Monday, 19 December 2022

healthy heart

Healthy heart
Darood +११ baar " या कबी यो" +दरूद 

Sunday, 18 December 2022

(व्यंग्य भारती) शर्म इनको मगर नहीं आती

(व्यंग्य भारती)

"शर्म इनको मगर नहीं आती "

     अपने अपने तरीके से हर कोई आत्मनिर्भर होने में लगा है! लेकिन इस कालिकाल में उम्मीदों में बौर आने से पहले ही लसिया जाते हैं! जब कामयाब होने वाले कम हों और बेकारी के शिकार ज़्यादा, तो विरोध और विद्रोह में से कुछ भी हो सकता है! जहां संतोषम परम सुखम है, वो जगह क्रांति के लिए बंजर है ! क्रांति का अर्थव्यवस्था से भी गहरा नाता है ! रोटी की फिक्र आदमी को मेंदा से मस्तिष्क की ओर नहीं जाने देती ! धीरे धीरे आदमी पेट से सोचने लगता है ! ऐसी सिचुएशन में बहुमत के दिमाग को कुछ लोग हाइजैक कर नर्सरी बना लेते हैं ! अब वहां मनपसंद विचारधारा रोपी जाती है ! सर्वहारा वर्ग विचारधारा को ही गेहूं और धान समझकर आत्मनिर्भरता की ओर चल पड़ता है ! ऐसी नर्सरी का आविष्कार सबसे पहले कांग्रेस ने ही किया था, आज छोटे भाई ने संभाल लिया है!
रंग पर रिसर्च शुरु हो गया है !
       ये पहली बार है कि "रंग" बेशर्म नज़र आया है! कुछ लोग आहत होने वालों से पूछ रहे हैं कि अक्षय कुमार और मनोज तिवारी की फिल्मो से आस्था को इंफेक्शन क्यों नहीं हुआ था ! यहां तो फ़िल्म के नाम ( पठान) से ही आस्था आहत गैंग सड़क पर उतर आया  ! बुनियाद देख कर ही आत्मा आहत होने लगती है,ऊपर से जेएनयू में आस्था रखने वाली हीरोइन ! इस फिल्म को तो देखना भी महापाप है ! विरोध जायज है, जब इंडस्ट्री में कंगना जी जैसी संस्कारी और सात्विक विचार वाली हीरोइन साक्षात मौजूद है तो दीपिका को क्यों साइन किया गया ! किसने  ऐसी बेशर्मी की ! बहुत नाइंसाफी है यह! इसकी सजा मिलेगी ! ऐसे गानों को देख देख कर आठ आठ साल के बच्चे भी गुल्लक फोड़ कर फ़िल्म देखने भागेंगे ! ऐसे गानों से संस्कार को पाला मार सकता है !
         बायकॉट के विरोध में विपक्ष अड़ गया है, काहे बहिष्कार करें, अक्षय कुमार और निरहुआ के गाने का विरोध काहे नहीं किया । उस गाने में तो ज़्यादा वायरस थे , तब आस्था काहे नहीं आहत हुई ! अब तो आटा बेच कर फ़िल्म देखना है! फ़िल्म नहीं देखूंगा तो विपक्ष धर्म का पालन कैसे होगा ! फिल्म नहीं देखा तो दीपिका और शाहरुख के घर वाले भूखों मर जाएंगे । तुम्हारी आस्था को चोट पहुंच रही है,इधर मेरी आस्था को इसी गाने से फाइबर हासिल हो रहा है ! अब आस्था का ध्यान तो रखना होगा ! परिवार का ध्यान रखने के लिए 5 किलो गेहूं है न ! आस्था का ध्यान कौन रखेगा !  पहले तो लोग ही एक दूसरे की आस्था का ध्यान रखते थे ! तब वाली आस्था इतनी कुपोषित भी नहीं थी कि पीली धूप देख कर मुरझाने लगे !
         आज दोपहर होते होते आस्था आहत गैंग के वर्मा जी ने चौधरी के कान भर दिए! चौधरी सीधा मेरे पास आकर बोला, -" उरे कू सुण भारती ! कितै जा रहो आज फिल्मी छोरी के गैल"!
      " कौन छोरी?" 
" वही छोरी, जो पीला लंगोट बांध कर आस्था आहत कर रही है ! के नाम सै बेशर्म छोरी कौ "?
       " दीपिका पादुकोण"!
"घणी जल्दी याद आ गयो नाम ! कितै छुपा रख्या सै छोरी नै!!"
   " मैं शादीशुदा आदमी हूं, क्यों मेरी आस्था को आहत कर रहे हो?"
     "वर्मा नू बता रहो अक तू फिलम देखने कू तावला सै ?"
      " तौबा तौबा ! मैने आज तक तुम्हारे बगैर कोई फ़िल्म कभी देखी"?
   " नू बता, कूण सी फिलम आई है " बेशरम रंग" ।
       " गाना है, फ़िल्म नहीं "!
" गाने ते आस्था आहत हो रही, या फिल्म ते?"         "हीरोइन ने जो लंगोट बांध कर गाना गाया है, उस के रंग से ! अगर लंगोट का रंग हरा होता तो आस्था नॉर्मल होती!"
        चौधरी का दिमाग़ घूम गया, - " पर हीरोइन कू लंगोट पहनने की के जरूरत थी ! बाकी कपड़े चोरी हो गए  के "?
      चौधरी का सवाल जायज़ है! बात रंग की छोड़ दें तो सवाल है ये है कि हीरोइनों के बदन पर कपड़े सिमट क्यों रहे हैं? हालत ये है कि सूट सलवार और साड़ी जैसे गरिमापूर्ण भारतीय परिधान लगभग विलुप्त हो गए ! इस नंगेपन से हमारी आस्था क्यों नहीं आहत होती ! बेकारी और मंहगाई से आहत होने के लिए पब्लिक को लावारिस छोड़ दिया गया है ! प्रशासन कभी आहत नही होता ! करप्शन,सांप्रदायिकता और नफरत की आंच भी उनकी आस्था तक नहीं जाती । कितनी मोटी खाल है !! "बेशर्म रंग" कितना गाढ़ा चढ़ा हुआ है किरदार पर ! ज़िंदगी से थपेड़े मारती अभाव,संघर्ष और गुरबत की लहरें कहीं किसी दिन अपना रास्ता न बदल दें! भूख और बेकारी की समस्या को समाधान चाहिए, शब्द नही।
           सोशल मीडिया के समर्पित योद्धा आग बबूला हैं! संस्कार और संस्कृति को बचाने की सारी जिम्मेदारी इन्ही के कंधो पर है ! पिछले आठ सालों में एक से बढ़कर एक  क्रांति आई है! कोराेना भले जनता के लिए लाभदायक न रहा हो, लेकिन कुछ लोगो ने उस बंजर आपदा में भी नफरत उगाने का अवसर पैदा कर लिया ! कोरोना से मरे बाप की अर्थी को कंधा  न  देकर भी इनकी आस्था कभी शर्मिन्द न हुई  !  संप्रदाय विशेष के कंधों पर बाप चिता पर जाता रहा और बेटा अर्थी ढोने वालों के थूक में कोरोना की नर्सरी ढूंढता रहा। गंगा में लावारिस बहते रिश्ते सहारा ढूंढते रहे और  बेशर्म लोग रंग में नफरत !

