Tuesday, 12 October 2021

(व्यंग्य "भारती") "क्या करूं, शक्ल ही ऐसी है "

                  [व्यंग्य 'भारती']

      'दुनिया बनाने वाले, मैंने थारा के बिगाङा'

          मैं अपनी पर्सनाल्टी को लेकर चिंतित हूं ! कहीं ज़रूर कुंडली में भारी उलटफेर हो गया जो मैं इस शक्ल सूरत के साथ बीसवीं सदी में पैदा हो गया ! मुझे तो हजारों साल पहले वाले सतयुग में पैदा होना था जब आदमी को आदमी पहचानता था ! खामखा सतयुग में जीने के लिए भेज दिया जब आदमी को डोमिसाइल से पहचाना जाएगा ! ऊपर से आदमियत भरा चेहरा ! आदमी बनाकर पैदा करना ही था़ तो कम से कम चेहरा तो बदल देते ! भेड़िया, हाइना, शेर, तेंदुआ, जगुआर, नाग, कोबरा या  ब्लैक मोंबा का चेहरा दे देते ! मानव शरीर के साथ  इंसानी सूरत और सीरत  देकर प्रभु तूने अच्छा नहीं किया ! दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई,,,,!   सूरत सीरत और शरीर से इंसान पाकर आज मैं खुद को ठगा सा महसूस कर रहा हूं ! ऐसी फीलिंग हो रही है गोया कैटफिश से भरे तालाब में किसी ज़िंदा मुर्गे को फेंक  दिया गया हो !
       वो गाना तो आपने सुना होगा, - अच्छी सूरत भी क्या बुरी शै है, जिसने डाली गलत नज़र डाली-! खैर इस कैटेगरी का मैं इकलौता पीस नहीं हूं - एक ढूंढो हज़र  मिलते हैं - ! मैं चेहरे के मासूमियत की बात कर रहा हूं ! कुछ लोगों का चेहरा तो इंसान का होता है लेकिन मासूमियत खरगोश और कबूतर की मिल जाती है ! ऐसे प्राणी कदम कदम पर अंगौछे की तरह इस्तेमाल होते हैं ! हर कोई उन्हें अंधे की गाय समझ कर  'दुहने ' की घात में रहता है ! कुछ लोग तो शक्ल से इतने सज्जन होते हैं कि कोई भी उनके कुर्ते में नाक पोंछ कर भाग जाए ! ऐसे  'शराफत अली' घर और बाहर दोनों जगह  ऑक्सीजन की कमी महसूस करते  रहते हैं! ऐसे लोग अपनी शादी के रोज भी सीरियस नजर आते हैं, गोया हंसे तो शादी का बिगङ जायेगा !
              कुछ लोग ऐसा फेस लेकर पैदा होते हैं कि गलती न होने पर भी डांट खाते हैं ! समाज के शातिर लोग अपने गुनाह और गलतियों का  'अंडा ' उनके घोंसले में रख देते हैं ! 'शराफत' अली को बुरा लगता है, गुस्सा भी आता है लेकिन मुंह से आवाज़ नहीं आती ! लिहाज़ में मना नहीं कर पाते ! ये जो संकोच और लिहाज़ होता है न, इंसान को बहुत नुकसान पहुंचाता है ! ये  'सतोगुण ' कुदरत उन्हें ही देती है जिन्हें सतयुग में आकर भी जिंदगी की सजा काटनी है ! चाल, चरित्र और चेहरा ऐसा लेकर कलियुग में पैदा हो गए जैसे सतयुग में रजिस्टर बदल गया हो ! घर से ऑफिस तक कलियुग का 'ततैया'  पीछा नहीं छोड़ता !  'सज्जन राम' को इन ततइयों पर गुस्सा बहुत आता है,पर उन्हें लड़ने का तजुर्बा नहीं है ! जहां तक लड़ने और पलट कर जवाब देने का सवाल है, वो दर्द का सारा आक्रोश और गुस्सा बीवी बच्चों पर निकाल कर उधारी चुका देते हैं !
           ऐसे शराफत अली और ' सज्जन दास ' दुनियां में जिंदगी का सलीब ढोने के लिए भेजे जाते हैं ! ये बेशक अपने परिवार वालों के लिए ज्यादा काम के ना हों, पर दुनियां वालों के लिए बड़े उपयोगी होते हैं ! शहर में इन्हीं  के खून पसीने की कमाई का पैसा ' पीयरलेस ' में डूबता है ! इन्हीं की शरीफ़ बीवी के गहने  साफ़ करने वाले इनका घर  " साफ" कर जाते हैं ! इनसे काम लेकर न मालिक पैसा देता है न ठेकेदार ! गांव में इन्हीं के नाम से सरपंच लोन ले लेता है ! दूर दराज भट्ठों पर इन्हीं का परिवार बंधुआ मजदूर बनता है ! शहर से गांव तक - 'शराफत अली' हाय तुम्हारी यही कहानी - ! कितना मल्टी पर्पज चेहरा है, - दुनियां भर के चोर उचक्के ठग बदमाश और लूटेरों के काम आता है !
                  धर्म में घोर आस्था और पाप से एक किलोमीटर की दूरी रखने वाले ऐसे जीव को नर्क से घनघोर डर लगता है ! उनकी खुरदरी ज़िंदगी में स्वर्ग/जन्नत के प्रति काफी सॉफ्ट कॉर्नर होता है ! उनके चेहरे से धर्माधिकारियों को काफ़ी सारी 'राहत' मिलती है! ये परिवार का पेट काट कर किश्तों में जन्नत का इंटालमेंट भरते रहते हैं, - जब तक है जान , जाने जहान मैं नाचूंगा,,,,! इनका चेहरा अपने आप में इंसानियत का स्प्रे मारता साइन बोर्ड होता है, इसलिए इन्हें 'दुर्भाग्य' आराम से ढूंढ लेता है ! इन्सानियत भरा मासूम आदमी इस दौर में अपनी ही ज़िंदगी के लिए अभिशाप बन जाता है  ! 
                 चेहरे को लेकर एक गीत है, - दिल को देखो चेहरा न देखो -! अबे जो सामने है वही तो देखेंगे ! पसलियों  के पीछे  छुपे  दिल को तो सिर्फ़ डॉक्टर देखता है ! दिल के मारों को दुनियां पूछती है, (उसमें किक है!) चेहरे से मार खाए इंसान को कोई नहीं पूछता !   मेरे गांव में एक जमालुद्दीन हैं, चेहरे से ही कबूतर की तरह मासूम हैं ! कोई उन्हें संजीदगी से नहीं लेता ! मैंने देखा ही नहीं कि कभी किसी ने उन्हें ' जमालुद्दीन ' कहकर पुकारा हो ! कोई जमालू तो कोई जकालू कहता है, कई बच्चे कचालू कह कर पुकारते हैं ! गरीब और शरीफ़ का नाम लोग रोटी की तरह तोड़ कर इस्तेमाल करते हैं ! किस्मत की सितमजरी देखिए कि तीन बेटियों के बाप हैं, बेटा एक भी नहीं ! बुढ़ापा चल रहा है, पसंद नापसंद की सीमा रेखा कब की मिट चुकी है ! ख़्वाब में अब कोई इंद्रधनुष नहीं उगता ! हंसी का पोखर मुस्कराहट की हद तक सूख गया है । पिछली गर्मियों में मैंने उन्हें बीवी से डांट खाते देखा था ! पता चला कि दस दिन सड़क निर्माण में मजदूरी की थी , मांगने पर ठेकेदार ने डांट कर भगा दिया ! लगातार टूट रहा आदमी अपना हक भी दमदारी के साथ  कहां मांग पाता है !     

