Wednesday, 19 May 2021

" महान होने की तमन्ना "

              '' महान होने की। तमन्ना"

       आज़ पानीपत से आए एक फोन ने मुझे बेमौसम सरसों के पेड़ पर बिठा दिया । हुआ यूं कि सुबह नौ बजे एक पाठक ने पानीपत से फोन करके पूछा , ' क्य आप मशहूर व्यंग्यकार सुलतान भारती बोल रहे हैं "? मेरे कानों में जैसे मलाई बहने लगी  थी ! ( अब तक मुझे भी अपने  "मशहूर" होने का पता नहीं था !) तब से मुझे एकदम से ब्लैक फंगस दयनीय और कोरोना बड़ा क्षुद्र जीव लगने लगा है ! हो सकता है अप्रैल में उसे पता ना रहा हो कि जिसके नाक में घुस रहा है वो " मशहूर " हो चुका है और अब "महान"होने की सोच रहा है ! यूपी वाले तो जेठ की भरी दुपहरी में भी शीतनिद्रा में चले जाते हैं! हमे तो दिल्ली वालों पर क्रोध आता है , इन्हें भी ख़बर नहीं हुई और हरियाना वालों को मेरे मशहूर होने की खबर मिल गई !
        जब से मुझे अपने मशहूर होने का पता चला है , मैंने फैसला किया है कि कैसे भी सही , अब मुझे 'महान '
होना है ! ( हालांकि इसके पहले कभी  हुआ नही था !) मेरे जान पहचान के अनंत लेखक हैं ! जिसमें जितनी कम प्रतीभा है ,वो उतना ज़्यादा गलतफहमी का
शिकार है । कई लेखक तो खुद को विदेशों में लोकप्रिय बताते हैं ! शायद देश मे लोकप्रिय होने में रिस्क ज़्यादा था !  (  रुकावट के लिए खेद है ! ) यहां अपने ही साहित्यिक मित्र  मशहूर या महान होने के रास्ते में  कोरोना बन कर खड़े हो जाते हैं ! जो जितना - विश्वत कुटुम्बकम - का राग अलापता है , उतना संकुचित सोच का लेखक है ! साहित्यकारों ने अपने अपने गैंग बना लिये हैं जो आपस में ही एक दूसरे को  ''मशहूर" और 'महान ' बना देते हैं ! ( अगले मुहल्ले का फेसबुक गैंग स्पेलिंग की गलती ढूंढ कर उनकी  " महानता" को ख़ारिज कर देता है !) अब ऐसे मे कोई दूसरे प्रदेश का प्राणी आपको मशहूर घोषित कर दे तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने ऑक्सीजन सिलेंडर ऑफर किया हो !
                 मशहूर तो  मैं हो ही चुका था अब महान् होने की कसर थी ! काश अगला फोन यूपी से आ जाए ! यूपी में "महान' होना आसान है ! वहां ऐसे ऐसे लोग महान हो गए जो ठीक से मानव भी नहीं हो पाये थे। लेकिन जैसे ही महान होने का मानसून आया वो छाता फेंक कर खड़े हो गए ! ( इस दौर में मानव होने के मुक़ाबले ' महान ' होना ज़्यादा आसान है !)  अगली सीढ़ी '' भगवान" होने की है ! ऐसे कई महान् लोग हैं जो ठीक से इंसान हुए बगैर सीधे भगवान हो गए !  लेकिन मेरी ऐसी कोई योजना नहीं है! मैं महान् होकर रुक जाऊंगा , आगे कुछ और नहीं होना ! ( कुछ " भगवानों" की दुर्दशा देख कर ऐसा निर्णय लिया है !) मै अपने ईर्ष्यालु मित्रों की फितरत से वाकिफ हूं ! जैसे ही उन्हें मेरे " मशहूर '' होने की खबर मिलेगी , उनका ऑक्सीजन लेवल नीचे आ जायेगा !
                मैं जानता हूं कि महान होने के लिए अगर मैंने अपने साहित्यिक मित्रो से सलाह ली तो मेरा क्या हस्र होगा ! इसलिए मैने मुहल्ले की  ही दो  हस्तियों से  सलाह लेने की ठानी ! सबसे पहले मैंने फेसमास्क लगा कर ' वर्मा जी ' का दरवाजा खटखटाया ! चश्में में कसा वर्मा जी का काला चेहरा दरवाजे के बीच नजर आया ! इन्होंने मुझे ऐसे देखा, गोया मेरा फेसमास्क ही फर्जी 
हो - " सत्ताइस तारीख़ तक लॉक डाउन है "!
     उन्हें धकेल कर अंदर रखी कुर्सी पर बैठते हुए मैने कहा, " में तब तक इंतज़ार नहीं कर सकता "!
      '' क्यों ! क्या जांच में तुम्हारे अंदर ब्लैक फंगस पाया गया है ? ऐसी स्थिति में तुम्हें मेरे पास नहीं आना था "!
       " ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है, मै बिलकुल ठीक हूं और काफ़ी गुड फील कर रहा हूं "!
          वह फ़ौरन बैड फील करने लगे , " यहां किस लिए आए हो ?"
      " मुझे आज ही पता चला कि मैं मशहूर हो चुका हूं , अब मैं महान होना चाहता हूं"!
        " किसी ने फर्स्ट अप्रैल समझ कर फोन कर दिया होगा, ऐसी अफ़वाह मत सुना करो "!
    "अब समझा ,  तुम्हे मुझसे जलन हो रही है "!
               मै जानता था कि वर्मा जी को मुझ से कितना ' गहरा लगाव ' है! मैंने तो सिर्फ उनका वज़न कम करने के लिए सूचना दी थी ! वहां से निकल कर मैंने चौधरी को खुश खबरी दी, " मुबारक हो !"
   चौधरी ने संदिग्ध नजरों से मुझे देखा, '' सारी उधारी आज दे देगो - के ?"
      " जब तक उधारी है, तब तक आपसदारी है! मैं नहीं चाहता कि आपसदारी खत्म हो ! खैर तुम्हें ये जान कर बहुत खुशी होगी कि मैं मशहूर हो चुका हूं "!
           " कितै गया था चेक कराने ?"
   '' कहीं नहीं, मुझे बताना नहीं पड़ा - लोगों ने खुद ही मुझे फोन करके बताया"! " 
       " इब तू के करेगो  "?
'' मैं महान होना चाहता हूं !"
       चौधरी ने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोलते हुए कहा , " घणा अंट संट  बोल रहो ! नू लगे - अक - कोई नई बीमारी आ - गी  काड़ोनी में।  तू इब तक घर ते बाहर हांड रहो ! या बीमारी  में मरीज कू ब्लैक फंगस जैसे खयाल  आवें सूं !"

        यहां कोई किसी को ' महान ' होते नहीं देता और चुपचाप रातों रात महान होने को लोग मान्यता नहीं देते ! जिएं तो जिएं कैसे ! चतुर सुजान प्राणी बाढ़, सूखा, स्वाइन फ्लू और कोरोना के मौसम में भी महान हो लेते हैं ! जिन्हें महान होने की आदत है वो विपक्ष में बैठ कर भी महानता को मेनटेन रखते हैं ! बहुत से लोग  तो कोरोना और ऑक्सीजन सिलेंडर की आड़ में भी महान हो गए हैं ! इस कलिकाल में भी नेता और पुलिस आए दिन महान हो रही है !