       कबीर की एक उलटबांसी थी, - बरसे कंबल भीगे पानी -! सच को झुठलाने और झूठ को पुनर्जीवित करने का इतना बड़ा समुद्र मंथन पहले कभी नहीं हुआ !!

          

Monday, 5 December 2022

ग़ज़ल सर्द रातों में पसीना मुझे आता क्यों है!

(ग़ज़ल)
सर्द  रातों  में  पसीना  मुझे  आता  क्यूं  है !
खुशी में ज़ख्म का चेहरा नज़र आता क्यूं है !!

जो मेरे ख्वाब की  ताबीर  नहीं बन सकता!
वो  तसव्वर  में  मेरे  बारहा  आता  क्यों है !!

सनद इंकार या इकरार की हासिल तो नहीं !
फिर  कोई  मेरी तरफ उंगली उठता क्यों है !!

मैं भी इंसान हूं  खुशियों की जुस्तजू  भी है !
मेरे  हिस्से  में  भला  दर्द  जियादा  कpp  है!!

हर एक दर पे तो झुकता नहीं है सर अपना !
इतनी  खुददारी  किसी एक को देता क्यूं है !!

हर  गुनहगार  को  बख्शेगा उसका वादा है !
फिर तू आमाल फरिश्तों से लिखाता क्यूं है !