  जब मायूसी हद पार करती है तो " जमालू" अपनी बेहद खस्ताहाल सायकल को खूंटी से उतार कर साफ करने लगते हैं ! शायद दोनों के दर्द की शक्लें एक जैसी हो चुकी हैं !

   मित्रों ! लाइक और कमेंट मेें नो कंजूसी प्लीज !

 ( सुलतान "भारती" )
           

Saturday, 2 October 2021

" पतझड़ में बसंतोत्सव"!

( व्यंग्य "भारती")      "पतझड़ में बसंतोत्सव"


          मरहूम अब्बा श्री के नाम में कुछ मिस्टेक थी तो बिजली का बिल लेकर मैं  'बीएसईएस' के ऑफिस पहुंचा ! तारीख़ थी, 04-10-2021 . वहां जाकर पता चला कि सरकारी संस्थान में कोरोना ने बाबुओं को कितनी सुविधा उपलब्ध कराई है ! विंडो के पीछे बैठा क्लर्क मुझे देखते ही गुर्राया, - " प्रॉब्लम बाद में बताना, पहले फेस मास्क ठीक करो ! नाक से नीचे फिसल रहा है ! कोरोना बाटने आए हो क्या "!
  " तुम्हें मेरी नाक में कोरोना नज़र आ रहा है क्या ?"
" किसी के माथे पर लिखा है कि वो कोरोना फ्री है ! लोग जाने क्या क्या लेकर घूमते हैं! खैर तुम क्या लाए हो?"
      " बिजली के बिल में नाम ठीक कराना है"!
" तो पहले गलत नाम क्यों लिखाया था ?"
    "ये गलती तुम्हारे विभाग ने की है !" 
         " तीन नंबर खिड़की पर जाओ !" 
     तीन नंबर खिड़की पर बताया गया कि कोरोना के चलते फिजिकली डॉक्यूमेंट नहीं जमा हो सकते ,  क्या 
भरोसा आप बिजली बिल के साथ साथ ब्लैक फंगस भी  टोपीलेकर आए हों ! ऑन लाइन डॉक्यूमेंट सम्मिट करने lपर  यूवायरस पाइप लाइन में फस जाते हैं ! पीछे खड़े हुए एक सज्जन  बगैर पूछे बताने लगे - " दो महीने से चक्कर काट रहा हूं । ये कागज़ात लेते नहीं और ऑन लाइन एक्सेप्ट नहीं होता ! त्रिशंकु बनकर बीच में लटके रहोगे ! कोरोना  हरामखोरों के लिए कितने अवसर लेकर आया है "!
           लौट के बुद्धू बस स्टॉप पर आए ! शेड पर खड़े होते ही मेरी नज़र एक सरकारी विज्ञापन पर पड़ी ! पढ़ कर मैं सन्न् रह गया ! मुझे अपने पिछड़ेपन पर गुस्सा आने लगा ! आज जाकर मुझे पता चला कि देश  "विकास उत्सव"  मना रहा है ! सचमुच अक्ल के मामले में मैं अभी भी नाबालिग हूं । देश विकास उत्सव मना रहा है और मूर्ख लोग विकास ढूंढ रहे हैं ! गली में छोरा शहर ढिंढोरा,,,,! घर मेंउपलब्ध कनस्तर का आटा अंतिम सांस ले रहा था ! मुझे तुरंत विकास की ज़रूरत थी ! मैं विकास उत्सव के विज्ञापन को इस उम्मीद और आत्मीयता से देख रहा था, गोया अभी अभी आटा समेत कनस्तर बाहर आने वाला है। कनस्तर नहीं आया, उल्टे बस आ गई और एक बार फिर मैं  विकास से वंचित हो गया - करम गति टारे नाहि टरे !
         "विकास उत्सव" के बारे में जानकारी प्राप्त होने के बाद मेरी मन: स्थिति - नींद न आए मुझे चैन न आए कोई जाओ जरा ढूंढ के लाओ - जैसी हो चुकी है ! मैने अपने पड़ोसी 'चौधरी' से मशविरा किया, - "देश विकास उत्सव मना रहा है! "! 
     चौधरी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मेरा मानसिक संतुलन ठीक नहीं है! फिर धीरे से बोला , -" फेस मास्क लगाकर लिकड़ा कर घर ते ! आखिर हो गया न कोरोना !! इब घर जा , अर भटकटैया का काढ़ा पी कै सो ज्या !"
