Friday, 4 December 2020

(व्यंग्य चिंतन) ' सब ठीक है न '

             अब क्या बताऊं, ये औपचारिक सवाल अपने आप में घाव पर नमक से कम नहीं है ! ' सब ठीक है ना ' दुनियां का अकेला ऐसा वाहिद सवाल है जो नकारात्मक परिस्थिति का सामना कर रहे इंसान से भी  सकारात्मक जवाब चाहता है ! अगर आप तालाब में डूब रहे हों और आपके खैरख्वाह  बगल से गुजरते हुए  पूछें,  - 'सब ठीक है न' ! तो भी  हकीकत  बताने का कोई फायदा नही कि,,,,'बगल पेङ के नीचे पेट खाली कर के अपना पिछवाङा धोने आया था, पैर फिसला और अब डूब रहा हूं, बस चंद पल का मेहमान हूं' -!  बल्कि हालात हाजरा के मुताबिक मुस्करा कर कहें , ' हां सब ठीक है , बस ज़रा मरने वाला हूं , क्योंकि  मुझे तैरना नहीं आता "! यकीन मानों इसके बाद भी वो रुकेगा नहीं, क्योंकि उसे आपसे कोई लेना देना नहीं है, वह फॉर्मेल्टी की दुनियां मेंजीता है ! उसने ईमान, इंसानियत, हमदर्दी , दुख दर्द, रिश्तेदारी,संवेदना सबको औपचारिकता की पोटली में बांध रखा है ! सच पूछो तो ऐसे लोगों का समाज में ज़िंदा होना  भी औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं होता !
          हमारे पड़ोसी " बुद्धि लाल" जी को लिजिए ! जब से उन्हें शुगर हुई है, केजरिवाल से सख़्त नाराज़ हैं !  लॉक डॉउन में बिजली विभाग ने बगैर रीडिंग देखे अनाप शनाप बिल भेज दिया । उसे सैटल करवाने की चिंता में इतना दौड़े कि  शुगर पेशेंट हो गए ! हर दिन सुबह पार्क में नज़र आने लगे। उन्हें देखकर हर आदमी पूछने लगा, ' सब ठीक है ना '! वो कहना चाहते कि -' बिलकुल ठीक नहीं हूं - मेरा चैन वैन सब लूटा...! बी एस ई एस ने लूट मचा रखी है ! किसी दिन विधान सभा के सामने बिजली के तार से लटक कर सती हो जाऊंगा ! ' पर उनकी चिंता या चेतावनी पर हर कोई सिर्फ रस्मी सवाल फेंक कर आगे बढ़ जाता था ! दुर्भाग्य से एक दिन मैं उनके सामने पड़ गया ! सोचा , एक औपचारिक सवाल उछाल कर बरी हो जाऊंगा ! देखते ही मैंने पूछा लिया,  'सब ठीक है ना !'
       वो पहाड़ी बादल की तरह फटे, " ख़ाक ठीक है ! मेरी नौकरी कोरोना खा गया और सिलेण्डर की सब्सिडी उज्ज्वला योजना ! किचन गरीबी रेखा के नीचे ऑक्सीजन ढूंढ रहा है ! केजरी सरकार ने सुकून की जगह शुगर दे दिया  ! तुम कुछ करो !'
    मैंने हाथ खड़े कर दिए,  'मुझे भी  शुगर है"! 
वो जान को अटक गए, ' फिर तुमने क्यों पूछा कि सब ठीक है ना ?" 
     मै मुस्कराया, " आप भी तो मोहल्ले में इसी थोथी औपचारिकता के लिए जाने जाते हैं ! किसी की कटी उंगली पर कभी एंटीसेप्टिक समझ कर ही कभी मूता हो तो बताइए  "?
