसे - सिफ्लिस, गिनोरिया, एड्स, हाई ब्लड शुगर और स्वाइन फ्लू आदि ! ( वर्तमान में लाई गई आयातित बीमारी कोरोना भी ख़ास आदमी की दें है!)
       आम आदमी अरेंज मैरिज करता है, ख़ास आदमी लव मैरेज ! आम आदमी " एको नारी ब्रह्मचारी " का पालन करता है, ख़ास आदमी की लाइफ में अक्सर बीबी कम वैलेंटाइन ज़्यादा होती हैं !आम आदमी की बीबी कम कपड़े पहने तो मजबूरी, ख़ास आदमी की वाइफ लंगोट में घूमे तो मॉडल कहलाए !
        आम आदमी कमाता है, ख़ास आदमी खाता है । आम आदमी वोट देता है, ख़ास आदमी सरकार बनाता है! आम आदमी बस चलाता है- ख़ास आदमी बी एम डब्लू! आम आदमी मालिश करता है ख़ास आदमी करवाता है ! आम आदमी कानून से डरता है ख़ास आदमी कानून से खेलता है ! आम आदमी को " विकास दूबे" बना कर कभी कभी ख़ास आदमी उसे जुर्म की दुनियां का सितारा बनाता है और रोल खत्म होने पर उसके ज़िंदगी की गाड़ी को उलट देता है !
      आम आदमी धार्मिक होता है , ख़ास आदमी धर्माधिकारी ! आम आदमी को संतोषम परम सुखम् की शिक्षा दी जाती है! सारी नैतिक मूल्यों की स्थापना और रखवाली उसी की ज़िम्मेदारी है ! आम आदमी पेट काटकर बैंक में पैसा जमा करता है, ख़ास आदमी बैंक की आबरू लूटकर" विजय माल्या" हो जाता है!
     हरी अनंत हरि कथा अनंता,,,,,,!  आम आदमी जमूरे हो कर जी रहा है और ख़ास आदमी मदारी ! ख़ास आदमी के कहने पर आम आदमी ताली, थाली और घंटा बजा कर कोरोना को आकर्षित कर रहा है ! कालचक्र जारी है,- आम आदमी (अपने अनजान पाप को धोने के लिए ) तीर्थ यात्रा पर जा रहा है,और,,, ख़ास आदमी ( अपने पाप की गठरी को स्विस बैंक में जमा करने के लिए) विदेश यात्रा पर जा रहा है!!शायद,,,,,,
       यही विधि का विधान है !!

Saturday, 11 July 2020

'बही खाता"!

विकास दूबे ' उज्जैन' से ( गाड़ी के) ' उलटने' तक!!

