Saturday, 20 May 2023

"व्यंग्य भारती" दो हजार का नोट

"व्यंग्य" भारती

              दो हज़ार का नोट

         आज सुबह ही सुबह चौधरी ने आकर मुझे टटोला, - ' उरे कू सुण भारती ! तेरी तो लुटिया ही डूब गी , इब के करेगो !'
      मैं हैरान था, मेरी लुटिया डूब गई थी और मुझे बिल्कुल पता नहीं था! मैंने हैरत से बताया, - ' कैसे डूब गई, जब कि मेरे पास तो एक भी लुटिया नहीं थी -! फिर भी मुझे उसके डूबने का अफसोस है -!'
      " घणा पत्रकार बना हांड रहो, अर इतनो भी ख़बर नो है अक दो हज़ार कौ लोट बंद हो गयो, इब के करेगो '!
      " सरकार को धन्यवाद दूंगा ! सच कहूं आंखों को ठंढक पहुंचाने वाली ख़बर सुनाई है तुमने! कंबख्त को मैं फूटी आंख भी नहीं देखना चाहता था ! जब भी किसी को वो गिनते हुए देखता तो मन ही मन सोचता, काश उसकी उंगलियां जकड़ जाएं या जेब में आग लग जाए-'!
      " क्यों" 
   " क्यों कि मेरी जेब में लाल रंग के ये क्रान्तिकारी नोट कभी आये ही नहीं ! मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये नोट निकाला ही क्यों जो सबका साथ सबका विकास के अनुकूल न हो ! सामने वाले को गिनते देख हमेशा हीनता आ जाती थी! पचास रुपए से ऊपर का नोट छपना ही नही चाहिए, तभी डिजिटल इंडिया बन पाएगा -'!
   " कूण बना रहो डिजिटल इंडिया -'?
  ' कई लोग इस काम में लगे हैं! तुम्हें तो दूध का दही बनाने से फुर्सत मिले तभी तो डिजिटल इंडिया बनाओगे! तुम तो हर चुनाव में बेवकूफ बनते रहो,बस !'
       " के करूं, मने कदी बनाया कोन्या ! लोग उधार खा खा कर उल्लू बना दें! अच्छा याद दिलाया तने, कद चुका रहो पिछले साड़ की उधारी"?
        " इस साल उधारी की नहीं, प्यार मुहब्बत की बात करो, सुना नहीं, उधार प्यार की कैंची है! हमें तो कैंची का जिक्र भी नहीं करना चाहिए, खैर अब ये तो बता दो कि घर में दो हज़ार वाले कितने पड़े हैं? उन्हें देख कर घबराना मत, मैं हूं न !"
       " अच्छा याद दिलाया, नू बता, वो सीआईडी वाड़ा के मामला हा ?"
      " सीआईडी वाला ! मैं समझा नहीं?"
     " वर्मा नू बता रहो अक - बंद हुए दो हजार वाड़े नोट में सरकार ने सीआईडी फिट किया हा "!
     " अच्छा, तुम्हारा मतलब चिप्स ! हां, सुना तो मैने भी था, पर टटोल कर कभी देखा नहीं "! 
      " पर लगाया किस लिए था ?"
    " सरकार ने चिप्स लगा कर नोट को छोड़ दिया था, कि जहां जहां नोट जाएगा, सरकार को ख़बर लग जाएगी कि उस नोट के इर्द गिर्द कितने काले धन वाले नोट हैं ! चिप्स की आपसी बात चीत रिकॉर्ड होते ही ईडी वाले जाकर जमाखोरों को पकड़ लेने वाले थे "।
    " जमाखोर कूण सै "? 
     " कैसे बताऊं ! ऐसा समझ लो जैसे किसी दूध बेचने वाले के धौरे बगैर हिसाब के नोट आ जाए और वो फिर भी शरीफ़ लोगों से उधारी वसूलने की चिन्ता में दुबला होता रहे ! साठ साल की उम्र में तो  मोह माया से दूर रहना चाहिए "!
    चौधरी ने घूर कर देखा, - ' जो पूछ रहा, वो बता दे ! जिब नोट बढ़िया काम कर रहा था, फेर बंद करने की के ज़रूरत पड़   गी "?
     " वही तो रोना है चौधरी, नोट नाकारा साबित हुआ ! बिलकुल बिलल्ला !!"
        "  कैसे ?"
     " नोट को इसलिए स्पेशल बनाकर छोड़ा गया था कि वो काले धन को ख़त्म करेगा, पर वो खुद काले धन कुबेरों के साथ गलबहियां डाल कर गाने लगा, -' हम बने तुम बने इक दूजे के लिए -'!
    " कती धोखेबाज लिकडा -"!
  "जमाना घणा बुरा सै चौधरी! कितने लाड प्यार और उम्मीद से पाल पोस कर उसे मिशन में लगाया गया था, पर - सब धन धूल समान- ! इसलिए महाबली के आदेश पर नोट की किडनी निकाल ली गईं, और उसे  देश निकाला दे दिया गया - चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना -- "!
    " काड़े धनवाड़ा ?"
  " उसे पकड़ने के लिए कोई नया नोट और नया तरीका निकाला जायेगा! वैसे देखा जाए तो बड़ी विकट समस्या है, जिसे काले धनकुबेर पर लगाम लगाने के लिए भेजा जाता है, वही अपनी पीठ पर काठी लगा कर उनके सामने हिनहिनाने लगता है "!
    " कितै छुपा बैठो है यू काड़े धन वाड़ा ?"
एक बारगी तो मेरे मन में आया कि 'वर्मा जी' का नाम ले लूं, फिर सोचा कि तीनों का संडे खराब हो जायेगा ! मैंने चौधरी को समझाया, -' सरकार ने नोट बंद कर के सर्जिकल स्ट्राइक तो कर दी है!"
   " के    मतबल !!"
   " काले धनकुबेरों के लिए काला धन ही ऑक्सीजन है, ऑक्सीजन बंद तो सांस बंद! इस वक्त काले धन वालों को दिन रात हिचकी आ रही है, क्योंकि सरकार ने दो हज़ार का नोट बंद करके उनकी ऑक्सीजन सप्लाई रोक दी! वैसे तुम्हारे पास लाल रंग वाला कितना काला धन है '?
   ' कटे घाव पे कटहल मत गिरा ! किस्मत में काड़ा सफेद कैसा भी नोट कोन्या ! देखने कू कती तरस गयो ! किस्मत कती खराब सै, तीस साड़ पहले तू आयो अर तीन साड़ ते कोरोना ! जिब ते कुंडली की सांस उखड़  गी ! लोग नू कहें अक उधार देने ते बरकत उड़ ज्या! आखिरकार तेरी उधारी के चलते दो हज़ार का नोट उड़ गया -! चल इब लौटा दे बरकत नै -!"