                    आदमी आइने में सिर्फ अपनी सूरत देख कर रह जाता है, सीरत देखता ही नहीं ! पैसे और पेट से अघाये आदमी बहुत बढ़िया सलाह देते हैं ! और,,,बेचारा भूखा अक्लमंद आदमी उसकी मूर्खता में प्रोटीन ढूढता है! अक्ल का अंधा अमीर आदमी अगर  प्रवचन दे तो चारण और कवि उसकी बकवास मेें छायावाद और रहस्यवाद तक ढूढ लेते हैं ! और सर्वहारा वर्ग के सामने उनकी मूर्खता को परोस कर शोध करने और  'गूढ अध्यात्म' ढूढने को कह दिया जाता है ! दरअसल आज भी यही पूंजीपति वर्ग सर्वहारा समाज को औपचारिकता की अफीम चटा रहा है। हमारे एक बडे़ व्यापारी मित्र की एक विचित्र आदत है! वो अपने हर दुखी मित्र को एक ही सलाह देते हैं, -' खुश रहा करो '! उनको अपने इस सलाह पर कभी राई बराबर भी  शर्मिंदगी नहीं हुई ! वो आज़ भी दूसरों को यही सलाह देते हैं, 'खुश रहा करो' ! कौन नहीं चाहता कि वह खुश रहे, पर खुश रहना अपने हाथ में है कहां !
        हमारे 'वर्मा जी ' ने इस मामले में भी मैराथन मार रखा है ! बासठ साल की उम्र में भी मोहल्ले के लोगों को छेड़ने में काफी सक्रिय है ! समस्याग्रस्त शख़्स को घेर कर पूछते हैं,' सब ठीक है ना !' एक बार पङोस के मिश्रा जी ने उनके सवाल को संजीदगी से ले लिया,-' कहां ठीक है वर्मा जी, अभी पिछले हफ्ते मेरे लखनऊ वाले फूफ़ा जी मर गए!' 
                       उसके बाद तो वर्मा जी फुल फॉर्म में आ जाते हैं, ' कमाल है ! आप तो कहानी लेकर बैठ गए ! मैने तो सिर्फ हाल चाल पूछा था़, मैने ये कब पूछा कि आप के फूफा जी जिन्दा हैं या मर गए ! सबको मरना है मिश्रा जी , कोई अजर अमर नहीं है ! आज फूफा जी मरे हैं, कल आप भी मर सकते हैं ! इस वक्त मरोगे तो क्रेडिट अमृतकाल को मिलेगा ! हमारी याददाश्त कुछ ठीक नहीं है, अगर हमसे कुछ उधार लिया हो तो याद कर के मरने से पहले दे देना '!
     मिश्रा जी की घिग्घी बंध गई , आकस्मिक हमले से सदमे में आए मिश्रा जी रुआंसे होकर सिर्फ इतना  कह पाए,  " मुझ पर आपका कोई उधार नहीं '-!
          वर्मा जी ' सब ठीक है ना ' के जवाब में रामराज चाहते हैं ! अब ऐसे में कोई कांग्रेसी देश या गांव की दुर्दशा लेकर बैठ जाए तो वर्मा जी आपे से बाहर हो जाते हैं , " किस दुनियां में रहते हो ! अपने अलावा किसी का विकास पसंद नहीं  ! अब देश में तुम्हारा तुष्टीकरण मॉडल नहीं  चलेगा ! कमाल है , चुनाव में नहीं जीते तो आप अमृतकाल में कोरोना लेकर आ गए ! कहां कहां की कौड़ी ढूंढ लाते हो ! मैने तो सिर्फ इतना पूछा था कि - सब ठीक है ना '!
      आज के दौर मे बेशक आप सर से पैर तक पट्टियों में लिपटे स्ट्रेचर पर जा रहे हों, पर- 'सब ठीक है ना' - के जवाब में मुस्करा कर सिर्फ़ यही कहें, ' हां सब ठीक है ! बस ज़रा कार के नीचे आ गया था ! चार पसलियों के साथ दोनों पैर टूट गए हैं , मगर खुदा का नजरे करम देखिए, जबान चल रही है ! हर्ष का विषय है कि नाक टूट गई मगर दांत नहीं टूटा !'  यकीन  मानिये, इतना सुनकर भी सामने वाले की बेशर्मी एक मिलीमीटर कम नहीं होगी !
                       कोरोनाकाल मेे दिल्ली की सड़को पर जगह जगह एक बोर्ड नज़र आता था ,-' जब तक कोरोना की दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं ! घर से बाहर ना निकले! घर में रहें - सुरक्षित रहें' -!  कौन कमबख्त घर से निकलना चाहता है ! लेकिन एक शादीशुदा प्राणी से हलफ दिलवा कर पूछो  कि घर में रहेगा तो कैसे सुरक्षित रहेगा ?  ये उपदेश भी 'सब ठीक है ना - से अलग नहीं है ! 