       " पर मुझे तो कुछ हुआ भी नहीं!"
" नॉर्मल होता तो दिन में  "विकास उत्सव" के धोरे कदी न जाता ''!
       " मैने बस स्टॉप पर लिखा देखा था। तीन साल से बेकारी ओढ़ कर लेटा हूं, ऐसे में किसी को विकास करते कैसे देख सकता हूं ! मैने सोचा शायद तुम्हें उस जगह का पता हो, जहां बसन्त आया हुआ है "!
       " किस्मत फूट गी  म्हारी ! बारह साड़ लिकड़ गया विकास  अर बसंत कू देखे ! इब तो सुबह शाम तमैं ही देखूं सूं ! कती पतझड़ पसर गयो जिंदगी में " !
         " मैं क्या करूं कहां जाऊं ! सच बड़ा संदिग्ध हो गया है ! हकीकत और प्रोपेगंडा के बीच का फ़र्क ही मिटता जा रहा है ! भूख और खाली पेट के बीच में - संतोषम परम् सुखम - अड़ गया है । स्लोगन ने सच को निगल लिया है ! मैं बड़ी शिद्दत से केजरीवाल की तरह एक स्वस्थ मुस्कराहट चहता हूं ! लेकिन मुस्करा नहीं पा रहा हूं ! जैसे ही सावन की कल्पना करता हूं, सामने पतझड़ आ जाता है ! "
           " गाम लिकड़ ले मेरे गैल तीन दिन के लिए ! उतै धान कौ खेतन में सावन उतरो सै ! वरना विकास उत्सव ढूंढ ढूंढ कै कती पागल हो ज्या  गा "!
       मैंने सोचा, एक से भले दो, जाकर ' वर्मा जी ' से भी
पूछ लिया, - ' सावन के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?"
   " सिर्फ इतना कि सावन में अंधा होने पर पूरी ज़िंदगी इंसान को हरा हरा नज़र आता है ! लगता है तेरे  घर में गेहूं आ गया है ! जब तक भाजपा सरकार है, मौज कर ले।"
      " पर फ्री राशन तो केजरीवाल सरकार दे रही है?"
 "  खाते में हर फसल पर पैसा तो मोदी सरकार डालती है ! उसके बगैर गेहूं नहीं उगता, इसलिए अबकी बार मोदी सरकार "!
 " मैं भी विकास उत्सव मनाना चाहता हूं, कैसे मनाऊं" ?
         " तेरे मन में खोट है ! तुझे सच कभी नहीं नज़र आएगा ! जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी त्यों तैसी ! कुछ समझा "?
        " अज्ञानी हूं , मार्ग दर्शन करें "!!
    " ईश्वर नजर नहीं आता किंतु करोड़ों भक्त उसे हर वक्त महसूस करते हैं ! ठीक उसी तरह विकास है, जिन्हें नजर आ रहा है वो 'उत्सव' मना मना रहे हैं, जिन्हें तुम्हारी तरह दूध में मक्खी ढूंढने की बीमारी -उन्हें न "विकास" नज़र आता है  न  "उत्सव" ! तूने- 'फर्स्ट डिजर्व देन डिजायर- ' वाली कहावत तो सुनी होगी न ! पहले खुद को इस लायक़ बनाओ कि तुम्हें " विकास" दिखाई पड़े ! जिस दिन ये योग्यता आ गई तुम अपने आप "उत्सव" मनाने लगोगे ! अभी हट जा ताऊ पाच्छे नै, हवा आने दे "!!

   मैं अभी भी पतझड़ में बसंत ढूंढ रहा हूं !!

( दोस्तों पढ़ कर कमेंट ज़रूर करें !  ( सुलतान भारती )
               


        

''हास्य धारावाहिक"

(  हास्य  धरावाहिक )

      " मारे गए   गुलफाम "
( " सारांश " )       (Synopsis).   
          काल खंड- ( इक्कीसवीं सदी  2021.)