  चौधरी को उधारी की हिचकी शुरु हो गई थी , मैने चुप हो जाना ही बेहतर समझा !

        ( Sultan bharti)




Tuesday, 2 May 2023

व्यंग्य भारती "मैं बपुरा बूडन डरा,,,!"

(व्यंग्य भारती)

     मैं बपुरा बूड़न डरा,,,,,,"!

     अब क्या बताऊं कि मैं लीगल काम करने में भी कितना डरता हूं ! मैं विचार करने में उम्र खर्च करता रहा और भद्र जन विकास करते रहे ! जितनी देर मैं आत्मनिर्भर होने के बारे में सोचता हूं, उतनी देर में लोग एन जी ओ बनाकर दूसरों को आत्मनिर्भर करने में लग जाते हैं ! शायर लोगों ने मेरी इसी लेट लतीफी पर एक शेर भी कहा है, -' कारवां निकल गया गुबार देखते रहे -'! अब भैया क्या बताऊं, इतनी बार गुबार को देखा कि आंख और दिल दोनों में मोतियाबिंद का खतरा  है !
     2020 के बाद जब रोटी रोजी में कोरोणा लगा तो मेरे जैसे लोग आपदा में घिर गए, लेकिन साहसी लोग अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने लगे । यही वो लोग थे जो आपदा और अवसर दोनों का मर्म समझते थे ! ऑक्सीमीटर से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक एक दम से उड़ गए, तो यही वीर पुरूष संजीवनी बूटी ढूंढ कर लाते रहे! ऐसे ही वीरों के बारे में साहित्यकारों ने कहा है, - वीर भोग्या वसुंधरा -! (कलियुग में कुछ लोगों ने इन वीरों की प्रगति से कुपित होकर उन्हें  "कालाबाजारी" करने वाला तक कह दिया ! का करें, लोग तो संतो को भी नहीं बख्शते!) 
          जो प्राणी आपदा की आहट पाकर ही पसीने पसीने हो जाता हो , वो क्या ख़ाक अवसर का लाभ उठाएगा! यहां तो अवसर का विज्ञापन देख कर आपदा की गंध महसूस होती है ! परसों शाहीन बाग के बस स्टॉप पर - ' प्रतिदिन 1200/ से 3500/तक कमाएं -' का विज्ञापन देखा ! बेकारी का पतझड़ झेल रहे शख्स के लिए ये बहुत बड़ी रकम थी ! फौरन दिए हुए नंबर पर फ़ोन मिलाया ! उधर से बताया गया कि मैं बड़ा भाग्यशाली हूं, क्योंकि अब सिर्फ़ एक ही सीट बची है -!' कायदे से तो मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन मुझे अवसर और ऑफर की जगह मछली फांसने का कांटा नजर आने लगा ! उधर से एक लडकी बेहद मधुर आवाज़ में बता रही थी,-' मैं फर्म का एकाउंट नंबर व्हाट्स ऐप कर रही हूं, आप सिक्योरिटी के तौर पर सात हजार पांच सौ रुपया फौरन डिपॉजिट करवा दो, आपका अपॉइंटमेट लेटर भेज दिया जाएगा ! हैव ए गुड डे सर -'! 
         एक बार फिर मैं खुद को अवसर के ऑउटर पर खड़ा हुआ देख रहा था !
             किसी के पास घर न हो और उसे ये विज्ञापन नज़र आ जाए तो,,,,,,- दिल्ली से बीस मिनट की दूरी पर ग्रेटर नोएडा में अपना आशियाना बनाएं, सिर्फ 4500/ प्रति गज के रेट पर! दस हज़ार देकर  कब्जा  पाएं, बाकी  आसान किश्तों पर -! इस सादगी पे कौन न लुट जाए ऐ खुदा ! पढ़ते ही खाट समेत घर नज़र आने लगता है। फिर भी मैं बपुरा बूडन डरा,,,! तमाम सवाल कांटों की तरह हलक उग आए, - ' ये सतयुग वाला प्रॉपर्टी डीलर कौन आ गया ! दिल्ली से बीस मिनट के फासले पर ? पैदल या बुलेट ट्रेन से बीस मिनट !!
कनॉट प्लेस से बीस मिनट या कड़कड़डूमा से बीस मिनट !! पैतालीस सौ का रेट तो तुगलकाबाद किले के अंदर भी नही है -!'  अपने आप से इतने सवाल !! एक बार फिर मैं वीर भोग्या वसुंधरा - का अवसर खो बैठा था।
       बेहद सज्जन आदमी और भेड़ में बड़ी समानता होती है, दोनों ही नियमित रूप से मूंडे जाते हैं ! देश में कभी पब्लिशर प्रचुर मात्रा में थे, लेखक कम थे ! आज लेखकों की सुनामी आई हुई है,मगर फ्री में छापने वाले देसी घी की तरह दुर्लभ हैं ! कैफियत ये है कि लेखक - हरि अनंत हरि कथा अनंता - की तरह हर मोहल्ले में व्याप्त है, किंतु कैश की जगह कंटेंट के आधार पर रचना छापने वाला प्रकाशक , ईश्वर की तरह होते हुए भी, नज़र नहीं आता ! फिर  कालिकाल  में  अचानक ही  मामला, - बरसे कंबल भीगे पानी - जैसा सरल हो गया ! यानि जो लेखक पहले प्रकाशक को ढूंढ रहे थे, उन्हें अचानक प्रकाशक पुकारने लगे, - आवाज़ दो कहां हो -! सोशल मीडिया पर बरसीम की तरह पब्लिशर उगने लगे ! ये प्रकाशकों की वो दिव्य प्रजाति थी जो हर ' निरहुआ' को "नामवर"  बनाने  पर उतारू थे ! लगभग हर प्रकाशक हर रचना को एक सौ पैंसठ देशों में बेचने का दावा कर रहा है , साथ में सौ फीसदी रॉयल्टी वाला थैला ! मेरा मन भी ज्वालामुखी में फौरन कूद पड़ने को आतुर था, पर 2999 रूपए का पैकेज देखकर एक बार फिर हलक में सवाल उग आए, और एक बार फिर मैं - "सौ प्रतिशत रॉयल्टी और विश्व विख्यात"- होने से महरूम हो गया ! कारण,,,,,?
   मैं बपुरा बूड़न डरा ! ये जो बुद्धिजीवी होते हैं न! ये कभी रिस्क नहीं लेते ! आपदा में खुश रह लेंगे, लेकिन डूबने का रिस्क नहीं लेंगे ! अपनी शादी को छोड़ कर हर अवसर को  शक  की  नजर  से देखते हैं !  2999रुपए का पैकेज देखते ही जहां नया लेखक फौरन विश्वविख्यात होने को व्याकुल हो जाता है, वहीं बुद्धिजीवी लेखक सवाल खड़ा कर देता है, इतनेकम पैसे में - कागज़, टाइपिंग, प्रिंटिंग, प्रूफ रीडिंग, पैकिंग,,, ! ज़रूर कुछ घपला है ! अब आप खुद सोचो, भला इतने शक्की साहित्यकार को इस दौर का सतयुग कैसे सूट करेगा ! इसलिए ऐसे खुन्नसी लेखक सत्तर साल की उम्र में भी वरिष्ठ और विख्यात होने से वंचित होते हैं,और एक दिन उन्हीं बागी तेवरों के साथ "वीरगति" को प्राप्त होते हैं ! और फिर,,,, उनके विरोधी भी मंच पर उन्हें "महान" घोषित करते हुए ऐलान करते हैं,- ' खुदा  बख्शे, बहुत  सी  खूबियां  थीं  मरने  वाले में - !'