मेरे  ख्वाबों में कोई रोता है सिसकी  लेकर !
क्या पता ज़ख्म और पहचान छुपाता क्यूं है!!

ज़िंदगी एक तामाशे के सिवा कुछ  भी नहीं !
मौत  बरहक है, भला मौत से डरता  क्यूं है !!

शरीक अपनी खुशी में सभी इन्सान को कर !
सबब ए अश्क भी मजलूम का बनता क्यूं है!!

अश्क भी आग से कमतर नहीं होते "सुलतान"!
इस  हकीकत  से कोई  आंख  चुराता  क्यूं  है !!

             ग़ज़ल गो,,,,,,( सुलतान भारती)

Sunday, 4 December 2022

शायरी

शायरी
मुझे झुकाने  की  चाहत में टूट जाओगे!
मिरे क़िरदार की बुनियाद में वो लोहा है!!

Monday, 28 November 2022

"व्यंग्य भारती" चंदन विष व्यापत नहीं,,,,,!

(व्यंग्य भारती)

" चंदन विष व्यापत नहीं,,,,"!

           अब हमका का पता, काहे ! कौन सवाल जवाब के कोल्हू में उंगली दे! स्कूल में पढ़ाते हुए 'पंडी' जी हों या  'माससाब' "क्यों" पूछने पर बांस की 'सुटकुनी' उठा लेते थे ! ये   सुटकुनी  ससुरी "छड़ी" से टोटल डिफरेंट थी ! हाथ के साथ पीठ पर भी विश्वत रेखा खींच देती थी। अभिव्यक्ति की आज़ादी मस्साब के पास हुआ करती थी , वही सवाल पूछते थे ! मुझे तभी से दोहे की ये लाइन खटकती थी ! काहे नाही विष व्यापत ! बचपन में "बीछी" (बिच्छू) का डंक खाकर मैं घर के साथ पूरा मुहल्ला सर पर उठा लेता था ! यहां तो बिच्छू की जगह भुजंग का मामला था। मुझे तो चंदन और मीडिया की सांठ गांठ मालूम होती है! मास्साब से शंका समाधान करता तो वो सुटकुनी से सर्जिकल स्ट्राइक कर देते ! का करें, 1970 में मरकहा गुरु भी  "गोबिंद" हुआ करता था, उस दौर में छात्र को पीटना गोविंद का सुटकुनी सिद्ध अधिकार हुआ करता था ! घर में मास्साब की शिकायत करने पर उल्टे अब्बा श्री से पिटाई की आशंका !
        सुनी सुनाई दंत कथा लिख कर लाल बुझक्कड को साहित्यकार हो जाने का अधिकार था ! बड़ा हो जाने पर पता चला कि चंदन ने खामखा भुजंग को बदनाम कर दिया है! वो बेचारा तो सपेरे से बचने के लिए सात दिन  से  भूमिगत था ! (जंगल में सपेरे आए थे । ) चंदन को खतरा वीरप्पन से था, और नाम भुजंग का बदनाम हो रहा था ! दरअसल सात दिन बाद अज्ञातवास से बाहर आकर बेचारा भुजंग  कौआ के अंडे खाने के लिए  एक पेड़ पर चढ़ गया ! उसे क्या पता कि पेड़ चंदन का है या धतूरे का !  उसके पहले वो कभी चन्दन पर चढ़ा भी नहीं था ! भुजंग को देखते ही कौआ उड़ गया और भूखा प्यासा भुजंग बिल में जाकर कोमा में चला गया। कौए ने भुजंग की इमेज खराब करने के लिए ये कहानी कवि को बता दी ।बस कवि ने चंदन को हीरो और भुजंग को अमरीश पुरी बना दिया ! उसके बाद आज तक कवियों ने वीरप्पन का कभी नाम नहीं लिया! इसे कहते हैं कि - जबरा मारे ( मगर) रोने न दे -!! साहित्यिक षडयंत्र कितना घातक होता है!