          हमारे यूपी में कहते हैं, - सावन के अंधे को सिर्फ हरा हरा नज़र आता है -!
 तो,,,, ठीक है चच्चा ! झाड़े रहौ कलक्टर गंज !!  

       सुलतान  'भारती'  (Journalist )

Wednesday, 2 December 2020

" डायना ह्यूमन"

       सन  2020 ,,,,,,,,        (   अरब सागर के एक खूबसूरत सी बीच पर धूप स्नान करता एक आत्मनिर्भर नेता ! वो अभी अभी समंदर से नहाकर बाहर आया था, और अब धूप सेंक रहा था ! पास के सेवन स्टार होटल के बाहर खड़े नारियल के पेड़ पर बैठे एक मच्छर ने नेता को देखते ही उड़ान भरी और नेता की पीठ पर टेक ऑफ किया ! मच्छर कई दिनों का भूखा था और उसकी हालत कांग्रेस की तरह दयनीय लग रही थी ! उसने जी भर कर नेता का खून पिया ! अचानक मच्छर ने ऐसा महसूस किया जैसे उसने खून नहीं तेज़ाब पी लिया है ! वो घबरा कर उड़ा और पास के एक बबूल के पेड़ जा बैठा ! बैठते ही मच्छर कोमा में चला गया ! तभी पेड़ से गोंद बही और मच्छर एक इतिहास समेटे  "गोंद" में सुरक्षित हो गया !)