  तो,,,,पहुंची वहीं पे खाक  जहां का  खमीर था !

    Sultan bharti 

Sunday, 23 April 2023

("व्यंग्य"भारती) अब किसी बात पर नही आती

"व्यंग्य" भारती

,,,,"अब किसी बात पर नहीं आती"

         अब का बताएं भैया, मेरी हंसी खो गई है ! कोरोना के दौरान भी हंसी का ऑक्सीजन लेवल ठीक था ! हंसी तब भी क्रिटिकल नहीं थी जब यदा कदा डॉक्टरों ने मरना शुरू किया था ! जब मरणासन्न नींबू 280 रुपए किलो बिक रहे थे, तब भी मैं गाहे ब गाहे हंस लेता था ! जब विपक्ष बाढ़, सूखा और चक्रवातीय समुद्री तूफान के पीछे सत्तारूढ़ दल को जिम्मेदार ठहरा रही थी तो भी मेरी हंसी आत्मनिर्भर थी ! जब खेतों में गेहूं की फसल बारिस में तबाह होने पर भी मीडिया खाद्यान व्यवस्था को पहले से ज्यादा मजबूत बता रही थी, तो मेरी हंसी भी अर्थव्यवस्था की तरह मजबूत हो रही थी ! जब धार्मिक जुलूस के बाद उपद्रव से भाईचारा मजबूत हो रहा था ,तो भी हंसी में कोई इन्फेक्शन नहीं पैदा हुआ !
      लेकिन अब,,,, गज़ब भयो रामा जुलम भयो रे !
ऐसा लगा जैसे हंसी कोमा में चली गई! सारे टोटके आजमा लिए, हंसी नहीं आ रही ! वैसे मेरे घनिष्ट मित्रों में ऐसे ऐसे 'शुभचिंतक' हैं जो मुझे हंसता हुआ देख लें तो उनका 200 ग्राम खून जल जाए ! मैने सोचा, क्यों न उन्ही से किसी एक से शुरूआत करूं! सबसे पहले मैने वर्मा जी से ही दुख बांटना बेहतर समझा, मैंने जान बूझ कर काफ़ी गमगीन लहज़े में कहा, -" मेरे ऊपर तो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है -"!
         'मेरे ऊपर मुसीबत'- शब्द सुनते ही वर्मा जी के चेहरे की रौनक और चमक एक दम से बढ़ गई, फिर अचानक ही जबरदस्ती मायूस होने की नाकाम कोशिश करते हुए बोले, -" भगवान की जैसी मर्जी ! होनी को कौन टाल सकता है, तो,,,यह  पहला हार्टअटैक था क्या?"
     " नहीं "! 
   " ओह, तो दूसरा था  ! सद अफ़सोस !! अब सिर्फ़ एक अटैक और पेंडिंग है! भाई कहा सुना माफ़ करना ! जीवन चला चली का मेला है!'
   " वो बात नहीं है -'!
वर्मा जी की आंतरिक खुशियों पर जैसे नींबू की पहली बूंद गिरी हो ! थोड़ा शंकित होकर उन्होंने पूछा, -" तो,,, क्या है -?"
    "पिछले हफ्ते से मुझे हंसी नहीं आ रही है !"
      ऐसा लगा जैसे उनकी आखों में क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा हो ! अपनी खुशियों की भ्रूण हत्या होती देख वो क्रोध में दुर्वासा ऋषि नज़र आने लगे, - " तुझे हंसी नहीं आ रही और मुझे अब अपने आप पर रोना आ रहा है ! मुझे पता होता तो मैं कभी दरवाज़ा न खोलता -!"
  " तो गोया आप मेरे आकस्मिक मृत्यु से खुश होने वाले थे ?"
   अब वर्मा जी को लगा कि उन्होंने खुशी प्रकट करने की जल्दबाजी में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती, खुद को संभालते हुए उन्होंने मामले पर मिट्टी डाली, - ' तुम्हारे बारे में दुखद खबर सुनकर मेरा हार्ट अटैक हो जाता तो,,,?'
     मैं जानता था कि उनकी सुखद कल्पनाओं पर वज्रपात हो चुका है , कुछ देर और रुक कर मैं उनके घाव पर नींबू नहीं टपकाना चाहता था! मैने अपने दूसरे मित्र चौधरी के पास जाकर अपनी समस्या बताई, -' मुझे हंसी नहीं आ रही है -'!
 ' पर मन्ने त घणा रोना आ रहो ! कूण सा बुरो बखत हा, जिब थारे बगल आके बस गयो! कोरोना कती पीछा न छोड़ रहो! आजकड़ सेहत अर खुशी सिर्फ डॉक्टरन के धौरे मिलेगी -'!
  " हंसी के लिए मैं डॉक्टर को अफोर्ड नहीं कर सकता "!
    अचानक ही चौधरी को कुछ याद आ गया, -'उरे
कू सुन भारती! यू सतपाल मलिक कूण सै?'
     " गृहमंत्री ने पत्रकारों से एक सवाल पूछ कर सतपाल मलिक की सारी इमेज को ही कटघरे में खडा कर दिया कि अगर वो इतने बड़े सत्यवादी हैं तो इतने दिन खामोश क्यों थे? अब कुर्सी से हटने के बाद सत्यवादी होने की क्यों सूझी !! खैर, मैं क्या करूं, मुझे हंसी नहीं आ रही है ?'
      " तेरी वजह ते बहुतों को हंसी न आ रही, भगवान के घर देर है, पर अंधेर कोन्या -!'
       वहां से निकल कर मैंने पड़ोस के ही एक छायावादी कवि से समस्या साझा की,-' क्या करें,- '
पहले आती थी हाले दिल पे हंसी!
अब  किसी  बात  पे  नहीं  आती !!'
      उनके मुरदार चेहरे पर ग्राहक पाने वाली खुशी नज़र आई  ! वो चहक कर बोले - " बहुत दिनों के बाद इतनी विलक्षण क्रान्तिकारी कविता का सृजन हुआ हुआ है, तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम सही मुहूर्त में आए हो "!
            न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि मैं दलदल में फंसने वाला हूं ! कवि का मुझे देखते ही इतना खुश होना,,,,मुझे शक हो रहा था। कवि तुरंत बगल वाले कमरे में घुसा, मैने समझा नाश्ता लाने गया है, परंतु उसे एक रजिस्टर के साथ लौटते देख मेरा शक भय में बदल गया ! रजिस्टर खोलते हुए कवि मेरी तरफ़ देख कर मुस्कराया, - ' मुझे पूरा यकीन है  कि मेरी कविता सुनकर आपकी खोई हुई हंसी वापस लौट आएगी "!
       मेरा गला सूख रहा था, मैंने धड़कते दिल के साथ पूछा, -' ये कविता संग्रह है क्या ?'
       ' और नहीं भाई, ये एक ही कविता है, एक सौ पैंसठ पेज लंबी ! इसे गिनीज़ बुक में ले जाना है, किंतु कोई सुनने को राज़ी नहीं है ! देखिए, आज़ आप  हत्थे चढ़ गए ! ख़ैर,,,इस कविता का शीर्षक है  "मय्यत" !
    सुनकर  मेरी आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया ! मेरे दो घंटे का जनाजा उठने वाला था ! कवि मेरे सामने इस तरह बैठा था कि मैं भाग भी नही सकता था ! कवि ने अभी पहला पेज खोला ही था कि दरवाज़ा धड़ाक से खुला और चौधरी अंदर आया ,  -' उ रे कू सुन भारती ! दूध अर घी दोनों तोल दिया है, इब चलकर  ठा ले "!
     मैं जान बचा कर भागा ! कवि मेरी तरफ़ ऐसे देख रहा था गोया, किसी ने बिल्ले के मुंह से कबूतर छीन लिया हो ! रास्ते में  चौधरी  मुझसे कह रहा था, -' थारी किस्मत अच्छी थी , अक मन्ने तुझे कवि के घर में घुसते देख लिया हा, वरना आज तू ढाई घंटे ते पहले लिकड़ न पाता ! कवि कू घने दिन ते या कविता सुनने वाड़ों की तलाश सै ! एक दिन वा ने दो लाइनें मेरी भैंस कू सुना दी, भैंस नै दूध देना कती बंद कर दिया ! उसे नॉर्मल होने में हफ्ता लिकड़ गया ! कदी मैं फंस जाऊं त फिर तू भी मेरो ध्यान रखियो' - ! 