      नाग भुजंग ! बेचारा, भूख का मारा ! कौआ का अंडा खाने के लिए पहली बार चंदन पर चढ़ा था ! उसे क्या पता कि कौए ने अपना अंडा पहले ही कोयल के घोंसले में रख दिया है और फर्जी  घोंसला चंदन के पेड़ पर टांग दिया है ! कविता की तलाश में जंगल में घूम रहे कवि को कौआ मिल गया! कौए ने भुजंग को खलनायक और चंदन के पेड़ को नायक बना दिया ! कवि ने पहली बार चन्दन पर भुजंग देखा था, उसने कौए की कहानी पर भरोसा किया और बादशाह ने कवि की कविता पर !सत्यापन किसी ने नहीं किया, - 'महाजनों येन गता: स पंथ':- मान लिया गया ! कहावत बन गई तो चन्दन को "बेचारा" और भुजंग को राक्षस मान लिया गया ! वो तो भला हो वीरप्पन का, जिसने चंदन को गुमनामी से बाहर निकाला और  दुबारा लोकप्रियता दिलाईं ! जनता को यकीन दिलाया कि चंदन के पेड़ पर कोई भुजंग नहीं रहता ! चंदन को हङपने के लिए सिर्फ  फॉरेस्ट और सियासत में बैठे दो  पैर वाले  भुजंगों  से साठ गांठ करनी पड़ती है । यही विधि का विधान है।
        प्रशासन ऐसे भुजंग से भरा हुआ है, जो जनहित में घातक हैं लेकिन उन्हे कोई कौआ किलहंटी या "तोता" चिन्हित नही करता ! बल्कि खुद मिडिया के कौए ही भुजंग की इमेज को चंदन से ओतप्रोत करते रहते हैं! कौए इनके प्रचार मंत्री हैं और तोता ताबेदार ! शत शत जोहार !! मिट्टी की जगह महल मे रहते और मलाई खाते इन भुजंगो पर किसी जहर का असर नहीं होता ! इन्हें चंदन से बड़ा लगाव होता है ! ये चंदन के पेड़ पर नहीं जाते, बल्कि चंदन खुद चलकर इनके पास आता है ! चंदन का वृक्षारोपण करते हुए फोटो खिंचवाना इन्हे अत्यंत प्रिय है । इनका जीवन चक्र चंदन के टीके से शुरू होकर चन्दन की चिता पर खत्म होता है!  
   वैसे,,,एक ठो 'लघु' साइज वाली  'शंका'  है ! चंदन पर भुजंग के जहर का अगर असर नहीं होता तो क्या ये चंदन की विशेषता है या चंदन में कमी है ! इंसान ईश्वर की बनाई सर्वश्रेष्ठ रचना है, और उस पर तो भुजंग के विष का भरपूर असर होता है ! चंदन पर क्यों नहीं होता ! इसलिए नहीं होता, क्योंकि कहानी सच से कोसों दूर है! कौआ और वीरप्पन दोनों ने भुजंग के बहाने चंदन का शोषण किया ! कौआ ने चन्दन पर घोंसला बनाया, और वीरप्पन एक पेड़ छोड़ कर चंदन काटता रहा ! प्रशासन और वीरप्पन दोनों से प्रताड़ित भुजंग आखिरकार जंगल छोड़कर आबादी में चला गया ! लेकिन भुजंग के अज्ञातवास के बाद भी एनसीआरटी ने आजतक दोहे को पाठ्यक्रम से नहीं हटाया ।
     ये मुट्ठी भर वीरप्पन और कौए आज भी वैभव के चंदन से सर्वहारा वर्ग को दूर रखने के लिए "भुजंग" का खौफ़ खड़ा करते हैं, - ' तुम लोग काम, क्रोध, मद और लोभ से दूर रहा करो ! पाप का चंदन मेरे जैसे निकृष्ट पापी के लिए छोड़ दो, और तुम कष्ट,अभाव और गुरबत की सलीब ढोते हुए स्वर्ग की बाधा दौड़ पूरी करो -'! बहुमत  जन्नत  के  लिए  खुद  को क्वालीफाई करने में लगा है !

 आज दोहा लिखने वाला बुनियादी कवि, वह कौआ और वीरप्पन में से कोई नहीं है, लेकिन चंदन के पीछे मुफ्त में बदनाम होने वाला बेचारा भुजंग आज भी अपने विष का दंश झेल रहा है !

  बुजुर्ग सही कहते हैं,- बद अच्छा, बदनाम बुरा -!

                              ( सुलतान भारती)

  

Sunday, 13 November 2022

किराए दार !