           स्टोरी 

 (  आपदा में अवसर की तलाश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रुहेलखंड यूनिवर्सिटी से निकले दो ग्रेजुएट और  जिगरी दोस्त ,,,,, साबिर  और सतबीर ! ! एक इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर, और  दूसरा ग्रेजुएट के अलावा कुश्ती में चैंपियन  और कराटे में ब्लैक बेल्ट ! दोनों किसान के बेटे नौकरी की तलाश में दिल्ली आते हैं ! दोनों गांव की रामलीला में एक्टिंग करते करते भेष बदलने और अभिनय के शौकीन हो चुके हैं ! उन के पास डिग्री के साथ हिम्मत , हिकमत , जोश और हौंसला तो था लेकिन शायद क़िस्मत ब्लैक एंड व्हाइट थी ! लगातार नौ महीने नौकरी के लिए ऑफिसों की परिक्रमा करने के बाद भी जब नौकरी न मिली तो सतवीर जाट की खोपड़ी घूम गई , - उरे कू सुण साबिर !"
          " हां सत्ते !"
  " इब के करेगा भाई "?
    " के करूं  यार ! कल भी नौकरी ढूंढने निकलूंगा !"
" कोल्हू के बैल बण  गे -" सतवीर जाट  बिगड़  गया - " सुबह ते शाम तक नौकरी खातर चक्कर काटते जूते घिस  गे  म्हारे "!
     " तो करें क्या ! गांव लौट चलें "?
" मन्ने के बेरा ( मुझे क्या पता) ! मगर नू लगे अक अपनी
 किस्मत  में  नौकरी  कोन्या ! ''
      " हंबे !" साबिर ने हामी भरी - " घणा धक्का खा लिया सत्ते "! 
        अचानक सतवीर मुस्कराता है, -"  यू दिल्ली ने हमारे गैल बढ़िया न करी ! इब मैं सूद समेत सबै वापस कर द्यूंगा !" 
      " सूद समेत वापस ? ज़रूर तू कुछ गडबड करेगा "!
" इब तक हम नौकरी के पाछे दौड़ते रहे, इब नौकरी बाड़े  हमारे पाच्छे दौड़ांगे "!
 साबिर ने सर पीट लिया, - " जाने अब तुझे क्या फितूर सूझा है "! 
           सतवीर मुस्कराया , - " रामलीला !!"
     " रामलीला ! क्या मतलब ?"
" रामलीला में मैं राम बनता था, अर तू लक्ष्मण "!
      "तो" ?
    " उम्र में तू मेरे ते आठ महीने बड़ो सै, पर जिन्दगी कौ रामलीला  में तू मेरो शागिर्द बनेगो - लक्ष्मण की तरया"!
     साबिर ने अपना सर नोचते हुए पूछा - " पक्का मरवाएगा मुझे ! करना क्या है मेरे बाप ? " 
         " इब तक हम नौकरी ढूंढते थे, इब नौकरी बाड़े मोए ढूंढेंगे ! लोग म्हारे धौरे मोह माया लेकर आंगे अर यहां ते सुकून प्रेम और संतोष लेकर ज्यांगे "!
     "ऐसा कौन सा काम करेगा सत्ते ! मेरे तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा !! ज़रूर किसी बड़ी मुसीबत को न्यौता देने वाला है !! अब मुझे साफ साफ बताओ "!

( और फिर  सतवीर जाट के दिमाग़ से जो  'लाजवाब' प्लान  निकल कर बाहर आया उसे सुनकर इंजीनियर साबिर अली की आंखें फैल गईं ! मगर उस धंधे में कुछ भी गैरकानूनी नहीं था, इसलिए थोडा न नुकर के बाद साबिर भी तैयार हो गया !
      तो,,,, आखिर वो धंधा क्या था ?  दोनों जिगरी दोस्तों ने इस बार  अपने लिए " आपदा" को न्यौता दिया था या   किसी बढ़िया  " अवसर " को !  जानने के लिए देखते रहिए - हास्य, व्यंग्य,सौहार्द और राष्ट्रवाद की चाशनी में सराबोर विख्यात व्यंग्यकार सुलतान भारती की कलम का ताज़ा तिलिस्म- " मारे गए गुलफाम.''!!! बहुत जल्द "डी वी चैनल" पर  !!)

Monday, 20 September 2021

" अपना अपना स्टैमिना है जी "

(व्यंग्य ''भारती"). "अपना अपना स्टेमिना है  साहब !"

