'दुनिया बनाने वाले, मैंने थारा के बिगाङा'
मैं अपनी पर्सनाल्टी को लेकर चिंतित हूं ! कहीं ज़रूर कुंडली में भारी उलटफेर हो गया जो मैं इस शक्ल सूरत के साथ बीसवीं सदी में पैदा हो गया ! मुझे तो हजारों साल पहले वाले सतयुग में पैदा होना था जब आदमी को आदमी पहचानता था ! खामखा सतयुग में जीने के लिए भेज दिया जब आदमी को डोमिसाइल से पहचाना जाएगा ! ऊपर से आदमियत भरा चेहरा ! आदमी बनाकर पैदा करना ही था़ तो कम से कम चेहरा तो बदल देते ! भेड़िया, हाइना, शेर, तेंदुआ, जगुआर, नाग, कोबरा या ब्लैक मोंबा का चेहरा दे देते ! मानव शरीर के साथ इंसानी सूरत और सीरत देकर प्रभु तूने अच्छा नहीं किया ! दुनियां बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई,,,,! सूरत सीरत और शरीर से इंसान पाकर आज मैं खुद को ठगा सा महसूस कर रहा हूं ! ऐसी फीलिंग हो रही है गोया कैटफिश से भरे तालाब में किसी ज़िंदा मुर्गे को फेंक दिया गया हो !
वो गाना तो आपने सुना होगा, - अच्छी सूरत भी क्या बुरी शै है, जिसने डाली गलत नज़र डाली-! खैर इस कैटेगरी का मैं इकलौता पीस नहीं हूं - एक ढूंढो हज़र मिलते हैं - ! मैं चेहरे के मासूमियत की बात कर रहा हूं ! कुछ लोगों का चेहरा तो इंसान का होता है लेकिन मासूमियत खरगोश और कबूतर की मिल जाती है ! ऐसे प्राणी कदम कदम पर अंगौछे की तरह इस्तेमाल होते हैं ! हर कोई उन्हें अंधे की गाय समझ कर 'दुहने ' की घात में रहता है ! कुछ लोग तो शक्ल से इतने सज्जन होते हैं कि कोई भी उनके कुर्ते में नाक पोंछ कर भाग जाए ! ऐसे 'शराफत अली' घर और बाहर दोनों जगह ऑक्सीजन की कमी महसूस करते रहते हैं! ऐसे लोग अपनी शादी के रोज भी सीरियस नजर आते हैं, गोया हंसे तो शादी का बिगङ जायेगा !
कुछ लोग ऐसा फेस लेकर पैदा होते हैं कि गलती न होने पर भी डांट खाते हैं ! समाज के शातिर लोग अपने गुनाह और गलतियों का 'अंडा ' उनके घोंसले में रख देते हैं ! 'शराफत' अली को बुरा लगता है, गुस्सा भी आता है लेकिन मुंह से आवाज़ नहीं आती ! लिहाज़ में मना नहीं कर पाते ! ये जो संकोच और लिहाज़ होता है न, इंसान को बहुत नुकसान पहुंचाता है ! ये 'सतोगुण ' कुदरत उन्हें ही देती है जिन्हें सतयुग में आकर भी जिंदगी की सजा काटनी है ! चाल, चरित्र और चेहरा ऐसा लेकर कलियुग में पैदा हो गए जैसे सतयुग में रजिस्टर बदल गया हो ! घर से ऑफिस तक कलियुग का 'ततैया' पीछा नहीं छोड़ता ! 'सज्जन राम' को इन ततइयों पर गुस्सा बहुत आता है,पर उन्हें लड़ने का तजुर्बा नहीं है ! जहां तक लड़ने और पलट कर जवाब देने का सवाल है, वो दर्द का सारा आक्रोश और गुस्सा बीवी बच्चों पर निकाल कर उधारी चुका देते हैं !