                   और,,,,एक मैं हूं जिसे  "महान" होने के लिए रास्ता बताने वाला कोई महापुरुष नहीं मिल रहा   है -. जाऊं तो जाऊं कहां !!
                                      ( सुलतान भारती)

         

Monday, 10 May 2021

"बहते मुर्दे" - चलते मुर्दे "

               मुर्दे बोल रहे हैं! मुर्दे आवाज़ उठा रहे हैं! मुर्दे पुकार रहे हैं ! मुर्दे मदद मांग रहे हैं और जिंदे लोग गांधी जी के बंदर हो चुके हैं, - मुर्दा मत देखो, जो गंगा में तैर रहे हैं उन्हे मुर्दा मत कहो और कोरोना पीड़ित अपना सगा बाप भी अगर दरवाजा पीटे तो मत सुनो ! कोरोना ने रिश्तों को कैसी कसौटी और पटकनी दी है। खूनी रिश्ते अपनो के कंधों के लिए तरस गए। सैकड़ों कंधे उस कौम के काम आए, पूरी ज़िंदगी जिसकी परछाईं से परहेज़ का जहर ढोते रहे! कुछ मुर्दे साइकल पर ढोए गए , किसी के ऊपर पुलिस वाले को दया आई तो श्मशान भूमि तक पहुंछाया ! गांव के छप्पर पर सूखती लौकी और बाप की लाश में उपेक्षा का एक जैसा समाजवाद नज़र आ रहा था ! 
                मुर्दे गंगा में बहाए जा रहे हैं। कानपुर से गाजीपुर तक मुर्दों की कतार ! मुर्दे रिश्तों पर थूक रहे हैं! मुर्दे फादर्स डे और मदर्स डे पर अपने कलियुगी बेटों के फर्जी पोस्ट की अर्थी लेकर बह रहे हैं ! मुर्दों की खामोशी में गज़ब का शोर है ! लोग घरों से निकल कर घाट पर आ गए हैं ! ये चलते फिरते मुर्दे हैं जो तैरते मुर्दों से अलग कपड़े पहने हुए हैं ! बस्ती के मुर्दों को आते देख बहने वाले मुर्दे आपस में बतियाने लगे, -' थोडा रुक कर बहते हैं ! शायद हमारे लिए आए हैं !'
         " काहे किनराते हो , जो परिवार के थे वो कुत्तों के हवाले कर गए ! ये तो गैर हैं"!
       '' इस त्रासदी में गैर ही तो काम आए हैं"!
एक दर्जन लाशें उथले पानी की रेती में स्थिर हो गईं.!. ज़िंदा लाशें थोड़ी दूर पर रुक कर आपस में बात करने लगीं, - " ये लाशें किस जाति की हो सकती हैं ?"
       " कैसे पता चलेगा ? कफन तो बडा सस्ते वाला लगता है "  । 
    " कई कफ़न तो फटे हुए है, किसी काम के नहीं हैं"!

  पहले वाला लाशों की जाति को लेकर अभी भी चिंतित था , " जानें कौन सी जाति के हैं, गंगा मैया को गंदी करने चले आए "!
       लाशें घबरा कर फिर बहने लगीं !दो किलो मीटर आगे गंगा के किनारे तीन युवा कुत्तों का एक गैंग आपस में बात कर रहा था, ' अब तो और कुछ खाने का मन ही नहीं करता ''!
        '' मेरे अंदर तो शाकाहारी फीलिंगआने लगी थी," एक और कुत्ता बोल पड़ा '.अब जाके आया मेरे बेचैन दिल को करार"!
        कुत्तों का मुखिया बोला, '' वैसे जिन्होंने अपने परिजनों को हम कुत्तों के हवाले किया है, उनका ज़रूर हम कुत्तों से पूर्व जन्म का नाता है"!
    '' बेशक! इतना तो कोई अपना ही केयर करता है "!
'' इंसान का कैरेक्टर हम कुत्तों से भी गया गुजरा है, इस दौर ने साबित कर दिया है"!!
      मै न्यूज देख रहा हूं, दरिया गंज ( दिल्ली) में तीन व्यापारी गिरफ्तार।! रेमडेसीवीर इलेक्शन दस गुना से अधिक दाम पर बेच रहे थे ! ऑक्सिमीटर और ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी का क्या कहना! आपदा को अवसर में बदलने का हुनर इन्ही के पास है! क्या इनके अंदर ईमान,  दया, गुनाह, इंसानियत या दर्द का कोई भी एहसास नहीं होता ? तो,,,,, ये ज़िंदा कहां हैं ! दूसरों की आपदा को अपने लिए अवसर बनाने के लिए ये जीते जी मर जाते हैं ! अब ये.आंसू,  दया और धर्म की तुच्छ सांसारिक सोच से मुक्त होकर जिंदों के बीच आराम से विचरते हैं! ऐसे बहुत सारे मुर्दे आपके आसपास आबाद हैं, जिनकी वजह से मुर्दे तैर रहे हैं!
               हम नई परिभाषा नहीं तलाशते, पुरानी को दुहरा कर संतुष्ट हैं! गंगा में तैरती लाश के साथ सड़ते रिश्तों से पहले हमें सरकार की नाकामी नजर आने लगती है! हम खुद पर कोई दोष नहीं लेते, ऐसा करने से हमारे ज़िंदा होने की आशंका बढ़ जाती है! इसलिए हम हालाते हाजरा की जलवायु सूंघ कर मुर्दों के साथ बहने लगते हैं ! इल्जाम लेना बड़ी हिम्मत का काम है, इसलिए हम जोखिम उठाने की अपेक्षा दूसरों को दोषी साबित करने में लगे होते हैं!

                  मुर्दे बह रहे हैं, कथित जिंदे गंगा के किनारे खड़े अफसोस कर रहे हैं ! मुर्दे लावारिस हैं, उनके वारिस रात में उन्हें गंगा के हवाले कर मोक्ष के प्रति आश्वस्त हैं! मोक्ष और मुर्दों के बीच में कुत्ते खड़े हैं ! मुर्दे बह रहे हैं, तट पर खड़े मुर्दे अपने भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, " मै मुर्दों को नहीं, इन कुत्तों को लेकर चिंतित हूं!  कल को ये कुत्ते हमारी बस्ती में आकर मानव मांस तलाशेंगे ! सरकार को कुछ करना होगा"!

    मुझे एक शे'र याद आ रहा है !

साहिल के  तमाशाई  हर डूबने वाले पर !
अफसोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते !!

            ( सुलतान भारती)

Wednesday, 14 April 2021

" कोरोना ! लागी छूटे ना "

      लागी छूटे ना - "कोरोना " !