  अब कैफियत ये है कि जब भी भैंस को देखता हूं, बेशाख्ता हंसने लगता हूं !

  

Friday, 7 April 2023

(व्यंग्य "भारती") " तीन एंकर "

( व्यंग्य "भारती")

              तीन एंकर

      महानगर में दंगा हो गया! पूरी रात शहर दंगाईयों के कब्जे में रहा ! गरीबों को लूटने और घर जलाने के साथ साथ मस्जिदों में तोड़ और आगजनी भी की गई ! दंगाईयों ने हथियार लहराते हुए पीड़ितों पर ईट पत्थर फेंके, मस्जिदों पर हमला किया, नमाजियों के साथ मार पीट की और एक प्राचीन मदरसे में आग लगा दी ! अगले दिन दोपहर  तक मीडिया के लोग सक्रिय हो गए। एक एंकर जलाए गए मुहल्ले में, दूसरा उस मस्जिद मे जिसके नमाजियों को घुस  कर पीटा गया था, और तीसरा एंकर जलाए गए प्राचीन मदरसे में जा पहुंचा !
               ( पहला एंकर )
   ' मैं उस मुहल्ले में हूं , जहां 'कथित' रूप से लूटपाट और आगजनी हुईं है ! हर्ष का विषय है कि  भीड़ ने किसी को जान से नहीं मारा ! इसका अर्थ है कि अभी भी अपने देश के लुटेरों में दया, भाईचारा और सहिष्णुता का अभाव नहीं है ! किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है, -' दया समान धर्म नहीं दूजा -!   इस मोहल्ले में दंगाईयों ने लूटा पीटा, आग लगाया किन्तु दया और इंसानियत पर अटल रहे ! हमें उनसे सीख मिलती है कि दंगे के समय भी दया और मानवता नहीं त्यागना चाहिए -'!
       मीडिया को देखकर जले हुए घरों से कुछ लोग निकल कर देखने लगे थे, एंकर माइक लेकर एक महिला के पास जा पहुंचा , - ' धार्मिक जुलूस था, आप लोगों की तरफ से उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए पथराव किया गया था ! पहला पत्थर आप में से किसने फेंका था -'?
     " किसी ने नहीं !'
          पत्रकार की भावना को ठेस पहुंची,- ' ठीक से सोचो ! बगैर पथराव के दंगा कैसे हो सकता है ! लगता है सदमे की वजह से तुम्हारी याददाश्त जा चुकी है , अब तो अगले दंगे में ही याददाश्त वापस लौट पाएगी-!'
     'हम सब मज़दूर हैं, पथराव क्यों करते! जुलूस तो पिछले साल भी आया था- '!
   ' अच्छा! तो पिछले साल आप लोगों ने पथराव नहीं किया था, तो इस साल भी न करते ! चलिए अब उस मास्टर माइंड का नाम बताइए, जिसने पथराव और दंगे की प्लानिंग बनाई थी?"
   तभी एक और महिला चिल्लाई, -' मार दहिजरे को ! हमारा घर जला और हमारे ही आदमी जेल में बन्द किए गए,  ये घाव पर नमक छिड़क रहा है -'! 
   औरतों की भीड़ को पत्थर ढूढते देख एंकर और कैमरामैन भाग निकले! 
                 ( एंकर नंबर 2 )
      ये एंकर ठीक उस वक्त मस्जिद के अंदर पंहुचा जब लोग रोजा इफ्तार की तैयारी कर रहे थे। माइक और कैमरा देखकर कुछ बुजुर्ग नमाज़ी पास आ गए ! एंकर ने पूछा, -' परसों आख़िर हुआ क्या था ?'
     सर पर पट्टी बंधवाए हुए एक बुजुर्ग बताने लगे, -' हम लोग रोजा खोल रहे थे, तभी लाठी डंडे और लोहे की सरिया लेकर भीड़ अंदर आई और मार पीट शुरु कर दिया!"
     ' एफ आई आर में जिक्र है कि मस्जिद से पथराव हुआ था,आप लोग इफ्तारी में भी पत्थर लेकर बैठते हैं - ' ?
   ' हमारी इफतारी चेक कर लीजिए !'
' अगर आपने पथराव नहीं किया तो जुलूस वालों को चोट कैसे लगी! आपमें तो कोई घायल नहीं हुआ ?'
      ' शायद आपको हमारे सर पर बंधी पट्टी भी नज़र नहीं आ रही '-!
 " पट्टी से तो पता नहीं चलेगा कि पत्थर जुलूस की तरफ़ से आया या मस्जिद की तरफ से ! क्या पता आप किसी नमाज़ी के पथराव का निशाना बने हों! किसी नमाज़ी से कोई पुरानी रंजिश - ?'
    बुजुर्ग अपना बाल नोचता हुआ चीखा, -' खुदा के वास्ते मस्जिद से निकल जा ! वर्ना हम सब पागल हो जाएंगे -'!
   मस्जिद से बाहर आकर एंकर माइक पर व्यूअर्स को बताने लगा, -' दर्शक सीधी तस्वीरें उस मस्जिद की देख रहे हैं, जहां से परसों धार्मिक जुलूस पर पथराव हुआ था और भक्तों को गंभीर चोटें आईं थीं! मस्जिद में आज भी काफ़ी लोग जमा है, और पुलिस का दूर दूर तक कोई पता नहीं है ! ऐसे में कोई जुलूस निकला तो मस्जिद की तरफ से पथराव होना तय है ! कैमरामैन धृतराष्ट्र के साथ मैं कुमार दिव्य दृष्टि!"