             अब आपसे क्या छुपाना,,,,, अपने स्टेमिना को लेकर मैं कुछ खास सैटिसफाइड नहीं हूं ! दरअसल मैं स्टेमिना को लेकर अक्सर कन्फ्यूज हो जाता हूं कि इस पर भरोसा करूं या न करूं ! ऐसे स्टेमिना को लेकर कोई कैसे खुश हो सकता है जिसकी स्टोरी में शादी के बाद कोई महिला मित्र न हो ! ( धर्मपत्नी शादी से पहले मित्र हो सकती है,शादी के बाद तो,,,, हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता  है !) विश्व विख्यात ब्रिटिश लेखक चार्ल्स डिकेंस का मानना है कि - लगातार असफलता आदमी को अपनी नजर में बौना कर देती है-! ( मुझे भी लगता है कि पिछले तीन साल से मेरा कद काफ़ी कम हुआ है !) लेकिन मैं,,, चार्ल्स तोरी बतियां न मानू रे ,,,,,,!!
                स्टेमिना ,,,,,,बोले तो क्षमता की सबकी अलग कहानी है ! सब अपने स्टेमिना को धार देते रहते हैं ! बड़ी अजीब अजीब चीज़ो में लोगों ने अपनी क्षमता यानि स्टेमिना को डेवलप किया हुआ है! हमारे गांव में एक सज्जन ने रात के घनघोर अंधेरे में दूसरे के पेड़ का महुआ चुराने का स्टेमिना था ! इस स्टेमिना के चलते वो एक रात पेड़ से टपक पड़े और सुबह टूटी हुई टांग के साथ बरामद हुए ! जिसके पेड़ के नीचे पैर तुड़वा कर   बरामद हुए थे, उसी शख्स ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया ! उन्हें टांग टूटने का उतना दुख नहीं था जितना। उस रात महुआ न चुरा पाने का !
            किसी किसी में दूध के अंदर पानी मिलाने का ऐसा गज़ब का स्टेमिना होता है कि लैक्टोमीटर तो दूर खुद भैंस भी नहीं पहचान पाती !  मजे की बात ये है कि मिलावट को न दूधिया कुबूल करता है न भैंस ! ऐसी विषम परिस्थिति में अगर ग्राहक उसे गलत बताए तो भैंस और दूधिया दोनों बुरा मान जाते हैं ! मैंने अपने दोस्त चौधरी से एक दिन शंका ज़ाहिर की,- " अपनी भैसों को कोविड वैक्सीन लगवाई "?
       " तूने लगवा ली  के ?"
  " हां , एक लगवा ली, दूसरा लगना है "!
" दूसरा लगने के बाद भी तू चलता फिरता नज़र आया ता फेर भैसन कू लगवा लूंगा " !
  " मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि तुम्हारी भैंसें आजकल पानी बहुत पी रही हैं" !
   "  मन्ने के बेरा ! पर तमै कैसे पता चल्या ?"
    " दूध के नाम पर सिर्फ सफेदी बची है "!
चौधरी भड़क उठा, " तमैं भैसन के कैरक्टर पे उंगली ठाने ते पहले नू सोच्या को न्या - अक - थारी सेहत उन्हीं की बदौलत बची रह गी "! 
    " सेहत का ही तो रोना है चौधरी ! नए साल में उधार दूध पीना शुरू किया था, चौथे महीने ही मुझे कोरोना ने धर दबोचा ! आठ किलो वजन खा गया ! काश भैंस ने मेरे बारे में से सीरियसली सोचा होता"!
       चौधरी ने मुझ पर ब्लेम लगाया, - " सबै गलती थारी है, तमै दूध का पेमेट हर महीने कर देना चाह ! नब्बे दिन तक तमै कूण  धार  देगो ! या में भैंस की गलती कोन्या  भारती ! कोई और भैंस होती तो इब तक थारा सर फाड़ देती "!
          भैंस का स्टेमिना सुन कर मैं चुप हो गया !
       कुछ लोग अपने स्टेमिना को लेकर गलतफहमी पाल लेते हैं ! गलतफहमी में जीना और कोमा में जीना एक जैसा है ! दोनों सूरतों में आदमी सिर्फ जीने का भ्रम बनाए होता है !  गलतफहमी में जीना बडा घातक होता है। प्राणी अपनी इमेज को अचानक ही कद्दावर मान लेता है और फिर सारे मुहल्ले से उम्मीद करता है कि उसके इस नए अवतार को लोग तस्लीम करें ! ऐसा महामानव मुहल्ले से लेकर महानगर तक कहीं भी बरामद हो सकता है ! कल दक्षिण दिल्ली ( संगमविहार) के कोरोणा वैक्सीन सेंटर में आए 4 फुट 11 इंच के एक महापुरुष मुझे अपना परिचय देते हुए कह रहे थे -" मुझे नहीं जानते! मुझे तो संगम विहार का बच्चा बच्चा जानता है !! कहीं बाहर से आए हो क्या "?
             " नहीं तो ! मैं भी संगम विहार से हूं"!
       " फिर मुझे कैसे नहीं पहचाना ! खैर अब गलती सुधार लो, और मुझे अंदर जाने दो ! "
       लेखक को अपने टैलेंट को लेकर अक्सर गलतफहमी हो जाती है ! वो चहता है कि सारी दुनियां उसे पढ़े मगर वो किसी को न पढ़े ! अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए वो थोक में झूठ बोलता है,, - झारखंड साहित्य अकादमी मुझे सम्मानित करना चाहती है, मगर मैने मना कर दिया। मैं नक्सल प्रभावित राज्य में जाना ही नहीं चाहता ! दरअसल मैं प्रेम और श्रृंगार रस का पुजारी हूं, बंदूक और बारूद के नाम से ही मेरी रचना दूषित हो जाती है ! " साहित्य सम्मेलन में आमंत्रित न किए जाने का कारण वो कुछ यूं बताते हैं, -" लिस्ट फाइनल करने से पहले आयोजक का फ़ोन आया था, मैंने आमंत्रित किए जाने वाले कवियों की लिस्ट मांगी ! नाम देखने के बाद खुद जानें से मना कर दिया ! कम से कम रचनाकार का स्टेमिना और स्टैंडर्ड तो बराबर का होना चाहिए"!
   
        झूठ सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हो चुका है, पता नहीं कैसे - सत्यमेव जयते - का नगाड़ा पीटा जा रहा है ! हर कदम पर झूठ की मार्केटिंग ज़ारी है ! झूठ के स्टेमिना के सामने सत्यमेव जयते का ऑक्सीजन लेवल लगातार
गिर रहा है और विधायिका चाहती है कि  "सत्य"  को सिर्फ  स्लोगन (नारा) के भरोसे  "जयते"  मान  लिया जाए ,- मगर मैं क्या करूं, दिल है कि मानता नहीं !!
                                 (  सुलतान भारती)


Thursday, 16 September 2021

( व्यंग्य"भारती") परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर

                       (व्यंग्य "भारती")

          " परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर" !