           अब हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है! अब तो शायद पूरी दुनिया के समझ में आ गया है कि कोरोना को हम पसंद आ गए हैं ! वो मरदूद यहां से जाने को राज़ी नहीं है ! जाने उसे किसने क्या घुट्टी पिला दी है कि जाने के लिए - कोरोना है कि मानता नहीं ! कई लोगों ने समझाया भी कि , - घर वापसी कर ले , मां बाप कुंभ में ढूंढ रहे होंगे ! गाना गा रहे होंगे - तू छुपा है कहां ढूंढता मैं यहां ,,,,!' पर उसे अपने पिता श्री ( चीन) से ज़रा भी लगाव नहीं ! बड़ी नालायक औलाद है । यहां के मल्टी टैलेंटेड नेताओं के पैर पकड़ कर कह रहा है, " तेरे चरणों से जुदाई तो नही मांगी थी ,,,,,!'
                   2020 में जब कोरोना आया तो मैच्योर्ड नहीं था़ , ना समझी में कहीं भी घुस जाता था । फिर उसे गुरुकुल के आचार्य मिले और उसका टाइम टेबल और रूट चार्ट से उसे अपडेट किया गया । अब उसे बताया जाता था कि अगले दिन उसे किस गरीब की बस्ती से पलायन करना है और किस मार्केट में चटाई बिछा कर लेट जाना है !कई अवतारी पुरुष मल्टीनेशनल कंपनियों से डाटा इकत्र कर जनता को बता रहे थे ,- अमेरिका, इटली, चीन और ब्राज़ील के मुक़ाबले अपने यहां स्थिति काफ़ी नियंत्रित है -! कोरोना पूरे अप्रैल २०२० में गुड फील करता रहा ! मैंने सोचा कि कोरोना को भी मनरेगा योजना में शामिल कर लिया गया है और और अब उसे मुख्य धारा से कोई अलग नहीं कर सकता ।
        वर्मा जी के कई यक्ष प्रश्न हैं जिन्हें सुनकर सरकारी और गैरसरकारी अधिकारी पूंछ उठाकर भागते हैं ! वो कल ऐसा ही एक सवाल मुझसे पूछ रहे थे, - " लॉक डाउन से कोरोना को क्या प्रॉब्लम आती है ?" मैंने वर्मा जी को टालना चाहा, - " इस सवाल का जवाब कोई नेता दे सकता है या पुलिस अधिकारी "! वर्मा जी अड़ गए, " चलो थोड़ी देर के लिए तुम खुद को लेखक की जगह कोरोना मान लो, अब बताओ, लॉक डाउन से एक कोरोना को क्या असुविधा हो सकती है।" मैं उनके सवालों में फंस गया था, निकलने का कोई रास्ता नहीं था, मैने हमला वाला रास्ता पकड़ा, " लॉक डाउन से कोरोना को कम नुकसान है, लेखक को ज़्यादा । लेखक कब तक घर में सहन किया जाएगा! आखिरकार उसे गेहूं के लिए बाहर निकल कर जाना होगा । कोरोना के लिए गेहूं की कोई बाध्यता नहीं है"!
     वर्मा जी ने मुझे घूर कर देखा, - " मुझे तो बताया गया था़ कि तुम्हें कोरोना हो गया है,और तुम्हारा दिमाग़ अब आउट ऑफ कंट्रोल हो चुका है ! लानत है, लोग आजकल भी झूठ बोल रहे हैं।" उन्हे ये जानकर बिलकुल खुशी नहीं हुई थी कि मैं सही सलामत हूं! वो हवा में दुलत्ती मार कर निकल गए!
     वैसे एक हकीकत है कि शायद पूरे देश के व्यंग्यकारों ने मिलकर भी कोरोना के खिलाफ़ इतना ना लिखा होगा जितना अकेले मैने लिखा है। इतना मजाक तो एक मुर्दा भी सहन नहीं कर सकता ! लोगों ने तो कोरोना को पूड़ी सब्जी  खिला कर खुद गोबर तक खा लिया , मूत्र पी लिया कि , अब से कोरोना शांत हो -! यहां एक मैं था कि लॉक डाउन में भी बाहर निकल कर उसे ढूंढता रहा, लिखता रहा और मजाक उड़ाता रहा। इसलिए जब १६ अप्रैल 2021 को मै कोरोना के हत्थे चढ़ा तो कोरोना समर्थक काफ़ी खुश थे,, ( आज आया है ऊंट पहाड़ के नीचे !) जब मुझे पता चला कि मुझे कोरोना हुआ है तो मैं डरने की जगह थोड़ा हैरान हुआ! हैरान इसलिए क्योंकि मुझे अभी तक यकीन नहीं था़ कि कोरोना एक क्रूर हकीकत है ! 

तो,,, दोस्तों ! आपको एक बड़े तजुर्बे की बात बताता हूं। मौत का एहसास क्या है ? सांस और हिचकी के बीच के खला पर रुका खुदा का फैसला जो आप खुली आंखों से देख कर भी आगे खुद को जगा नहीं पाते। मेरी ऑक्सीजन 82 से 88 तक दौड़ रही थी और मैं पूछने पर घर बालों को 92 और 94 बता देता था। सच तो ये भी था कि मैं कहीं से कहीं तक कोरोना या मौत को लेकर ज़रा भी खौफ में नहीं था । अलबत्ता बैखौफ होने के पीछे का जो मज़बूत कंक्रीट होता है, उसे मैने पहचान लिया है। वो आपके नेक अमल हैं ! अगर आप दूसरों के लिए जीने को वरीयता देते हैं तो आप को न मौत से खौफ होगा न ज़िंदगी से बहुत ज़्यादा लगाव ! 

   आज शायद बीस दिन बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूं। अभी ठीक से चल नहीं पा रहा हूं। धीरे धीरे धीरे ताकत रिस्टोर हो रही है। मेरे तमाम चाहने वालों ने दुआओं और शुभकामनाओं की रेड कार्पट बिछा दी थी मेरे लिए  ! यही तो आप कमाते हैं अपने लिए । यही सबसे बड़ी दौलत है हम जैसों के लिए !

तो,,, शब्बा खैर, खुदा करे हर इंसान को शिफा हासिल हो और कल का सूरज आपकी कामयाबी की रोशनी लेकर आए !  (   अब तो दफा हो ले कोरोना  !)

Friday, 26 March 2021

की "खेला" होबे !

         की - "  खेला "   होबे !

