Monday, 21 June 2021

( व्यंग्य भारती) दाढ़ी के पीछे क्या है !

           '' दाढ़ी" के पीछे क्या है!!


             अपना देश चमत्कारी पुरूषों से लबालब भरा है। इनके दिव्य कारनामों को सामने लाने वाली मीडिया उनसे भी महान है । एक घटना होती है तो पहले दिन कुछ होती है फिर अगले दिन कुछ और नजर आती है, और आखिरकार  थाने जाकर पता चलता है कि जिसको समझा था खमीरा वो भकासू निकला ! वादी सकते में और प्रतिवादी पुलिस की दिव्य जांच से गदगद गाने लगता है, - आज मैं उपर आसमां नीचे,,,,! आए दिन आसमां नीचे और कोरोना कंटेंट ऊपर जा रहा है ! सच को कोहरे में लपेट दिया गया है - सीधी सड़क भी जांच में पगडंडी पाई जा रही है। 
       कोरोना ने अर्थव्यवस्था और आबादी को घातक चोट पहुंचाई, लेकिन ऑक्सीजन लेवल मीडिया का गिरता चला गया । हमारे देश की मीडिया को जाने कौन सा रोग लगा है कि बगैर किडनी के चल रहा है! प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ जनता में अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है ! अब न्यूज कम - ब्रेकिंग न्यूज़ ज्यादा आती है , जहां खबर के साथ साथ भरोसा भी टूट जाता है ! सिर्फ़ सच दिखाते हैं हम-,' हर खबर पर पहली नजर - ' और ' सच डंके की चोट पर -' देने वाले सच को सात पर्दों में छुपा कर परोसते हैं - ढूंढ सके तो ढूंढ ! मैं सोचता हूं कि अगर सोशल मीडिया न होती तो जनता को क्या क्या झुनझुना दिया जाता ! क्योंकि मीडिया के सारे  'भीष्म पितामह' तो राज सिंहासन से बंधे हैं, सच का चीरहरण दिखाई ही नहीं देता किसी को!
                  ख़बर सुनकर सच को समझना भूसे के ढेर से गेहूं का दाना निकालने जैसा है ! सोशल मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के बीच में सच कहीं जलेबी बन कर छुप जाता है - ' बूझो तो जानें -!  सच की तालाश में दिल दिमाग पर चोट खाई जनता हल्दी मिला दूध पीकर सो जाती है। सच की संजीवनी खोजने कुछ मीडिया मुगल हिमालय पर बैठ गए हैं और कुछ डिबेट का समुद्र मंथन चला रहे हैं ! जनता हर चैनल पर "किसान आंदोलन के अवशेष" ढूंढ़ रही है, वो कहीं नज़र नहीं आ रहा है ! हर चैनल बस - अंतिम सांस लेता कोरोना और तीसरी लहर - की पदचाप सुना रहा है !
            एक और चैनल है देश में जिसके सामने सोशल मीडिया भी पानी भरे, वो है पुलिस का चैनल , जहां खबरों को कोल्हू में डाल कर सच का जूस निकाला जाता है। वैसे तो सारे मीडिया के लोग खबरों के संकलन के लिए पुलिस के संपर्क में आते ही हैं किंतु पुलिस की अपनी मीडिया कितनी सशक्त और महान है इसकी कल्पना भी है की जा सकती ! शांति , सुरक्षा और न्याय का डंडा लेकर बैठी पुलिस कब किसे क्या दे दे - कहा नहीं जा सकता ! हर आदमी शांति, सुरक्षा और न्याय चहता है मगर थाने जाते हुए पैर कांपता है। ऐसे में पोलिस को कभी कभी जबरदस्ती भी देना पढ़ता है ! जब जब पुरवाई चलती है तो प्राणी को शांति, सुरक्षा और न्याय  पाने का एहसास होता है !
          जून २०२१ के पहले हफ्ते में यूपी के जिला गाजियाबाद में एक बुजुर्ग आदमी को कुछ लोंगो ने पकड़ कर पीटा , जय श्री राम के नारे लगवाए और उनकी दाढ़ी काट ली !  सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ तो कोहराम मच गया ! ( आज कल क्राइम करने के बाद भागने की जगह वीडियो डालने का फैशन पॉपुलर है ! ) पीड़ित बुजुर्ग को लेकर उनका युवा बेटा स्थानीय थाने पहुंचा !  दाढ़ी के कटने को लाभदायक बताते हुए एक पुलिस वाले ने बुजुर्ग को समझाया ,- तो क्या हुआ ! दाढ़ी कट जाने से अबतुम्हारे चेहरे को बराबर हवा मिल रही है ' ! ( गोया चेहरे को ऑक्सीजन मिलने के रास्ते में दाढ़ी स्पीड ब्रेकर बन गई थी !)
           .पर अभी तो ये बस शुरुआत थी। दाढ़ी कटने को लेकर एक संप्रदाय विशेष में आक्रोश था ! पुलिस को दूर से इस आक्रोश के पीछे ' दंगे की साजिश ' नजर आ गई ! पीड़ित बुजुर्ग सैफी साहब अपने समुदाय के जिस हमदर्द को अपना दुख बांटने वाला और इकलौता मददगार बता रहे थे ,उसी को " माहौल खराब करने" के जुर्म में पुलिस ने अंदर कर दिया ! गनीमत रही कि पुलिस जांच में दाढ़ी गवांने वाले बुजुर्ग अपराधी नहीं पाए गए ! इस तरह यूपी पुलिस की सतर्कता से एक दंगे की  "भ्रूण मृत्यु" हो गई ! किंतु अभी बहुत से खुलासे बाकी थे !
              पुलिस की जांच का अगला खुलासा सुन कर लोगों पर सकता छा गया। पोलिस ने बताया कि दाढ़ी काटने, जै श्री राम का नारा लगवाने और पीटने के इस पूरे मामले के पीछे मॉबलिंचिंग नहीं " ताबीज" थी !. पोलिस ने खुलासा किया कि जांच में पीड़ित बुजुर्ग कारपेंटर नहीं तांत्रिक पाए गए !  उनकी ताबीज़ से प्रतिवादी पक्ष को इन्फेक्शन हो गया था ! इस ख़ोज से पीड़ित बुजुर्ग सन्नाटे में आ गए, क्योंकि वो खुद नहीं जानते थे कि वो ताबीज़ बनाते हैं ! अभी तक उन्हें यकीन था कि वो सिर्फ़ बढ़ई का काम करते हैं ! मुहल्ले वाले अलग सदमे में थे, लोगों ने उन्हें हमेशा लकड़ी का काम करते देखा था ! सहानुभूति अब शक के शिकंजे में थी और पुलिस शांति सुरक्षा और न्याय का डंडा लेकर ताबीज़ पर आकर रुक गई थी !
          पुलिस ने वो दिव्य ताबीज़ खोज लिया था जिसका पता बनाने वाले को भी नहीं था ! ताबीज़ ने एक्टिवेट होकर अपना काम भी शुरू कर दिया था ! दाढ़ी की आड़ में दंगा लेकर खड़ा पहलवान भी पकड़ लिया गया था ! ( खुद पहलवान को पकड़े जाने पर ही पता चला कि दाढ़ी कटने की आड़ में वो दंगा करवाना चाहता था !) अभी इसका खुलासा नहीं हुआ है कि अनिष्टकारी ताबीज़ से प्रतिवादी पक्ष का कितना बड़ा नुकसान हुआ है ! ये भी नहीं पता कि प्रतिवादी पक्ष दाढ़ी काट कर संतुष्ट है या मुआबजा लेकर मानेगा ! रहा दाढ़ी खो चुका वादी पक्ष - तो,,,,उनकी तो लॉटरी लग गई, थोड़े से थप्पड़,चप्पल और डंडे खाकर उन्हें कितनी कीमती जानकारी हाथ लगी कि दाढ़ी काट जाने पर चेहरे को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है !
         इस घटना से हमें ढेर सारा सबक मिलता है ! अब अगर आपको रास्ते में पकड़ कर लूट ले तो थाने जानें से पहले अपनी गलती पर आत्म मंथन करें, -' हमें इस मासूम लुटेरे  रास्ते में आना नहीं था ! शरीफ़ आदमी था,सिर्फ लूट पीट कर छोड़ दिया। शायद "ऊपर से" मिले पैकेज में जान से मारना शामिल नही था!-' ! अगर कोई गला रेत कर छोड़ दे तो मरने से पहले अपने कर्मपत्र पर नज़र डालें, कभी आपने उसकी भैंस तो नहीं चुराई थी ? क्या पता आपने चुराया हो और आपको भनक भी ना लगी हो ! ये तो थाने जाकर ही पता चलेगा !
       जांच जारी है - दारोगा जी सौ गुनाहगार को छोड़ देंगे मगर एक बेगुनाह ( दाढ़ी कटाने वाले बुजुर्ग ) को सजा नहीं होने देंगे !! दाढ़ी वाले बुजुर्ग को बचाने के तुफैल में दाढ़ी काटने वालों को छोड़ना ही पड़ेगा !!

