Tuesday, 15 December 2020

" भाग्य सौभाग्य और दुर्भाग्य"

        अचानक आज मुझे तुलसीदास जी की एक अर्धाली याद आ गयी , ' सकल पदारथ है जग माहीं - करमहीन नर पावत नाही -' !  (मुझे लगता है, ये कोरोना काल में नौकरी गवां चुके उन लोगों के बारे में कहा गया है जो इस सतयुग में भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए !) ये जो  'सकल पदारथ' है ना , ये किसी भी युग में शरीफ़ और सर्वहारा वर्ग को नहीं मिला ! सकल पदारथ पर हर दौर में नेताओं का कब्ज़ा रहा है ! इस पर कोई और चोंच मारे , तो नेता की सहिष्णुता ऑउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है ! अब देखिए ना, सैंतालीस साल से ऊपर तक कांग्रेसी ' सकल पदारथ ' की पंजीरी खाते रहे मगर मोदी जी को सात साल भी देने को राजी नहीं ! बस यहीं से भाग्य और दुर्भाग्य की एलओसी शुरु होती है ! हालात विपरीत हो तो दिनदहाड़े प्राणी रतौंधी का शिकार होकर दुर्भाग्य का गेट खोल लेता है - आ बैल मुझे मार !
            बुजुर्गों ने कहा है, - ' भाग्य ' बड़ा बलवान ! हो सकता है , मैंने तो देखा नहीं ! हमनें तो हमेशा ' दुर्भाग्य '
को ही बलवान पाया है ! कमबख्त दादा की जवानी में घर में घुसा और पोते के बुढ़ापे तक वहीं जाम में फंसा रहा ! जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आयी और गईं , मगर सौभाग्य  ' ग्राम प्रधान ' के घर से आगे बढ़ा ही नहीं ! मैंने चालीस साल पहले अपने गावं के राम गरीब का घर बगैर दरवाजे  के देखा था ! आज भी छत पर छप्पर है, सिर्फ टटिया की जगह लकड़ी का किवाड़ से गया है ! इकलौती बेटी रज्जो की शादी हो गई है। राम गरीब की विधवा और दुर्भाग्य आज भी साथ साथ रहते हैं ! उनकी ज़िंदगी में ना उज्ज्वला योजना आयी ना आवास योजना ! अलबत्ता सरकारें कई आयी ! सचमुच दुर्भाग्य ही दबंग है ! दलित, दुर्बल, और असहाय पीड़ित  को देखते ही दुर्भाग्य कहता है, हम बने तुम बने - इक दूजे के लिए '!
             भाग्य कभी कभी लॉटरी खेलता है ! ऐसे मौसम में प्राणी ' माझी ' से सीधे मुख्यमंत्री हो जाता है ! अब प्रदेश के सकल पदारथ उसी के हैं , बाकी सारे करम हीन छाती पीटें ! कभी कभी ठीक विपरीत घटित होता है। सकल पदारथ की पॉवर ऑफ अटॉर्नी लेकर विकास की जलेबी तल रहा प्राणी मुख्यमंत्री से लुढ़क कर सीधे ' कमलनाथ ' हो जाता है ! ये सब ' सकल पदारथ के लिए किया जाता है ! एक बार सकल पदार्थ हाथ आ जाए, फिर विधायक या सांसद के हृदय परिवर्तन का मुहूर्त आसान होता है ! "सकल पदारथ से युक्त सूटकेस" देखते ही काम क्रोध मद लोभ  में नहाई आत्मा सूटकेस में समा जाती है ! अगला चरण विकास का है ! जिन्होंने बिकने का "कर्म"  किया उन्हें सकल पदार्थ मिला ! जो "करम हीन" पार्टी से चिपके रहे , वो विपक्ष और  दुर्भाग्य के हत्थे चढ़े ! जाकी रही भावना जैसी,,,,,,!
           मुझे कहावतें बहुत कन्फ्यूज़ करती हैं! भाग्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में एक कहावत है, ' भाग्य में जो लिखा है वही मिलेगा '!! तो फिर इतनी हाय तौबा किसलिए ! भाग्य में सकल पदार्थ का पैकेज होगा तो डिलीवरी आयेगी ! फिर भला रूकी हुई " कृपा" के लिए काहे फावड़ा चलाएं ! और,,,अगर किस्मत में सौभाग्य है ही नहीं, तो  रजाई से बाहर क्यों  निकलें ! ( ऐश्वर्य,लोभ, प्रोग्रेस और परिश्रम से सोशल डिस्टेंस रखो - मोक्ष डिजिटल होता जायेगा !) 
           इसके बाद अगर  ' करम हीन ' कहा तो तुम्हारे दरवाजे का बल्ब तोड़ दूंगा !   ' कर्मवान'  और 'कर्महीन'  के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए , गीता में साफ साफ लिखा है, - जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान ! इलाके का विधायक अगर तुम्हें आठ आठ आंसू रुला रहा है तो इसमें विधायक का क्या दोष ! वोट देने का  "कर्म" किया है तो पांच साल तक "फल" खाओ ! विकास फंड का सकल पदार्थ उसी के हाथ में है ! तुम अपने आप को इस काम, क्रोध, मद लोभ से दूर रखो !