               अब इसका जवाब तो कोई  खिलाड़ी ही दे सकता है , मै तो ( सियासत वाले) खेल में अनाड़ी हूं ! आजकल हर कोई  'खेला होबे' की आशंका जता रहा है। कमाल है, गरीब टोला में ही फाग खेला जाता है । एक तो खेल खेल में  "दीदी" का पैर तोड़ा, ऊपर से उनके दर्द  की खिल्ली उड़ा रहे हो ! अब अगर उन्होंने गुस्से में कह दिया कि - "खेला होबे" तो सारी मीडिया ततैया की तरह टूट पड़ी । 'हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,,,,, ' - वाली स्थिति है ! अब सारे विरोधी पिचकारी लेकर दीदी को घेर कर है रहे हैं, " आज न छोड़ेंगे ममता दीदी - खेलेंगे हम होली ! चाहे मानो होली दीदी, चाहे मानो ठिठोली '! इस घातक ठिठोली को समझने वाले समझ रहे हैं, ना समझे वो अनाड़ी है!
            .         सत्ता का विरोध जब बगावत मान लिया जाए तो प्रजातंत्र शरसैया पर लेट जाता है , - ' चलो रे डोली उठाओ कहांर,,,,!' अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा अब बंगाल में हिन हिना रहा है  ! दीदी जानती है कि  उसके साथ - की खेला होबे ,  पर नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सुने कौन ! 'दादा' के सामने 'दीदी' पैर में पलस्तर बंधवाए विलाप कर रही है ,- ' इन्हीं लोगों ने लै लीन्हा दुपट्टा मेरा "! पूरा बंगाल "सोनार बांग्ला" होने के लिए कतार में खड़ा हो गया है ! कोरोना घबरा कर वहां से निकल भागा है और आदेशानुसार दिल्ली और महाराष्ट्र  में चटाई बिछा चुका है ! सोनार बांग्ला के लिए मानसून भी आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है कि कब रामराज का आगमन हो, और वह सारा विकास उड़ेले ! भिखारी तक को सोनार बांग्ला से काफ़ी आशाएं हैं, -'  शोनार बोंगला में अमी कार में बैठ कर भीख मांगबे "!
                 पहले चरण का विकास हो चुका है , दो चार बूथों पर मार कुटाई की ख़बर है ! विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि इस बार बंगाल में सबसे कम हिंसा हुई है ! ( मलाल नहीं होना चाहिए क्योंकि -' पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त -'! ) आज होली है, इसलिए आज़ कोई खेला नहीं होबे ! सारे दिग्गज खिलाड़ी चुनाव में लगे हुए  हैं ! ऐसी ऐसी गुगली और यार्कर " फेंका " जा रहा है , जिसे सुनकर विद्वान सकते में हैं और इतिहास सदमे में ! अभी विकास बस शुरू हुआ है, आगे आगे देखिए फेंकेंगे क्या !! खेल बडा होबे , क्योंकि राष्ट्रीय खिलाड़ी के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी खड़े हैं ! अभी उन्होंने अपने सारे पत्ते खोले नहीं हैं !  वो स्वस्थ हैं, संतुष्ट है और जानते हैं कि बहुमत को " सोनार बांग्ला" चाहिए ! तो,,, ले लो, वो तो कब से आवाज़ लगा रहे हैं -" ले लो चंपा चमेली गुलाब लई लो"!
                      "दीदी" व्हील चेयर पर है और तमाम खिलाड़ी होली मनाने के मूड में ! सारा विपक्ष दीदी को घेर कर "खेला होबे" का शोर मचा रहा है। कमबख्त होली को भी आज़ ही आना था ! खेल शुरू होने से पहले ही जनता को स्टेडियम से बाहर निकाल दिया गया ! दर्शकों से कह दिया गया कि आंख पर नहीं, कमेंट्री पर भरोसा करें! अब कमेंट्री की जिम्मेदरी मीडिया को दी गई है, जो पूरी ईमानदारी और भक्ति भाव से कमेंट्री कर रही है, " प्रथम चरण का " खेला" हो चुका है ! "बाबा" के मुकाबले  "दीदी" का मनोबल स्ट्रेचर पर पीछे पीछे चल रहा है ! जनता को परिवर्तन चाहिए, और बंगाल को सोनार बांग्ला ! सोनार बांग्ला होते ही आम के पेड़ों से चावल की बोरियां टपकने लगेंगी और बंगाल की खाड़ी से मछलियां निकल कर हावड़ा ब्रिज पर बैठ कर गाने लगेंगी, ' दुख भरे दिन बीते रे भइया , अब सुख आयो रे - सोनार बांग्ला का 'रसोगुल्ला' लायो रे "!
          किराए का टोटा है वरना बंगाल चला जाता ! सच कहूं, सोनार बांग्ला देखने के लिए जिया बेकरार है ! कल चौधरी भी मुझ से पूछ रहा था, " उरे कू सुण भारती ! तमै
 कछु पतो है "?
   " हां, दिल्ली और महाराष्ट्र में लॉकडाउन के आसार हैं, कोरोना है कि मानता नहीं"!
    " परे कर कोरोना कू ! मै विकास की बात करूं सूं अर तमैं कोरोना सूझ रहो ! नू बता - अक- यू सोनार बांग्ला किस तर्या बनाया ज्यागा !"
 " बड़ा मुश्किल सवाल है ! मैं नहीं बता पाऊंगा ! रुकावट
के लिए खेद है '!
      " क्यों ?"
   " क्या बताऊं, मैंने कभी किसी को ठीक से उल्लू तक नहीं बनाया- सोनार बांग्ला कैसे बनाऊंगा "!
        " फिर कूण बना रहो ?"
" इतनी दूर से कैसे बताऊं ! जाकर देखना पडेगा ! वैसे जहां तक बनाने की बात है तो कुछ लोगों को तो बहाना बनाना भी नहीं आता ! और कुछ लोग दूसरे देश जाकर लोगों को उल्लू बना कर लौट आते हैं "! 
       चौधरी बिलकुल कन्विंस नहीं है ! सारा देश खेला होबे को अपने अपने चश्में से देख रहा है। इस बको ध्यानम में किसी को अपने आस पास का खेला बिलकुल नहीं नज़र आ रहा ! कुछ लोग पूरी चतुराई से कोरोना कोरोना खेल रहे हैं ! देश में नाना प्रकार के खेल हो रहे हैं, पर नज़र बंगाल पर टिकी है। सुकई चच्चा बुधई से पूछ रहे हैं, " ई सुनार बांग्ला में सारे सुनार रहेंगे या राशन की दुकान भी होगी?" 
     " अरे चच्चा ! सोच कर काहे वजन घटाए हैं। बहुत दूर का मामला है - का पता, राशन न दें ! "
        दीदी का खेला भी हाई प्रोफाइल है, धक्का मुक्की में लगी चोट पर चढ़ा प्लास्टर उतरने का नाम नही ले रहा।  इसी प्लास्टर को लेकर देव दानव दोनो चिंतित है ! प्लास्टर ने दीदी को व्हील चेयर पर और टी एम सी को मुख्य धारा में ला दिया है ! ये देश का वो सौभाग्यशाली प्लास्टर है जो किसी के लिए वरदान और किसी के लिए अभिशाप बन गया है ! ऐसा प्लास्टर है जो विरोधियों के सुखद सपनों पर कोरोना बनकर गिरा है ! जैसे जैसे प्लास्टर दीर्घ जीवी हो रहा है, विरोधी खेमें में गठिया रोग बढ़ रहा है ! अब इसी प्लास्टर पर बंगाल  का भविष्य टिका है ! "सोनार बांग्ला" के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा इस प्लास्टर के आगे लाचार खड़ा है ! जनता को प्लास्टर वाला पांव नज़र आ रहा है, व्हील चेयर के पीछे मक्खी उड़ाता दुखियारा "घोड़ा" नहीं नज़र आ रहा !  "सोनार बांग्ला" का सारा तिलिस्म इस घायल पैर के नीचे दब गया है ! व्हील चेयर और प्लॉस्टर चिरंजीवी होते जा रहे हैं ! "बाबा जी" सारे नुस्खे बेअसर हो रहे हैं!!

  "ठीक" होने के लिए "पैर" है कि मानता नहीं !

                         (  सुलतान भारती )

Sunday, 21 March 2021

" बही खाता "

                " सत्यमेव  जयते "


             मैं कसम खाता हूं कि आज जो भी कहूंगा सच कहूंगा - सच के अलावा,,,,,,,,, मौका मिला तो ज़माने का लिहाज़ करते हुए थोडा़ बहुत झूठ भी बोलूंगा ! ( वरना लोग ताना मारेंगे कि अच्छे दिन आते ही औकात भूल गया !) जब सच और झूठ पर बहस छिड़ ही गई तो लगे हाथ मुझे कह लेने दो कि दुनियां                " सत्यमेव  जयते "