                 ( सुलतान भारती)
    
 
        

Sunday, 20 June 2021

'अबुल हाशिम' - ज़िंदगी का अपराजेय योद्धा !!

"ज़िंदगी का अपराजेय योद्धा" -   अबुल हाशिम !!


      ज़हीन,  जुझारू,  जीवट और  जंगबाज शख्सियत के धनी हाशिम साहब को मैं पिछले तीस सालों से जानता हूं! मैं उन दर्जन भर खुश किस्मत लोगों में खुद को शुमार करता हूं जिन्होंने बहुमुखी प्रतिभा के धनी अबुल हाशिम साहब की विराट शख्सियत को बेहद करीब से देखा है ! चुनौती उन्हें जोश देती है और जीत एक और चुनौती को स्वीकार करने का हौंसला !
                      उनकी अबतक की जिंदगी - संघर्ष , सतत परिश्रम, जीत , अपार जोश और कभी न थकने का एक नायाब दस्ताबेज है ! संघर्ष की सीढियों पर कामयाबी के पदचिन्हों का पीछा करते युवाओं के लिए उनकी जीवनी तमाम नुक्ते और नक्शे खोलती है ! पैंसठ साल के चिर युवा अबुल हाशिम साहब के बारे में कोई भी जानकार बे शाख्ता यही कहेगा,-  उनके लिए असंभव कुछ भी नहीं -'!
            बहुत बेचैन हूं उनकी आत्मकथा  '' परवाज़ " को पढ़ने के लिए ! उनके चाहने वालों ने उन्हे कई भूमिका में देखा है , और अब एक शानदार शाहकार के लेखक के रूप में देखेंगे! मुझे उम्मीद है कि  ''परवाज़" में उनके हजारों चाहने वाले प्रशंसकों को उनकी जिंदगी के कई बंद पन्नों से मुलाकात होगी !

         " परवाज़" की प्रतीक्षा में बेकरार
                  सुलतान भारती
( - मुंशी प्रेमचंद साहित्य सम्मान - से सम्मानित  साहित्यकार)
 वी