        अब हंगामा है क्यों बरपा , गाड़ी ही तो पल्टी है! काहे छाती पीटते हैं, क्या भारतीय पुलिस ने पहली बार ऐसा कोई कारनामा अंजाम दिया है जो उसके चरित्र की शाश्वत परंपरा के विपरीत है ! तब काहे शीत निद्रा से उठ बैठे मान्यवर ! 
       कालिदास जीवित होते तो आज गाड़ी के पलटने की इस मोहक अदा पर लिखते -" गाड़ी पलटी- आया बसंत "! ( बेशक जुलाई में बसंत का नहीं कोरोना का क्लाइमैक्स चल रहा है, किंतु गाड़ी के पलटने से कई महारथियों की कुंडली पलटने से बच गई , और द्रुत गति से आता हुआ पतझड़ बसंत में बदल गया !)
         कुछ अति बुद्धिजीवी प्राणियों ने इस बात पर भी सवाल  उठाया कि उज्जैन में तथाकथित पकड़े जाने पर विकास दूबे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर ये क्यों कह रहा था कि-' मै विकास दुबे हूं, कानपुर वाला ?' क्या वाहियात सवाल है! अरे भैया, देश में एक और मोस्ट वांटेड ""विकास" है - जिसे पिछले कई सालों से विपक्ष तलाश रहा है ! वह भी नजर नहीं आ रहा है! दूबे ने सोचा होगा कि कहीं वहीं विकास समझ कर भीड़ ने छोड़ दिया तो आत्मसमर्पण खटाई में पड़ जायेगा ! इसलिए उसने  ज़ोर देकर कहा " कानपुर वाला"! शंका समाधान ज़रूरी था!
                        गाड़ी उज्जैन से चली तो गाड़ी ठीक थी, लेकिन गाड़ी वालों का जिया बेकरार था! बार बार "आकाशवाणी" हो रही थी- " आगे दिशा शूल है"! लेकिन मध्य प्रदेश  की सीमा तक सड़क एयरपोर्ट के रनवे की तरह ए वन थी , लिहाज़ा चाहकर भी गाड़ी पलट ना सकी ! गाड़ी के पलटने में एक और गतिरोध था, पीछे पीछे मीडिया की गाड़ियां सा रही थीं !
     और फिर,,,, वो घड़ी आ गई जब गाड़ी को पूरी श्रद्धा से पलटना था। कानपुर आ चुका था,  पहुंची वहीं पे ख़ाक जहां का खमीर था! विकास दूबे और कानपुर सामने सामने थे । स्थानीय पुलिस ने मीडियकर्मियों की गाड़ियों को रोक दिया ताकि विकास दूबे वाली गाड़ी बगैर घबराहट के उलट सके ! शुभ मुहूर्त आ चुका था, लिहाज़ा गाड़ी ने पूरे भक्तिभाव से उलट कर पटकथा पूरी की ।
         गाड़ी पलटी तो विकास दूबे की बुद्धि उछल कर बाहर जा गिरी । उसने  "मेजबान" का ही रिवाल्वर छीन कर बुलडोजर से गिराए गए अपने घर की ओर दौड़ लगा दी। एस टी एफ वालों को मेहमान की ये हरकत पसंद नहीं आई, लिहाज़ा ललकारा। ऐसे सीक्वेंस में विकास दूबे ने वही किया जो हर मरने को लालायित अपराधी करता है, उसने पुलिस पर गोली चलाई । एस टी एफ द्वारा "आत्म रक्षा" में चलाई गई गोली से विकास दूबे मारा गया! ( दर असल- यूपी पुलिस जब भी आत्मरक्षा में गोली चलाती है, वो हमेशा निशाने पे लगती है ! पता नहीं विकास दूबे के घर पर गई पुलिस की गोली उस दिन कैसे चूक गई थी !)
      अथ श्री विकास दूबे कथा,,,,,,लेकिन एक ज़िक्र के बग़ैर विकास दूबे की कथा अधूरी रह जाती है। जिस वक्त पुलिस और सियासत का पाला हुआ भस्मासुर विकास दूबे अपने घर पर गई पुलिस पार्टी पर गोली चला रहा था तो घायल और घिरे पुलिस वालों ने चिल्ला कर कहा था, " हमें मत मारो! हमें मारोगे तो तुम मारे जाओगे "! ये शब्द अपराध और प्रशासन की गठजोड़ का खुलासा है! पुलिस वालों के इस कथन का एक सीधा मतलब ये है कि - पुलिस के अलावा तुम किसी को भी मार दो , बच सकते हो! मगर पुलिस को मार कर नहीं ! थाने में विधायक की हत्या करने के बाद भी साठ मुकदमों का घोषित अपराधी ज़मानत पर घूम रहा था
        तो,,,, भस्मासुर विकास दूबे मारा गया ! मिशन पूरा हुआ !लेकिन एक यक्ष प्रश्न उठता है- क्या गारंटी है कि भविष्य में पुलिस और प्रशासन के कुछ घिनौने चेहरे अपने आर्थिक, सामाजिक और सियासी मक़सद के लिए फिर किसी देसी बहेरी आम को जुर्म की दुनियां का " दशहरी आम" नहीं बनाएंगे,- विकास दूबे की तरह !!

       (   -  सुलतान भारती )