                          ( तीसरा एंकर)

      यह एक जला हुआ प्राचीन मदरसा था जहां सैकड़ों दुर्लभ मजहबी ग्रंथ जला डाले गए थे! मदरसे के एक बुजुर्ग टीचर एंकर को दिखाते हुए बता रहे थे, -' ये इतना बड़ा नुकसान है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती "!
     '  क्यों ?'
" सैकड़ों साल पुरानी किताबें कहां से आएंगी!'
      ' आग लगाने वाले कौन थे '?
 ' हिंसक भीड़ थी, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता ! मदरसे की पहचान जिन किताबों के बदौलत दुनियां में थी, उसे जला दिया गया -'!
    ' ऐसा लगता है पड़ोसी राज्य बंगाल से उपद्रवी आए थे, आपका क्या कहना है?'
      ' मैं कैसे बता सकता हूं, ये तो जांच करने के बाद पता चलेगा -'!
   " बंगाल के लोग मछली बहुत खाते हैं,यहां चारों ओर मछली की गंध फैली हुई है! आप हमारे कैमरे पर बयान दीजिए कि दंगाई लोग पश्चिम बंगाल से आए थे -'!
 "ये महक मछली की नहीं , मिट्टी के तेल की है ! दंगाईयों ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई थी '!
   एंकर बिलकुल हताश नज़र आने लगा था, बुजुर्ग टीचर बता रहे थे, - ' मछली तो हम भी खाते हैं "!
      " तो फिर,,, हो सकता है, मदरसे में उस दिन मछ्ली पकाते हुए आग लगी हो ! याद कर के बताओ, उस दिन कौन सी मछ्ली पका पका रहे थे आप लोग -"?
     बुजुर्ग को बिलकुल गुस्सा नहीं आया, - " वो दूसरी इमारत है, जहां खाना बनता है, उसमें आग नहीं लगाई गई, आइए छत पर चलते हैं "!
         छत पर सीमेंट, ईट और रोड़ी पड़ी थी, देखते ही एंकर का मायूस चेहरा खिल उठा , -' तो,,, यही है वो गुप्त जगह, जहां से उस दिन धार्मिक जुलूस पर पथराव किया गया था ! कितने आदमी थे ? '
         " उस दिन कोई जुलूस नहीं निकला था , भीड़ आई थी जो लूटमार और आगजनी करके चली गई -'!
     " अच्छा ! मतलब आप लोगों ने जुलूस को निकल जाने दिया, पीछे चल रही भीड़ पर पथराव किया था ! पथराव करने में आप के साथ मदरसे के और कितने आदमी थे ?"
     बुजुर्ग टीचर गंभीर होकर बोला,-' मुझे तो पत्थर बाज़ साबित ही कर दिया तुमने, बाकी की पहचान भी तुम्हीं बता दो -! बस इतना और बता दो, कि इतना इल्म लाते कहां से हो  -'!!
       आधे घंटे बाद मदरसे से बाहर आकर एंकर अपने कैमरे  के सामने बोल रहा था, -' हर्ष का विषय है कि मदरसे की छत से हुए  पथराव से भीड़ को चोट नहीं लगी ! लगता है जैसे, पथराव से क्रुद्ध भीड़ ने ही मदरसे में आग लगाई थी ! अगर मदरसे के स्टॉफ और छात्रों पर सख्ती की जाए तो ईंट का ईंट और मछ्ली का मछ्ली पता चल जायेगा -' !!

           मछली वाले बर्तन की खोज जारी है !!
                 

Thursday, 30 March 2023

व्यंग्य "भारती" 'पत्रकारिता का मूत्र स्तर'

व्यंग्य 'भारती'