Wednesday, 16 June 2021

(व्यंग्य " भारती" ) सोशल मीडिया के वीर

            [व्यंग्यं चिंतन ]
  सोशल मीडिया के घुड़सवार         


                अगर आप का मन लड़ने के लिए उतावला है और लड़ने के लिए कोई मिल नहीं रहा है तो कोई बात नही, फेस बुक पर आइए ! लड़ाई के लिए यहां अनंत योद्धा और विषय हैं!  घर में फोन है ना ! स्मार्ट फोन है जहां, हल्दी घाटी है वहां !! योद्धा ही योद्धा - एक बार (फेस बुक में) घुस तो लें !! सोशल मीडिया पर एक से एक महारथी चक्रव्यूह उठाए खडे हैं ! बस उनके पोस्ट में एक बार नत्थी हो जाइए , फिर तो आपका शुद्धिकरण करके दम लेंगे !  फेस बुक पर अनगिनत अक्षोहिणी सेनाये ( ग्रुप) मौज़ूद है, किसी में भी नत्थी हो जाइए । ऐसी पैदल सेना है जिसमें ज्यादातर अक्ल से पैदल हैं! ऐसे धर्म योद्धा हैं जिनकी अक्ल  "आड  इवन" के हिसाब से चलती है । 
                  आजकल अनुकूल बयार पाकर इनके संस्कार का ऑक्सीजन लेवल सौ से उपर जा रहा है ! संप्रदाय विशेष के बारे में इतनी  "रिसर्च पूर्ण" जानकारी फेस बुक पर उडेलते हैं कि इतिहासकार गश खाकर गिर जाए ! ( सनद रहे - यहां पर अपील , साक्ष्य, तर्क या प्रमाण का कोई विकल्प नहीं है ! अब अगर विरोधी खेमें के किसी 'बुद्धिजीवी ' के ज्ञान में उबाल आ गया और उसने साक्ष्य मांग लिया तो बस !! इस अक्षम्य अपराध के एवज में सैकड़ों ततैया बुद्धि वैभव लेकर टूट पड़ते हैं , और आपत्ति दर्ज़ कराने वाले को अंतत: देशद्रोही साबित कर दिया जाता है !     
                               सोशल मीडिया के कुछ विद्वानतो व्हाट्स ऐप और फेसबुक को सार्वजनिक शौचालय समझ बैठे है ! बहस करो तो अक्ल का लोटा फेंक कर मारते हैं ! घमासान जारी है, कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं ! इस देवासुर संग्राम में बहुधा बुद्धिजीवी ही परास्त और अपमानित होता है ! अनन्त योद्धा हैं और ब्रह्मांड तक फैला युद्धक्षेत्र !! अक्ल के घोड़े दौड़ रहे हैं और घुड़सवार खुद अक्ल से पैदल है ! यहां युद्धविराम मना है , पूरी पूरी रात योद्धा इतिहास खोदते रहते हैं ! सुबह को जब दुनियां जाग कर काम में लगी होती है तो ये योद्धा नींद में चरित्र निर्माण का अगला अध्याय ढूंढ रहे होते हैं ! जागते ही सोशल मीडिया एकाउंट चेक करते हैं कि कहीं कोई  ' हिरण्यकश्यप ' नत्थी हुआ या सारा एकाउंट अभी भी सात्विक है !
            सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं! इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते ! अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९. कमेंट से बघार दिया जाता है ! (इतने योद्धा हर वक्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं!) इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है।  कॉमेंट की सूक्ष्म जांच में विरोधी खेमे का ' देशद्रोही' बरामद होते ही पांडव सेना " जय श्री राम" के उदगार के साथ दिन का पहला यलगार शुरू कर देती है !  यहीं से संस्कार का मानसून शूरू हो जाता है !
                      ये विद्वता का निर्द्वंद मैराथन है, जहां प्रतिद्वंदी  की  टांग  खींचने और गाली देने  पर  कोई  पाबंदी नहीं है ! सुविधा ये है कि प्रतिद्वंदी  फेसबुक पर है, फेस टू फेस नहीं ! यह बेलगाम प्रतिभा का ऐसा अभयारण्य है जहां  द्रोण और एकलव्य दोनों का विवेक धर्म से संक्रमित  है। ( एकलव्य की दलित विनम्रता ने उसे क्या दिया - सिर्फ़  विकलांगता !! )  महाभारत काल में कौरव खेमें में  मीडिया की सुविधा के नाम पर सिर्फ 'संजय' उपलब्ध थे ! उनके टैलेंट और  बेनिफिट सिर्फ अंधे धृतराष्ट्र को था  ! संजय के ज्ञान को  चुनौती गांधारी भी नहीं दे सकती थी, उसने खुद ही आंख पर पट्टी बांध ली थी। अब दोबारा सोशल मीडिया पर द्वापर लौट आया है। दिव्य ज्ञान से लैस तमाम संजय ज्ञानोपदेश में लगे हैं , धृतराष्ट्र झुंड के झुंड लाइक और कमेंट कर रहे हैं ! ऐसे में अगर किसी ने बीच में पांडव बनने का प्रयास किया तो उसके लिए लाक्षागृह तैयार है ।
            पिछले पखवाड़े फेस बुक पर हमारे दो मित्र इसी खाड़ी युद्ध में उलझ गए ! पत्रकारिता और समाज सेवा को समर्पित दोनों महामानव सोशल मीडिया पर गुथ गए ! कोई गलती मानने को राजी नहीं !. दोनों अपने अपने बायोडाटा से एक दूसरे को दो दिन तक धमकाते रहे, पर शिमला समझैता हो न  सका ! कुछ बुद्धिजीवियों ने सुलह वाली पोस्ट डाली तो कुछ ने पेट्रोल उड़ेला ! तीसरे दिन दोनों फोन पर भिड़ गए ! अब दो बुद्धिजीवी लंबे वक्त के लिए विरोधी हो चुके हैं ! और,,,,,, ये सब हुआ दिल्ली में अगले साल होने वाले नगर निगम चुनाव के ऊपर ! इसी को कहते हैं - सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा !!  योद्धा तैयार हैं!

         कोरोना ने हाय राम बडा दुख दीन्हा ! काम धाम कुछ है नहीं ! समय बिताने के लिए सोशल मीडिया पर जाता हूं तो वहां फेस बुक वॉल पर ततैया छितराए बैठे हैं। कुछ मित्र सिर्फ इसलिए नाराज़ हैं कि मैं उनकी 'अद्वितीय रचनाओं ' पर मनभावन कमेंट नहीं करता !कई महामानव ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ नारियों की पोस्ट में विद्वता का छायावाद नजर आता है ! कुछ मित्रों ने अकारण खुद को वरिष्ठ साहित्यकार मान लिया है, और अपना लोहा मनवाने के लिए रोज पोस्ट का अश्वमेध यज्ञ वाला घोड़ा छोड़ते हैं ! समझदार और सहिष्णु लोग लाइक कर के मुख्यधारा में बने रहते हैं। तर्क और विवेक वाले  विरोध करते हैंऔर अगली सुबह मित्र सूची से सस्पेंड कर दिए जाते हैं ! चलो रे डोली उठाओ कहांर,,,,,!!
            " सोशल मीडिया  तू ना गई मेरे मन से !!