              मुझे भी अब तक नहीं मालूम था कि साधुओं ने किस लिए मानव शरीर धारण किया है !  यति नरसिंहराव को देखकर  पता चला कि दर असल साधुगण 'परमार्थ' के ब्रांड एंबेसडर बन कर पृथ्वी पर आए हैं ! पिछले कई दशक से वो परमार्थ कर रहे हैं और जनता उसका "फल" खा रही है !  एक प्रसिद्ध साधु के चेले ने तो गुरु के "परमार्थ" को हड़पने के लिए अभी हाल ही में अपने गुरू का ही  'राम नाम सत्य' कर डाला ! कुछ कॉरपोरेट साधु तो नेताओं के वोट बैंक तैयार करते करते  सत्ता के  " गॉड फादर" हो गए ! किंतु जब हर दल के अपने अपने गॉड फादर होने लगे तो परमार्थ का लोड बढ़ गया ! शिक्षित और अशिक्षित दोनों  तारणहार के  आश्रम में होने वाले 'परमार्थ ' से परिचित और मौन थे ! सत्ता पर आस्था का बेताल सवार था ! ऐसे में "साधुन" को  'सद्कर्म' करने से भला कोई कैसे रोक सकता था ! ±
                 भाजपा के सत्ता में आते ही कई सेवन स्टार बाबाओं के खाते में जमा 'परमार्थ ' की जांच शुरु हो गई! वाणप्रस्थ आश्रम की अंतिम सीढ़ी पर खड़े स्वर्णभस्म खा रहे साधु जेल जाने लगे ! "राम" और "रहीम" दोनों के चरित्र पर कालिख पोत रहे अवतारी पुरूष को उनके 'परमार्थ' समेत जेल भेज दिया गया ! कई साधु देश छोड़ कर निकल भागे और  विदेश  में  आश्रम खोल कर  'परमार्थ ' निर्माण में लग  गए ! एक ऐसी पार्टी सत्ता में आई थी जिसमें ओरिजनल साधु थे, अत: डुप्लीकेट साधु और उनके बुरे परमार्थ के "अच्छे" दिन शुरू हो गए थे ! रोज कहीं न कहीं से खबरें आने लगीं कि - ' जो बेचते थे दर्दे दवाए दिल, वो दुकान अपनी बढ़ा गए -!'
        परमार्थ के लिए साधु ही परमिट का हकदार है! आम आदमी का किया हुआ परमार्थ शायद मार्केट में नहीं चलता ! सज्जन आदमी के ' परमार्थ ' को मुहल्ले में भी क्रेडिट नहीं मिलता और स्वामी नित्यानंद का "परमार्थ" देश से भाग जाने  पर भी ब्रेकिंग न्यूज में आता है ! साधु सन्त चाहते हैं कि वो जो भी करें उसे 'परमारथ' माना जाए ! सांसारिक दृष्टि से देखने पर भले वो लुच्चे नज़र आये, पर वो परमार्थ है ! उसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए ! परमार्थ नाना प्रकार के हो सकते हैं ! संत चाहे नंगा होकर मालिश कराए या बलात्कार करे , वो परमार्थ की कटेगरी में ही आएगा ! संत समागम में आईं युवा मलिलाओं पर  टॉर्च की स्पॉटलाइट डाले या फिर बुरी नजर ! उसके खिलाफ आवाज उठाना चरित्रहीनता और व्यभिचार में आता है ! संत का जन्म नहीं होता बल्कि परमार्थ के लिए वो मानव शरीर धारण करता है ! जेल जाकर भी उसका चाल, चरित्र,और चिंतन "परमारथ" में लगा होता है !
             धर्म कोई भी हो, महिलाएं सबसे पहले  अवतारी पुरुषों के संपर्क और सम्मोहन में आती हैं ! इसके बाद परमार्थ शुरु हो जाता है ! बाबा की झकाझक सफेद दाढ़ी से एक मोहिनी कंटिया बाहर आती है और आस्था के साथ 'परमार्थ' शुरु हो जाता है ! धीरे धीरे घर के मर्द भी विवेक की चिलम  पीना शुरू कर देते हैं ! 'परसाद' और 'परमार्थ' बढ़ता चला जाता है , काम क्रोध मद लोभ से मुक्ति मिलनी शुरू हो जाती है! प्राणी को मृत्यु लोक में रहते हुए भी देवलोक की अनुभूति होने लगती है ! सद्कर्म की कंटिया में फंसा एक जीव  मोहल्ले की कई  'मछलियों' को मोक्ष दिलाने का परमार्थ करता  है ! 
         न  "साधु जन" में कोई कमी आई है न  'परमार्थ' में ! यूपी के सुल्तानपुर स्थित मेरे गांव में एक दशक पहले भूईसर ( मुंबई) से एक सैयद बाबा पधारे ! वो सर से लेकर पैर तक परमार्थ में डूबे हुए थे ! भक्त और बाबा की शोहरत इन्फेक्शन की रफ्तार से फैली ! भक्तों में नर नारी दोनों की प्रचुरता । बाबा  मुस्लिम और हिंदू दोनों के चहेते थे ! बाबा के प्रचारक बाबा को काम क्रोध मद लोभ से कई किलोमीटर दूर बताते थे ! कुछ विरोधी भक्तों ने दबे स्वर में बताया कि- बाबा के पैर का दर्द युवा  महिलाओं  के  दबाने  से  ही  दूर  होता है-!  यही नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील अवसर पर  पुरुष भक्तों के दर्शन मात्र से बाबा का पैर दर्द बढ़ जाता था ! पारिवारिक और सांसारिक मोह माया से मुक्त पैंसठ वर्षीय बाबा अविवाहित बताए जाते थे ! विगत वर्ष सैय्यद बाबा अचानक मुंबई प्रवास में   "स्वर्गीय" हो गए ! उन्हें दफनाने के लिए पैतृक गांव गोंडा लाया गया !  उनकी मय्यत में गए भक्त ये देख कर सदमे में आ गए कि मोह माया से परे होने का ढोंग करने वाले सय्यद बाबा शादीशुदा और बाल बच्चेदार थे ! जिस जमीन पर दफनाए गए ,वो भी एक विवादित भूखंड था ! स्वर्गीय होकर भी - माया तू न गई मेरे मन से - !
        ये जो पर्मारथ है न ! कभी कभी ठग और लुटेरे भी आजमाने लगते हैं ! उम्र के इंटरवल तक अविवाहित रहे एक साधु को अचानक गृहस्थ आश्रम के प्रति मोह उत्पन्न हुआ ! कई युवकों ने मिलकर एक कमसिन लड़के को साड़ी में दूर बिठाकर साधु से कहा, -' इस लड़की को पति बहुत मारता है , ससुराल से भाग आई है ! गरीब की बेटी है आपके साथ सुखी रहेगी -' ! कामिनी मोह में साधु अंधे हो चुके थे। मंदिर के सामने वरमाला पड़ी और रात में डकैती ! साधु को नशीली चीज पिला कर हनीमून से पहले ही, जीवन भर का जमा किया  'परमार्थ' , समेट कर दुल्हन  गैंग के साथ फरार हो चुकी थी ! होश में आने पर बाबा महीनों अंगारों पर करवटें बदलते रहे!

