Sunday, 10 January 2021

(लघु कथा) "सितारों की बस्ती '

            आज भी तो कुछ नहीं बदला था ! सरकारी अस्पताल की वही चीख पुकार , वार्ड ब्वाय की वही बदतमीजी ! ट्राली और स्ट्रेचर खींचने की वही इरीटेट करती आवाज ! छत पर ख़ामोश घूरते पंखे की ओट में छुपी वही छिपकिली ! पिछले तीन महीनों में कुछ भी नहीं बदला था ! इसी बीच कई मरीज़ लाश बान कर अस्पताल से जा चुके थे I उसे मरने से नहीं बल्कि इस छिपकली से डर लगता था।।अब तो उसे ऐसा लगता था गोया छिपकली पूरे वार्ड में सिर्फ़ उसे ही घूरती है !जाने वो खाना खाने कब निकलती थी! कुछ दिनों से तो उसे ऐसा महसूस होने लगा था कि छिपकली उसे बड़ी खामोशी से धमकाने भी लगी है ! पिछली रात उसे  अहसास हुआ जैसे छिपकली कह रही हो, ' अब तेरी बारी है, तू बस अब मरने वाला है-'  करवट बदलता वो पूरी रात बेचैन रहा !
 नशे की लत छुड़वाने के लिए उसे एक नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया गया था , जो अब खुद एक यातना शिविर लगने लगा था! वो उस दिन को कोस रहा था जब दोस्तों की महफल  में बैठ कर उसने ड्रग्स को गले लगाया था ! यहां पर इलाज़ सरकारी वित्तीय सहायता को निगलने कि खानापूरी भर थी ! लगातार बिजली के झटके ने उसकी सेहत खत्म कर दी थी ! नशे के अभाव में नींद नहीं आती थी !अट्ठाइस साल की उमर मे ही उसके चेहरे का तिलिस्म उड़ गया था ! छिपकली से आतंकित होकर उसने तय कर लिया था कि वो हर कीमत पर अस्पताल से बाहर ही मरेगा - अंदर नहीं ! उसे छिपकली को बताना था कि - देख मै ज़िंदा वापस जा रहा हूं -! 
     और फ़िर,,,  रात के चार बजे वो निकल भागा ! बदन के कपड़ों के अलावा उसके पास कुछ नहीं था ! शहर सो चुका था मगर सड़कें जाग रही थीं ! नो एंट्री पीरियड में बेलगाम  भारी वाहन सड़कों को रौंदते हुए चल रहे थे ! सड़क पर पहुंच कर उड़ने खूब खींच कर फेफडों में हवा जमा किया ! फेफड़े तंदुरुस्त और मजबूत लगे !. ऐसा महसूस करते ही उसके जीने की इच्छा जाग उठीं ! ये आज़ादी की हवा थी ! वो जल्द से जल्द घर पहुंच कर अपनी मां और छोटी बहन को चौंका देना चाहता था। वो कल्पना कर रहा था कि उसे सामने देख कर मां क्या कहेगी , -' अरे पूजा ! देख कौन आया-  मेरा बेटा  अरविंद !!' 
                                दूर रेड लाइट  नजर आई तो उसने जल्दी से सड़क पार करना चाहा ! अचानक रोंग साइड से आता हुआ भीमकाय ट्रक बगल नमूदार हुआ ! उसने जल्दी से वापस मुड़ने की कोशिश की मगर कमज़रील या किस्मत - लड़खड़ाकर गिर गया ! बजरी से लदे ट्रक के एक तरफ के पहिए उसके सीने और पेट से गुज़र गए ! अचानक उसे लगा जैसे मां और बहन के चेहरे इसके ऊपर झुके हुए हैं ! डूबती हुई चेतना को झकझोर कर उसने हाथ उठाने की कोशिश की, मगर सड़क से चिपका हाथ निकला ही नहीं ! वो धीरे धीरे बुदबुदा रहा था , ' देखा! मैने कहा था ना -मै वहां नहीं मरूंगा -'!
       
   फिर अचानक जैसे शहर अंधेरे में डूब गया !

     सुलतान भारती
I- block 12/ 1083 Sangam vihar South Delhi 220080

Saturday, 9 January 2021

लघु कथा - ' टूटती लकीरें '