( सुलतान भारती)

Wednesday, 9 June 2021

' ' बदनाम होने की चाहत''

 (  व्यंग्य )          

                  मैं बदनाम होना चाहता हूं । चालीस साल से 'नाम' कमाने में लगा था़ , नाम तो कमाया मगर नाक नहीं बढ़ी ! जवानी के बेहतरीन पच्चीस साल सामने से ट्रेन के डिब्बे की तरह गुजर गए ! उम्र का बही खाता देख रहा हूं, नाम तो है - नेफे में नोट नहीं है । जब मैं नाम कमाने में लगा था, इतने वक्त में पड़ोस के पांचू लाला बनिया से सेठ हो गए ! बस उन्होंने नाम नहीं कमाया !! वो अच्छे खासे बदनाम हैं! लोग कहते हैं कि उनकी दुकान पर बिकने वाले हर मसाले में मिलावट है ! उन पर ये गंभीर आरोप है कि लाला अपने पालतू घोड़े की लीद को मसाले में इतनी सफाई से मिलाता है कि घोड़ा भी ना पकड़ पाए ! बदनामी को बैलेंस करने के लिए उनकी एनजीओ गरीब और अनाथ लड़कियों की शादी कराती है!  ( लड़के चाहे जितना अनाथ और गरीब हों , पांचू लाला उन पर कृपा नहीं करते !).उनकी इस दयालुता का रहस्य उनका घोड़ा भी नहीं जान पाया।
         मैं पांचू लाला से काफी प्रभावित हूं और अब मैं भी बदनाम होना चाहता हूं ! कोरोना काल चल रहा है - ये आपदा में अवसर का मौसम है ! सोशल मीडिया पर धर्मयुद्ध जारी है ! कोरोना में बहुमत को राष्ट्रीय आपदा नजर आ रही है तो किसी को रामराज ! ( जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी त्यों तैसी !) आपदा अपनी जगह है - अवसर अपनी जगह ! घुटनों में सर देकर बैठी जनता टीवी खोलती है, समाचार आ रहा है - ऑक्सीजन रोक कर डॉक्टर ने कई मरीजों की जान ली - ! अगला समाचार है - मरीज के रिश्तेदारों ने एक डॉक्टर को पीट पीट कर लहूलुहान किया -! ( हिसाब बराबर - ! ) बदनामी में बड़ा ग्लैमर है ! बदनाम आदमी को सलामी देने वाले ज्यादा हैं । भय बिन होय न प्रीति,,, का फॉर्मूला कलियुग में ज्यादा हिट है ! तमाम बदनाम और बदमाश लोगों ने "आपदा'' में ही बड़ी बड़ी फसल काटी है ! बाढ़ की आपदा में सिंघाड़े की खेती सबको नहीं आती है , मै बपुरा बूडन डरा रहा किनारे बैठ,,,! इसलिए अब तक बदनाम नहीं हो पाया !
           बदनामी में करियर बनाना है तो साहस और बेशर्मी दोनों चाहिए। ( साहस की कमी नहीं पर बेशर्मी को लेकर थोड़ा चिंतित हूं!) जैसे जैसे उमर निकल रही है, मेरी घबराहट बढ़ रही है ! आख़र कब मुझे अक्ल आयेगी और कब मैं बदनाम हो पाऊंगा ! अभी जवानी के कुछ अवशेष बाकी हैं !  बाद में बदनाम होने पर बृद्धाश्रम वाले भी इंट्री नहीं देंगे! अपने अंदर झांक कर देखता हूं ! 'गुरु' वाला स्थान खाली है ! देश में बदनाम महापुरुषों की कमी नहीं है - एक  ढूढ़ों  हजार मिलते हैं - वाली प्रचुरता  है !  ' राम रहीम' से लेकर संत ज्ञानेश्वर तक किसी से भी कोचिंग लेकर ' असीम आनन्द ' की प्राप्ति हो सकती है ! तो,,, मन रे परसि हरि के चरन !!