ऐसे शराफत अली और ' सज्जन दास ' दुनियां में जिंदगी का सलीब ढोने के लिए भेजे जाते हैं ! ये बेशक अपने परिवार वालों के लिए ज्यादा काम के ना हों, पर दुनियां वालों के लिए बड़े उपयोगी होते हैं ! शहर में इन्हीं के खून पसीने की कमाई का पैसा ' पीयरलेस ' में डूबता है ! इन्हीं की शरीफ़ बीवी के गहने साफ़ करने वाले इनका घर " साफ" कर जाते हैं ! इनसे काम लेकर न मालिक पैसा देता है न ठेकेदार ! गांव में इन्हीं के नाम से सरपंच लोन ले लेता है ! दूर दराज भट्ठों पर इन्हीं का परिवार बंधुआ मजदूर बनता है ! शहर से गांव तक - 'शराफत अली' हाय तुम्हारी यही कहानी - ! कितना मल्टी पर्पज चेहरा है, - दुनियां भर के चोर उचक्के ठग बदमाश और लूटेरों के काम आता है !
धर्म में घोर आस्था और पाप से एक किलोमीटर की दूरी रखने वाले ऐसे जीव को नर्क से घनघोर डर लगता है ! उनकी खुरदरी ज़िंदगी में स्वर्ग/जन्नत के प्रति काफी सॉफ्ट कॉर्नर होता है ! उनके चेहरे से धर्माधिकारियों को काफ़ी सारी 'राहत' मिलती है! ये परिवार का पेट काट कर किश्तों में जन्नत का इंटालमेंट भरते रहते हैं, - जब तक है जान , जाने जहान मैं नाचूंगा,,,,! इनका चेहरा अपने आप में इंसानियत का स्प्रे मारता साइन बोर्ड होता है, इसलिए इन्हें 'दुर्भाग्य' आराम से ढूंढ लेता है ! इन्सानियत भरा मासूम आदमी इस दौर में अपनी ही ज़िंदगी के लिए अभिशाप बन जाता है !
चेहरे को लेकर एक गीत है, - दिल को देखो चेहरा न देखो -! अबे जो सामने है वही तो देखेंगे ! पसलियों के पीछे छुपे दिल को तो सिर्फ़ डॉक्टर देखता है ! दिल के मारों को दुनियां पूछती है, (उसमें किक है!) चेहरे से मार खाए इंसान को कोई नहीं पूछता ! मेरे गांव में एक जमालुद्दीन हैं, चेहरे से ही कबूतर की तरह मासूम हैं ! कोई उन्हें संजीदगी से नहीं लेता ! मैंने देखा ही नहीं कि कभी किसी ने उन्हें ' जमालुद्दीन ' कहकर पुकारा हो ! कोई जमालू तो कोई जकालू कहता है, कई बच्चे कचालू कह कर पुकारते हैं ! गरीब और शरीफ़ का नाम लोग रोटी की तरह तोड़ कर इस्तेमाल करते हैं ! किस्मत की सितमजरी देखिए कि तीन बेटियों के बाप हैं, बेटा एक भी नहीं ! बुढ़ापा चल रहा है, पसंद नापसंद की सीमा रेखा कब की मिट चुकी है ! ख़्वाब में अब कोई इंद्रधनुष नहीं उगता ! हंसी का पोखर मुस्कराहट की हद तक सूख गया है । पिछली गर्मियों में मैंने उन्हें बीवी से डांट खाते देखा था ! पता चला कि दस दिन सड़क निर्माण में मजदूरी की थी , मांगने पर ठेकेदार ने डांट कर भगा दिया ! लगातार टूट रहा आदमी अपना हक भी दमदारी के साथ कहां मांग पाता है !
जब मायूसी हद पार करती है तो " जमालू" अपनी बेहद खस्ताहाल सायकल को खूंटी से उतार कर साफ करने लगते हैं ! शायद दोनों के दर्द की शक्लें एक जैसी हो चुकी हैं !
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( सुलतान "भारती" )