        मटियामहल से फराशखाने तक आने मे उसे महसूस हो गया कि अंदर कुछ दरक सा गया है । पल पल ऐसा महसूस हो रहा था कि इसके रिक्शे पर दो सवारियां नहीं बल्कि पहाड़ रख दिया गया हो !  रिक्शे पर बैठी वो एक युवा मां थी जो अपने तीन साल के बेटे को बार बार ये ताकीद कर रही थी ,-'  मामू के घर में किसी बच्चे से मार पीट मत करना' ! बच्चा बहुत ही शैतान था और बड़ी मुश्किल से मां उसे संभाल रही थी ! जामा मस्जिद के दक्षिणी गेट से बाईं तरफ मुड़ते ही बच्चे की नज़र बकरों पर पड़ी और वो उन्हें भी लेने की ज़िद करने लगा, - ' वो सफ़ेद वाला चाहिए -'!  बड़ी मुश्किल से मां ने उसे रिक्शे से बाहर कूदने से रोका था !
     थोड़ी देर के लिए समरू  अपना दुख दर्द भूल गया ! उस बच्चे की आवाज़ में अब एक नए चेहरे का अक्स उभर रहा था ,- सोनू ! उसका अपना बेटा सुरेंद्र ! अब तो जवान हो रहा होगा ! ग़रीबी और ग्रामीण राजनीति ने उसका परिवार बर्बाद कर दिया था। सरपंच के विरोध में खड़ा होने का खामियाजा ऐसा भयानक था कि पुश्तैनी तीन बीघे जमीन वकील खा गए और जब फर्जी केस की सजा काट कर समर बहादुर उर्फ समरू  जब जेल से बाहर आया तो किसान से मजदूर हो चुका था ! पत्नी अपने छे साल के बेटे सुरेंद्र के साथ मायके चली गई थी ! खेत और परिवार के बगैर समरू को पूरा गांव अजनबी सा लगा ! तीन चार दिन वो अपने खेतों को देख देख कर रोता रहा और एक दिन घर को खुला छोड़ कर गांव से निकल गया ! एक धुंधला सपना था कि दिल्ली शहर में पैसे कमाकर अपने टूटे ख्वाबों में दोबारा रोशनी जगाएगा ! और,,, अब आठ साल से वो रिक्शा चला रहा था ! सपनों में रंग तो नहीं आए, अलबत्ता उसके जिस्म और ज़िंदगी मे बेवक्त शाम उतरने लगी !
                         अचानक तेज आवाज़ आईं और वो अतीत से उछल कर वर्तमान में आ गया ! लड़की चीख रही थी, ' बहरे हो गए हो अंकल ! कब से चिल्ला रही हूं कि रिक्शा रोक दो , सुनते ही नहीं !' समरू अपराध बोध से दब गया था ! उसने रिक्शा रोका ! युवती अपने बेटे के साथ नीचे उतरी, पर्स खोला और पांच सौ का एक नोट निकाल कर समारू को पकड़ाया ! समरु ने धीरे से कहा , -' छुट्टा नहीं है बेटी !'
       " कोई बात नहीं अंकल ! रख लो ! खाना खा लेना और अपने बच्चों के लिए कुछ ले लेना !".
        समरु को लगा कि जैसे सूरज की तपिश में अचानक चांदनी घोल दी गई है ! वो रिक्शा लेकर वापस लौट पड़ा ! हर पल उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे काफ़ी लोग इसका पीछा कर रहे हैं और हज़ारों नज़रे उसकी जेब पर लगीं हो ! चांदनी चौक की ओर लौटते हुए उसके तमाम ख्वाब फिर ज़िंदा हो गए ! बेटे के लिए एक सूट कपड़ा खरीदना था, बीबी के लिए बनारसी साड़ी ना सही, दो तीन सौ वाली साड़ी तो लेना ही था ! एक खेत हो जाता तो  मैं खेती करता और हमारी बीबी खेत पर खाना लेकर आती ! अंकुरित ख्वाब कद्दावर हो  रहे थे और पांच सौ का नोट  बौना होता जा रहा था ! 
         अचानक रिक्शा रुक गया , सामने दारू का ठेका था ! वो यंत्रचलित सा काउंटर पर पहुंच कर बोला, ' एक एयरिस्टोक्रेट की पूरी बोतल !' पंद्रह मिनट बाद वो कौड़ियां पुल के सार्वजनिक शौचालय के पास नशे में धुत बडबडा रहा था, ' आओ सब मुझे मार कर खा जाओ- तुम क्या मारोगे ! मैं  तो कब का मर गया हूं ! क्या करूं इस आंधी में मेरा एक भी तिनका रुकता ही नहीं है ! सब उड़ गया,,,,! ' बेटा पत्नी खेत ख्वाब और गाँव सारी तस्वीरें धुंधली होती चली गईं 
     और,,, फिर उसी फुटपाथ पर उसके खर्राटे गूंजने लगे ! अब ट्रेफिक का कोई शोर उस तक नहीं पहुंच रहा था!
         सारी चिंता की लकीरें टूट गईं थीं !

            ( सुलतान भारती)

Wednesday, 6 January 2021

"फिर भी,,,,, हैप्पी न्यू ईयर !!"