             मैं कसम खाता हूं कि आज जो भी कहूंगा सच कहूंगा - सच के अलावा,,,,,,,,, मौका मिला तो ज़माने का लिहाज़ करते हुए थोडा़ बहुत झूठ भी बोलूंगा ! ( वरना लोग ताना मारेंगे कि अच्छे दिन आते ही औकात भूल गया !) जब सच और झूठ पर बहस छिड़ ही गई तो लगे हाथ मुझे कह लेने दो कि दुनियां में आदर्श सिर्फ "माल्यार्पण" के काम आता है और झूठ एक ताकतवर हकीकत है ! सत्यमेव जयते की तख्ती लगाकर लोग सरेआम झूठ की मार्केटिंग करते हैं ! थाने के बाहर लिखा होता है,-शांति सुरक्षा न्याय - और इनकी चाहत में अंदर जाते हुए  'शांतिलाल जी' के पैर कांपते हैं ! उन्हें इस खोखले आदर्शवादी सच के पीछे खड़े इस शक्तिशाली झूठ की जानकारी  है कि  "शांतिलाल जी" को  "गांधी जी" के बगैर 'शांति ' नहीं मिलने वाली।  
      "सच" को सत्य मेव जयते मान लिया गया है , इसलिए जीवन भर नीलकंठ बने रहो ! सेठ अखरोट चंद की धर्मशाला , औषधालय और प्याऊ के भरोसे जीवन का नर्क काट कर, मरने के बाद जब एक आम आदमी सत्यमेव जयते की गठरी लेकर धर्मराज के सामने खड़ा  होगा तो क्या उसे स्वर्ग मिलता होगा! या फिर उसके साथ कुछ इस तरह की पूछ ताछ होगी, " क्या नाम है तुम्हारा "?
     ' दुखी लाल '!
     " काम क्या करते थे "?
 ' कभी झूठ नहीं बोला, चोरी नहीं की, किसी को चोट नहीं पहुंचाया , किसी का हक नहीं मारा, लालच नहीं किया, किसी को गाली नहीं दी,,,,'!
" कामचोर कहीं के ,  अबे ! ये तो वो काम हैं जो तूने किया ही नहीं ! इसका मतलब ईश्वर द्वारा दिया गया जीवन व्यर्थ गवां दिया , पक्का नर्क काटेगा !  ख़ैर - जीवन में कभी कोई गौशाला या धर्मशाला बनवाया था या नहीं ?'
      " नहीं, बल्कि मेरा परिवार तो खुद कभी कभी धर्मशाला में खा कर आ जाता था "!
       " कभी किसी गरीब की शादी कराई हो,या सर्दी में कंबल बांटा हो ?"
       " नहीं "! दुखी लाल को अपनी आवाज़ भी दूर से आती हुई लगी ।
                 चित्रगुप्त ने कंप्यूटर पर फाइनल रिर्पोट लगाकर धर्मराज को मेल करते हुए शिफारिश की, " ये बहुत गरीब आदमी है , पृथ्वी पर रहकर भी विकास नहीं कर पाया ! गरीबी और अभाव का नर्क भोग कर आया है , बेचारे को सुख का अनुभव नहीं है !  अगर इसे स्वर्ग में डाला गया तो इसे पक्का इंफेक्शन हो जायेगा ! "
           सच की पैरवी करने वाले खुद उसे " कड़वा" बताते हैं ! यही महापुरुष समाज को उपदेश देते हुए कहते हैं, " सत्यम ब्रुयात- प्रियम ब्रूयात "! ( सच बोलना चाहिए - मीठा बोलना चाहिए )  अब आप सर धुनिए, जब सच कड़वा होता है तो मीठा कैसे बोलोगे ?  सच की नसों मे झूठ की चाशनी डालिए ! दूसरी तरफ़ झूठ में नीम जैसी कड़वाहट नही, कलाकंद जैसी मिठास है। शूगर का पेशेंट भी बोलने से परहेज़ नहीं करता ! सच बोलने के लिए प्राणी को हिम्मत, कोशिश और संस्कार की ज़रूरत पड़ती है ! झूठ के लिए मुंह मे जबान होना  काफ़ी है ! बाकी यार दोस्त बोलना सिखा देते हैं,और कुछ ही दिनों में मुंह से फूल झड़ने लगते हैं !
             दुनियां के ८० प्रतिशत लोगों की लगाम २० प्रतिशत लोगों के हाथ में है । यही बीस प्रतिशत लोग बहुमत के गले में आदर्शवादिता की घंटी बांधते हैं ! यही लोग तय करते हैं कि किसे कड़वा सच बोलना है और किसे "निकृष्ट झूठ" की मार्केटिंग करना है ! बस इसके बाद अलौकिक विकास शुरू हो जाता है, एक तबका सत्य और स्वर्ग की ख़ोज में तीर्थयात्रा की ओर जाने लगता है , और दूसरा लोभ,लालच और झूठ के पापकुंड में नहाता " विदेश यात्रा" की ओर ! 'धर्मबुद्धि ' पेट काट कर बच्चों का भविष्य बैंक में जमा करेगा और "पापबुद्धि"  बैंक  समेट कर फरार हो जायेगा! अस्सी फीसदी वाला तबका "बेचारा" होता चला जायेगा और बीस प्रतिशत वाला " विश्व गुरु "!
         सच की पैरवी बड़ी हिम्मत का काम है और विरले ही इस पुलसरात पर टिक पाते हैं ! ये भी सच है कि जब तक सच ज़िंदा है, संसार वजूद में है। सच विहीन संसार एक बेलगाम हिंसक भीड़ में बदल जायेगा ! मगर दिनो दिन सच का गिरता सेंसेक्स झूठ का वर्चस्व बढ़ा रहा है !
विडंबना ये है कि जिस ढांचे पर सच को प्रमोट करने की जिम्मेदारी है वही झूठ के तानेबाने में लिपटा हुआ है। फल ये हुआ कि सच के पेड़ पर "बौर" आते ही झूठ का "लासा" लग जाता है ! झूठ के ब्रांड एंबेसडर कौए ऐसे बगीचे से कोयल को खदेड़ कर खुद बैठ जाते हैं! झूठ कितना पॉवरफुल है ये अगले महीने यूपी के पंचायत चुनाव में जाकर देखना ! आरक्षित सीटों पर हरिजन  उम्मीदवार की पीठ पर "बेताल" की तरह सवार ठाकुर, सैयद, पंडित या खान साहब का छाया चित्र प्रशासन के अलावा सबको नज़र आ आयेगा
          सच और झूठ की रेस में सच को कछुआ बना कर  जिता देना अक्ल को अफीम चटाने जैसा है ! झूठ कभी सोता नहीं, और सच इस गफलत में दौड़ता नहीं कि हम तो - सत्यमेव जयते - में आते हैं ! हम इंसानों को सदियों से  'थ्योरी'  पढ़ाई जाती है और 'प्रैक्टिकल' को छुपाया जाता है ! हम थ्योरी के आदर्शवादिता की अफीम चाटकर सोते आए हैं फिर भी चारण हमे विजेता घोषित कर देते हैं ! मैं ये नहीं कहता कि झूठ के पैरोकार बने, मेरा मकसद ये है कि सच का संरक्षण हो । सच को किताबों से निकाल कर कल्ब ( दिल) में उतारा जाए ! सच अगर सत्यमेव जयते है तो समाज और संविधान में नज़र भी आना चाहिए !       

        सच का उपहास उड़ाते झूठ की ताज़ा बानगी देखिए !  "आर्थिक रूप से कमज़ोर" तबके की मदद के लिए एसडीएम ऑफिस में उपलब्ध ( EWS) फॉर्म के एक क्लॉज में अभ्यार्थी से  " तीन साल के आयकर रिटर्न " का लेखा जोखा मांगा गया है ! ( अब अगर गरीब आदमी को आर्थिक सहायता प्राप्त करना है तो पहले तीन साल तक अमीर होकर इनकम टैक्स भरे ! तभी उसके गरीब होने पर यकीन होगा !) 

            वरना - हट जा ताऊ पाछे नै !!