           इस बार किसी मित्र से सलाह नहीं लूंगा ! मैं नहीं चाहता कि  "चौधरी" या "वर्मा जी" को इसकी भनक भी लगे। पहले चुपचाप बदनाम हो लेते हैं ! इस उपलब्धि पर वर्मा जी का - दिल जलता है तो जलने दे -! अब बेसिक प्रॉब्लम ये है कि बदनाम होने की शुरुआत कहां से करूं !
बैंक को गठरी में बांध कर विदेश भागने में अच्छी खासी बदनामी है, लेकिन पास में पासपोर्ट तक नही है! जनहित में फाइनेंस कंपनी खोल कर मुहल्ले को ठगने से भी थोक में बदनामी हासिल होगी, पर उसके लिए इन्वेस्ट करना पढ़ेगा ! मेरे बदनाम होने की कोई सूरत नज़र नहीं आती ! ले दे कर "छेड़खानी" ही अफोर्ड कर सकता हूं ! लेकिन छेड़ूं किसे ? कॉलोनी में सब पहचानते हैं और दूसरे मुहल्ले में छेड़खानी करूं तो सही सलामत लौट पाने की क्या गारंटी है ! ( अस्पताल के बेड पर पड़ कर बदनामी को एंज्वॉय नहीं करना चाहता !)
            हमारे यूपी में एक देहाती कहावत है- या तो नाम सपूते या कपूते -! यानि बेटा चाहे 'सपूत ' निकले या ' कपूत ' दोनों सूरतों में नाम कमाएगा -!( ये हमारे यूपी वालों का ही कलेजा है जो ऐसी कड़वी  कहावत को पैदा करते हैं!) मैने भी सपूत होकर नाम कमाने की बड़ी कोशिश की , पर मेरा नंबर आते आते मानसून रुक जाता है  ! कई जगह सपूत होकर नाम कमाना चाहा , पर वहां पर जमे कपूत ने ठीया लगने ही नहीं दिया ! प्राइवेट हो या सरकारी , हर जगह सपूत से ज्यादा कपूत की टीआरपी देखी है! मुझे लगता है,  हमारे समाज में दो तरह के संस्कार पनप रहे हैं ! शरीफ, संवेदनशील और सचरित्र सपूतों को सतयुग वाला वैक्सीन दिया जाता जाता है - सत्यम ब्रूयात -! कपूतों पर पाप पुण्य की कोई प्रेत छाया नहीं होती ! उनका स्टेमिना इतना सॉलिड होता है कि कोरोना में कोविड इंजेक्शन की जगह कुकुरमुत्ता का काढ़ा भी काम कर जाता है !
                हमेशा 'सपूत ' को ही कांवर ढोना पढ़ता है !
कपूत को हर फील्ड में ग्रेस माक्र्स मिल जाता है! बाप भी अपने कपूत का बचाव करते हुए कहता है, " तुम्हें उसके मुंह नहीं लगना चाहिए था "! ज़माने की नब्ज पहचानने वाले बाप घर में भी कपूत को प्रीफ्रेंस देने लगे हैं , - मेरा नाम करेगा रोशन जग में बेटा नाकारा -! ( पडोसी  का खेत दबाना या बंजर हडपना सपूत के बस का नहीं होता ! ऐसे मौके पर सपूत बेटा संस्कार ओढ़ लेता है, " देख पराई चूपडी मत ललचावे जीव ''!) इसलिए अब बदनाम होने की तमन्ना है। नाम कमा कर नींद गवां बैठा । कोरा नाम कमाने से क्या फायदा कि बाल काटने के बाद नाई मालिश भी ना करे !
                    लेखन जैसे व्हाइट कॉलर जॉब में भी  'कपूत ' लोगों की कमी नहीं  है ! आम के पेड़ में कलम बांधना तो सबने सुना होगा , मै एक ऐसे लेखक को जानता हूं जो दूसरों के रचनाओं की शाख काट कर अपने लेख में रोप लेते हैं ! ऐसे लेखक कोरोना में भी फल फूल रहे हैं और सच्चे लेखक "अच्छे दिन" के उम्मीद में आह भर रहे हैं - ' अबहूं  न  आए  बालमा  सावन बीता जाए -'!!
                      ( सुलतान भारती )


Thursday, 27 May 2021

"छोटा आदमी - बड़ा आदमी"

                " छोटा आदमी - बड़ा आदमी "
 

            आज की दुनियां में सिर्फ दो तरह के आदमी बचे हैं, "छोटा आदमी'' और "बड़ा आदमी"! ( मैं  'कद' की  नहीं -  "कैश"  के मापदंड की बात कर रहा हूं! ) सुविधा हीन , फटेहाल और झुग्गी में रहने वाला आदमी भले छै फीट ऊंचा हो , कभी बड़ा आदमी नहीं माना जाता ! वैसे देखने में दोनों एक जैसे नज़र आते हैं, मगर कुंडली में जमीन आसमान का फ़र्क होता है !