        आज मैं जो भी कहूंगा सच कहूंगा - सच के अलावा ( मौक़ा मिला तो....) काफ़ी सारा झूठ भी बोलूंगा ! क्योंकि पिछले साल ( २०२०) की चरित्रहीनता से काफ़ी प्रभावित हुआ हूं ! पूरे साल ऐसे ऐसे झूठों से वास्ता पड़ा कि अपने सच पर शर्मिंदा होता रहा ! अब जब कि झूठ के मुआमले में मै काफ़ी आत्मनिर्भर हो चुका हूं तो गरीबी रेखा पर खड़ा मेरा ज़मीर आगबबूला है ! होने दो, कुपोषित आशाओं की गठरी लेकर अपने सूर्यास्त में सबेरा तलाशने दो उसे । मैंने देर से झूठ को पहचाना, पर कोई बात नहीं- देर आयद दुरुस्त आयद ! अब मुझे पूरी उम्मीद है कि कोरॉना, कंगाली, बेकारी, बदहाली , साम्प्रदायिकता के बाबजूद साल 2021 पूरे फॉर्म में हैप्पी होने जा रहा है ! ( अपना हाथ पांव बचा कर चलना !) 
          दिसंबर जब भी आता है, व्यापारी और नेता बहुत खुश होते हैं ! जाने कैसे एक हफ्ता पहले ही इन्हें नए साल के  "हैप्पी"  होने का पता चल जाता है ! ३१ दिसंबर की रात में ही मोहल्ले से लेकर मेन मार्केट तक पोस्टर चिपक जाता है ! ( पोस्टर में नेता से ज़्यादा उसके चेले हैप्पी नज़र आते हैं !) मोहल्ले वाले जब एक जनवरी को घर से बाहर निकलते हैं तो हर तरफ नए साल के हैप्पी होने की तस्वीर टेखकर हैरान हो जाते हैं ! हमारे दिलजले पड़ोसी " वर्मा " जी की प्रतिक्रिया आप भी सुनें, - ' मैं अख़बार लेने घर से बाहर निकला तो ये देख कर हैरान था कि रातों रात साल ' हैप्पी ' हो चुका था !   हालांकि मुझे अभी भी नज़र नहीं आ रहा था ! मैंने अपने पड़ोसी ' बुद्धिलाल ' से पूछा , ' दिन के दस बज गए और तुम ऐसे नजर आ रहे हो , जैसे विजय माल्या तुम्हारा ही बैंक लेकर भागा हो ' !
     - बुद्धीलाल बोले, - ' एक उचक्का दूध की थैली छीन कर भाग गया '!
   " तो क्या हुआ ! साल तो हैप्पी हो गया ! मै तो देर तक सोता हूं इसलिए नहीं देख पाया , तुमने तो साल 2021 को हैप्पी होते देखा होगा ?"
     वो रुआंसे होकर बोले, ' मैंने सिर्फ इतना देखा की वो आया और थैली छीन कर भाग गया ! अब मुझे क्या पता कि कि ' हैप्पी होकर ऐसा करेगा '!
     अचानक वर्मा जी मुझ पर ही भड़क उठे , ' तुम पत्रकार लोगों की चार आंखे होती हैं ना ! मैने तो आज तक नए साल को कभी हैप्पी होते देखा नहीं, तुम्हें कैसे नज़र आ जाता है ! हर आने वाले साल को तुम पत्रकार लोग जनवरी में हैप्पी बता देते हो और फिर पूरे साल उसमें कोरोना निकालते रहते हो ! खबरदार जो मुझे नए साल की मुबारकबाद देने की कोशिश की "!
       क्रोध में वो दुर्वाशा ऋषि नज़र आने लगे थे, मै उनके सामने से हट गया ! वर्मा जी करैला ज़रूर हैं मगर हक बोलते हैं ! साल 2020के बारे में भी लोगों ने हैप्पी न्यू ईयर कहा था ! फावड़ा लेकर भी यादों का मलबा हटाऊं तो भी कहीं दस ग्राम "हैप्पी" नहीं मिलेगा ! पूरा साल दुखीराम के नाम रहा! लोग ट्रंप के लाए तोहफ़े को संभालते रहे ! एक तरफ कोरोना - दूसरी तरफ आत्मनिर्भरता !! ( गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,,,) जनता नौकरी ढूंढ़ रही थी और डॉक्टर किडनी ! हर किसी को अर्थव्यवस्था मजबूत करने की जल्दी थी ! ज्यादा जागरूक लोग देसी दारू के ठेकों पर लाइन लगा कर खड़े थे ! अर्थव्यवस्था के लिए हर जोख़िम उठाया जा रहा था ! सोशल डिस्टेंस देखते तो अर्थव्यवस्था मज़बूत होने की जगह ग़रीबी रेखा के नीचे चली जाती!
       इस बार २०२१ में मैने सिर्फ उन्हीं चंद लोगों को हैप्पी न्यू ईयर कहा है , जिनसे बदला लेना है ! अब मेरे समझ में आ गया है कि ऐसा कहकर लोग अपना शनि उतारते हैं ! ऐसे लोगों को कमी नहीं जो अपना बही खाता देख कर आश्वस्त हैं कि उनकी शुभकामनाएं किसी बददुआ से कम नहीं है ! पहली जनवरी को वो पुरी चैतन्यता से लिस्ट बना कर अपने विरोधी और खाते पीते पड़ोसियों को नींद से जगा कर हैप्पी न्यू ईयर की शुभकामना दे देते हैं ! ( वो दोहा तो सुना ही होगा - तोकों फूल के फूल हैं - वाको है " त्रिशूल"!) साल के पहले सप्ताह में ही जिसे इतने त्रिशूल भेंट किए गए हों, उसकी किस्मत में  कोरोना नहीं तो क्या होगा !
                      वैसे,,,,साल 2020 बडा़ क्रांतिकारी रहा ! शर्म, हया और लाज लिहाज से जिनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं था,वो भी मुंह ढक कर निकलने लगे ! फेस मास्क को ख़्वाब में भी ना देखने वाले इसी को संजीवनी बूटी समझने लगे ! सोशल मीडिया पर इसके समर्थन और विरोध में हजारों चारण दिन रात ज्ञान की गंगा बहा रहे थे !  चालान के डर से लाखों लोगों को इसी से कोरोना रुकता नज़र आ रहा था , तो विपक्षी चारण दावा कर रहे थे, -' फेस मास्क का माइक्रो छेद भी कोरोना के साइज से दस गुना बड़ा है ! अगर कोरोना चाहे तो अपनी फेमिली के साथ फेस मास्क से घुस कर आपके मुंह में कॉलोनी बना सकता है ! ' सोशल डिस्टेंस की अनिवार्यता के चलते कवि साहित्यकार मंच से बेदखल होकर साहित्य सृजन में पिले पड़े थे ! श्रोता चैन से सो रहे थे और बीबियों की नींद हराम थी ! नौकरी गवां चुके कई असाहित्यिक प्राणियों ने करुण रस में लिखना सीख लिया था, - ' दुनियां बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई ! तूने काहे को पत्नी बनाई '!
      नए साल में  चार दिन बाद मै अपने दोस्त ' चौधरी ' 
से मिला ! विगत कई वर्षों से हमने ये नियम बना लिया था कि एक जनवरी को कोई किसी को हैप्पी न्यू ईयर का अभिशाप नहीं देगा ! मैने देखा कि चौधरी भैंसों का दूध दुह कर अख़बार देख रहा था ! मुझे देखते ही उसने गुस्से में पूछा, -.' इब कूण सा कीड़ा लिकड़ आयो मुर्गे में ?'
  ' वही, जो तीन साल पहले आया था जब मुर्गा और आलू एक भाव में बिके थे - बर्ड फ्लू '!
     " तू इतै कैसे आया ?"
   ' सोचा चार दिन बाद शनि उतर गया होगा, चलो हैप्पी न्यू ईयर कह दूं '!
     " भैंसन कौ चारा घणा महंगा हो गया , मैने भी दूध दस रुपए किलो बढ़ा दिया "!
        " किसान के खाते में सरकार बराबर पैसे ड़ाल रही है ! और तुम दूध महंगा कर रहे हो ! एक बार भैंसों से पूछ तो लेते ?"
      " मन्ने पूछा हा, नू बोली- अक - बेशक मेरे दूध कू नाले में गेर दे, पर कदी लेखक कू उधार मत नै दे"!
        " नया साल में एक और कीड़ा आ रहा है, इंगलैंड से ! अल्ला जाने क्या होगा आगे !"
       " थारे गैल रहूंगा तो सुखी कैसे रह सकूं ! साड दो हजार बीस ने आधा खून पी लई , इब बचा हुआ खून नया कीड़ा खावेगो ! कोरोना तो लिकड़ा भी ना इबे घर ते ! नू बता, सबै कीड़े म्हारे देश में क्यूं आ जावें , इनके देश में घणी बेकारी है - के ?"
           " नहीं, दरअसल हम अतिथि को देवता समझते हैं ! इसलिए हर विदेशी बीमारी नाक उठाए आ जाती है, और हम उसे अतिथि समझ कर कह देते हैं - आ गले लग जा - ! क्या करें - दिल है कि मानता नहीं -"!

       तब से चौधरी मुझे घूर रहा है !

Tuesday, 29 December 2020

" दे दे प्यार दे !"