                           ।।। ( सुलतान भारती ) !!! में आदर्श सिर्फ "माल्यार्पण" के काम आता है और झूठ एक ताकतवर हकीकत है ! सत्यमेव जयते की तख्ती लगाकर लोग सरेआम झूठ की मार्केटिंग करते हैं ! थाने के बाहर लिखा होता है,-शांति सुरक्षा न्याय - और इनकी चाहत में अंदर जाते हुए  'शांतिलाल जी' के पैर कांपते हैं ! उन्हें इस खोखले आदर्शवादी सच के पीछे खड़े इस शक्तिशाली झूठ की जानकारी  है कि  "शांतिलाल जी" को  "गांधी जी" के बगैर 'शांति ' नहीं मिलने वाली।  
      "सच" को सत्य मेव जयते मान लिया गया है , इसलिए जीवन भर नीलकंठ बने रहो ! सेठ अखरोट चंद की धर्मशाला , औषधालय और प्याऊ के भरोसे जीवन का नर्क काट कर, मरने के बाद जब एक आम आदमी सत्यमेव जयते की गठरी लेकर धर्मराज के सामने खड़ा  होगा तो क्या उसे स्वर्ग मिलता होगा! या फिर उसके साथ कुछ इस तरह की पूछ ताछ होगी, " क्या नाम है तुम्हारा "?
     ' दुखी लाल '!
     " काम क्या करते थे "?
 ' कभी झूठ नहीं बोला, चोरी नहीं की, किसी को चोट नहीं पहुंचाया , किसी का हक नहीं मारा, लालच नहीं किया, किसी को गाली नहीं दी,,,,'!
" कामचोर कहीं के ,  अबे ! ये तो वो काम हैं जो तूने किया ही नहीं ! इसका मतलब ईश्वर द्वारा दिया गया जीवन व्यर्थ गवां दिया , पक्का नर्क काटेगा !  ख़ैर - जीवन में कभी कोई गौशाला या धर्मशाला बनवाया था या नहीं ?'
      " नहीं, बल्कि मेरा परिवार तो खुद कभी कभी धर्मशाला में खा कर आ जाता था "!
       " कभी किसी गरीब की शादी कराई हो,या सर्दी में कंबल बांटा हो ?"
       " नहीं "! दुखी लाल को अपनी आवाज़ भी दूर से आती हुई लगी ।
                 चित्रगुप्त ने कंप्यूटर पर फाइनल रिर्पोट लगाकर धर्मराज को मेल करते हुए शिफारिश की, " ये बहुत गरीब आदमी है , पृथ्वी पर रहकर भी विकास नहीं कर पाया ! गरीबी और अभाव का नर्क भोग कर आया है , बेचारे को सुख का अनुभव नहीं है !  अगर इसे स्वर्ग में डाला गया तो इसे पक्का इंफेक्शन हो जायेगा ! "
           सच की पैरवी करने वाले खुद उसे " कड़वा" बताते हैं ! यही महापुरुष समाज को उपदेश देते हुए कहते हैं, " सत्यम ब्रुयात- प्रियम ब्रूयात "! ( सच बोलना चाहिए - मीठा बोलना चाहिए )  अब आप सर धुनिए, जब सच कड़वा होता है तो मीठा कैसे बोलोगे ?  सच की नसों मे झूठ की चाशनी डालिए ! दूसरी तरफ़ झूठ में नीम जैसी कड़वाहट नही, कलाकंद जैसी मिठास है। शूगर का पेशेंट भी बोलने से परहेज़ नहीं करता ! सच बोलने के लिए प्राणी को हिम्मत, कोशिश और संस्कार की ज़रूरत पड़ती है ! झूठ के लिए मुंह मे जबान होना  काफ़ी है ! बाकी यार दोस्त बोलना सिखा देते हैं,और कुछ ही दिनों में मुंह से फूल झड़ने लगते हैं !
             दुनियां के ८० प्रतिशत लोगों की लगाम २० प्रतिशत लोगों के हाथ में है । यही बीस प्रतिशत लोग बहुमत के गले में आदर्शवादिता की घंटी बांधते हैं ! यही लोग तय करते हैं कि किसे कड़वा सच बोलना है और किसे "निकृष्ट झूठ" की मार्केटिंग करना है ! बस इसके बाद अलौकिक विकास शुरू हो जाता है, एक तबका सत्य और स्वर्ग की ख़ोज में तीर्थयात्रा की ओर जाने लगता है , और दूसरा लोभ,लालच और झूठ के पापकुंड में नहाता " विदेश यात्रा" की ओर ! 'धर्मबुद्धि ' पेट काट कर बच्चों का भविष्य बैंक में जमा करेगा और "पापबुद्धि"  बैंक  समेट कर फरार हो जायेगा! अस्सी फीसदी वाला तबका "बेचारा" होता चला जायेगा और बीस प्रतिशत वाला " विश्व गुरु "!
         सच की पैरवी बड़ी हिम्मत का काम है और विरले ही इस पुलसरात पर टिक पाते हैं ! ये भी सच है कि जब तक सच ज़िंदा है, संसार वजूद में है। सच विहीन संसार एक बेलगाम हिंसक भीड़ में बदल जायेगा ! मगर दिनो दिन सच का गिरता सेंसेक्स झूठ का वर्चस्व बढ़ा रहा है !
विडंबना ये है कि जिस ढांचे पर सच को प्रमोट करने की जिम्मेदारी है वही झूठ के तानेबाने में लिपटा हुआ है। फल ये हुआ कि सच के पेड़ पर "बौर" आते ही झूठ का "लासा" लग जाता है ! झूठ के ब्रांड एंबेसडर कौए ऐसे बगीचे से कोयल को खदेड़ कर खुद बैठ जाते हैं! झूठ कितना पॉवरफुल है ये अगले महीने यूपी के पंचायत चुनाव में जाकर देखना ! आरक्षित सीटों पर हरिजन  उम्मीदवार की पीठ पर "बेताल" की तरह सवार ठाकुर, सैयद, पंडित या खान साहब का छाया चित्र प्रशासन के अलावा सबको नज़र आ आयेगा
          सच और झूठ की रेस में सच को कछुआ बना कर  जिता देना अक्ल को अफीम चटाने जैसा है ! झूठ कभी सोता नहीं, और सच इस गफलत में दौड़ता नहीं कि हम तो - सत्यमेव जयते - में आते हैं ! हम इंसानों को सदियों से  'थ्योरी'  पढ़ाई जाती है और 'प्रैक्टिकल' को छुपाया जाता है ! हम थ्योरी के आदर्शवादिता की अफीम चाटकर सोते आए हैं फिर भी चारण हमे विजेता घोषित कर देते हैं ! मैं ये नहीं कहता कि झूठ के पैरोकार बने, मेरा मकसद ये है कि सच का संरक्षण हो । सच को किताबों से निकाल कर कल्ब ( दिल) में उतारा जाए ! सच अगर सत्यमेव जयते है तो समाज और संविधान में नज़र भी आना चाहिए !       

        सच का उपहास उड़ाते झूठ की ताज़ा बानगी देखिए !  "आर्थिक रूप से कमज़ोर" तबके की मदद के लिए एसडीएम ऑफिस में उपलब्ध ( EWS) फॉर्म के एक क्लॉज में अभ्यार्थी से  " तीन साल के आयकर रिटर्न " का लेखा जोखा मांगा गया है ! ( अब अगर गरीब आदमी को आर्थिक सहायता प्राप्त करना है तो पहले तीन साल तक अमीर होकर इनकम टैक्स भरे ! तभी उसके गरीब होने पर यकीन होगा !) 