                बडा आदमी कोरोना का सहोदर होता है! कोरोना में भी उसी का डीएनए है,इसलिए कोरोना की लाइफ लाइन वाला  "अमृत'' वो अपनी नाभि में रखता है ! अब कोरोना अजर अमर है और बड़ा आदमी धड़ल्ले से आत्मनिर्भर ! सारे ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाएं छूमंतर ! 'सहोदर' को दीर्घजीवी करने के लिए वो कुछ भी करेगा - (अवसर मिला तो एंबुलेंस को आलू के खेत में छुपा देगा !) छोटा आदमी बीमार है और सरकारी अस्पताल में वॉर्ड ब्वॉय की डांट खा रहा है, -' इस स्ट्रैचर पर अभी दो मरीज और लोड करूंगा तभी चलूंगा, चुप होकर लेट जाओ ! इन्फेक्शन की चिंता मत करो ! यहां कोरोना इसलिए नहीं आता कि कहीं  अस्पताल की गंदगी से उसका ऑक्सीजन लेवल गिर न जाए "!
मरीज वार्ड ब्वॉय से घिघियाता है - " एक स्ट्रेचर पर तीन मरीज़,,,, सोशल डिस्टैंस का क्या होगा "?   वार्ड ब्वॉय भड़क उठता है,- " लोगों के बीच की आपसदारी इसी सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से खत्म हो गई ! इसी वजह से कुछ लोग बाप की अर्थी के करीब नहीं आते ! आज हास्पिटल मेें बेचारे डॉक्टर नर्सों से छेड़खानी तक नहीं कर पा रहे हैं!"
              छोटा आदमी ऊंट पर बैठ कर भी छोटा ही रहता है , वहीं बड़ा आदमी कुर्सी पर सोता हुआ भी बड़ा नजर आता है । बड़ा आदमी सबका फोन नहीं उठाता जब कि छोटा आदमी मिस्ड कॉल को भी पलट कर बतिया लेता है, ' कौन बोल रहे हैं भइया ?'
         'दुखीलाल बोल रहा हूं , फैज़ाबाद से - आप कहां से बोल रहे हैं भइया ?'
        'अरे भैया दिल्ली से दीन मुहम्मद बोलित अहै ! तुहरे बगल सुलतान पुर कै रहै वाला  --. बंदा  गोमती किनारे वाला।'
            'कलेजा जुड़ायगा भइया ! और सब परिवार मा बचवा लोग ठीक हैं ना भइया ? हमार बिटवा दिल्ली मा रहत हैं, उसी को मिला रहे थे , आपको मिल गया  '! 
             छोटा आदमी मिस्ड कॉल पर भी रिश्ते ढूढ लेता है, वहीं बड़ा आदमी अपने ही डीएनए को पहचानने से इंकार कर देता है, -'सेक्रेटरी ! किसका फोन है ?'
       'आपके भाई सुखचैन जी हैं, कह रहे हैं बड़े भाई साहब से बात कराओ' !
       ' घर बनवा रहा है, ज़रूर पैसा मांगने आया होगा ! कह दो मैं घर और ऑफिस कहीं नहीं हूं "!
          छोटे आदमी और बड़े आदमी में बहुत फर्क होता है ! छोटा आदमी बेगुनाह होते हुए भी सजा काटता है , और बड़ा आदमी मुस्करा कर चुनौती देता है, " किसी का बाप भी मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकता "! छोटे आदमी को स्वर्ग और संस्कार की बड़ी चिंता होती है। उसे लगता है कि '  चित्रगुप्त ' हर वक्त बही खाता लिए उसी की झुग्गी पर दूरबीन लगा कर बैठे हैं कि कब संस्कार से पैर फिसले और कब खाते में  नर्क का योग ' बने ! ( उधर इतनी देर में बड़ा आदमी कई बैंकों को गठरी में बांध कर विदेश उङ जाता है !)
            छोटा आदमी मरता है - बड़ा आदमी अमर होता है ! बड़े आदमी को चंदन की चिता या कब्र पर गुलाब के फूलों की चादर मिलती है, छोटे आदमी को मोक्ष की जगह कभी कभी मगरमच्छ और कुत्ते मिलते हैं ! छोटा आदमी कुदाल और फावड़ा चलाता है और बड़ा आदमी देश चलाता है ! छोटा आदमी सोशल डिस्टेंसिंग करे तो भूख से मरता है और न करे तो पुलिस और कोरोना से !
बड़ा आदमी कोरोना प्रूफ होता है, बार बार  अस्पताल में भर्ती होकर भी वापस आ जाता है ! छोटा आदमी किडनी बेचता है और बड़ा आदमी ईमान ! बड़ा आदमी गुनाह करता है - छोटा आदमी सजा काटता है !
                    हरि अनंत हरि कथा अनंता,,,,,!
        छोटा आदमी वर्किंग करता है - बड़ा आदमी वॉकिंग ! छोटा आदमी शादी करता है और देश को अगला मजदूर देता है ! बड़ा आदमी एक बीबी घर में और दो चार वेलेंटाइन फील्ड में रखता है ! छोटा आदमी गुटखा खाता है - बडे आदमी के मीनू मेें रिश्वत, सरकारी जमीन , पुल और फ्लाईओवर तक हो सकता है ! छोटे आदमी के कंधे पर देश और धर्म दोनों की जिम्मेदारी होती है, जबकि बड़े आदमी के पास सिर्फ़ विकास और  "विकास पुरुष" का टार्गेट होता है !
          