                            "दे दे प्यार दे  "  

 अब इस वक्त जब कि दिन के ग्यारह बज रहे हैं , मै पूरी निर्भीकता से चादर ओढ़ कर लेटा हूं ! बगल वाले घर   से टीवी पर गाने की आवाज़ सुनाई पड़ रही है ,  - दे दे 
प्यार दे प्यार दे प्यार दे दे ! मुझे प्यार दे- !! वक्त के साथ साथ इजहारे इश्क का तरीका किस कदर जामे से बाहर हुआ है ! ये भी कोई तमीज है, - दे दे यार दे ! प्यार दे - प्यार दे दे -! सुनकर ऐसा लगता है गोया आशिक अपना गिरवी माल छुड़ाने आया हो ! पहले इजहारे इश्क का एक सलीका हुआ करता था,  ' तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं -' ! ज़माने ने इश्क पर कितना घातक असर डाला है, आशिक का इजहारे इश्क भी  राहजनी जैसा लगता है, - ' दे दे प्यार दे ! प्यार दे प्यार दे दे - मुझे प्यार दे ' ! (जितना है सब तिज़ोरी से निकाल दे !) इसे कहते हैं दिनदहाड़े इश्क की तहबाजारी ! प्यार और व्यापार के बीच की दूरी सिमट रही है !
        टीवी बंद हो चुकी है, मगर आवाज़ अभी भी सुनाई पड़ रही है, - दे दे प्यार दे-!  घर का युवा भविष्य अब इजहारे इश्क के लिए बाल्कनी में खड़ा है !  मै हैरान था , दुनियां कोरोना की वैक्सीन मांग रही है और वो प्यार की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहा था ! लौंडे पर लैला मजनू का बसंत देख मैं सोचने लगा,  ' शादी से पहले भला शादी के बाद का संकट क्यों नहीं नज़र आता '!  वैसे ये सवाल मैंने ' वर्मा ' जी से भी पूछा था ! उनका जवाब था , 'नज़र भी आ जाए तो लोग उसे नज़र का धोखा मान लेते हैं ! उदाहरण मेरे सामने खड़ा है ! जब तुझे इश्क का इन्फेक्शन हुआ था तो मैंने कितना समझाया था , कि इस दरिया ए आतिश में मत कूद - पर तू कहां माना था ! और फ़िर,,,,शादी के पांच साल बाद किस तरह  के .एल . सहगल की आवाज़ में मेरे सामने रोना रो रहा था, ' जल गया जल गया - मेरे दिल का जहां !' 
                                इश्क का साइड इफेक्ट देखिए ! लोग कहते हैं इश्क अंधा होता है !  मै नहीं मानता, लैला मजनू, रोमियो जूलियट,शिरीन फरहाद और हीर.रांझा  में कोई अंधा नहीं था ! सभी आँख वालों ने जान बूझकर चूल्हे में सर दिया ! हर आदमी इश्क नहीं कर सकता !  कुछ लोग इश्क करते हैं, कुछ लोग इश्क के तंदूर में गिर कर सिर्फ धुआं पैदा करते हैं !इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है ! जिसे इश्क का सलीका नहीं आता, वही इश्क की परिभाषा तय करता है !  वही तय करता है कि लौकिक और पारलौकिक इश्क में  किसके अंदर फिटकिरी कम है ! जो इश्क के मामले में बंजर होता है , वही इश्क में  'अद्वैतवाद ' खोजता है ! ऐसे लोगों ने साहित्य को बंजर बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है !  जिन्हें इश्क का शऊर नहीं था, उन्होंने    छायावाद और अद्वैतवाद की दिव्यता  में  लपेट कर इश्क को  पिरामिड की ममी बना दिया  !  कहीं तो इश्क को सबक सिखाना था !
                                                                                   तो,,,,इश्क क्या है? वो ज़माना गया जब इश्क भी
' इबादत '  हुआ करता था ! इस दौर में इश्क कमीना हो चुका है  - ' मुश्किल कर दे जीना - इश्क कमीना '!   (लगता है कि इश्क में  ऑक्सीजन कम और  कार्बन डाइ ऑक्साइड बढ़ गई है !) ऐसा शायद  उन महापुरुषों की वजह से हुआ है  जो वैलेंटाइन की मोमबत्ती जला कर ज़िंदगी में बसंत ढूंढते हैं !।इश्क के इंफेक्शन में आदमी निकम्मा हो जाता है, ऐसा मै नहीं चचा गालिब कहते हैं ,-
                          इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
                          वरना हम भी आदमी थे काम के"!!
  
               बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे ! कॉरोना ने इश्क को भी संक्रमित कर दिया ! इस दौर मे आकर  इश्क  ' नमाज़ी ' से इश्क ' जेहादी ' हो गया ! ये अब तक का सबसे बड़ा हृदय परिवर्तन था ! लव सीधे जेहाद हो चुका है ! अब  पुलिस बाकायदा इश्क का धर्म , राशन कार्ड और आधार कार्ड  चेक करेगी !  ऐसे मामले में पुलिस ईश्वर का भी दख़ल बर्दाश्त नहीं करेगी  ! उधर,,,, इश्क गहरे सदमे में है ! वो जेहादी हो गया और खुद उसे भनक तक ना लगी ! ये सब इतनी जल्दी में हुआ कि इश्क को संभलने का भी मौक़ा नहीं मिला ! अब उसके सामने चेतावनी है कि -' चलाओ न नज़रों से बाण  रे। -'! (वरना रोज  थाने  का चक्कर काटना पड़ेगा !)
          लगता ' मां का लाडला बिगड़ गया '  है ! बाल्कनी से फिर लौंडे के गाने की आवाज़ आ रही है, " दे दे प्यार दे "! इस बार उसकी आवाज में रोब नहीं याचना है ! जैसे वो इश्क नहीं गेहूं मांग रहा हो ! ( वैसे इस हालात ए हाजरा में इश्क के मुक़ाबले गेहूं ज़्यादा महफूज़ है ! इश्क को तो पुलिस और पब्लिक दोनों पीट रही है !  मैं एक व्यंग्य लिखने की सोच रहा हूं और उधर देश का भविष्य प्यार का कटोरा उठाए याचना कर रहा है ! हम यूपी वाले ऐसे  इश्क का धुआं देख लें तो खांसने लगते हैं ! मैं फ़ौरन उठकर बाल्कनी में आ गया ! छिछोरा आशिक टॉप फ्लोर की ओर देख कर गाने लगा, ' हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे ! मरने वाला कोई - जिंदगी चाहता हो जैसे '! उस फ़्लैट की खिड़की अभी भी बंद है  पर लौंडा डटा है !आशिक और भिखारी दोनों के धंधे में धैर्य ज़रूरी है !
       सतयुग को देखते हुए मुझे पूरा यकीन है कि - अभी
इश्क के इम्तेहान और भी हैं - ' ! इश्क का दिल से बडा गहरा रिश्ता होता है ! और,,,,दिल हैं कि मानता नहीं ! तो,,, नतीज़ा ये निकला कि सारा किया धरा दिल का है , इश्क खाम खा बदनाम है ! दिल तेरा दीवाना है सनम ! दिल खुराफाती है और इश्क मासूम ! सदियों से  कौआ  वेचारा कोयल के बच्चे पालता आया है ,  और दुनियां की नज़र में ' वो ' कोयल आज भी मासूम है जो बडे़ शातिराना तरीके से अपने अंडे कौए के घोसले में रख देती है ! इश्क के इस अवसर वादिता पर एक ताज़ा शेर पेश करता हूं ! -

कितनी लगन से फूल की दरियां बिछाई थीं !
कमबख्त  मौक़ा  पाते  ही  कुत्ते पसर  गए !!