 किराए दार ध्यान दें!
  ( पूजा मिश्रा, रंजीत पंडित और हेरून मिश्रा जी)

श्रीमति/ माननीय, 
            मई 2022  के बाद इस मकान में नई नई समस्याओं का अंतहीन सिलसिला शुरू हो चुका है ! क्रैंपटन जैसी कंपनी के मोटर का बार बार खराब होना और  बंदरों के आतंक की जो कहानी मेरे छत पर पैदा होती है, वो अन्यत्र कहीं नहीं है! कोई भी मकान मालिक इतना नुकसान उठा कर नही चल सकता !  अत: अब मैने अंतिम फैसला किया है कि,,,,,
A,    आगे से बंदर सीढ़ी, पानी का पाइप या टंकी कुछ भी तोड़े, उसे किरायेदार ही लगवाएंगे, और वो पैसा किराए में एडजस्ट नहीं होगा !

B,,,,, अब अगर मोटर फूंकेगी तो आप जिम्मेदार हैं,    चाहे आपस में चंदा करके बनवाएं या अपनी मोटर ले आएं।

C,,,, मुझे रेंट एग्रीमेंट कराने हेतु आप तीनों फ्लेट के मुखिया का दो दो फोटो और आधार कार्ड की एक कॉपी चाहिए! मेरे व्हट्स ऐप पर भेज दें!
           ये जरूरी है, इसे अन्यथा न लें!

                      आपका
                    सुलतान भारती 
              9899962243 ,  9310608221
           

Friday, 11 November 2022

(कलाम विद लगाम) हृदय परिर्वतन का सीजन

(कलाम विद लगाम)           ( व्यंग्य)

            "हृदय परिर्वतन का सीजन"