                          सन 2080
       जीव वैज्ञानिकों की एक खोजी टीम को साठ साल बाद गोंद में सुरक्षित वो मच्छर बरामद हो गया जो आज भी कोमा में था ! खोजी दल उसे लेकर लैब आए और फिर भारत के चोटी के तीन वैज्ञानिक आपस में सलाह करने लगे , डॉक्टर मंजीत सिंह बेंस का कहना था़," हमें प्री वर्ल्ड वॉर की बड़ी दुर्लभ जानकारी मिलने वाली है ! 2040 में हुए तीसरे वर्ल्ड वॉर में जब सब कुछ खत्म हो गया तो ये क्या खाकर जिंदा बचा ?"
     दूसरा युवा वैज्ञानिक डॉक्टर नज़ीर सिद्दीक़ी बोले " ये मच्छर आज के मच्छर से डिफरेंट है। इसके खून की जांच से पता चलेगा कि इसने किस जानवर का खून पिया था़ ! फिर ब्लड सैंपल से हमें क्रोमोसोम्स डेवलप करने में आसानी होगी "!
        जांच दल के मुखिया और सीनियर वैज्ञानिक डॉक्टर अजीत वर्मा ने फैसला किया ," जब डायोग्राफर मशीन जीव की संरचना दिखाए तो उसके मेमोरी डॉट्स को डेवलप करके ये ज़रूर पता करना है कि मच्छर ने जिस जीव का खून पिया था़, वो क्या खाता था ! कल एक प्रेस कांफ्रेंस का इंतजाम भी किया जाए "!
      तीनो वैज्ञानिक अपने काम में लग गए ।
,2040 मे हुए तीसरे विश्व युद्ध में आबादी के साथ साथ सभ्यता की रूपरेखा तक बदल गई थी ! बडे़ बडे़ वैज्ञानिक , राजनेता और कार्पोरेट घराने अपने अपने स्पेसशिप में बैठ कर अंतरिक्ष में चले गए थे ! दो साल बाद जब पृथ्वी पर परमाणु विकिरण खत्म हुआ, नए पेड़ पौधों ने ऑक्सिजन का उत्पादन और गुणवत्ता नियंत्रित किया तो स्पेस शिप पृथ्वी पर वापस लौटे ! अगले दस साल इंफ्रा स्ट्रक्चर खड़े होने में लगे ! दुनियां अब सतयुग के दायरे में थी।  देश और दुनियां की बच्ची खुची आबादी अपना अतीत ढूंढ रही थी ! इसी खोज में विश्व की नई महाशक्ति भारत के वैज्ञानिकों को साठ साल पहले का मच्छर हाथ लगा था ।
         अगले दिन पूरी दुनियां से मिडिया वाले दिल्ली आए हुऐ थे ! उनमें ज़्यादातर नई दुनियां के लोग थे़ । सबकी नजरें एक बडे़ स्क्रीन पर लगी थीं, जहां तीनों चोटी के वैज्ञानिक मच्छर को घेर कर खड़े थे ! उसके ब्लड सैंपल से क्रोमोजोम्स लेकर तीनों वैज्ञानिक अलग अलग मशीनों द्वारा जांच कर कर रहे थे़ ! सबसे पहले युवा वैज्ञानिक सरदार मंजीत सिंह चिल्लाए , " रब दी सौं, मैनू कदी ना बेख्या ऐसा जानवर !"
      " क्या मतलब" ? डॉक्टर अजीत ने पूछा !
" बॉडी डायोग्राफ़र मशीन के मुताबिक मच्छर ने कोमा में जाने से पहले जिस जीव का खून पिया था़, दिखने में वो हमारे पूर्वज इन्सानों जैसा है! पर उसकी खुराक़ डायनासोर से बड़ी है !"
   "क्या मतलब"?
" जाने  किस ग्रह से पृथ्वी पर आया था, इसके फेवरेट भोजन में कंद मूल या कढ़ी की जगह कमीशन खाने का सबूत है ! कैरेक्टर डाटाबेस की जांच से पता चला है कि ये मर्डर, रेप, करेप्शन और किडनेपिंग में इन्वॉल्व था ! क्या आप इस जीव के प्रोडक्शन का रिस्क उठायेंगे "?
   डॉक्टर अजीत के बोलने से पहले ही dr सिद्दीक़ी चिल्लाए , " खुदा की मार हो इस पर ! आखिर इस मासूम मच्छर ने इतना खतरा क्यो उठाया !"
       " अब क्या हुआ डॉक्टर ?"
  " इसका मेमोरी डॉट्स एक्टिव हो चुका है ! मैंने उसे इसके कैरेक्टर डाटा बेस से जोड़ दिया है! माय गॉड ! ये तो एक दर्जन हिंदू मुस्लिम दंगे करवा चुका है ! ये तो पूरी दुनियां के लिए खतरनाक है !" 
                " इसका निर्माण कर हम इसे म्यूजियम में रखने का रिस्क नहीं उठा सकते ! " डॉक्टर अजीत वर्मा बोले " ये नई सभ्यता को पनपने से पहले ही खत्म कर देगा । सारे क्रोमोसोम्स फ्रीज़ कर दो और मिडिया को बोलो कि हर कोशिश के बाद भी हम डीएनए को ऐक्टिव करने में नाकाम रहे ! बाई द वे , इस जीव को हमारे पूर्वज क्या कहते थे ?"
        " मेमोरी डॉट्स और कैरेक्टर डाटा बेस में इसे "नेता" की पहचान दी गई है "!
 "  नेता ! ओह गॉड, सो डेंजरस ! गुड बाय मिस्टर नेता , हमारी दुनियां को अभी किसी नेता की जरूरत नहीं है । हम अभी नफ़रत और हिंसा मुक्त दुनियां के निर्माण में लगे हैं । ब्वायज ! इसे सीज़ कर दो !"