                     ( सुलतान ' भारती ')

Thursday, 24 December 2020

रमेश बिधूड़ी ( एक सांसद ऐसा भी )

         एक  "सांसद"  ऐसा  भी
              ( रमेश बिधूड़ी )
 
 मैं उन्हें बहुत नज़दीक से जानता हूं ! उनके प्रशंसक और विरोधियों के संतुलन को देखूं तो समर्थक और प्रशंसक ज़्यादा नज़र आते हैं। वैसे विरोधी और आलोचकों की भी कोई कमी नहीं है ! उनके निवास पर जन समस्याओं को लेकर आने वाली भीड़ २००३ के मुकाबले आज 2023 में कई गुना ज़्यादा बढ़ गई है ! लोगों की ये भीड़ ही रमेश बिधूड़ी की बढ़ती लोकप्रियता की खुली गवाही देती है ! रमेश जी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें मैंने तब से लोगों की जन समस्याओं के लिए स्थानीय प्रशासन से जूझते देखा है, जब वो विधायक भी नहीं थे ! आज वह सांसद हैं ! तो,,, ज़ाहिर है कि उनकी जिम्मेदारियों का कद बहुत बढ़ गया है ! लोगों की ये भीड़ ही रमेश बिधूड़ी की बढ़ती लोकप्रियता की खुली गवाही देती है  !चलिए मैं अपने पाठकों को रमेश बिधूड़ी के कठोर संघर्ष, विकट साहस,जन सेवा , और सतत संघर्ष की उस कहानी से रूबरू कराता हूं, जिसके बारे में एक शेर कहा जा सकता है -

जिस्म  छिल जाता है पहचान नई पाने में !
कौन आसानी से बनता है मील का पत्थर !!
                   यादों का एलबम                             रमेश बिधूड़ी का जन्म 18 जुलाई 1961 को दिल्ली के ऐतिहासिक गांव तुगलकाबाद में हुआ ! पिता रामरिख बिधूड़ी की सामाजिक कार्यों में बड़ी सक्रीय भूमिका का प्रभाव बालक रमेश पर भी पड़ा ! प्रारंभिक शिक्षा कालका जी स्थित स्कूल से   शुरू हुई ! आगे चलकर उन्होंने दिल्ली के विख्यात भगत सिंह  कॉलेज से बी. कॉम किया। किसान बाहुल्य उस गांव में उस दौर में विरले ही कॉलेज तक पहुंचते थे ! साहसी, जोशीले और प्रखर वक्ता रमेश बिधूड़ी छात्र जीवन में ही सियासत में दाखिल हो गए ! लेकिन एक किसान के बेटे के लिए राजनीति का ये रास्ता आसान नहीं था ! बस,,,, इतनी सी पूंजी लेकर वो अपने ख्वाबों को सूरज दिखाने निकल पड़े !
        