          वो ज़माना गया  जब "सकल पदारथ"  परिश्रम  का नतीजा हुआ करता था ! अब सुविधा, संपदा और सत्ता का सकल पदारथ अभिजात वर्ग को दे दिया गया है, और मेहनत और मजदूरी करने वालों को - रूखी सूखी खाय के ठंढा पानी पीव - की सात्विक सलाह दी जाती है ! धर्मराज की सलाह  है  कि आम आदमी को तामसी प्रवृत्ति वाले ' सकल पदारथ ' के नजदीक नहीं जाना चाहिए, वरना मरने के बाद स्वर्ग तक जाने वाला  "हाई वे"  कुहरे की चपेट में आ जाता है ! अब आम आदमी धर्म संकट में है! जीते जी 'सकल पदारथ' ले -  या मरने पर ' स्वर्ग ' ! ( गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,,, काके लागूं पाय !) आखिरकार  संस्कार उसे - रूखा सूखा खा कर - "स्वर्ग " में जाने की सलाह देता है !
                    देवताओं का कुछ भरोसा नहीं कि कब रूठ जाएं ! भाग्य का सौभाग्य में बदलना तो - बहुत कठिन है डगर पनघट की- !. मगर ' दुर्भाग्य ' बग़ैर प्रयास बेहद सुगमता से हासिल हो जाता है ! जब देखो तब आंगन में महुआ की तरह टपकने लगता है ! जिन्होंने साहित्य से गेहूं हासिल करने की ठानी, उसे दुर्भाग्य  ' वन प्लस वन' की स्कीम के साथ मिलता है। शादी के सात साल बाद ही मेरी बेगम को साहित्य और साहित्यकार की " महानता " का ज्ञान हो चुका था ! एक दिन उन्होंने मेरे इतिहास पर ही सवाल उठा दिया, ' मै वसीयत कर जाऊंगी कि मेरी सात पीढ़ी तक कोई साहित्यकार से शादी ना करे ' !  लक्ष्मी और सरस्वती के पुश्तैनी विरोध में खामखा लेखक पिसता है ! लक्ष्मी जी का वाहक उल्लू लक्ष्मी जी को लेखक की बस्ती से दूर रखता है !
                                    भाग्य और दुर्भाग्य के बीच में  ' सकल पदारथ ' की चाहत में खड़ा इंसान तोते वाले  ज्योतिषी के पास जाता है ! कोरोना का सम्मान करते हुए ज्योतिषि अपने तोते से कहता है , ' इस का भाग्यपत्र निकालो वत्स '!  तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, " कोई फ़ायदा नहीं ! इसकी फटेहाल जैकेट देख कर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं । बेकारी का शिकार है ! शनि इसके घर में रजाई ओढ़ कर सो गया है ! ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों खत्म है ! इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद ! " ज्योतिषी को पहली बार अपने कस्टमर दया आ आ यी , ' जा भाई , तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है ! तोते का पैर छू और - फकीरा चल चला चल' !   
           बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख ! जाने किस मूर्ख ने ये कहावत गढ़ी थी । मोती को कौन कहे, मिट्टी भी मांगने से नहीं मिलती ! रही सकल पदार्थ के लिए समुद्र मंथन की बात , तो यहां भाग्य चक्र प्रबल हो जाता है ! धर्मभीरू जनता घर का गेहूं बेचकर तीर्थ यात्रा पर जा रही है और  ' सेवकनाथ जी  '  नौ बैंकों का हरा हरा "सकल पदारथ" समेट कर विदेश यात्रा पर ! यही विधि का विधान है !

        कल मैने अपने मित्र चौधरी से पूछा , ' सौभाग्य और दुर्भाग्य को संक्षेप में समझा सकते हो ?' चौधरी कहने लगा -" बहुत आसान है ! तुम मुझसे उधार दूध ले जाते हो, ये तुम्हारा " सौभाग्य" है और मेरा "दुर्भाग्य" !!

    जाने क्यों - ये मुझे तुरंत समझ में आ गया !!

Saturday, 12 December 2020

" सोशल मीडिया के ' सदाचारी "!