            वरना - हट जा ताऊ पाछे नै !!

                           ।।। ( सुलतान भारती ) !!! 

Tuesday, 16 March 2021

बडे़ साइज़ की " सोच"

         बडे़ साइज़ की  छोटी "सोच"

           मैं अपनी तुच्छ सोच को लेकर दुखी हूं ! सीनियर सिटीजन होने की सीमा रेखा पर खड़ा होकर भी सोच के मामले में अभी नाबालिग हूं ! बुद्धिलाल जी हमेशा कहते रहते हैं कि आदमी को "बडा" सोचना चाहिए ! (वैसे अभी तक उन्होंने सोच की साइज़ नही बताई है !) वो सबको सलाह देते हैं, - जीवन में तरक्की करना है तो "बड़ा" सोचो - ! हालांकि बडा सोचने के मामले में उनकी सोच को लेकर मुझे थोडा़ डाउट है, क्योंकि अपनी शिक्षा को लेकर  उन्होंने हाई स्कूल से बड़ा सोचा ही नहीं ! तीन दिन पहले भी मुझे सुना कर कह रहे थे, -." आदमी बेशक गली कूचे का लेखक हो, और उसकी रचना मोहल्ले के साप्ताहिक अख़बार के अलावा कहीं न छपती हो, पर उसकी सोच बड़ी होनी चाहिए ! "
           मैने अक्सर कई बुद्धिजीवी प्रजाति के लोगों से से सुना है कि - सोच "बड़ी" होनी चाहिए - ! सुन सुन कर मेरे पतझड़ ग्रस्त दिल में भी सावन जाग उठा है ! ज़िंदगी के इंटरवल के बाद वाली लाइफ में पसरे रेगिस्तान के लिए शायद " सोच" ही जिम्मेदार है ! सोच को - लार्जर देन लाइफ - होना चाहिए था , पर हुआ उल्टा ! लाइफ बढ़ती गई और सोच सिमटती गई ! अब "बुद्धिलाल" जी कहते हैं कि बड़ा आदमी होने के लिए सोच बड़ी होनी चाहिए ! ये एक बड़ी समस्या है मेरे लिए , क्योंकि सोच बढ़ाने वाला फार्मूला कहां से लाऊं ! बड़ा आदमी तो मैं बचपन से होना चाहता था, पर तब घर वालों ने मिसगाइड कर दिया ! अब्बा श्री बोले थे, - "पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ( बडा आदमी ) " ! जब पढ़ने लगा तो साहित्य ने मिस गाइड कर दिया - ' बड़ा  हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,,',! ( रहीम के दोहे भी मेरे बड़े होने के पक्ष में नहीं थे !) अब्बा श्री और मास्साब  दोनों चाहते थे कि मैं पढ़ लिख कर बडा आदमी बनूं ! तब किसी ने नहीं बताया था कि बड़ा आदमी होने के लिए शिक्षा नहीं - ' सोच' बड़ी होनी चाहिए ! अब कोरोना और बेकारी के बाद सोच कुपोषण का शिकार हो गई!
       हमारे एक विद्वान मित्र हैं जो बड़ा आदमी होने का वर्कशॉप चलाते हैं ! इस काम में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है ! मुझे उनसे गहरी ईर्ष्या है, (क्योंकि पैंसठ साल के बाद भी वो सफेद दाढ़ी में जवान बने हुए हैं !) अख़बार में छपी उनकी एक गाइड लाइन के मुताबिक़ , - बड़ा होने के लिए आदमी को अपनी "सोच" बड़ी करनी चाहिए -! पिछला पूरा साल मैं सिर्फ़ कोरोना के बारे में ही सोचता रहा, लिहाज़ा सोच बडा करने का कोई मौका नहीं मिला ! पूरा देश बडा सोचने की जगह कोरोना को छोटा करने में लगा था ! इस साल मेरे लिए बेकारी एक बड़ी समस्या है, पर इस हालत में भी मैं बड़ा सोचना  चाहता हूं !  प्रॉब्लम ये है कि कभी किसी ने सिखाया ही नहीं कि बेकारी में बडा कैसे सोचा जाता है! मेरे जैसा छोटा आदमी, जिसकी सोच - दाल, भात और चपाती से ऊपर जाती ही नहीं, वो क्या खाक नीरव मोदी या विजय माल्या जैसी बड़ी सोच ला पायेगा !
               पर,,,,अब मैं मानूंगा नहीं , मुझे हर हाल में बड़ा बनना है ! लिहाजा मैं हर उस महापुरुष से दीक्षा लेना चाहता हूं जो  " बड़ा सोचने" का हुनर जानते हैं। एकबार मैं बड़ा सोच कर देखना चाहता हूं। वैसे मैं अपनी तरफ़ से  जब भी बड़ा सोचने की कोशिश  करता हूं तो बेगम जली  कटी  सुना देती  हैं, - " कुछ काम भी करोगे या पड़े पड़े सोचते ही रहोगे ! वसीयत कर जाऊंगी कि लड़की कुंवारी मर जाए पर किसी लेखक से शादी ना करे !" देख लिया न,  बड़ी सोच के रास्ते में किस क़दर स्पीड ब्रेकर खड़े  हैं।
            मैंने बड़ी सोच के बारे में "वर्मा जी" से जानकारी मांगी तो वो भड़क उठे, " जीडीपी तेरे कैरेक्टर की तरह नीचे गिर रहा है और तू सोच बड़ी करने में लगा है ! मूर्ख! ज्यादातर लोगों ने अपने काले धंधे का नाम ही  " बड़ी सोच" रख दिया है "! मैं फिर भी चौधरी से पूछ बैठा, " मै बड़ा सोचना चहता हूं "! चौधरी ने गुस्से में जवाब दिया, - ' मेरी तरफ से रुकावट कोन्या, तू बड़ा सोचे या सल्फास खाए- पर पहले म्हारी उधारी चुकता दे! मोय भैंसन कू हिसाब देना पड़  ज्या ! कदी समझा कर "!!
         " बड़ा"  कैसे सोचूं,-बस यही सोच सोच कर वज़न घटा लिया है ! शायद मेरा बैकग्राउंड ही बड़ी सोच में बाधक  है ! यूपी के छोटे से गांव में पैदा हुआ , छोटा सा आंगन , ऊपर मेरे हिस्से का आसमान ! साझी धूप की विरासत में पलते छोटे छोटे सपने ! मां बाप की खुशी और नाखुशी के एहतराम में झूमती गेहूं की सुनहरी बालियों की मानिंद जवानी आई तो उन्हीं छोटे सपनों को लिए दिल्ली आ गया ! दिल्ली में पैर जमे संगम विहार में, जो प्रदेश की सबसे बड़ी सुविधा विहीन क्लस्टर कॉलोनी है । यहां कुछ और सोचने से पहले प्राणी को पीने वाले पानी के बारे में सोचना पड़ता है । सारे सपने पानी, राशन और सड़क के हैंगर पर टंगे मिलते हैं ! मेरी यही प्राब्लम है, जब भी ' बड़ा ' सोचने की कोशिश करता हूं , सारी सोच राशन कार्ड लेकर दुकान के सामने खड़ी हो जाती है  ! पेट से बंधी छोटी सोच !!

       फिर भी,,,,,, "बड़ी"  सोच के लिए आज भी - दिल है कि  मानता नहीं !!