    और,,,,,इस तरह नई दुनियां तबाह होने से बच गई !
       

Tuesday, 1 December 2020

Friday, 27 November 2020

" कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन!"

        ''जामुन"  से   "जोंक''  तक 

      मुझे आज तक बचपन से ज़्यादा लज्जतदार कुछ नहीं मिला ! शायद बचपन देख कर ही खुदा को जन्नत बनाने का ख्याल आया होगा ! बचपन,,,,यानी हमारी हुकूमत और बादशाहत का वो दौर जब हमारी चाहत पूरी करने वाले कतार लगाकर खड़े होते हैं ! जब हमारे रूठने पर पूरा घर मनाने पर उतर आता है ! जब हमारे रोने की आवाज़ से मोहल्ले के डॉक्टर को छोड़कर सब मायूस हो जाते हैं! वो बचपन, जहां बच्चे के देर तक जागने पर लोरियां जन्म लेती हैं , खिलौने बोलते हैं और मां बाप रात आखों मे काट देते हैं !
         वही बचपन, जो  इन्सान की ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार आता है और यादों के ढेरों ख़ज़ाने सौंप कर चला जाता है! उम्र हमें इतनी भी मोहलत नहीं देती कि ज़िन्दगी के इस बेहतरीन ख़ज़ाने को हम पूरी तरह सहेज कर रख सकें ! उसके पहले ही हम वर्तमान की धूप में खड़े कर दिए जाते हैं, जहां हालात और दुनियां हमारी यादों पर अपने मोहरे खड़े कर देती है ! बस वहीं से हमारी सल्तनत का शीराजा बिखरने लगता है, हम चक्रवर्ती सम्राट से सीधे चौकीदार होने लगते हैं ! आज़ादी खत्म - अधीनता की ज़िन्दगी शुरू ! पहले टीचर के आधीन, फिर बॉस के आधीन और फिर बीबी के आधीन ! अंतर: बुढ़ापे में औलादों के आधीन ! 
      बचपन   !  क्या बादशाहत के दिन थे यार! नमक तेल लकड़ी की कोई फ़िक्र नहीं । ऊंच नीच के बारे में हमें कभी बताया ही नहीं गया ! हम शेख़ सैय्यद ! हमारे दोस्तों में दलित, ठाकुर,अहीर पंडित सभी थे!  आज़ सोच कर हैरान हो जाता हूं बाबूलाल की लाई हुई उबली शकरकंद हम सब मिलकर खा लेते थे ! ( ऊंच नीच और जाति के बारे में सारा ज्ञान स्कूल से  मिला ज़रूर पर अमल की पाबन्दी या सख्ती नहीं थी।) अखाड़ा, कुश्ती और कबड्डी में मेरा प्रतिद्वंदी संतराम भी एक दलित था ! गांव में जाता हूं तो संतराम के साथ आज भी हम बचपन की यादों के सारे एलबम उलट लेते हैं।
          वैज्ञानिकों का दावा है कि इंसान का दिमाग जन्म से पांच वर्ष की आयु तक ९५ प्रतिशत डेवलप हो जाता है! बकाया ५ फीसदी विकसित होने में पंद्रह साल लग जाते हैं ! हमारे दौर के बचपन की उम्र दस साल तक थी। हमारी पीठ पर दस किलो किताबों का बोझ नहीं होता था । शुरुआत में लकड़ी की एक मजबूत तख्ती होती थी । उसी से हम आपसी विवाद तक निपटा लेते थे । तख्ती को घोंट कर चमकाने के लिए हम भी जाने कहां कहां से संजीवनी बूटी लाते थे ! आपस में लड़ते ज़रूर थे़, पर कभी घर में बताते नहीं थे़ ! ( तब घर में पिटने की भरपूर सम्भावना रहती थी।) 