       १९९३ के विधान सभा चुनाव को एक साल बचा था और संगम विहार में नए नए नेता अंकुर की तरह उग आए थे ! प्रदेश में कांग्रेस का दबदबा था, मगर मंदिर आंदोलन से सारा देश आंदोलित था ! अगले साल चुनाव हुआ और बाबरी विध्वंस का खामियाजा कोंग्रेस को भुगतना पड़ा ! दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी संगठित मुस्लिम वोटर्स ने कोंग्रेस को ज़बरदस्त झटका दिया ! संगम विहार की सीट पर भी कोंग्रेस को शिकस्त मिली , और दिल्ली में चार सीटें जनता दल के खाते में गईं ! ( जो बाद में कोंग्रेस के खेमें में शामिल हो गई !) इस त्रिकोणीय चुनावी मुकाबले में रमेश बिधूड़ी ने  जबरदस्त परफॉर्मेंस दिखाया पर भाजपा वोटों के बिखराव और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के चलते आज़ाद उम्मीदवार शीशपाल विजयी हुए !
          निराश होने की बजाय  उन्होंने अपने आप को दोबारा जनसेवा में झोंक दिया ! देश में बहुत कम ऐसे नेता होंगे जो जनता को रमेश बिधूड़ी जितना वक्त देते हैं! प्रदेश हाईकमान ने उनकी योग्यता और समर्पित सेवा के  आधार पर  १९९८ में उन्हें फिर संगम विहार सीट से दोबारा उतारा , मगर वो फ़िर हार गए  ! संगठित मुस्लिम वोटर्स  के मुकाबले में बिखरे हिन्दू वोटर्स को  को एक दिशा देना आसान काम नहीं था ! भाजपा कैडर और संगठन बनाने का मुश्किल काम करने में रमेश बिधूड़ी ने जबरदस्त मेहनत किया था  ! लगातार दूसरी हार आदमी को निराश कर देती है , मगर रमेश बिधूडी किसी और ही  मिट्टी के बने थे ! ऐसे जीवट के लोग अपनी शिकस्त को आने वाली जीत का नक्शा बना लेटे हैं , और ,,,,, दिल्ली ने वही देखा !! आखिरकार 2003 में उसी संगम विहार से  सारे पूर्वानुमान को ध्वस्त करते एवं सारे विरोधियों को धूल चटाते हुए हुए रमेश बिधूड़ी ने यह सीट भाजपा के खाते में डाल दी !      
                             हर राजनेता के सियासी रास्ते में कठिनाइयां  आती हैं, किंतु रमेश बिधूड़ी के रास्ते में कुछ ज़्यादा ही मुश्किलें खड़ी थीं ! ये शायद एकमात्र ऐसे विधायक थे जो अपनी विधान सभा के साथ साथ दुसरी विधान सभा की जनता की परेशानी भी सुनते, समझते और हल करते थे ! मै अक्सर किसी काम के बगैर भी (सुनपत हाउस) उनके निवास चला जाता था, सिर्फ उनकी कार्यप्रणाली देखने ! हमने हमेशा उन्हें समस्याग्रस्त लोगो से घिरा पाया था ! वो मुझे भीड़ मै भी देख कर पहचान लेते और एक ही बात कहते,." आओ भारती भाई " !.
      उनकी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा 2008 के दिल्ली विधान सभा चुनाव में तब पेश आई जब विधायक होने के बावजूद उन्हें पार्टी ने संगम विहार से टिकट न देकर तुगलकाबाद से प्रत्याशी बना दिया ! कोई भी प्रत्याशी होता तो लड़ने से पहले ही हार मान लेता । मगर रमेश बिधूड़ी को अपने निस्वार्थ भाव से की गई जन सेवा पर पूरा भरोसा था ! चुनाव परिणाम आया तो विरोधियों के सारे जोश पस्पा हो गए ! मिडिया के सारे पूर्वानुमान को ध्वस्त करते हुए रमेश बिधूड़ी ने भारी जीत हासिल की ! इस असंभव जीत को संभव बनाने के बाद प्रदेश में उनका कद काफ़ी बढ़ गया !
          "सांसद का कांटो भरा ताज" !
     २०१४.के लोक सभा चुनाव की जब तारीख़ घोषित हुई तो रमेश बिधूड़ी विधायक थे, मगर पार्टी हाईकमान ने उनके साहस,जुझारूपन, सूझबूझ, जनसेवा और सियासी पकड़ को देखते उन्हे दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया ! मोदी जी का जादू और रमेश बिधूड़ी की मेहनत सर चढ़ कर बोल रही थी ! रमेश बिधूड़ी भारी मतों से जीत कर संसद भवन पहुंचे ! भाजपा के प्रचंड बहुमत ने पूरे देश मे कांग्रेस की चूलें हिला दी थी , और संसद में एक दिशाहीन - नामनिहाद विपक्ष की तस्वीर नजर आने लगी ! पूरे देश में भाजपा  'कोंग्रेस मुक्त भारत ' के अभियान को गति और उर्जा देने लगी ।
           मै कभी कभी चला जाता था उनसे मिलने, पर कम ही जाना होता था ! सांसद बनने के बाद जनसेवा का भार काफ़ी बढ़ गया था । घर ( तुगलकाबाद) और सरकारी आवास ( लोदी इस्टेट) दोनों जगह लोग अपनी अपनी समस्या लेकर पहुंच रहे थे ! २०१६ में इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट में पत्रकारों से भरे हॉल में जब मेरी पहली किताब " राज दंश " का विमोचन हुआ तो अपने व्यस्त कार्यक्रम से वक्त निकाल कर रमेश बिधूड़ी जी मेरी हौसला अफजाई को वहां आए थे!
            अपने इस स्पष्टवादिता, सत्यवादित, साहस और  जनसेवा से जहां उनका जनाधार बढ़ा है वहीं उनके बहुत सारे विरोधी और दुश्मन भी पैदा हो है गए हैं !  खासकर स्थानीय प्रशासन के वो भ्रष्ट अधिकारी जिन्हें अब बगैर रिश्वत के काम करना पड़ रहा है ! रमेश बिधूड़ी के जनता दरबार में कोई शख्स ये शिकायत नहीं कर सकता कि उसकी शिक़ायत सुनी नहीं गई ! वो ना केवल सुनते हैं बल्कि तुरंत संबंधित अधिकारी को फोन कर के सख़्त लेहजे में समाधान करने का निर्देश भी देते है ! इस भाग दौड़ और असाधारण व्यस्तता का असर रमेश जी की सेहत पर भी पड़ा है ! (  आम दिनों में भी वो चार घंटे से ऊपर नहीं सोते हैं !)
                  विगत १९ दिसंबर २०२० को  कई महीने के अंतराल पर हमारी मुलाक़ात हुई ! हमेशा की तरह उनके पुश्तैनी घर सुनपत निवास का मीटिंग कक्ष भरा हुआ था ! मुझे देखते ही वह मुस्कराकर बोले, " ओ हो !
सुलतान द ग्रेट ! " बस,,,,वो अपने काम में लग गए , और मै उनकी जन सेवा का तरीका देखने लगा ! वहां पर आए लोगों में किसी का घर बनते बनते रोक दिया गया था , किसी को पड़ोसी तंग कर रहा था , तो,,, किसी को पेंशन योजना का लाभ लेना था !  एक बुज़ुर्ग का केस सबसे अलग था , उनके पूरे घर का सूख चैन नई बहू ने छीन लिया था !ये केस  पड़ोस के गोविंद पूरी क्षेत्र से आया था ! समस्या सुनकर सांसद भी हैरान थे ! ये जनता की चाहत का कद्दावर सबूत था, जो लोग उनसे अपनी पारिवारिक समस्या भी डिस्कस करलेते हैं! 
        अक्टूबर 2023 का पहला हफ्ता है! आज काफी दिन बाद मैं सुनपत निवास आया! 
           दिन के पौने ग्यारह बज चुके थे ! अभी ग्यारह बजे उन्हें दस किलो मीटर दूर जाकर  दूसरे ऑफिस में बैठ कर जन समस्याओं से रुबरू होना था ! दस बजकर पचास मिनट पर वो उठकर अपनी कार की ओर चल पड़े !  आज की जन पंचायत खत्म हो चुकी थी ! बीच में बसपा साँसद दानिश अली के साथ हुई बहस मे रमेश जी नाम सभी के ज़बान पर चढ़ गया! आज भी वो भारी भीड़ से घिरे लोगोँ की समस्या के निदान में लगे थे! आज तो भीड़ इतनी थी कि उन्हें घर से लगे पार्क में बैठना पड़ा था! बीच बीच मे लोग नारा लगा देते थे-     हमारा सांसद कैसा हो!
        " रमेश बिछुड़ी जैसा हो!!" 
    कई लोग मिठाई का डिब्बा लेकर आते हैं, रमेश जी तुरंत उपस्थित जनसमुदाय मे बंटवा देते हैं! सामने होने के बावजूद उनसे मिलने में घंटा भर लग गया  ! इस लोकप्रियता के पीछे उनका काम बोल रहा है ! उनके हर ऑफिस मे भीड़ का यही आलम है! आने वाले लोकसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली की ये सीट तीसरी बार रमेश बिछुड़ी को जीत का सेहरा पहनाने जा रही है !

               साढ़े ग्यारह हो चुके थे! मुलाकात कर मैं ऑफिस से निकला!अपनी बाइक पर सवार घर लौटते हुए सांसद रमेश बिधूड़ी के लिए  एक शेर बार बार मेरे ज़ेहन में आ रहा था , जो उन पर पूरी तरह फिट बैठता है ! ---

हज़ारों  साल  नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है!
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा !!