                        अब क्या बताऊं मित्र ! सारी सारी रात मोहे नींद ना आए - जैसी सिचुएशन है । मेरे अनिद्रा रोग को लेकर आप भी भ्रम में हो सकते हैं ! न न न ! कैरेक्टर में इन्फेक्शन का मामला नहीं है ! अब इस उमर में ''मटुक नाथ ' होने का कौनो इरादा नहीं है भाई ! तो,,, काहे मुंह कोंहड़ा हो रहा है ! ऊ का है कि सोशल मीडिया पर रिश्तेदार बढ़ गए हैं ! ऐसे ऐसे आदर्श 'महामानव ' नज़र आ रहे हैं जिन्हें देखकर मेरा मनोबल एवरेस्ट से फिसल कर सीधे बंगाल की खाड़ी जा गिरा है ! माँ बाप की इतनी इज़्ज़त और सेवा करने वाले लोगों को अगर  'श्रवण कुमार' देख लें तो फ़ौरन हीनभावना के शिकार हो जाएं ! कितने चरित्रवान लोग फेस बुक पर 'नाईट वॉक' कर रहें हैं ! (मॉर्निग वॉक के समय ये बाप के जगाने पर भी नहीं उठते !)
             मैं 2015 में फेस बुक के गुरुकुल में दाख़िल हुआ था ,तब तक ज्ञान और संस्कार दोनो में नाबालिग था ! ( वैसे उम्र पचास की हो गई थी !) फेसबुक पर आते ही ज्ञान और आदर्श के एक से एक डायनोसोर खलीफा  से मुलाकात होने लगी ! मुझे पता नहीं था कि इस असार संसार में इतने विद्वान और उपदेशक आसन जमाए बैठे हैं ! सुबह होते ही फेस बुक पर रंगबिरंगी " गुड मॉर्निंग" नज़र आती ! (कई बार तो मै जवाब देने की मूर्खता भी कर जाता था़ !) उसके बाद सदाचार की शिक्षा शुरू होती , " मां"  की सेवा ही परमानंद है"! ( ऐसी पोस्ट डालने वालों में वो सदाचारी आगे होते हैं जिन्होंने अपनी मां को वृद्धाश्रम भेज रखा है !) साक्षात धर्मराज की पोस्ट में भी रिश्तों की इतनी आदर्शवादिता नहीं होगी, ज़रा देखिए - " सत्य का मार्ग संकट में भी नहीं त्यागना चाहिए -"! ( लगता है, विभीषण को इन्होंने ही मोडीवेट किया था!)   कुछ ने तो संस्कार के मामले में सतयुग को भी सिल्वर मेडल पर रोक दिया है, ' व्यवहार में नम्रता महापुरुषों की निशानी है '! ( इसके बावजूद कोई महापुरुष होने को तैयार नहीं !)
        दुनियां में कितना भी कलियुग या कोरोना आया हो पर सोशल मीडिया पर सतयुग और सदाचार का बसन्त उतरा हुआ है। इस पर इतने सदाचारी सवार हैं कि गांधी जी के बन्दर भी पूंछ उठाकर भाग लें ! सोशल मीडिया पर विद्वान महापुरुषों की एक नस्ल ऐसी भी है जिसने अपनी आंखों में सतयुग का लेंस डलवा लिया है! इसका फ़ायदा ये हुआ है कि चाहें जितना सूखा पड़े, उन्हें सावन की  ही अनुभूति होगी ! लेंस की बिक्री बढ़ रही है और साथ ही सतयुग की अनुभूति भी।  ये उसी लेंस का चमत्कार है कि प्राणियों को सूखे में मानसून, पतझड़ में बसंत, गरीबी में आत्मनिर्भता और किसान आंदोलन के
पीछे हरा भरा खालिस्तान नज़र आता है! लगता है - आने वाले वक्त में खुशहाली और बदहाली के बीच का भेदभाव खत्म हो जायेगा ! 
                                 हां तो,,,,, सोशल मीडिया के सात्विक चरित्र निर्माताओं की बात चल रही थी ! परसों फेस बुक पर एक सज्जन ने गांव से शहर आई अपनी वृद्ध माता जी के साथ अपना फोटो शेयर किया है! फोटो में शायद माता जी को मुस्करा कर फोटो खिंचवाने की सलाह दी गई थी। वो मुस्कराने और रोने के बीच की तस्वीर है ! (तसवीर में बहू सामने खड़ी है, शायद इसी लिए माता जी मुस्करा नहीं पायी !) मातृभक्त बेटे ने पोस्ट में लिखा था ,  ' माता की सेवा में परमानंद की अनुभूति होती है ' ! (पता नहीं ये दिव्य ' अनुभूति ' कितने दिन तक चली!) एक और सदाचारी बेटे ने अपनी मां को जूस पिलाते हुए तस्वीर शेयर की थी ! ( शायद दूध का क़र्ज़ उतार रहा था !) कितना घनघोर सतयुग है , फ़र्ज़ सिमट कर गिलास भर रह गया है !
             मैंने ' वर्मा ' जी से पूछ ही लिया, -' लोग जन्म देने वाले मां बाप के लिए थोडा़ सा भी फ़र्ज़ अदा करते हैं तो पोस्ट डाल कर ढिंढोरा क्यों पीटते हैं ?' वर्मा जी ने अपने तरीके से समझाया , " आज के दौर में इंसान ने ईश्वर को संदिग्ध बना दिया है ! तथाकथित धर्मगुरुओं ने मानव को भ्रम में लपेट दिया है ! उसे बिलकुल भरोसा नहीं है कि उसके पुण्य को ईश्वर कोई क्रेडिट देगा ! तो,,, क्यों ना दुनियां को अवगत कराया जाए '!  मैंने तर्क़ पेश किया , ' सर ! हर इंसान के कंधे पर एक एक फरिश्ता होता है जो उसके नेकी और बदी का अकाउंट अपडेट रखता है ! इंसान को इश्वर पर भरोसा रखना चाहिए"!                 "ईश्वर पर भरोसा तो ठीक है, फरिश्तों पर कैसे रखें! कहीं वो ख़ुद कंधों से उतर कर  ' पोस्ट ' डालने बैठ जाएं तो !! वो रंभा और मेनका का वीडियो देख रहें हों, और उतनी देर में  माता जी जूस का गिलास खाली कर दें ! फरिश्तों की लापरवाही से इतना बड़ा "पुण्य"  पल भर में रोहिंग्या हो कर रह गया "!

         हरि अनन्त हरि कथा अनंता - ! मै हैरान हूं इतने  विद्वानो की पोस्ट देखकर ! उम्र के इंटरवल पर मेरी हीनता क्लाइमैक्स पर है ! धीरे धीरे समझ में आ रहा है कि हिमालय और किष्किंधा की गुफाओं में तपस्या रत सारे ज्ञानी सोशल मीडिया पर लौट आए हैं ! सदाचार की अनंत शोधशालाएं जीवंत हो उठीं हैं ! कोरोना की कृपा से विद्वानों की बुद्धि भले भ्रमित हो पर सदाचार का उत्पादन बढ़ गया है । दस महीने में जीडीपी गरीबी रेखा से नीचे चली गई , मगर कोरोना मरदूद को मिर्गी तक ना आई ! बोर हो सारे सदाचारी  फावड़ा लेकर फेसबुक पर आ  गए , - सदाचार बिना चैन कहां रे !! अब चूंकि युग परिवर्तन में लगे हैं, कलिकाल में सतयुग फेंटना है ! इसलिए ऐसे कमेंट पर - लाइक या शेयर की उदासीनता नहीं देखी जाती ! गमले में रखा  मनीप्लांट का पौधा ताज़े पानी के इंतजार में कुपोषण का शिकार है , और  घर का मालिक फेसबुक पर पोस्ट डाल रहा है , -  'आज का सुविचार ! हमें अपने आस पास के पेड़ पौधों को नियमित रूप से खाद पानी देना चाहिए ! पर्यावरण को बचाने में आप हमारी इस मुहिम का हिस्सा बनें ' !!

       मुझे यकीन है, वो कल भी मनीप्लांट में पानी नहीं डालेगा, मगर फेसबुक पर पोस्ट ज़रूर डालेगा !


Thursday, 10 December 2020

[ व्यंग्य चिंतन] " पैसा बोलता है "!