            छोटा आदमी भक्त होता है - बड़ा आदमी ' भाग्यवान ' ! छोटा आदमी ज्योतिषी के उस 'तोते '  की तरह होता है जो दूसरों का भाग्य सुनहरा बना कर भी पूरा जीवन पिंजरे में गुजारता है !  बड़ा आदमी उस "कोयल" की तरह होता है, जो अपने कुकर्म का अंडा हमेशा किसी कौए के घोंसले में छुपाता है ! विधि का विधान देखिए , छोटा आदमी  तूफान में तबाह हुई अपनी झोपड़ी को लेकर चिंतित है और बड़ा आदमी  "राहत पैकेज" को लेकर ! झोपड़ी बनते ही छोटा आदमी तीर्थ यात्रा करेगा और बड़ा आदमी विदेश यात्रा ! हे दुनिया के पालनहार ,,,,,!

        तूने काहे को दुनियां बनाई !!

                 ( सुलतान भारती )


       

        

Wednesday, 19 May 2021

" महान होने की तमन्ना "

              '' महान होने की। तमन्ना"

       आज़ पानीपत से आए एक फोन ने मुझे बेमौसम सरसों के पेड़ पर बिठा दिया । हुआ यूं कि सुबह नौ बजे एक पाठक ने पानीपत से फोन करके पूछा , ' क्य आप मशहूर व्यंग्यकार सुलतान भारती बोल रहे हैं "? मेरे कानों में जैसे मलाई बहने लगी  थी ! ( अब तक मुझे भी अपने  "मशहूर" होने का पता नहीं था !) तब से मुझे एकदम से ब्लैक फंगस दयनीय और कोरोना बड़ा क्षुद्र जीव लगने लगा है ! हो सकता है अप्रैल में उसे पता ना रहा हो कि जिसके नाक में घुस रहा है वो " मशहूर " हो चुका है और अब "महान"होने की सोच रहा है ! यूपी वाले तो जेठ की भरी दुपहरी में भी शीतनिद्रा में चले जाते हैं! हमे तो दिल्ली वालों पर क्रोध आता है , इन्हें भी ख़बर नहीं हुई और हरियाना वालों को मेरे मशहूर होने की खबर मिल गई !
        जब से मुझे अपने मशहूर होने का पता चला है , मैंने फैसला किया है कि कैसे भी सही , अब मुझे 'महान '
होना है ! ( हालांकि इसके पहले कभी  हुआ नही था !) मेरे जान पहचान के अनंत लेखक हैं ! जिसमें जितनी कम प्रतीभा है ,वो उतना ज़्यादा गलतफहमी का
शिकार है । कई लेखक तो खुद को विदेशों में लोकप्रिय बताते हैं ! शायद देश मे लोकप्रिय होने में रिस्क ज़्यादा था !  (  रुकावट के लिए खेद है ! ) यहां अपने ही साहित्यिक मित्र  मशहूर या महान होने के रास्ते में  कोरोना बन कर खड़े हो जाते हैं ! जो जितना - विश्वत कुटुम्बकम - का राग अलापता है , उतना संकुचित सोच का लेखक है ! साहित्यकारों ने अपने अपने गैंग बना लिये हैं जो आपस में ही एक दूसरे को  ''मशहूर" और 'महान ' बना देते हैं ! ( अगले मुहल्ले का फेसबुक गैंग स्पेलिंग की गलती ढूंढ कर उनकी  " महानता" को ख़ारिज कर देता है !) अब ऐसे मे कोई दूसरे प्रदेश का प्राणी आपको मशहूर घोषित कर दे तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने ऑक्सीजन सिलेंडर ऑफर किया हो !
                 मशहूर तो  मैं हो ही चुका था अब महान् होने की कसर थी ! काश अगला फोन यूपी से आ जाए ! यूपी में "महान' होना आसान है ! वहां ऐसे ऐसे लोग महान हो गए जो ठीक से मानव भी नहीं हो पाये थे। लेकिन जैसे ही महान होने का मानसून आया वो छाता फेंक कर खड़े हो गए ! ( इस दौर में मानव होने के मुक़ाबले ' महान ' होना ज़्यादा आसान है !)  अगली सीढ़ी '' भगवान" होने की है ! ऐसे कई महान् लोग हैं जो ठीक से इंसान हुए बगैर सीधे भगवान हो गए !  लेकिन मेरी ऐसी कोई योजना नहीं है! मैं महान् होकर रुक जाऊंगा , आगे कुछ और नहीं होना ! ( कुछ " भगवानों" की दुर्दशा देख कर ऐसा निर्णय लिया है !) मै अपने ईर्ष्यालु मित्रों की फितरत से वाकिफ हूं ! जैसे ही उन्हें मेरे " मशहूर '' होने की खबर मिलेगी , उनका ऑक्सीजन लेवल नीचे आ जायेगा !
                मैं जानता हूं कि महान होने के लिए अगर मैंने अपने साहित्यिक मित्रो से सलाह ली तो मेरा क्या हस्र होगा ! इसलिए मैने मुहल्ले की  ही दो  हस्तियों से  सलाह लेने की ठानी ! सबसे पहले मैंने फेसमास्क लगा कर ' वर्मा जी ' का दरवाजा खटखटाया ! चश्में में कसा वर्मा जी का काला चेहरा दरवाजे के बीच नजर आया ! इन्होंने मुझे ऐसे देखा, गोया मेरा फेसमास्क ही फर्जी 
हो - " सत्ताइस तारीख़ तक लॉक डाउन है "!
     उन्हें धकेल कर अंदर रखी कुर्सी पर बैठते हुए मैने कहा, " में तब तक इंतज़ार नहीं कर सकता "!
      '' क्यों ! क्या जांच में तुम्हारे अंदर ब्लैक फंगस पाया गया है ? ऐसी स्थिति में तुम्हें मेरे पास नहीं आना था "!
       " ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है, मै बिलकुल ठीक हूं और काफ़ी गुड फील कर रहा हूं "!
          वह फ़ौरन बैड फील करने लगे , " यहां किस लिए आए हो ?"
      " मुझे आज ही पता चला कि मैं मशहूर हो चुका हूं , अब मैं महान होना चाहता हूं"!
        " किसी ने फर्स्ट अप्रैल समझ कर फोन कर दिया होगा, ऐसी अफ़वाह मत सुना करो "!
    "अब समझा ,  तुम्हे मुझसे जलन हो रही है "!
               मै जानता था कि वर्मा जी को मुझ से कितना ' गहरा लगाव ' है! मैंने तो सिर्फ उनका वज़न कम करने के लिए सूचना दी थी ! वहां से निकल कर मैंने चौधरी को खुश खबरी दी, " मुबारक हो !"
   चौधरी ने संदिग्ध नजरों से मुझे देखा, '' सारी उधारी आज दे देगो - के ?"
      " जब तक उधारी है, तब तक आपसदारी है! मैं नहीं चाहता कि आपसदारी खत्म हो ! खैर तुम्हें ये जान कर बहुत खुशी होगी कि मैं मशहूर हो चुका हूं "!
           " कितै गया था चेक कराने ?"
   '' कहीं नहीं, मुझे बताना नहीं पड़ा - लोगों ने खुद ही मुझे फोन करके बताया"! " 
       " इब तू के करेगो  "?
'' मैं महान होना चाहता हूं !"
       चौधरी ने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोलते हुए कहा , " घणा अंट संट  बोल रहो ! नू लगे - अक - कोई नई बीमारी आ - गी  काड़ोनी में।  तू इब तक घर ते बाहर हांड रहो ! या बीमारी  में मरीज कू ब्लैक फंगस जैसे खयाल  आवें सूं !"

        यहां कोई किसी को ' महान ' होते नहीं देता और चुपचाप रातों रात महान होने को लोग मान्यता नहीं देते ! जिएं तो जिएं कैसे ! चतुर सुजान प्राणी बाढ़, सूखा, स्वाइन फ्लू और कोरोना के मौसम में भी महान हो लेते हैं ! जिन्हें महान होने की आदत है वो विपक्ष में बैठ कर भी महानता को मेनटेन रखते हैं ! बहुत से लोग  तो कोरोना और ऑक्सीजन सिलेंडर की आड़ में भी महान हो गए हैं ! इस कलिकाल में भी नेता और पुलिस आए दिन महान हो रही है !