          सोशल मीडिया पर ऐसे ठगों का पूरा टिड्डी दल मौजूद है जो - साधून धरा शरीर - के गेटअप में कुछ यूं जाल बिछाते हैं, - 'कोई गारंटी नहीं, कोई डॉक्यूमेंट नहीं ! पांच मिनट में फटाफट लोन लीजिए  -'! ( इस सादगी में कौन न फंस जाए ऐ खुदा ! लगता है कि इनकम टैक्स विभाग की रेड से बचने के लिए दानवीर हातिमताई नोट की बोरी फेंकना चाहते हैं !) साहित्यकारों को फसाने  के लिए अलग तरह की कंटिया है, -  'क्या आप लेखक हैं और अपनी किताब को दुनियां के 175  देशों में देखना चाहते हैं ? यदि  'हां ' तो हमारे  'परमारथ प्रकाशन ' से किताब छपवाएं  और दुनियां के अगले बेस्ट सेलर  राइटर बने - '! ( पूरे शहर के प्रकाशकों द्वारा ठुकराई गई रचना को लेकर रचनाकार  "बेस्ट सेलर"  होने के लिए फौरन व्हेल के मुंह में छलांग मार देता है !)

              परमार्थ में लगा  "साधुन धरा शरीर" कलियुग में खूब फल फूल रहा है और सचमुच के परमार्थ  में सब कुछ गवां कर संत खुद को सीख दे रहा है - " नेकी कर और जूते खा " !! 

                        ( सुलतान भारती )।      
          



Wednesday, 15 September 2021

आदरणीय नड्डा जी,

आदरणीय जे पी नड्डा जी
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष
 राष्ट्रीय कार्यालय दिल्ली
पिन 110001

संदर्भ -- यशस्वी प्रधान मंत्री के सर्वजन हिताय कार्यक्रम " प्रधान मंत्री जन कल्याण जागरूकता अभियान '' के बढ़ते प्रभाव एवम जुड़ते जनसमुदाय के विषय में !
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आदरणीय नड्डा जी,
                   भारत के यशस्वी प्रधानमन्त्री और विश्व राजनीति के धुरंधर नेता हमारे नरेंद्र मोदी जी की सभी योजनाएं सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की कसौटी पर खरी उतरी हैं ! उनका सदैव यह प्रयास रहा है कि देश की १४५ करोड़ आबादी का सहभागी बने अंतिम ज़रूरत मंद आदमी तक उनकी योजना की सूचना एवम सहभागिता का लाभ पहुंचे !
                किंतु सत्ता का वनवास काट रहे विपक्ष के दुष्प्रचार एवम हमारे जनसंपर्क की कमी के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में हमारे पी एम की जनकल्याणकारी योजनाओं की सटीक और सामयिक जानकारी जनता को नहीं मिल पाती ! अपने कुत्सित स्वार्थ के चलते विरोधी दल प्रधानमन्तरी जी के इन बहुमुखी जनकल्याण योजनाओं के व्यापक प्रचार एवम प्रसार की गति कुंद करने में लगे रहते हैं! ( मिसाल के तौर पर  "तीन तलाक" के मुद्दे को देखिए ! मुस्लिम समाज की महिलाओं के चतुर्मुखी आजादी, बराबरी एवम विकास के लिए उठाए गए इस क़दम को भी विपक्ष ने अपने दुष्प्रचार की सामग्री बना ली है !) 
         हमारे संगठन में हर वर्ग के शिक्षित, समर्पित और संगठित युवा शामिल हैं! हमारा लक्ष्य है कि प्रधान मंत्री जनकल्याण योजनाओं से शहर से लेकर गांव के आखिरी आदमी तक  को जागरूक करना, जिससे देश के हर उस जरूरतमंद को इन योजनाओं का लाभ मिल सके , जिनको लक्ष्य कर हमारे पीएम ने ये योजनाएं शुरु की हैं !
        आशा है आप हमारे संगठन को जनहित और राष्ट्रहित में जागरूकता अभियान से जोड़ने की अनुमति प्रदान करेंगे - धन्यवाद

      ।।                    राष्ट्र हित में सदैव समर्पित आपका
                    

Thursday, 2 September 2021

("व्यंग्य भारती") दिल तो पागल है!!