         छोटे से बचपन का दायरा हमारे दिलों की तरह बडा़ था ! गांवों में बिजली नहीं थी मगर चांद की रोशनी में हम देर रात तक खेला करते थे । कुएं के पानी में खाना पकता था, उसी से खेत सींचते और उसी को पीते, पर कभी बीमार नहीं हुए ! बल्कि जिस कुएं के पास पेड़ होता, उसका पानी गर्मियों में रूह तक को सुकून देता ! ( आज हर घर में हैंडपंप है और उपेक्षित और लावारिस कुएं अपना बचपन ढूंढ रहे हैं!) हमें याद है कि मेला देखने के लिए मां से मिले २ रुपए पाकर हम कितने लबालब होकर घर से निकलते थे़ । इतनी बड़ी रकम देकर अम्मा ताकीद भी करती थीं कि छोटे भाई के लिए क्या क्या लाना है!
                            धान की फसल के बाद जब गेंहू के लिए खेत जोते जाते और सर्दियां दबे पांव गांव में उतरती, तो हम पूरी चांद रात गांव से बाहर खेतों में कबड्डी खेलते । सुबह खेत की हालत देखकर किसान गालियां देते जिसे हम लौंडे विटामिन और प्रोटीन समझकर लेते। जाड़े की सर्द रातों में पकते हुए गुड़ की सोंधी खुशबू में मदमस्त गांवों और चांदनी में बुझते हुए अलाव के गिर्द तिलिस्मी कहानियों में खोए हम बच्चे! अक़्सर कहानियां पूरी होने से पहले ही अलाव के किनारे हम नींद में लुढ़क जाते थे !  ( कहानी का वही रूहानी तिलिस्म जाने कब मेरी कलम और किरदार में उतर गया !) मै आज भी उन गुमशुदा कहानियों को ढूंढता हूं !
      मैं जब जब बचपन में झांकता हूं तो यादों के तालाब में  'जोंकें ' ज़रूर नज़र आती हैं! हर साल तालाब में कमल खिलते , हर दिन हम नहाते और हर दिन हमारा कोई ना कोई दोस्त जोंक का शिकार बनता ! हमें मगरमच्छ से ज़्यादा खौफ इस ३ इंच की  जोंक का होता था । तालाब में हमारे खेल भी बडे़ चुनौती वाले और खतरनाक हुआ़ करते थे ! मसलन - तालाब के किनारे वाले पेड़ पर चढ़ कर तालाब में छलांग मारना ! गहराई में  ईंट को फेंकना,फिर उसे पानी में डुबकी मार कर सबसे पहले निकालना ! वो हमारा मैराथन था !
         जाने कहां गए वो दिन ! बडा़ क्या हुआ , खुशियों की सारी कायनात छोटी हो गई ! चालीस साल दिल्ली में रहकर भी मेरा  गांव  और बचपन धुंधला ना हुआ़ ! ये सिर्फ हमारा बचपन नहीं है , यादों के इस आइने में आप सब के बचपन मुस्करा उठे होंगे ! वो बचपन - जो सरापा ज़िंदगी हमारी मायूसी को अपनी मासूम शरारतों भरी  यादों से दूर कर देता है! बचपन - यानी हमारी सल्तनत की वो जागीर जो हमारी सांसों के साथ ही विदा होती है!
 हमारे  मासूम अरमानों का ख्वाबगाह ! 