"पत्रकारिता का मूत्र स्तर"
      अपराधी मूत रहा है! पीछे खड़ी पुलिस अपराधी को देख रही है, और पुलिस के पीछे खड़ी मीडिया मूत देख रही है -जाकी रही भावना जैसी -!
पुलिस आपस में बात कर रही है, -' एक मिनट के लिए ढील नहीं देना है , क्या पता रास्ते में इसके साथी इसे छुड़ाने की कोशिश करें -' !
      पीछे थोक में खड़ी मीडिया मूतने की लाइव कवरेज दिखाने में आ रही दिक्कत को लेकर परेशान है! सबसे बड़ी दिक्कत पुलिस की वजह से है! हर ख़बर पर पहली नज़र रखने वाले चैनल का एंकर अपने कैमरामैन पर नाराज हो रहा है, -' जब सारा 'पानी' खेत में समा जाएगा,तब दिखायेगा क्या? ट्रायपॉड ऊंचा कर -'!
   ' इससे ऊंचा नहीं हो सकता '!
   नंबर वन चैनल वाला एंकर थोड़ा आगे था, उसने कमेंट्री शुरू कर दिया था, - ' दर्शक सुन सकते हैं, मूतने की आवाज़ यहां तक आ रही है, शायद पूरा तालाब पी कर आया है ! उसके खड़े होकर मूतने की एक्स्लेसिव तस्वीरें दर्शक सीधे देख रहे हैं! धैर्य रखिए, हम कोशिश कर रहे हैं कि दर्शकों को धार भी दिखा सकें -!'
     एक अन्य एंकर दर्शकों को अपने बलिदान और चिन्ता से अवगत करा रहा है, -' हमें क्या पता था कि 'भाई'  मूतने के लिए ये जगह सिलेक्ट करेगा, पता होता तो दो दिन पहले ही खेत में कैमरा छुपा दिया होता ! तब दर्शक पीठ की जगह प्रत्यक्ष देख रहे होते '!
           तभी नंबर वन चैनल का एंकर खुशी से ऐसे  चिल्लाया, गोया उसकी लॉटरी निकल आई हो, - "दर्शक अपने अपने टीवी सेट की आवाज थोड़ा कम कर लें, मूतने की आवाज़ के साथ धार भी दिखाई दे रही है ! ये तस्वीरें सबसे पहले आप मेरे चैनल पर देख रहे हैं -'!
                 डांट खा चुका उसका कैमरामैन गुस्से में बड़बड़ाया, - ' अब दिखाने के लिए हमारे पास बस यही सब  बचा है -'!
      एंकर अपनी खुशी नहीं छुपा पा रहा, -' हमारे मेगा फिक्सल कैमरे और "धार" के बीच में साठ फीट का फासला है, बीच में पुलिस बाधक न होती तो हम कैमरा लेकर बिलकुल धार के सामने खड़े होते ! पुलिस ने हमेशा अभिव्यक्ति की आज़ादी में रोड़ा अटकाया है -'!
              एक चैनल का एंकर ऐसे चिल्लाता हुआ दौड़ रहा था गोया उसने दोनों पैरों में गर्म तवा बांध लिया  हो, जिससे एकजगह टिक कर बोलना मुश्किल हो - ' वो खड़े होकर मूत रहा है! हालांकि उसके धर्म में खड़े होकर मूतने पर पाबंदी है ! इतनी मीडिया और पुलिस की मौजूदगी में भी वो खुलेआम अपने सामाजिक नियमों का उल्लंघन कर रहा है! इससे पता चलता है कि ये कितना जघन्य अपराधी है -' ! 
       "धार"  न  देख  पाने  से  आहत एक चैनल का एंकर अपराधी पर अपना शोध प्रस्तुत कर रहा था -' उसने पुलिस वैन से उतरते ही मूंछें ऐंठ कर मीडिया को देखा था ! लगभग बीस साल से इसकी मूछें ऐसी ही हैं! उसे मूछों से बहुत प्यार है, अगर पुलिस इसकी मूंछ काट ले तो ये अपने आप मर जायेगा , आज़ तो गाड़ी का पलटना थोड़ा मुश्किल लगता है -'!
      नंबर वन चैनल का एंकर चीखा, - ' धार तेज़ हो रही है, इसका मतलब उसे वाकई बहुत देर से पेशाब की हाजत बनी हुई थी ! दर्शक देख सकते हैं कि धार का रंग क्रिस्टल की तरह सफेद है, लगता है जैसे इसे किसी किस्म की बीमारी नहीं है ! मुझे तो कोरोना काल में ही शुगर हो गई थी -'!
    एक एंकर दावा कर रहा था -' जिन लोगों ने देर से टीवी सेट खोला है, उन्हें अपडेट कर दूं कि जिस खेत में वो मूत रहा है, उसमें गेहूं की फसल नहीं बोई गई थी, वरना आज अनर्थ हो जाता ! मानव मूत्र में अल्कोहल  होता  है जो गेहूं के पौधे को जला देता है ! इसलिए धान हो या गेहूं , दोनों  को सार्वजनिक शौचालय से दूर रखा जाता है -'!
    धार का फ्लो धीमा होता देख नंबर वन चैनल का एंकर निराश लग रहा था, - ' धार का फ्लो धीमा हो गया है, दर्शक देख सकते हैं! आखिरकार हर मूत का एक अंत होता है ! और,,,, लीजिए धार का नज़र आना बंद हो गया ! अब वो घूमने की मुद्रा में है ! वो वैन की तरफ वापस आएगा ! काश वो पांच मिनट और मूतता ! उससे खेत को नुकसान हो सकता है, पर उसके मूतने से हमारी टीआरपी तो बढ़ रही थी -'!
         मूतने के बाद अपराधी पुलिस वैन की ओर वापस लौट रहा था ! सारे मीडिया कर्मी वैन की ओर लपके ! दिव्य ज्ञान से सराबोर कई सवाल पेंडिंग थे ! सबसे पहले  हर ख़बर पर पहली नज़र रखने वाले एंकर ने सवाल दागा,-' जो आपने मूता, वो एनकाउंटर के डर के कारण था, या सचमुच प्रेसर बना हुआ था?'
              अपराधी कुछ जवाब देता, उसके पहले ही  नंबर  वन  चैनल  के एंकर ने  सवाल  दाग दिया,-' काफ़ी सारा मूता तुमने,अब कैसा फील हो रहा है -?'
     तभी पीछे से एक पुलिस ऑफीसर ने एंकर से कहा, - ' मुलजिम को  जितना ( आग) मूतना  था, मूत चुका है ! अब तो पिंड छोड़ो - ' !!

     मूतने को लेकर कई भ्रूण सवालों ने हलक में ही दम तोड़ दिया! अपराधी वैन में बैठ चुका था !

             ( सुलतान "भारती")

Friday, 24 March 2023

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         ( "व्यंग्य भारती")

      " अपना कटोरा और कर्ज़ का घी "