             मुझे पूरा यकीन है कि ध्यान से सुनेंगे तो पैसे की आवाज़ साफ़ साफ़ सुनाई देगी ! पैसा बोलता ही नहीं दहाड़ता भी है ! उसके सामने आदमी घिघियाता है, रोता है, फरियाद करता है और चारण बनकर पैसे की वंदना करता है ! पैसा वो  'मास्टर की ' है जो हर बंद ताला खोल देता है ! पैसा न हो तो खून के रिश्तों में भी चीनी कम हो जाती है, और पैसा हो बेगानी शादी में भी अब्दुल्ला दीवाना हो कर नाचता है  ! पैसे वाले मूर्ख की बकवास भी प्रवचन का आनंद देती है, और पैसे से बंजर विद्वान की नेक सलाह भी मोहल्ले को बकवास लगती है! पैसे वाले का चरण रज चन्दन होता है और गुरबत का चबैना फांक रहे इन्सान के सलाम का जवाब देने से भी लोग कतराते हैं,-  क्या पता उधार मांगने के लिए नमस्ते कर रहा हो -!
                                  पहले सिर्फ सुनता था, अब देख भी लिया कि लेखक कड़की के तालाब में उगा हुआ वो कमल है जिसमें कभी पैसे की खुशबू नहीं आती ! दूर से बडा़ खूबसूरत लगता है - खिलखिलाता और अपने टैलेंट से सबका ध्यान अपनी ओर खींचता ! लोग उसकी खूब तारीफ़ करते हैं, - ' कमाल है! गज़ब की रचना !! कोई मुकाबला नहीं जी ' ! मगर उसकी जड़ों में लिपटे हुए गुरबत के कीचड़ को कोई नहीं देखता ! ट्रेजडी देखिए - आह से निकला होगा गान - को पूरी बेशर्मी से लेखक की नियति बताई जाती है ! शायद ऐसी रुग्ण मानसिकता ने रचनाकार को  नोट से दूर नियति की ओर धकेल दिया है ! लिहाज़ा आख़री  सांस तक सिर्फ उसके हाथ की कलम बोलती है, पैसा नहीं बोलता !
       इंसान तो सिर्फ मुंह से बोलता है,पर पैसा चारों तरफ़ से बोलता है।  पैसा चाहे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे या पिछली सीट पर , लोग पहचान  ही लेते हैं ! और,,, मेरे जैसा शख़्स सूट बूट और टाई पहन कर कार की पिछली सीट पर बैठे तो भी हमारे पड़ोसी "वर्मा जी" पहचान कर बोल ही देंगे, ' कौआ चला हंस की चाल '!  पैसा जो बोलता है ! एल आई सी वाले मछली पकड़ने के लिए एक स्लोगन लाए हैं, - ज़िंदगी के साथ भी - ज़िंदगी के बाद भी -! ये पैसे के बारे में कहा गया है ! पैसा जितना ज़िन्दगी में बोलता है, उससे ज़्यादा मरने के बाद बोलता है ! धर्मशाला,प्याऊ, मस्ज़िद,मंदिर , अनाथालय बनवाकर लोग पुण्य के ब्याज में पैसे की झंकार सुनते रहते हैं ! पैसे के बगैर स्वर्ग कितना दुरूह और नर्क कितना नज़दीक  है ! तभी तो किसी दिलजले ने कहा है, - पैसे बिना प्यार बेकार है ! ( सुनते ही फौरन चीनी कम हो जाती है!)
         हमारे  'वर्मा जी ' इतने कठोर सत्यवादी हैं कि लोग सामने पड़ने  से घबराते हैं ! क्या पता बबूल की कांटेदार टहनी जैसी कौन सी बात बोल दें कि कान तक का कोरोना निकल भागे ! खाते पीते बुद्धिजीवी हैं, पूंजीपतियों से छत्तीस का आंकड़ा है ! मोहल्ले के बडे़ व्यापारी सेठ नत्थूमल को भी नथुआ कह कर बुलाते हैं ! पैसे को पैर की जूती समझने वाले वर्मा जी  अपना अलग  दर्शन बताते हैं , ' पैसा कमाने के लिए आदमी तोते की तरह बोलता है, पैसा आने के बाद आदमी मुंह में फेवीकोल डाल कर ' नथुआ ' हो जाता है! पैसा आने के बाद आदमी को बोलने की ज़रूरत ही नहीं , लोग बोलते हैं, पैसा सुनता है ! पैसे की ख़ामोशी में बड़ी आवाज़ होती है बबुआ "!
            बुजुर्गों ने एक कहावत गढ़ी थी, - अक्ल का  अंधा गांठ का पूरा -! जब पैसा किसी मूर्ख के पास आ जाए और पैसे को तरसते बुद्धि जीवी का उसी मूर्ख से वास्ता पड़ जाए तो क्या होगा ! दुर्भाग्यवश बुद्धिजीवी अगर साहित्यिक प्रजाति का हो तो सोने पर सुहागा ! साहित्यकार की जेब बेशक सूखा पीड़ित हो, पर दिल में खुद्दारी का हिन्द महासागर और क्रोध में दुर्वाषा से कम नहीं होता ! एक तो करैला - दूजा नीम चढ़ा ! पूंजीपति को देखते ही लेखक ऐसे फुंफकारता है, गोया सांड ने लाल रंग देख लिया हो ! कुछ करनी कुछ करम गति कुछ लेखक का भाग ! लेखक अपनी खुद्दारी नहीं छोड़ता और दुर्भाग्य पीछा ! पैसा और कलम - मत छेड़ो सनम !!
       पैसा बगैर ज़बान के बोलता है ! बोलता ही नहीं चिढ़ाता भी है ! पैसा जिसके पास जाता है उसे मुखिया बना देता है ! जो बोले वही सत्य वचन, जिधर से जाए वही रास्ता ! ( महाजनों येन गता: सा पंथा : ) पैसा परिभाषा बदल देता है ! हर कान पैसे की आवाज़ सुनता है! समाज भी पैसे वाले तराजू की जै जै कार करता है ! पैसा सूखा हगे या गीला - उसमें बदबू नहीं होती ! पैसा ही रस्म और परंपरा तय करता है !  गरीब आदमी की पत्नी  अगर कम कपड़े पहने तो  'मज़दूर ' - और,,,, पैसे वाले की बीबी अगर लंगोट पहन कर निकले तो  "मॉडल"  कहलाए ! 

         ।।  कि मैं कोई झूठ बोल्या ,,, ?  ।।

Tuesday, 8 December 2020

" रिटर्न ऑफ अलादीन और जिन्न "!