            सुलतान भारती
( प्रेमचंद साहित्य सम्मान से सम्मानित पत्रकार)


Sunday, 20 December 2020

" साहित्यिक पुरस्कार "

                              आजकल पालक से पेट्रोल तक की कीमत में आग लगी हुई है !कोरोना ने आटा से लेकर अर्थव्यवस्था तक का मुंडन कर डाला है , पर साहित्यकार की प्रतिभा में सूनामी ना रोक पाया ! रचनाओं की वेगमती धारा ने कोरोना को भी तबीयत से लपेटा ! मार्च 2020 से जून २०२० तक का समय संक्रमण और साहित्य से मालामाल होता रहा ! ( अनुकूल जलवायु पाकर कुछ अस्पताल " किडनी" में भी आत्मनिर्भर हो गए !) लॉक डॉउन में पत्नी का अत्याचार झेल रहे अधिकांश रचनाकर साहित्य में नई नई सुरंग खोदने लगे ! साहित्य सृजन से संपदा कम और समस्या ज़्यादा आती है ! (  लेखक के पड़ोसियों की आपबीती ! इसलिए सुरक्षावश कई लोग रचनाकार और कोरोना दोनो से सोशल डिस्टेन्स बना कर चलते हैं !)
         अमूमन साहित्यकार की दो प्रजातियां पाई जाती है !  एक झेला जा सकता है, दूसरा लाईलाज ! पहले किस्म का रचनाकार टैलेंट की जगह जुगाड को आधार बनाता है ! ये जुगाड़ू साहित्यकार अक्सर टैलेंट वाले साहित्यकार के हिस्से की साहित्यिक पंजीरी चट कर जाते हैं ! जुगाड़ू रचनाकार की  बगैर रीढ़ वाली रचनाएं भी आसानी से छप जाती हैं, समीक्षा भी अखबारों में आ जाती है और पुरस्कार की संस्तुति भी हो जाती है ! इसके बरक्स - प्रतिभाशाली साहित्यकार कलम, स्वाभिमान, और क्रोध से लबालब होता है ! वो अपने और ईश्वर के बीच में किसी तीसरे के अस्तित्व को बर्दाश्त ही नहीं करता  ( कोई कोई तो ईश्वर को भी बड़ी मुश्किल से पास आने देता p है !) 
       कुदरती साहित्यकार के मित्र बहुत सीमित होते हैं ! ( झेलने की सहिष्णुता सबमें नहीं होती !) शादी के बाद आजीवन बीबी दुखी ! जिस कॉलोनी में घर हो , वहां के पडोसी दुखी ! ( मंच से बेदखल कई रचनाकार श्रोता की घात में रहते हैं !)  ज़माना खराब है , नकली साहित्यकार का बाज़ार पर कब्ज़ा है !  "श्री जुगाड चंद" दुबई तक पहुंच गए और  "बुद्धि लाल" जी को अपने ही शहर के कवि सम्मेलन में नहीं बुलाया जाता ! नियति के इसी छायावाद से प्रतिभा कुंठित है और कवि क्रुद्ध ! गधे एक सुर में घोड़ों के निष्कासन की वकालत कर रहें हैं ! साहित्य में गधा युग का प्रयास जारी  है! कई सभ्रांत परिभाषाओं की खालपोशी तय है !
            हमें झूठी प्रशंसा की दीमक लग गई है ! कई बार आपके द्वारा की गई झूठी प्रशंसा को रचनाकार सच मान लेता है ! सोचिए ! अगर कोई रचनाकार गलती से साहित्य के दरिया ए आतिश में उतर आया है और उसकी दुखी आत्मा उसे घर वापसी की सलाह दे रही हो , और ऐसे में कोई दुश्मन उसकी बेजान रचना को "कालजयी" कह दे तो क्या होगा ! वो तो आक्रामक तरीके से साहित्य सृजन की शपथ ले लेगा ! ऐसे में रचना कालजयी हो न हो , रचनाकार के परिवार का  ' काल कवलित ' होना तय है ! कुछ लोगों को प्रशंसा करने का ऐसा रोग होता है कि उन्हें मौक़ा दिया जाये तो वो मक्खी में भी मिनरल्स और विटामिन ढूंढ लेंगे ! 
             हर लेखक का सपना होता है - पुरस्कार हासिल करना ! सबको सपना देखने की आज़ादी है ! लेकिन प्रॉपर चैनल से पुरस्कार पाना बहुत कठिन है ! अपने देश की एक विचित्र साहित्यिक रवायत है ! यहां साहित्यकार की उम्र पचास साल के बाद शुरू होती है ! दस किलो आर्टिकल्स लिखने के बाद लेखक " वरिष्ठ " होना शुरू होता है ! सत्तर साल का होते होते वो " विख्यात " मान लिया जाता है ! ( स्मरण रहे, ज़्यादातर मामलों में वरिष्ठ या विख्यात होने के लिए "टेलेंट" की बाध्यता नहीं है !) प्रतिभा के बावजूद हर रचनाकार साठ साल की उम्र में वरिष्ठ मान लिया जाये , इसकी भी कोई गारंटी नहीं ! ऐसा भी हो सकता है कि ' वरिष्ठ ' और ' विख्यात ' होने की  प्रतीक्षा में साहित्यकार सीधे  "वीरगति" को प्राप्त हो जाए ! ( वैसे मरने के बाद रचना कार को ज़्यादा सम्मान मिलता है ! विरोधी   भी कहते हैं, - " खुदा बख्शे ! बहुत सी खूबियां थीं मरने वाले में !)
                               मुझे याद है, जाने माने पत्रकार और " राष्ट्रीय विश्वास " अख़बार के कार्यकारी संपादक लतीफ़ किरमानी साहब ने आठ साल पहले यूपी के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार ' यश भारती ' के बारे में मुझसे कहा था , ' व्यंग्य विधा के स्थापित स्तंभकार हो !. इस बार अप्लाई करो ! तुम डिजर्व करते हो !' मै भी बहकावे में आ गया , सोचा  पुरस्कार का नाम    ' यश भारती ' और  मै  ' सुलतान भारती ' ! हो ना हो , इस पुरस्कार की प्रेरणा सरकार को मेरे ही नाम से मिली होगी ! अप्लाई करने के अगले ही दिन से अख़बार देखने लगा ! अगले महीने जब लिस्ट आईं तो आसमान से गिरा - पता चला कि '  अबहुं ना आए  बालमा सावन बीता जाए -' !  