            काश ! हमारी ज़िन्दगी हमारे बचपन से कुछ सीख लेती ! हम क्या जवाब देंगे अपने बचपन को !  . आजा बचपन एक बार फिर,,,,,,,!!!

           ( सुलतान भारती )

     

Monday, 23 November 2020

[ व्यंग्य चिंतन] " सूर्पनखा रिटर्न "

                 ( आप सब कल्पना कीजिए कि आज़ 2020 में अगर सूर्पनखा की नाक काटी गई होती तो बाहुबली रावण और उसकी फैमली पर क्या प्रतिक्रिया होती ! तो ,, आइए देखते हैं !!)

              " एक कटी हुई नाक" ! 

        अपने शानदार फॉर्महाउस अशोक वाटिका में रावण बैठा गृहमंत्री विभीषण के बारे में खुफिया एजेंसी की भेजी गई रिपोर्ट देख रहा था । सुपरसोनिक पुष्पक विमानो के सौदे में  "विभू" ने करोडो डॉलर कमीशन खाया था ! यानी इस जन्म में भी विभीषण अपनी आदत से मजबूर थे ! रावण ने फाइल एक तरफ रखी, हाथ को सेनेटाइज किया और चेहरे से फेस मास्क उतारते हुए खुलकर सांस ली। उसके बाद वह लैपटॉप पर अपनी फेवरेट फिल्म  ' बजरंगी भाई जान ' देखने लगा ! तभी उसके फ़ोन पर मिस्ड कॉल आई ! रावण ने पलट कर फोन किया , उधर से जानी पहचानी कॉलर ट्यून बजी,' "मुश्किल करदे जीना - इश्क कमीना '!
        रावण समझ गया कि दूसरी तरफ उसकी छोटी बहन सूर्पनखा है ! रावण घबरा गया , बहन रोती हुई  कह रही थी, ' भैया ! मेरी नाक फिर कट गई !'
  रावण को बिलकुल हैरानी नहीं हुई ! उसने नॉर्मल लहज़े में पूछा, " तुम नाक लेकर जाती ही क्यों हो ?"
  सूर्पनखा ने धमकी दी, " अगर इस केस में आप ने कुछ ना किया तो मैं अपनी कटी हुई नाक का विडियो विभीषण भइया को पोस्ट कर दूंगी । विभू भइया तुरंत वॉयरल कर देंगे ! फिर अपनी नाक कैसे बचाओगे "?
        इतना कहकर शूर्पी ने फ़ोन काट दिया !
रावण धर्मसंकट में था ! मेघनाथ किडनी बदलवाने इण्डिया गया हुआ था ! विभीषण एक और कमीशन का चेक लेने मलेशिया की यात्रा पर था। कुंभकरण था तो लंका में, लेकिन एक कुंटल गांजा पीकर छे महीने के लिए कोमा में जा चुका था ! रावण ने डायरी देख कर तीन नाम निकाले ,और फ़िर पहला फोन अमेरिका में चुनाव हार चुके डॉनल्ड ट्रंप को मिलाया ! रावण ने बहन के नाक कटने की व्यथा बताई, तो उधर से ट्रंप ने रावण का मजाक उड़ाते हुए कहा, " भतीजे! तुम समझदार नहीं खोत्ते  हो जो इस जमाने में भी नाक की परवाह करते हो ! हमारे देश में तो महिलाओं का कुछ भी लुट जाए, पर हम उसे नाक पर नहीं लेते "!
        " क्यों ?"
             "  इतना भी नहीं समझे कि अब लक्ष्मी बाई का नहीं, जलेबी बाई का ज़माना है! जानम समझा करो"!
      रावण ने फ़ोन काट दिया - वाइडन से हारने के बाद ट्रंप अनाप शनाप बोल रहे थे़ !  रावण ने अपने कुलगुरू का नंबर निकाला जो बलात्कार के अपराध में भारत की एक जेल में बंद थे़ ! रावण ने फ़ोन करके कहा, ' सत श्री अकाल गुरु जी !"
      " ओय रावण पुत्तर ! की हाल चाल है ट्वाडा !"
  " क्या बताऊं गुरु जी ! छोटी बहन की नाक कट गई !"
"ओय तो इसमें माइंड करने दी की गल ! हुण तुसी ऐवे कर, सूर्पनखा नू साड्डे कोलों पेज दे! असी एडजस्ट कर लांगे ! साड्डे नाल रहेगी ता ऐश करेगी !"