        अलादीन बड़ी मुश्किल से अपनी झुग्गी तक लौट पाया था  ! आज का दिन बहुत बुरा गुजरा था ! बदरपुर बॉर्डर ( दिल्ली) से थोडा़ बहुत कबाड़ खरीद कर जब वो अपने रिक्शे पर घर लौट रहा था, तो रास्ते में पुलिस ने रिक्शा रोक कर पूछा, - ' क्या लाद रखा है बे ?'.
          " कबाड़ है साहेब "!
        " कहां से ला रहा है ?'
        " ताजपुर पहाड़ी से "!
         " दिल्ली बॉर्डर पर चारों ओर किसान बैठे हैं, और तू माहौल ख़राब करने की कौशिश कर रहा है!" 
  अलादीन घबरा गया, ' मैंने कैसे ख़राब किया साहेब '?
        " किसानों का धरना चल रहा है और तू मुझसे जबान लड़ा रहा है ! तू तो मुझे संदिग्ध लग रहा है बे !!"
     " नहीं सर ! मै तो एक गरीब कबाड़ी हूं "!
 " तुझे क्या पता कि तू क्या है, ये तो मैं तय करूंगा ! ज़रा मुझे कबाड़ चेक करने दे! तब मैं डिसाइड करूंगा कि तू खालिस्तानी है या बांग्लादेशी !" 
      " मगर मैं तो हिन्दुस्तानी हूं!"                                     " तेरे कहने से कुछ नहीं होता ! ये तो मुझे डिसाइड करना है!"
      अलादीन रूआंसा हो गया ,  तभी दूसरा पोलिस वाला उसे एक तरफ ले जाकर बोला, ' अगर इन्होंने जांच शुरू कर दी तो इस जनम में तू कभी भी इंडियन नहीं साबित हो पायेगा ! वीजा लगाऊं तेरा ?"
        " वीज़ा "!
 " हां, आजकल रोहिंग्या का सीज़न चल रहा है! बीस साल के लिए जेल जाएगा !"
   
       " कुछ कीजिए सर !"
 " इब आया तू कानून के नीचे ! लिकाल दो सौ रुपया !"
       " किस जुर्म में सरकार ?"
" नाक के नीचे रिक्शा समेत रोहिंग्या बरामद हो गयो "!
     ' अभी सौ रुपया है सरकार।"
" कोई बात नहीं, पचास बाद में दे देना "!
                   जान बची और लाखों पाए ! अलादीन तेज़ी से रिक्शा चलाता हुआ अपनी झुग्गी की ओर चल पड़ा ! अभी वो तुगलकाबाद किले के नज़दीक पहुंचा था कि नाका लगाए पुलिस वाले ने उसका रिक्शा रुकवा दिया ! आसमान से गिरे खजूर में अटके , अब तो जेब में इतना भी पैसा नहीं था कि  'दिल धक धक ' गुटखा खरीद सके ! एक पुलिस वाले ने पास आकर कबाड़ का जायज़ा लिया, -' ये सब क्या है बे ?' 
     " कबाड़ है दरोगा जी !" 
पुलिस वाला दरोगा कहे जाने पर थोड़ा नरम हुआ, फ़िर भी ठेले का मुआइना करता हुआ बोला , ' कब से ये धंधा कर रहा है ?"
      " पांच साल से!"
 "तो इसका मतलब पांच साल से कानून की आंख में धूल झोंक रहा है , दस साल के लिए अंदर जायेगा "!
           " मगर क्यों मेरे आका ! क्या कबाड़ खरीदना जुर्म है ! मै तो बड़ी मुश्किल से अपना पेट पालता हूं"!
    पुलिस वाला धीरे से बोला ,- ' मेरे धौरे भी एक पेट सै बावली पूंछ ! उसने कूण पालेगो ! लिकाड सौ रुपया !!"
       " पिछली चेकपोस्ट पर सब ले लिया, सौ रुपया उधार चढ़ा है "! 
      " चल इब दो सौ रुपया उधार चढ़ लिया ! पे टी एम नहीं है के ?" 
        " मै बहुत छोटा आदमी हूं सरकार  "!
         अपनी झुग्गी में आकर भी अलादीन के दिल की धड़कन नॉर्मल नहीं हो रही थी ! शरीफ आदमी था इसलिए पुलिस को देखते ही ऐसे घबरा जाता था़, गोया किसी की जेब काट कर भागा हो !
      अचानक उसे जिन्न वाले चिराग़ की याद आई । इक्कीसवीं सदी में आकर जिन्न बिलकुल बदल गया था़ ! अव्वल तो रगड़ने के बावजूद वो चिराग़ से बाहर नहीं निकलता था़, और निकलता भी तो सियासत, क्राइम और किसान आंदोलन की बातें करता था। वर्तमान व्यवस्था का इतना बुरा असर जिन्न पर पड़ा था कि बगैर लेन देन के वो कोई काम नही करता था !
      अलादीन ने चिराग़ को रगड़ना शुरू किया ! पांच मिनट निकल गया ! अलादीन के मुंह से " पाताल लोक" वेब सीरीज की ओरिजनल गालियां निकलने लगीं, पर चिराग़ से धुआं न निकला ! खीझ कर अलादीन ने चिराग़ उठाकर फर्श पर दे मारा !
     चमत्कार हुआ ! चिराग़ से सफेद धुआं निकलता नजर आया और जब धुआं छटा तो गैस सिलेंडर पर बैठा हुआ जिन्न नज़र आया। अलादीन को देखते ही जिन्न ने फॉर्मेलिटी निभाई, " क्या हुक्म है मेरे फटीचर आका "?
        " तंग आ गया तुमसे ! रगड़ रगड़ कर हाथ घिस गए और तुम हो कि केजरीवाल सरकार की तरह सोये पड़े हो ! आखिर कहां कोमा में चले जाते हो ?"
       " मै सिंघु बॉर्डर पर किसान रसोई में खाना खा रहा था ! जबसे कोरोना आया है, तुम्हारी झुग्गी तो गरीबी रेखा से नीचे चली गई है ! कोरोना से तो बच गया पर कुछ दिन और तुम्हरे साथ रहा तो कुपोषण से मर जाऊंगा ! गांधी जी से भी ज्यादा उपवास कराते हो !" 
             " तो मै क्या करूं ! जब भी तुमसे कुछ मांगता हूं तो आसाराम की तरह उपदेश देने लगते हो ! कुछ लाते ही नहीं!!"
      "तुम अपनी च्वाइस तो देखो ! कैसी कैसी वाहियात डिमांड करते हो ! कभी एक पाव सरसों का तेल मांगते हो तो कभी सस्ता आलू ! कभी फुटपाथ पे दो सौ रुपए में बिकने वाले जूते की फरमाइश करते हो तो कभी सौ रुपए में जाड़ा उतारने वाली स्वेटर लाने को कहते हो ! इस सतयुग में क्या हो गया उस्ताद आपको ! लगता है रामराज सूट नहीं कर रहा है ! खैर आज क्या चाहिए ? सुर में बोले तो,,,, क्या हुक्म है मेरे आका !"
       अलादीन ने सारी समस्या बताते हुए कहा, ' मेरी सात पुश्तें यहीं मरी और दफ़न हुईं, लेकिन पुलिस वालों से मिलने के बाद तो मुझे खुद अपने ऊपर ही शक होने लगा है कि कहीं मैं रोहिंग्या तो नहीं ! कुछ चक्कर सा आ रहा है तब से !" 
         " बहुत छोटी सी समस्या है, डॉन्ट वरी मैं हूं ना ! "सुविधा शुल्क" ज़िंदाबाद ! सारा इंतजाम मैं कर दूंगा, बस आप ज़रा एक लिम्का की बोतल और चिकन तन्दूरी लेते आइए ! मुर्गा अंदर - समस्या बाहर !"
     ".कभी बगैर लेनदेन के भी काम कर दिया कर !"
" सुविधा शुल्क के बगैर कुछ नहीं होता बॉस ! होता तो पुलिस वाले तुमसे डेढ़ सौ क्यों लेते ! ' 