      अल्लाह रहम करे, फिर एक चुनाव आ गया ! दिल्ली नगर निगम चुनाव ! ये मौसम नेताओं के लिए मधुमास जैसा सुखद है, और जनता के लिए एक बार फिर ठगे जाने का ! नेता के लिए चुनाव लडना कोई प्राब्लम नही है, उसने तो इसी के लिए इस धरती पर जन्म लिया है,- जब तक है जान जाने जहान,,,,! नेता के लिए सिर्फ एक समस्या होती है कि वो किस नए वादे और विकास का झुनझुना लेकर वोटर के बीच जाए कि पहचान लेने के बाद भी जनता खुद  को ठगे जाने से न बचा पाए ! इस दुरूह बाधा दौड़ को जीतने के बाद वो 5 साल के अज्ञातवास पर निकल जाता है, और पीछे जनता लक्षागृह में सुलगती रहती है, ( जैसा करम करेगा, वैसा फल देगा भगवान!)
        "फल" का सीजन आ पहुंचा है ! दिल्ली नगर निगम चुनाव अगले महीने होगा ! अगले महीने सांता क्लॉज के आने का शेड्यूल होता है, लेकिन अब सभी पार्टियों के सांता इसी महीने दिल्ली आ जायेंगे! सबके पास अपना अपना विकास है। सबकी स्लेज़ गाड़ी गिफ्ट से भरी है ! सब अपने अपने इलाके की जनता का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं, -सोना लै जा रे ! चांदी लै जा रे ! विकास कैसे दे दूं ओ पब्लिक कि बड़ी नादानी होगी-! अगले वार्ड में दूसरी पार्टी सांताक्लॉज जनता को जन्नत का झांसा दे रहा है, - बड़ी दूर से आए हैं, साथ में 'झाड़ू' लाए हैं - ! ( एक बार और कुंडली पर फिरवा लो!)
जनता किवांड की दराज से झांक कर देखती है, कुछ पुराने तारणहार हैं जो पिछली बार किसी और पार्टी से आए थे, और अब किसी और पार्टी की तस्वीह पढ़ रहे हैं,- ' वो पार्टी जनहित में नहीं है, विकास का मौका ही नही देती , कहती है - न खाऊंगा न खाने दूंगा! तो क्या पांच साल व्रत रख कर गुजारा करूंगा?" 
      पार्टी के प्रति आस्था और वफादारी टिकट पर आकर टिक गई है! आज टिकट मिलने की आख़िरी तारीख है ! कई और सांता क्लॉज लाइन में लगे हैं ! कई अपने अपने स्लेज में लोहे का रॉड,हॉकी,पत्थर और लाठी भी लाए हैं! अगर विकास का टेंडर किसी और को मिला तो आस्था को ईंट में लपेट कर मारेंगे! कुछ तो दूसरी पार्टी से टिकट खरीद लेते हैं और कुछ अपनी ही पार्टी के लंका दहन के लिए आज़ाद उम्मीदवार बन कर मैदान में कूद जाते हैं ! ऊनके दोनों हाथों में लड्डू है, जीत गए तो 'विकास' करेंगे, हार गए तो विपक्षी पार्टी का पैसा गया ! ' तेरा था क्या जिसे खोने का शोक करता है !' पैसा तो वोट .काटने के लिए प्रमुख विपक्षी दल ने लगाया था ! वर मरे या कन्या, अपने "विकास" पर ओस नही गिरेगी ! 
       पार्टी की प्रॉब्लम सबसे बड़ी है ! सीट एक है और विकास का टेंडर लेने वाले कई ! टिकट किसी एक को ही मिलेगा,बाकी निष्ठा का लबादा उतार कर लंका दहन करेंगे ! निष्ठा टिकट से शुरू होकर टिकट पर ही ख़त्म हो जाती है ! इसका कार्यकाल 5 साल या 35 साल होना - इस  हाथ  दे उस  हाथ ले - पर डिपेंड करता है ! हर नेता में एक हनुमान ग्रंथि होती है, जो टिकट कटते ही उसे लंका दहन को उकसाती है ! बस यहीं से हृदय परिर्वतन का अंकुर फूटता है और कई प्राणी तराजू से कूद कर दूसरी पार्टी ज्वाइन कर लेते हैं! टिकट कटते ही प्राणी के अंदर अविश्वसनीय ज्ञान और दिव्य नेत्र ज्योति प्रगट होती है! अचानक ही उसे अपनी पार्टी के गेहूं में घुन और विरोधी पार्टी में फाइबर दिखाई देने लगता है !
         दिल्ली का संगम विहार ! इसे दिल्ली के लोग खांडवप्रस्थ और संकटविहार के नाम से जानते हैं ! यहां जनता कम और नेता ज़्यादा हैं, और यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम है ! सियासत थोक में विकास न्यूनतम ! हमारे यूपी में एक कहावत है, - ज़्यादा जोगी मठ उजाड़ -! बस ये हाल है हम दीवानों का !
यहां 4 साल 11 महीने  एकता और विकास पर चर्चा होती है और चुनाव घोषित होते ही जनता खेमों में बंट जाती है ।  1993 से पार्टियां बारी बारी से इसे समग्र विकास देने में लगीं हैं, मगर पेयजल तक हर जगह उपलब्ध नहीं है ! आम आदमी पार्टी ने अपेक्षाकृत काफ़ी विकास किया, मगर पानी के लिए आज भी संकट जारी है। संगम विहार के दरवाज़े पर मेट्रो आ गई है, फिलहाल प्यास लगे तो इसी से काम चलाओ! मानसून में सड़कें और गालियां तालाब बन जाते है ! अब चुनाव में तारणहार फिर जन्नत देने आयेंगे, और हम फिर विकास का एक नया सपना लेकर ठगे जाएंगे!
         हर वार्ड में हंगामा है ! जिनका टिकट कट गया, शायद उन्हें इतना आघात नही पहुंचा जितना उनके समर्थकों को पहुंचा है! कुछ उतने आहत हैं गोया किसी ने उनकी किडनी निकाल ली हो ! कुछ औंधे मुंह ऐसे गिरे हैं जैसे उनका टाइटेनिक जहाज़ डूब गया हो ! चहेते उम्मीदवार को टिकट न मिलने का गम लिवर, किडनी और दिल तीनो में खुजली पैदा कर रहा है। ( ये रिश्ता क्या कहलाता है!!) जहां ऐसे संवेदनशील समर्थक  बैठे हों, जो विकास के बगैर भी उम्मीदवार के लिए जौहर व्रत पर उतारू हों, वहां विकास की ज़रूरत ही क्या है !!

             मैं फेसबुक देख रहा हूं, जिन्हें टिकट नहीं मिला, वो हृदयपरिर्वतन कर लोक परलोक सुधार रहे हैं ! सदमे में पड़े समर्थक भी २५ नवंबर तक सामान्य होकर मुख्य धारा से जुड़ जाएंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि वार्ड को उम्मीदवार से ज्यादा उनकी ज़रूरत है! उन्हीं की तपस्या से विकास की
भागीरथी पृथ्वी पर आएगी ! आओ दधीचि! बची हुई हड्डियों को तारणहार लेने आए हैं! विकास के हवनकुंड में काम आएंगी !!

               सुलतान "भारती"