                अब मैं ऐसी गलती नहीं करता ! क्योंकि,,,, पुरस्कार हासिल करने वाले ' पाइथागोरस  का प्रमेय ' कुछ कुछ समझ में आने लगा है !!

.... Sultan bharti

Saturday, 19 December 2020

" किसान आन्दोलन और ' इन्द्र ' का सिंहासन !

                       महाराज इन्द्र के सामने रंभा डांस कर रहीं थी और वो सोशल मीडिया पर नजर जमाए बैठे थे ! पिछले कई दिनों से उनका सिंहासन ६.५ के रिक्टर स्केल पर हिल रहा था ! फेसबुक से ही उन्हें सूचना मिली कि भूलोक में किसान आंदोलन शुरू हो गया है ! तब भी इन्द्र ने अपने रूटीन में कोई परिवर्तन नहीं किया था ! पंद्रह दिन बीतते बीतते आंदोलन खत्म होने की बजाय क्लाइमैक्स की ओर जाता नज़र आया ! अब इन्द्र का मन थोड़ा उचटने लगा था ! उनके मुंह लगे चारण और कैबिनेट के महारथी देवताओं ने लगातार जन समर्थन पा रहे आंदोलन के बारे में कभी वास्तु स्थिति की जानकारी नहीं दी ! इन्द्र लोक के ईमानदार मीडिया प्रभारी नारद जी अज्ञातवास पर थे , और  ' आईटी सेल ' के खैरात पर पल रहा मीडिया आंखो पर गांधारी पट्टी बांध कर फर्जी ब्रेकिंग न्यूज देने में लगा था !
           अचानक इन्द्र ने हाथ उठा कर रंभा को डांस रोकने का इशारा किया ! रंभा ने चैन की सांस ली, उसने घुटनों पर ऑर्थो ऑयल की मालिश करनी शुरू कर दी ! पैंतालिस मिनट से लगातार नाचने से कमबख्त घुटनें कत्थक करने लगे थे ! महाराजा इंद्र रिक्रिएशन हॉल से उठ कर कॉन्फ्रेंस हॉल की ओर चले गए ! उधर रंभा से दूसरी नर्तकी उर्वशी पूछ रही थी, " हिज हाईनेस का मन कत्थक में लगा नहीं !"
          ' हां, उनका मन कत्थक में नहीं किसान आंदोलन में लगा है बहन ! " 
     " चलो इसी बहाने अपनी कैजुअल लीव सैंक्शन हो जायेगी ! बहुत दिनों से कश्मीर जाना नहीं हुआ "!
       उधर,,,,, कॉन्फ्रेंस रूम में देवराज इन्द्र आईटी सेल के प्रमुख से पूछ रहे थे, " किसान आन्दोलन की लेटेस्ट पोजीशन क्या है भद्र "?
                  " बहुत आनंदमय खबर है, किसान घी में तर बतर मक्के दी रोटी और सरसों दा साग खा रहें हैं ! हमारा पूरा आईटी सेल आज वहीं छक कर आया है "!
      " तुम आंदोलन तोड़ने गए थे या रोटी तोड़ने ?"
" आपने ही कहा है कि उनके अन्दर घुस कर खबर लाओ ! आज कुछ ज़्यादा ही अंदर घुस गया था " !
        " अंदर की क्या खबर है?"
 " दुश्मन की सप्लाई लाइन बहुत मजबूत है। खाने पीने की कोई कमी नहीं है। बाईस दिन बाद भी उनकी तादाद घटने की जगह बढ़ रही है ! लेकिन,,,, किसान आंदोलन दो तीन दिन में खत्म हो जायेगा !"
     " वो कैसे ?"
" मुझे भी नहीं मालूम ! मगर आपने कहा था कि आकर  खुश खबरी बताना , मैंने वही बताया !"
     इंद्र ने घूर कर देखा , " लगता है कि तुमने राक्षस दल से सांठ गांठ कर ली है ! तुम्हारा कोरोना टेस्ट करवाना पड़ेगा ! जब बगैर सैलरी के छे महीने के लिए सरकारी अस्पताल में कोरेंटाइन रहोगे तो उम्मीद है कि मुझे किसी दधीचि के पास नहीं जाना पड़ेगा !   हड्डी और किडनी दोनो तुम्हीं से मिल जायेगी"!
     " त्राहिमाम ! त्राहिमाम !!" 
इंद्र देव ने  वायुदेव ' से पूछा , " नारद जी के बारे में कोई इनफॉरमेशन ? ' 
      " कदापि नहीं ! एक बार तो सोचा कि कहीं दुबारा " नारद मोह " का कांसेप्ट ना हो, मगर शादी से लेकर स्वयंवर तक छान डाला- कहीं मिले नहीं ! "
     " कहीं किसान आंदोलन की समर्थक मीडिया से तो नहीं मिल गए ? "
                          "  विपक्ष उन्हें इतना बड़ा पैकेज नहीं दे सकता देवराज ! ये तो हम हैं जो इतने सारेसफ़ेद हाथी पालते हैं ! " 
     देवराज ने आईटी सेल के मुखिया पर निशाना साधते
हुए कहा," हमारी मीडिया नाकारा लगती है ! कभी कभी तो मुझे लगता है कि वो मुझसे भी सच छुपाते हैं ! अग्नि देव आप क्या कहते हैं !"
     " मुझे भी कुछ ऐसा ही फील होता है ! भूलोक के इतिहास में पहली बार अन्नदाता किसान हमारे खिलाफ आंदोलन पर उतरा है !"
      " मगर हमारा आईटी सेल तो कहता है कि वहां किसान नहीं खालिस्तानी और पाकिस्तानी बैठे हैं !"
     " तो उन्हें बॉर्डर पर रोका क्यों नहीं ? देवराज ! आखिरकार इन तीन कानून को वापस लेने में क्या दिक्कत है ?"
       इंद्रदेव बड़बड़ाए, " तुम्हें कैसे समझाऊं - बडे़ नासमझ हो !" फिर ज़ोर से बोले - ' इस आग के पीछे विपक्ष की माचिस है! हमारे आईटी सेल का चरित्र देखो, सैलरी हमसे लेता है और मक्के दी रोटी सरसों दा साग सिंघू बॉर्डर पर खाता है ! इन्हें कोरोना की भी शरम नहीं है ! इसकी सजा मिलेगी - बराबर मिलेगी ! कितने आदमी हैं ?."
      " दो आदमी !" अग्नि देव बोले ,"  सिर्फ  दो  आदमी , जिनकी वजह से ये सारा "कोरोना" है !"  

      देवराज अभी भी धर्मसंकट  में है !