      अलादीन मन ही मन गाली देते हुए झुग्गी से निकल गए ! वो समझ गए कि बगैर मुर्ग़ा और लिम्का के जिन्न उन्हें रोहिंग्या होेने से बचाएगा नहीं ! लेकिन इस घबराहट और जल्दबाज़ी में उनसे एक भारी भूल हो गई ! वो चिराग़ को जेब में रखना भूल गए ! जब याद आया तो बगैर मुर्ग़ा लिए झुग्गी को वापस भागे , मगर तबतक देर हो चुकी थीं !

                  में लालकिले से खरीदी हुई नई जीन और टी शर्ट खूंटी से गायब थी , और,,,,, चिराग़ लेकर जिन्न फ़रार हो चुका था!

                  *(Sultan bharti)*
       

Friday, 4 December 2020

(व्यंग्य चिंतन) ' सब ठीक है न '

             अब क्या बताऊं, ये औपचारिक सवाल अपने आप में घाव पर नमक से कम नहीं है ! ' सब ठीक है ना ' दुनियां का अकेला ऐसा वाहिद सवाल है जो नकारात्मक परिस्थिति का सामना कर रहे इंसान से भी  सकारात्मक जवाब चाहता है ! अगर आप तालाब में डूब रहे हों और आपके खैरख्वाह  बगल से गुजरते हुए  पूछें,  - 'सब ठीक है न' ! तो भी  हकीकत  बताने का कोई फायदा नही कि,,,,'बगल पेङ के नीचे पेट खाली कर के अपना पिछवाङा धोने आया था, पैर फिसला और अब डूब रहा हूं, बस चंद पल का मेहमान हूं' -!  बल्कि हालात हाजरा के मुताबिक मुस्करा कर कहें , ' हां सब ठीक है , बस ज़रा मरने वाला हूं , क्योंकि  मुझे तैरना नहीं आता "! यकीन मानों इसके बाद भी वो रुकेगा नहीं, क्योंकि उसे आपसे कोई लेना देना नहीं है, वह फॉर्मेल्टी की दुनियां मेंजीता है ! उसने ईमान, इंसानियत, हमदर्दी , दुख दर्द, रिश्तेदारी,संवेदना सबको औपचारिकता की पोटली में बांध रखा है ! सच पूछो तो ऐसे लोगों का समाज में ज़िंदा होना  भी औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं होता !
          हमारे पड़ोसी " बुद्धि लाल" जी को लिजिए ! जब से उन्हें शुगर हुई है, केजरिवाल से सख़्त नाराज़ हैं !  लॉक डॉउन में बिजली विभाग ने बगैर रीडिंग देखे अनाप शनाप बिल भेज दिया । उसे सैटल करवाने की चिंता में इतना दौड़े कि  शुगर पेशेंट हो गए ! हर दिन सुबह पार्क में नज़र आने लगे। उन्हें देखकर हर आदमी पूछने लगा, ' सब ठीक है ना '! वो कहना चाहते कि -' बिलकुल ठीक नहीं हूं - मेरा चैन वैन सब लूटा...! बी एस ई एस ने लूट मचा रखी है ! किसी दिन विधान सभा के सामने बिजली के तार से लटक कर सती हो जाऊंगा ! ' पर उनकी चिंता या चेतावनी पर हर कोई सिर्फ रस्मी सवाल फेंक कर आगे बढ़ जाता था ! दुर्भाग्य से एक दिन मैं उनके सामने पड़ गया ! सोचा , एक औपचारिक सवाल उछाल कर बरी हो जाऊंगा ! देखते ही मैंने पूछा लिया,  'सब ठीक है ना !'
       वो पहाड़ी बादल की तरह फटे, " ख़ाक ठीक है ! मेरी नौकरी कोरोना खा गया और सिलेण्डर की सब्सिडी उज्ज्वला योजना ! किचन गरीबी रेखा के नीचे ऑक्सीजन ढूंढ रहा है ! केजरी सरकार ने सुकून की जगह शुगर दे दिया  ! तुम कुछ करो !'
    मैंने हाथ खड़े कर दिए,  'मुझे भी  शुगर है"! 
वो जान को अटक गए, ' फिर तुमने क्यों पूछा कि सब ठीक है ना ?" 
     मै मुस्कराया, " आप भी तो मोहल्ले में इसी थोथी औपचारिकता के लिए जाने जाते हैं ! किसी की कटी उंगली पर कभी एंटीसेप्टिक समझ कर ही कभी मूता हो तो बताइए  "?
                    आदमी आइने में सिर्फ अपनी सूरत देख कर रह जाता है, सीरत देखता ही नहीं ! पैसे और पेट से अघाये आदमी बहुत बढ़िया सलाह देते हैं ! और,,,बेचारा भूखा अक्लमंद आदमी उसकी मूर्खता में प्रोटीन ढूढता है! अक्ल का अंधा अमीर आदमी अगर  प्रवचन दे तो चारण और कवि उसकी बकवास मेें छायावाद और रहस्यवाद तक ढूढ लेते हैं ! और सर्वहारा वर्ग के सामने उनकी मूर्खता को परोस कर शोध करने और  'गूढ अध्यात्म' ढूढने को कह दिया जाता है ! दरअसल आज भी यही पूंजीपति वर्ग सर्वहारा समाज को औपचारिकता की अफीम चटा रहा है। हमारे एक बडे़ व्यापारी मित्र की एक विचित्र आदत है! वो अपने हर दुखी मित्र को एक ही सलाह देते हैं, -' खुश रहा करो '! उनको अपने इस सलाह पर कभी राई बराबर भी  शर्मिंदगी नहीं हुई ! वो आज़ भी दूसरों को यही सलाह देते हैं, 'खुश रहा करो' ! कौन नहीं चाहता कि वह खुश रहे, पर खुश रहना अपने हाथ में है कहां !