                 (  सुलतान भारती  )

Saturday, 13 March 2021

" गलतफहमी"

             " गलत फहमी " 

                             मैं भी इस बीमारी का थोडा  बहुत शिकार हूं, लिस्ट में ऐसे मित्र बहुत हैं जिन्हें गम नहीं गलत फहमी ने मारा हुआ है। चचा बकलोल कहते हैं कि उन्हे इश्क से ज़्यादा गलतफहमी ने डुबोया है ! ये मुआ इंफेक्शन किसी भी उम्र में हो सकता है ! इसका कोई इलाज़ भी नहीं है ! रोगी किसी कीमत पर ये मानता ही नहीं कि वो किसी घातक बीमारी का शिकार है । गलत फहमी को वो सच मान कर जीने लगता है ! ऐसे दुर्लभ महापुरुषों से दुनिया का गुल्लक भरा हुआ है ।
       गांव में हमारे एक मित्र हुआ करते थे ! ग्रेजुएशन के बाद अचानक उन्हें ये गलत फहमी हो गई कि उनके चेहरे में काऊ ब्वॉय वाली खासियत है , और हर लड़की उन पर प्रथम दृष्टया आशिक हो सकती है ! ( हालांकि इस गलत फहमी से पहले उन पर ललिता पवार जैसी महिलाओं ने भी ध्यान नहीं दिया था !) इस घातक बीमारी की चपेट में आते ही वो गोपियों की तलाश में निकल पड़े ! जब तक घर वाले बीमारी सूंघ पाते, पुत्र रत्न ने कई लड़कियों को छेड़ डाला ! दो एक ने लोक लाज के डर से इग्नोर किया तो कुछ ने घर तक पीछा किया ! घर वालों को जब बेटे के टैलेंट का पता चला तो मुंह पीट लिया ! वो शादी ढूंढने लगे, किंतु  'होनहार विरवान' को इतना धैर्य कहां, एक रात गांव में हंगामा हो गया, पता चला कि गांव के एक लाला जी की छत पर सोती उनकी युवा लड़की को जगाकर प्रणय निवेदन कर बैठे थे ! कच्ची नींद से उठी लडकी ने डर कर शोर मचाया तो निर्भीक प्रेमी भागा भी नहीं। मामला सजातीय था, दोनों परिवारों ने असहमत होते हुए भी उनकी  शादी  पर सहमति जताई और इस तरह मित्र की गलत फहमी पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया !
       लेकिन गृहस्थ जीवन के बीस साल बाद एक बार फिर उन्हे गलतफहमी ने धर दबोचा ! हालांकि तब उनकी उम्र पैंतालिस साल हो चुकी थी, पर इससे गलत फहमी पर क्या फ़र्क पड़ने वाला था। इस बार की  गलतफहमी बिलकुल मुख्तलिफ किस्म की थी ! अबकी बारी उन्हें लेखक होने की गलत फहमी हो गई । ये पहले के मुकाबले ज्यादा घातक बीमारी थी,- लगभग असाध्य किस्म का रोग था जिसका दूर दूर तक कोई हकीम या वैद्य नहीं था ! जब तक घर वाले भांप पाते , उन्होंने दो सौ अस्सी पेज का एक उपन्यास लिख डाला ! घर में परचून की दूकान थी, पत्नी सोचती थी कि हर वक्त बही खाता लिखते हैं, लेकिन जब पता चला तो मुंह पीट लिया ! उधर मित्र की प्रॉब्लम थी उपन्यास के श्रोता नहीं मिल रहे थे ! हार कर उन्होंने दूकान पर आने वाले गांव के
ग्राहकों को पाठक बनाया । सोंठ के ग्राहक को साहित्य की ओर खींचने में श्रोता उधार मांगने लगे ! नवोदित लेखक मगन थे और दुकान अवसाद ग्रस्त ! दोनों को बचाने के लिए पत्नी ने एक दिन उस "दुर्लभ" पांडुलिपि को आग के हवाले कर दिया !
        साहित्यकारों में गलत फहमी की बीमारी आम है ! बेशक कंधे से अपना एक सर न संभल रहा हो , पर इस लंका में सब अपने आप को "दशानन" समझते हैं ! कुछ साहित्यकार बेतरतीब दाढ़ी मूछों में  लपेट कर  खुद को ऐसे परोसते हैं गोया साहित्य का सारा डैमेज कंट्रोल संभालने में खुद को संभालने का भी होश नहीं रहा ! बिलकुल ताज़ा ताज़ा साहित्य में लैंड हुए लेखक को हर ऐरू गैरू को सलामी ठोकना होता है ! अगर छोटा साहित्यकार बडे़ को सलाम करता है तो सामने वाला फर्जी बड़प्पन ओढ़ने के चक्कर में मुंह की जगह सर हिलाकर जवाब देता है । बड़ा साहित्यकार होने की गलतफहमी , अंडे के बाहरी खोल की तरह होती है जिसके टूटते ही इमेज बिखर जाती है। गलत फहमी का शिकार कथित बड़ा साहित्यकार  व्हाट्स ऐप ग्रुप ज़रूर बनाता है , ताकि अपने जैसे और " विद्वानों" का समर्थन जुटा सके ! इन्हे अपने से इतर कहीं टैलेंट नज़र नहीं आता ! वो बेशक सोशल मीडिया या अपनी मैगजीन के अलावा कहीं न छपें, पर नामचीन लेखको से भी डींग मार लेते हैं, - " मैने कभी आपको पढ़ा नहीं!"
     कुछ लोग इतने विलक्षण होते हैं कि गलतफहमी मे ही जी लेते हैं ! कुछ को सच के प्रति गलत फहमी होती है तो कुछ गलत फहमी को ही सच मान लेते हैं ! एक युवक मेरा बड़ा करीबी है, उसे ये गलत फहमी दिन में बार बार होती है कि उसके हाथ पैर गंदे हो गए हैं ! वो हर वक्त पानी की तलाश में रहते हैं और दिन भर में पचासों बार हाथ पैर धोते हैं ! कई बार तो वो हाथ पैर धो कर घर से बाहर आए और  तुरंत घर में घुस कर हाथ पैर धोने लगे ! शायद बाहर की हवा लगते ही उन्हें हाथ पैर गंदे हो जाने की गलत फहमी हो गई थी ! इस मानसिक प्रदूषण ने आज भी उन्हें कुंवारा बना रखा है।
          ये नामाकूल बीमारी मारती कम घसीटती ज्यादा है। दारू पीने के बाद कई महापुरुष गलत फहमी के शिकार हो जाते हैं। (वो कहानी तो सुनी होगी जब दारू के ड्रम में गिरा चूहा नशे मे आकर बिल्ली को ललकार रहा था!)  दारू अंदर - गलत फहमी बाहर ! ये दारू की ही महिमा है कि नशे में धुत प्राणी नदी और "नाली" में भेदभाव नहीं करता ! जो आसानी से सुलभ हो उसी में कूद पड़ता है ! नशा और गलती फहमी एक ही प्रजाति की दो बीमारी है, और दोनों की सदगति नाली अथवा गाली है !

             गलत फहमी कालांतर में कल्पना को जन्म देती है और कर्म विहीन कल्पना इंसान को नाकारा बना देती है ! गलत फहमी और स्वर्णिम कल्पना के संसार में उड़ता हुआ प्राणी आखिरकार एक दिन खुद को हकीकत की नाली में ही गिरा हुआ पाता है ! कर्मविहीन सुखद कल्पना हो या गलत फहमी, अंतत: बहुत तकलीफ़ देती हैं ! कि मैं कोई झूठ बोल्या,,,,?

             (सुलतान भारती )