        अपना अपना स्टाइल है, अपनी अपनी किस्मत ! कोई बोरे में नोट रखकर भी घी नहीं खा पाता और कोई कर्ज़ लेकर घी पीता है ! मैंने दोनों तरह के आदमी देखे हैं। हमारे यूपी में एक कहावत कही जाती है, - समय से पहले और किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा  -! ये चार्ज ऊपरवाले पर लगाया जाता है, कि उसने भैंस किसी को दी, और घी किसी और के लिए फिक्स कर दिया ! मामला गंभीर है, जिन्हें ईश्वर, समाज और बैंक तीनों लोन नहीं देते - वो क्या करें !!
       घी के बारे में तमाम कहावतें हैं! एक कहावत है कि - कुत्ते को घी हजम नहीं होता -! पर ये पता कैसे चला ! शंका स्वाभाविक है, हड्डी तक हजम करने वाले कुत्तों को घी हज़म क्यो नहीं है! हमारे वर्मा जी कहते हैं, - ' कांग्रेस के आने से पहले देश में घी दूध की नदियां बहती थीं, कुत्तों को उल्टी लग गई थी ! ये जो कुत्ते हैं, उन्हें अमृत कहां सूट करता है -! '
    ' वो घी दूध की नदियां कहां चली गई?'
 ' उसके पीछे गौ तस्करों का हाथ है, धीरे धीरे नदियों में दूध की जगह बरसात का पानी बहने लगा। लोगों ने दूध में पानी मिलाकर बेचना शुरू कर दिया! फिर नकली घी आ गया जिसे आदमी और कुत्ते दोनों ने एडजस्ट कर लिया - '!
    ' आपने खाकर देखा?'
   उन्होंने मुझे खा जाने वाली नज़र से देखते हुए चेतावनी जारी की -' इस कॉलोनी में कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी कागज़ात बनवा कर रह रहे हैं , मैं जल्दी ही उनके पीछे बुल्डोजर लगवाता हूं , तू भी शक के दायरे में है  - !
      मामला घी का था, मैंने अपने एक और अजीज़ मित्र से राय लेना जरूरी समझा! उनका घी दूध दोनों से गहरा रिश्ता था ! रोजा खोलने के बाद मैं जाकर उनसे मिला! मुझे देखते ही चौधरी ने चेतावनी जारी किया,- ' मन्ने दूध कौ दाम एक रुपया बढ़ा दिया, के करूं - जीडीपी घणी नीचे पौंच गी , ऊपर ठाना पड़ेगो ' !
      ' अभी रोजे चल रहे हैं, रमजान के बाद जीडीपी बढ़ा लेते -!'
   '  काल्ह करे सो आज कर ! नेक काम इसी महीने कर लें तो बढ़िया होगा -'!
    ' घी के बारे में कुछ पूछना था ' !
' मेरी भैंसों ने तय किया है कि वो बगैर घी वाड़ा दूध लिकाडेंगी -'!
    ' मैंने खरीदना नहीं है, सिर्फ पूछना है कि क्या घी के लिए कर्ज़ मिल सकता है -'!
   " मन्ने के बेरा ! भैंसन ते पूछ ले '!
          वैसे मैंने गांव में एक आदमी देखा है जो आज़ भी ज़िंदा है और बयासी साल की उम्र में भी काफ़ी तंदुरुस्त है! ग्रामीण बैंक में लोन की कोई भी स्कीम आए, वो फ़ौरन ले लेता है! लोन की वसूली करने वालों का न खौफ, न लौटाने की फिक्र ! बैंक अधिकारी को घर जाकर भी बैरंग लौटना पड़ता था! एक बार तो पुलिस को देखते ही दस लीटर केरोसिन के डिब्बे में रखा सारा पानी अपने ऊपर उड़ेल कर उसने दूर से ही बैंक वालों को ललकारा, -' गोहार लागो गांव वालों! बैंक वाले मुझे मिट्टी का तेल डाल कर जिंदा जलाने जा रहे हैं -!'
     उस दिन बैंक अधिकारियों ने हाथ जोड़ कर बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई थी! 
      बैंकों की आबरू लूट कर विदेश भागने वाले माल्या और मोदी ( नीरव) जैसे महापुरुष 'ऋणम कृत्वा घृतम पिवेत'- पर कितनी आस्था रखते हैं! कर्ज यहां लिया और घी विदेश में पी रहे हैं ! कर्ज़ को लेकर अपने देश में आम लोगों की सोच बढ़िया नहीं है! सज्जन और शरीफ आदमी कर्ज लेकर मुसीबत में फंस जाता है ! शातिर आदमी कर्ज लेकर घी  खाता  है और शरीफ आदमी जेल की हवा ! किसान  कर्ज लेता है और  किश्त चुकाने में असमर्थ होते  ही बैंक उसकी भैंस तक खोल लेता है !  बड़ा आदमी लोन के साथ बैंक को ही भैंस समझ कर गठरी में बांध कर उड़ लेता है !
       घी  का जो रिश्ता भैंस से होता है, वही रिश्ता खाने  वाले  का  घी से होता है ! भैंस पालने वाला  अकसर घी नहीं खाता, और घी खाने वाले अक्सर  भैंस नहीं पालते ! और,,,,घी  के  लिए  रॉ मैटेरियल ( दूध) मुहैया कराने वाली बेचारी भैंस को सूंघने के लिए भी घी नहीं मिलता ! दूसरों के पैसे से घी पीने वाले हर युग और दौर में बरामद हुए हैं! इस कलियुग में उनकी तादाद  सबसे ज्यादा है ! मुहल्ले में 'कमेटी ' डालने से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चिट फंड कंपनी के नाम से यही लोग जनता को भैंस समझ कर घी निकाल रहे हैं ! इस घी में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों  का भी हिस्सा तय होता है ! एक लूट कर भागता है तो दूसरा नए नाम के साथ शहर में सतयुग लेकर आ जाता है,- एक  लगाओ तीन पाओ -!

     दूसरों के पैसे से मुफ्त में घी पीने वाले इन्ही "वीर पुरुषों" की स्तुति में एक कहावत है, -शक्कर खोर' (ठग) को शक्कर ( घी), और टक्कर खोर (पीड़ित व्यक्ति) को टक्कर ( शोषण) मिलती है -! (जाकी रही भावना जैसी -! (प्रतिरोध जब समर्पण में बदलता है, तब समाज को केंचुआ बनाने वाली ऐसी कहावतें जन्म लेती हैं! ताकि जनता घी खिलाने को "कर्म" और  शोषण को अपनी "नियति" समझ ले !)
   इस "शक्करखोर जमात" के कई महारथी समाज को दुहने के बाद आज सियायत को अपनी सेवाएं दे रहे हैं ! वैसे जहां तक घी पीने की बात है, जनता को 5 साल में एक बार वायदों की शक़्ल में मिल ही जाता है  !!

       ,,,,, कि मैं कोई झूठ बोल्या !!