        हमारे 'वर्मा जी ' ने इस मामले में भी मैराथन मार रखा है ! बासठ साल की उम्र में भी मोहल्ले के लोगों को छेड़ने में काफी सक्रिय है ! समस्याग्रस्त शख़्स को घेर कर पूछते हैं,' सब ठीक है ना !' एक बार पङोस के मिश्रा जी ने उनके सवाल को संजीदगी से ले लिया,-' कहां ठीक है वर्मा जी, अभी पिछले हफ्ते मेरे लखनऊ वाले फूफ़ा जी मर गए!' 
                       उसके बाद तो वर्मा जी फुल फॉर्म में आ जाते हैं, ' कमाल है ! आप तो कहानी लेकर बैठ गए ! मैने तो सिर्फ हाल चाल पूछा था़, मैने ये कब पूछा कि आप के फूफा जी जिन्दा हैं या मर गए ! सबको मरना है मिश्रा जी , कोई अजर अमर नहीं है ! आज फूफा जी मरे हैं, कल आप भी मर सकते हैं ! इस वक्त मरोगे तो क्रेडिट अमृतकाल को मिलेगा ! हमारी याददाश्त कुछ ठीक नहीं है, अगर हमसे कुछ उधार लिया हो तो याद कर के मरने से पहले दे देना '!
     मिश्रा जी की घिग्घी बंध गई , आकस्मिक हमले से सदमे में आए मिश्रा जी रुआंसे होकर सिर्फ इतना  कह पाए,  " मुझ पर आपका कोई उधार नहीं '-!
          वर्मा जी ' सब ठीक है ना ' के जवाब में रामराज चाहते हैं ! अब ऐसे में कोई कांग्रेसी देश या गांव की दुर्दशा लेकर बैठ जाए तो वर्मा जी आपे से बाहर हो जाते हैं , " किस दुनियां में रहते हो ! अपने अलावा किसी का विकास पसंद नहीं  ! अब देश में तुम्हारा तुष्टीकरण मॉडल नहीं  चलेगा ! कमाल है , चुनाव में नहीं जीते तो आप अमृतकाल में कोरोना लेकर आ गए ! कहां कहां की कौड़ी ढूंढ लाते हो ! मैने तो सिर्फ इतना पूछा था कि - सब ठीक है ना '!
      आज के दौर मे बेशक आप सर से पैर तक पट्टियों में लिपटे स्ट्रेचर पर जा रहे हों, पर- 'सब ठीक है ना' - के जवाब में मुस्करा कर सिर्फ़ यही कहें, ' हां सब ठीक है ! बस ज़रा कार के नीचे आ गया था ! चार पसलियों के साथ दोनों पैर टूट गए हैं , मगर खुदा का नजरे करम देखिए, जबान चल रही है ! हर्ष का विषय है कि नाक टूट गई मगर दांत नहीं टूटा !'  यकीन  मानिये, इतना सुनकर भी सामने वाले की बेशर्मी एक मिलीमीटर कम नहीं होगी !
                       कोरोनाकाल मेे दिल्ली की सड़को पर जगह जगह एक बोर्ड नज़र आता था ,-' जब तक कोरोना की दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं ! घर से बाहर ना निकले! घर में रहें - सुरक्षित रहें' -!  कौन कमबख्त घर से निकलना चाहता है ! लेकिन एक शादीशुदा प्राणी से हलफ दिलवा कर पूछो  कि घर में रहेगा तो कैसे सुरक्षित रहेगा ?  ये उपदेश भी 'सब ठीक है ना - से अलग नहीं है ! 

          हमारे यूपी में कहते हैं, - सावन के अंधे को सिर्फ हरा हरा नज़र आता है -!
 तो,,,, ठीक है चच्चा ! झाड़े रहौ कलक्टर गंज !!  

       सुलतान  'भारती'  (Journalist )

Wednesday, 2 December 2020

" डायना ह्यूमन"

       सन  2020 ,,,,,,,,        (   अरब सागर के एक खूबसूरत सी बीच पर धूप स्नान करता एक आत्मनिर्भर नेता ! वो अभी अभी समंदर से नहाकर बाहर आया था, और अब धूप सेंक रहा था ! पास के सेवन स्टार होटल के बाहर खड़े नारियल के पेड़ पर बैठे एक मच्छर ने नेता को देखते ही उड़ान भरी और नेता की पीठ पर टेक ऑफ किया ! मच्छर कई दिनों का भूखा था और उसकी हालत कांग्रेस की तरह दयनीय लग रही थी ! उसने जी भर कर नेता का खून पिया ! अचानक मच्छर ने ऐसा महसूस किया जैसे उसने खून नहीं तेज़ाब पी लिया है ! वो घबरा कर उड़ा और पास के एक बबूल के पेड़ जा बैठा ! बैठते ही मच्छर कोमा में चला गया ! तभी पेड़ से गोंद बही और मच्छर एक इतिहास समेटे  "गोंद" में सुरक्षित हो गया !)