           " दिल तो पागल है "

             अब इसमें मेरा क्या कसूर ! शाम को अच्छा भला था, सुबह बारिश होते ही बौरा गया । मैने अपने दिल से बात चीत शुरू की, -' हाय ! कैसे हो !'
       ' तुम से मतलब ?'
   " काहे भैंसे की तरह भड़क रहे हो ! मैने तो सिर्फ  हाल चाल पूछा है - ! शाम को तुम नॉर्मल थे, सुबह का मानसून देख कर भड़के हुए हो, दिले नादान तुझे हुआ क्या है !'
       " जहां बेदर्द मालिक हो वहां फरियाद क्या करना ! काश मैं किसी आशिक के जिस्म में होता ! मजनू, फरहाद - रोमियो में से किसी के बॉडी में फिट कर देते, पर किस्मत की सितमज़री देखो , लेखक के पहलू में डाल दिया ! दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई !"
       मुझे हंसी आ गई, - ' अब बगावत करने से क्या हासिल होगा ! आख़री वक्त में क्या ख़ाक मुसलमा होंगे ! तुम्हें तीस साल पहले सोचना चाहिए था !"
         " बस यही तो रोना है ! मुझे सोचने की सलाहियत नहीं दी गई। तुम्हारे सर के अंदर जो सलाद भरा है, वो तय करता है कि मुझे कब रोना हैऔर कब आत्मनिर्भर होना है ! तुम्हारे पल्ले बंध कर रोना रूटीन हो गया और आत्मनिर्भरता ख़्वाब "!
         " दिल को संतोषी होना चाहिए"!
    " दिल पर दही की जगह नींबू मत टपका ! अभी जाने कब तक सजा काटनी होगी ! जिंदगी में कोई चार्म नहीं रहा ! लेखक का दिल होना किसी अभिशाप से कम नहीं है ! हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती "!
      ''' गोया तुम्हें अभी भी मुझसे मोहब्बत है !"
   ''' मुहब्बत और लेखक से ! मैं इतना भी मूर्ख नहीं !           "आखिर तुम्हें एक लेखक से इतनी नफ़रत क्यों है?"
        " तुम्हे पता है कि जिस्म का हर अंग रेस्ट करता है, सिर्फ दिल को ऐसी सजा दी गई है कि उसे दिन रात जागते रहना है ! मेरी ट्रेजेडी ये है कि मैं लेखक के जिस्म में हूं और लेखक जल्दी मरते ही नहीं "!
       " क्या बकवास है !!"
   " बकवास नहीं सच है, तुमने कभी किसी लेखक को सत्तर अस्सी साल से पहले मरते हुए देखा ?"
        " मेरे पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं, पर तुम्हें किसी लेखक के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए "!
     " क्यों नहीं कहना चाहिए, जिस आदमी का किसी बैंक में सेविंग अकाउंट तक न हो, वो विजय माल्या और नीरव मोदी के खातों के जांच करवाने के लिए परेशान हो तो बुरा तो लगेगा ही "!
       " लेखक खुदा की बनाई हुई वो रचना है, जो  समाज और सत्ता का प्रदूषण दूर करने में उम्र खर्च कर देता है ! वो अतीत से ऑक्सीजन लेता है और वर्तमान से नाखुश रहता है ! दुनियां के लिए  भविष्य की अपार संभावनाओं की तलाश करने वाला लेखक अक्सर अपने बच्चों को खूबसूरत भविष्य नहीं दे पाता ! हकीकत में वो वर्तमान समाज का पंखहीन फरिश्ता है !"
      " अपनी तारीफ कर रहे हो !  बाई द वे, तुम्हें लेखक होने की सलाह किसने दी थी ?"
    " यही तो रोना है कि ये सलाह किसी ने नहीं दी ! इस दरिया ए आतिश में उतरने का फ़ैसला मेरा ही था !"
   दिल बड़बड़ाया, - " जैसा करम करोगे वैसा फल देगा भगवान "!
           हर इंसान के दिल की बनावट एक जैसी होती है, लेकिन कुंडली एक जैसी नहीं होती है । करने वाला दिमाग़ होता है, लेकिन इल्जाम दिल पर लगता है ,- शादी शुदा थे, लेकिन अपने से आधी उम्र की लड़की पर दिल आ गया ! दिल ही तो है !! इसमें खां साहब का क्या कुसूर ? दिल के हाथों मजबूर हो गए"!  ( पता लगा कि दिल के हाथ पैर भी होते हैं !)
           आदमी गुनाह करने के बाद भी बेकसूर बताया जाता है! सारी गलती दिल की होती है ! सुपारी काटने से लेकर सजा काटने तक सारा कुकर्म दिल करता है तो फिर शरीर का क्या कुसूर ! लेकिन इसके बावजूद दिल के बारे में दलील दी जाती है - दिल तो बच्चा है जी -! अस्सी साल तक जिसका बचपना न जाए , वो कुसूरवार
नहीं माना जायेगा ! इसका फायदा उठाकर दिल एक से एक खुराफात करता रहता है, - टकरा गया तुमसे दिल ही तो है -! दिल और दिमाग़ में ज़्यादा खुराफाती कौन है, इसे लेकर साहित्यकारों और साइंसदानों में सदियों से बहस छिड़ी ! वैज्ञानिक कहते हैं , जब पूरा शरीर दिमाग़ के आधीन है तो दिल की क्या बिसात ! ऐसे में - दिल बेचारा बिन 'सजना' (दिमाग़) के माने न -!
        इंसान जानबूझ कर दिल को कटघरे में खड़ा करता है, - ये दिल ये पागल दिल मेरा,,, करता फिरे आवारगी -! ' मैंने तो दिल के हाथों मजबूर होकर तीसरी शादी कर ली -! अच्छा तो गोया दिल ने गला दबा दिया था ! दिले नादान तुझे हुआ क्या है! इतनी गुंडा गर्दी का सबब क्या है -! इतना आग मूतेगा तो हार्ट फेल होना ही है ! लोग दिल की आड़ में कितनी पिचकारी चलाते हैं ! हमारे एक परिचित के  दिमाग में 'हनुमान ग्रंथि' उग आई है ! वो हमेशा अपने मित्रों की 'इमेज़ ' के लंका दहन में ही लगे होते हैं ! वो भी सारा किया धरा दिल पर मढ देते हैं - दिल है कि मानता नहीं -!!

    बच के रहना रे बाबा - दिल तो छुट्टा  (सांड) है जी !!

                   ( सुलतान भारती)