                   और,,,,एक मैं हूं जिसे  "महान" होने के लिए रास्ता बताने वाला कोई महापुरुष नहीं मिल रहा   है -. जाऊं तो जाऊं कहां !!
                                      ( सुलतान भारती)

         

Monday, 10 May 2021

"बहते मुर्दे" - चलते मुर्दे "

               मुर्दे बोल रहे हैं! मुर्दे आवाज़ उठा रहे हैं! मुर्दे पुकार रहे हैं ! मुर्दे मदद मांग रहे हैं और जिंदे लोग गांधी जी के बंदर हो चुके हैं, - मुर्दा मत देखो, जो गंगा में तैर रहे हैं उन्हे मुर्दा मत कहो और कोरोना पीड़ित अपना सगा बाप भी अगर दरवाजा पीटे तो मत सुनो ! कोरोना ने रिश्तों को कैसी कसौटी और पटकनी दी है। खूनी रिश्ते अपनो के कंधों के लिए तरस गए। सैकड़ों कंधे उस कौम के काम आए, पूरी ज़िंदगी जिसकी परछाईं से परहेज़ का जहर ढोते रहे! कुछ मुर्दे साइकल पर ढोए गए , किसी के ऊपर पुलिस वाले को दया आई तो श्मशान भूमि तक पहुंछाया ! गांव के छप्पर पर सूखती लौकी और बाप की लाश में उपेक्षा का एक जैसा समाजवाद नज़र आ रहा था ! 
                मुर्दे गंगा में बहाए जा रहे हैं। कानपुर से गाजीपुर तक मुर्दों की कतार ! मुर्दे रिश्तों पर थूक रहे हैं! मुर्दे फादर्स डे और मदर्स डे पर अपने कलियुगी बेटों के फर्जी पोस्ट की अर्थी लेकर बह रहे हैं ! मुर्दों की खामोशी में गज़ब का शोर है ! लोग घरों से निकल कर घाट पर आ गए हैं ! ये चलते फिरते मुर्दे हैं जो तैरते मुर्दों से अलग कपड़े पहने हुए हैं ! बस्ती के मुर्दों को आते देख बहने वाले मुर्दे आपस में बतियाने लगे, -' थोडा रुक कर बहते हैं ! शायद हमारे लिए आए हैं !'
         " काहे किनराते हो , जो परिवार के थे वो कुत्तों के हवाले कर गए ! ये तो गैर हैं"!
       '' इस त्रासदी में गैर ही तो काम आए हैं"!
एक दर्जन लाशें उथले पानी की रेती में स्थिर हो गईं.!. ज़िंदा लाशें थोड़ी दूर पर रुक कर आपस में बात करने लगीं, - " ये लाशें किस जाति की हो सकती हैं ?"
       " कैसे पता चलेगा ? कफन तो बडा सस्ते वाला लगता है "  । 
    " कई कफ़न तो फटे हुए है, किसी काम के नहीं हैं"!

  पहले वाला लाशों की जाति को लेकर अभी भी चिंतित था , " जानें कौन सी जाति के हैं, गंगा मैया को गंदी करने चले आए "!
       लाशें घबरा कर फिर बहने लगीं !दो किलो मीटर आगे गंगा के किनारे तीन युवा कुत्तों का एक गैंग आपस में बात कर रहा था, ' अब तो और कुछ खाने का मन ही नहीं करता ''!
        '' मेरे अंदर तो शाकाहारी फीलिंगआने लगी थी," एक और कुत्ता बोल पड़ा '.अब जाके आया मेरे बेचैन दिल को करार"!
        कुत्तों का मुखिया बोला, '' वैसे जिन्होंने अपने परिजनों को हम कुत्तों के हवाले किया है, उनका ज़रूर हम कुत्तों से पूर्व जन्म का नाता है"!
    '' बेशक! इतना तो कोई अपना ही केयर करता है "!
'' इंसान का कैरेक्टर हम कुत्तों से भी गया गुजरा है, इस दौर ने साबित कर दिया है"!!
      मै न्यूज देख रहा हूं, दरिया गंज ( दिल्ली) में तीन व्यापारी गिरफ्तार।! रेमडेसीवीर इलेक्शन दस गुना से अधिक दाम पर बेच रहे थे ! ऑक्सिमीटर और ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी का क्या कहना! आपदा को अवसर में बदलने का हुनर इन्ही के पास है! क्या इनके अंदर ईमान,  दया, गुनाह, इंसानियत या दर्द का कोई भी एहसास नहीं होता ? तो,,,,, ये ज़िंदा कहां हैं ! दूसरों की आपदा को अपने लिए अवसर बनाने के लिए ये जीते जी मर जाते हैं ! अब ये.आंसू,  दया और धर्म की तुच्छ सांसारिक सोच से मुक्त होकर जिंदों के बीच आराम से विचरते हैं! ऐसे बहुत सारे मुर्दे आपके आसपास आबाद हैं, जिनकी वजह से मुर्दे तैर रहे हैं!
               हम नई परिभाषा नहीं तलाशते, पुरानी को दुहरा कर संतुष्ट हैं! गंगा में तैरती लाश के साथ सड़ते रिश्तों से पहले हमें सरकार की नाकामी नजर आने लगती है! हम खुद पर कोई दोष नहीं लेते, ऐसा करने से हमारे ज़िंदा होने की आशंका बढ़ जाती है! इसलिए हम हालाते हाजरा की जलवायु सूंघ कर मुर्दों के साथ बहने लगते हैं ! इल्जाम लेना बड़ी हिम्मत का काम है, इसलिए हम जोखिम उठाने की अपेक्षा दूसरों को दोषी साबित करने में लगे होते हैं!

                  मुर्दे बह रहे हैं, कथित जिंदे गंगा के किनारे खड़े अफसोस कर रहे हैं ! मुर्दे लावारिस हैं, उनके वारिस रात में उन्हें गंगा के हवाले कर मोक्ष के प्रति आश्वस्त हैं! मोक्ष और मुर्दों के बीच में कुत्ते खड़े हैं ! मुर्दे बह रहे हैं, तट पर खड़े मुर्दे अपने भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, " मै मुर्दों को नहीं, इन कुत्तों को लेकर चिंतित हूं!  कल को ये कुत्ते हमारी बस्ती में आकर मानव मांस तलाशेंगे ! सरकार को कुछ करना होगा"!

    मुझे एक शे'र याद आ रहा है !

साहिल के  तमाशाई  हर डूबने वाले पर !
अफसोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते !!

            ( सुलतान भारती)