                          सन 2080
       जीव वैज्ञानिकों की एक खोजी टीम को साठ साल बाद गोंद में सुरक्षित वो मच्छर बरामद हो गया जो आज भी कोमा में था ! खोजी दल उसे लेकर लैब आए और फिर भारत के चोटी के तीन वैज्ञानिक आपस में सलाह करने लगे , डॉक्टर मंजीत सिंह बेंस का कहना था़," हमें प्री वर्ल्ड वॉर की बड़ी दुर्लभ जानकारी मिलने वाली है ! 2040 में हुए तीसरे वर्ल्ड वॉर में जब सब कुछ खत्म हो गया तो ये क्या खाकर जिंदा बचा ?"
     दूसरा युवा वैज्ञानिक डॉक्टर नज़ीर सिद्दीक़ी बोले " ये मच्छर आज के मच्छर से डिफरेंट है। इसके खून की जांच से पता चलेगा कि इसने किस जानवर का खून पिया था़ ! फिर ब्लड सैंपल से हमें क्रोमोसोम्स डेवलप करने में आसानी होगी "!
        जांच दल के मुखिया और सीनियर वैज्ञानिक डॉक्टर अजीत वर्मा ने फैसला किया ," जब डायोग्राफर मशीन जीव की संरचना दिखाए तो उसके मेमोरी डॉट्स को डेवलप करके ये ज़रूर पता करना है कि मच्छर ने जिस जीव का खून पिया था़, वो क्या खाता था ! कल एक प्रेस कांफ्रेंस का इंतजाम भी किया जाए "!
      तीनो वैज्ञानिक अपने काम में लग गए ।
,2040 मे हुए तीसरे विश्व युद्ध में आबादी के साथ साथ सभ्यता की रूपरेखा तक बदल गई थी ! बडे़ बडे़ वैज्ञानिक , राजनेता और कार्पोरेट घराने अपने अपने स्पेसशिप में बैठ कर अंतरिक्ष में चले गए थे ! दो साल बाद जब पृथ्वी पर परमाणु विकिरण खत्म हुआ, नए पेड़ पौधों ने ऑक्सिजन का उत्पादन और गुणवत्ता नियंत्रित किया तो स्पेस शिप पृथ्वी पर वापस लौटे ! अगले दस साल इंफ्रा स्ट्रक्चर खड़े होने में लगे ! दुनियां अब सतयुग के दायरे में थी।  देश और दुनियां की बच्ची खुची आबादी अपना अतीत ढूंढ रही थी ! इसी खोज में विश्व की नई महाशक्ति भारत के वैज्ञानिकों को साठ साल पहले का मच्छर हाथ लगा था ।
         अगले दिन पूरी दुनियां से मिडिया वाले दिल्ली आए हुऐ थे ! उनमें ज़्यादातर नई दुनियां के लोग थे़ । सबकी नजरें एक बडे़ स्क्रीन पर लगी थीं, जहां तीनों चोटी के वैज्ञानिक मच्छर को घेर कर खड़े थे ! उसके ब्लड सैंपल से क्रोमोजोम्स लेकर तीनों वैज्ञानिक अलग अलग मशीनों द्वारा जांच कर कर रहे थे़ ! सबसे पहले युवा वैज्ञानिक सरदार मंजीत सिंह चिल्लाए , " रब दी सौं, मैनू कदी ना बेख्या ऐसा जानवर !"
      " क्या मतलब" ? डॉक्टर अजीत ने पूछा !
" बॉडी डायोग्राफ़र मशीन के मुताबिक मच्छर ने कोमा में जाने से पहले जिस जीव का खून पिया था़, दिखने में वो हमारे पूर्वज इन्सानों जैसा है! पर उसकी खुराक़ डायनासोर से बड़ी है !"
   "क्या मतलब"?
" जाने  किस ग्रह से पृथ्वी पर आया था, इसके फेवरेट भोजन में कंद मूल या कढ़ी की जगह कमीशन खाने का सबूत है ! कैरेक्टर डाटाबेस की जांच से पता चला है कि ये मर्डर, रेप, करेप्शन और किडनेपिंग में इन्वॉल्व था ! क्या आप इस जीव के प्रोडक्शन का रिस्क उठायेंगे "?
   डॉक्टर अजीत के बोलने से पहले ही dr सिद्दीक़ी चिल्लाए , " खुदा की मार हो इस पर ! आखिर इस मासूम मच्छर ने इतना खतरा क्यो उठाया !"
       " अब क्या हुआ डॉक्टर ?"
  " इसका मेमोरी डॉट्स एक्टिव हो चुका है ! मैंने उसे इसके कैरेक्टर डाटा बेस से जोड़ दिया है! माय गॉड ! ये तो एक दर्जन हिंदू मुस्लिम दंगे करवा चुका है ! ये तो पूरी दुनियां के लिए खतरनाक है !" 
                " इसका निर्माण कर हम इसे म्यूजियम में रखने का रिस्क नहीं उठा सकते ! " डॉक्टर अजीत वर्मा बोले " ये नई सभ्यता को पनपने से पहले ही खत्म कर देगा । सारे क्रोमोसोम्स फ्रीज़ कर दो और मिडिया को बोलो कि हर कोशिश के बाद भी हम डीएनए को ऐक्टिव करने में नाकाम रहे ! बाई द वे , इस जीव को हमारे पूर्वज क्या कहते थे ?"
        " मेमोरी डॉट्स और कैरेक्टर डाटा बेस में इसे "नेता" की पहचान दी गई है "!
 "  नेता ! ओह गॉड, सो डेंजरस ! गुड बाय मिस्टर नेता , हमारी दुनियां को अभी किसी नेता की जरूरत नहीं है । हम अभी नफ़रत और हिंसा मुक्त दुनियां के निर्माण में लगे हैं । ब्वायज ! इसे सीज़ कर दो !"

    और,,,,,इस तरह नई दुनियां तबाह होने से बच गई !
       

Tuesday, 1 December 2020