     

Wednesday, 8 March 2023

( बही खाता) "गरीब का मौसम"

                    ('व्यंग्य' चिंतन )

                 "गरीब का मौसम"

       मेहरबान !  मौसम कोई भी हो, गरीब के हित में कोई नहीं ! शहर से लेकर गाँव तक, गर्मी से लेकर सर्दी तक हर मौसम गरीब विरोधी है ! सर्दी, गर्मी और बरसात सभी अपने अपने नाखूनों को गरीब की खाल पर धार देते हैं ! अमीर वर्ग जहां हर मौसम की केस हिस्ट्री में अपनी ऐयाशी का 'डीएनए' ढूँढता है,वहीं गरीब आदमी मौसम की पदचाप से ही सिहर उठता है ! अप्रैल में पुरवाई तेज होते ही गरीब आदमी अपनी पत्नी 'सुखना' से शंका जाहिर करता है,- ' लगता है, फिर आँधी आएगी, कहीं छपरा न उड़ जाये-'! गरीब आदमी के घरवाली  की आशंका और भी भयावह है,-'पिछली आँधी में ये नीम का पेड़ उखड़ कर बस गिरने ही वाला था कि 'धमसा माँई' ने बचा लिया था !'
    " कैसे ?'
  " जैसे ही पेड़ ने आँधी में झूमना शुरू किया, मैंने  धमसा माई को सुमिरन करके मन्नत मांग ली  '!
     'कौन  सी मन्नत ?' मजदूर को लगा कि आज तो नीम के पेड़ को गिरने से से कोई नहीं बचा सकता !
   ' हे धमसा माई ! ई  आँधी मा हमार छपरा न उड़ा तो तुम्हें एक बकरा भेंट दूंगी '! 
     सुनकर उसके पति दुखीराम का कलेजा दहल गया , बकरा खरीदना औकात से बाहर था ! आज फिर नीम का पेड़ झूमने लगा था ! उसने चिल्ला कर पत्नी से कहा,-' इस बार मन्नत मत मांगना '!
            सुखना ने अपराध बोध से भरी आंखों से पति को देखा-' मन्नत तो मांग ली-" !
    दुखीराम को लगा कि नीम का पेड़ उखड़ कर सीधा सीने पर गिरा हो ! उसने घबरा कर सामने देखा, पेड़ अपनी जगह पर था ! आँधी थम गई थी मगर दुखीराम को लग रहा था जैसे नीम का पेड़ ज़बान निकाल कर उसे चिढ़ा रहा हो!
        गर्मी में भी दुखीराम पर मौसम की खास मेहरबानी होती है ! जब पूरे गाँव के घरों में बिजली के पंखे और कूलर चलते हैं तो दुखीराम का हाल चाल पूछने के लिए पूरे गाँव के मच्छर उसके लेटने का इन्तेज़ार करते हैं ! दिन भर की हड्डी तोड़ मेहनत के बाद दुखीराम ऐसे सो जाता , कि मच्छर खून पी कर उसी की नाक और कान में घुस कर सो जाते थे ! कभी कभी ऐसा भी होता था कि पड़ोसी झुरहू अपने बैलों को मच्छर से बचाने के लिए भूसा सुलगाता और ऊपर से नीम की हरी पत्ती डालता, तब ज़रूर  मच्छर घबरा कर दुखीराम को छोड़ कर पडोसी की ओर जाते थे !
       बरसात में मुसीबत बांध तोड़ कर बहती हुई दुखीराम के घर आती ! सामने गली में बहता हुआ पानी बगैर रोक टोक के घर के अंदर घुस आता था! बारिश मेें पानी सिर्फ सामने के दरवाज़े से  ही नहीं  छत से भी टपकता था ! अबकी तीसरी बरसात थी मगर इस बार भी दुखीराम का छपरा बजट के बाहर था ! क्या करें, गांव के प्रधान कह रहे थे कि सरकार मनरेगा में पैसा ही नहीं डाल रही है ! बादल गरज गरज कर बताते कि बिजली की नजर उसके छपरा पर है ! उधर,,,गाँव के जमालू भी जाग रहे होते! अमीर लोगों के लिए बारिस संगीतमय होती है,मगर जमालू के लिए सितम ढाती रात ! हर गरज के साथ जमालू का यक़ीन पक्का हो जाता कि गिरने के लिए बिजली उन्हीं का घर ढूंढ रही है !
        सर्दी - दुखीराम और जमालू दोनों के लिए क़हर की तरह थी! जमालू  के घर के मुख्य दरवाज़े की लकड़ी सड़ कर टूट चुकी थी और वहाँ से घूस, चूहे, सांप और नेवले के साथ छोटे कद के कुत्ते तक  बेखटके अंदर आकर जमालू की रजाई में घुस जाते थे ! गुरबत ने  घर में ऐसा समाजवाद ला दिया था कि जमालू की रज़ाई में घुसा कुत्ता उसी रज़ाई मे मौजूद बिल्ली पर एतराज नहीं करता था ! लगातार शक़्ल सूरत खो कर चादर की तरह पतली हो रही रज़ाई ओढ़ने वाले जमालू भाई इस समाजवाद के अंदर मौजूद 'रहस्यवाद' से पूरी तरह परिचित भी थे ! 
    जमालू को आज भी याद है कि बचपन कैसा गुजरा था ! जब फसल कटकर किसानों के घर चली जाती तो जमालू ऐसे खेतों मे छुट गई गेहूँ की बाली ,चने की ठोठी , मकई की बाली ढूंढ कर घर लाते ! जमालू और दुखीराम दोनों भूमिहीन ! दोनो के पेट और पीठ के बीच में न जाने कहाँ भूख बैठी थी, एक ऐसी खौफनाक भूख जो रोटी न  मिलने पर गरीब के सपने, सेहत सौंदर्य और,,,उम्र तक खा लेती है ! इस गाँव ने इंद्र की तरह उनसे पसलियों तो नहीँ मांगी ,लेकिन वक़्त  सब कुछ तो ले चुका था ! दोनों में एक समानता और थी ! दुखीराम खेत में चूहों के बिल खोद कर गेहू की बालियां निकाल कर चूहों को आशीर्वाद देता था और जमालू रज़ाई में बच्चे देने वाले चूहों को गालियाँ ! जमालू की बीबी खैरूल चूहों की इस हरकत के लिए भी जमालू को ही जिम्मेदार ठहराती थी, -' ये सब तुम्हारी वज़ह से हुआ है'-! बीबी के इस आरोप से आहत जमालू ने एक बार सफाई देते हुए दुखीराम से कहा  था-' चुहिया ने जो भी बच्चा दिया है, उसमे मेरा  कोई हाथ नहीं है -'!
     सवाल उठता है कि ऊपर वाला गरीब को पैदा क्यों करता है। जवाब है,- गरीब के लिए यह दुनिया नहीं बनाई गयी, अल्बत्ता इस दुनियां के लिए गरीब बनाया गया है ! अमीरों के लिए,गरीब खुशहाली का फर्टिलाइजर है ! निर्माण का मसाला है ! इतिहास में कभी दर्ज न होने वाली गुमनाम शहादत की फेहरिश्त है,और,,,,,सभ्यता तथा संस्कृति के कॉरीडोर मे बिछा हुआ वो लाल कालीन है , जो गरीब के लहू से सुर्खरूं  हुआ है ; फिर क्या फर्क पड़ता है कि उसका नाम जमालू हो या दुखीराम !!

                      ,,,,, [सुलतान 'भारती'],,,,,