रावण हैरान था, " मै समझा नहीं गुरु जी !"
    " त्वाडे समझने दी की लोढ़ ! नाक कट गी तो कट जान दे ! त्वाडी बहन विदाउट नाक भी चलेगी ! बस तुसी शुर्पी नू साड्डे कोलों पेज दे !"।                                     अब रावण का माथा ठनका,उसने गुस्से से पूछा, "आप कहना क्या चाहते हैं ?"
            " देख पुत्तर ! वाहे गुरु ने किन्नी सोनी जोड़ी बनाई है ! कुंडली दा मैच देख - हम दोनों ने ही नाक कटाई है !! बल्ले बल्ले, ते याहू याहू !!"
रावण गुस्से से चिल्लाया , " सूर्पनखा तुम्हारी बेटी की तरह है! तुम्हें शर्म आनी चाहिए !!"
         " मै इस दुनियां के रिश्ते मानता ही नहीं ! "शूरपी" ने पेज दे ! असी इक नवीं फिल्म बनावांगे, और ज़मानत मिली तो अगला वेलेंटाइन लंका आकर मनावांगे !"                   रावण ने घबराकर फ़ोन रख दिया ! थोड़ी देर में नॉर्मल होने के बाद रावण ने आखिरी फोन अपने फेमिली फ्रैंड प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को लगाया ! उधर से हिन्दी में गाने की आवाज़ आई,, - मोहे -  'पीओके '  पे नंदलाल छेड़ गयो रे ! गज़ब भयो रामा जुलम भयो रे !"
      रावण हैरान था, " खान साहब ! क्या हो गया ! हिन्दी में रो रहे हो ?" 
        " ओय खोचे रावन बिरादर ! इस भरी दुनियां में कोई भी हमारा ना हुआ़ ! मै फटेहाल पाकिस्तान को संभालूं या फजलुर रहमान को ! पीओके पर हालत ख़राब है निरादर !"
        " पीओके पर क्या हुआ ?"
             " उधर इंडियन आर्मी रोज आकर हमारा दरवाज़ा खटखटा कर मेरे बारे में पूछती, - " खोचेे  बुड्ढा घर पर है ?"
   "   वेरी बैड !"
 " खोचे इससे भी बुरा ! छप्पन मुस्लिम कंट्री हैं, पर मोडी जी ने क्या शहद चटाई है कि आज की डेट में - इस भरी दुनियां में कोई भी हमारा ना हुआ़ ! खैर तुमने कैसे याद किया बिरादर !"
                 अब रावण ने अपने दर्दे दिल की वजह बताई , " बहन की नाक कट गई खान भाई !"
    इमरान खान चौंक कर बोले, ' सिस्टर ने बताया कि किसने नाक काटा ?"
       रावण ने झूठ बोला, " मैंने नहीं पूछा !"
" खोचे पूछने का ज़रूरत ही नहीं, नाक तो ज़रूर किसी हिन्दुस्तानी ने काटा होगा !"
      रावण दंग था ! इमरान को कैसे पता, " भाईजान ! आप तो जीनियस हो ! आप को कैसे पता चला! ओह ख़ान तुसी ग्रेट हो !"
   "  ओय नहीं रावण बिरादर ! ये ग्रेट वाली नहीं, शर्म की
बात है ! अल्लाह दुहाई है दुहाई है ! कश्मीर से कारगिल तक हमने नाक ही कटाई है !! हमकू पता है !!"
      रावण की उम्मीद ठंडी हो रही थी !
   " खोचे रावण बिरादर ! बीसवीं सदी में तुमने पहली बार नाक कटाई है, इसलिए बिलबिला रहे हो ! हम तो पिछले सत्तर साल से रेगुलर नाक कटा रहे हैं !" 
    " अदभुत नाक है ! " 
  " ट्रेज्डी देखो ! हिन्दुस्तान का मुस्लिम भी हमारा सपोर्ट नहीं करता ! उधर का हिन्दू मुस्लिम आपस मे लाठियां चलाता है, पर हमारा नाक काटने के लिए दोनो एक हो जाता है !"
         " बहुत दुख हुआ "! 
  " इस सर्जिकल स्ट्राइक ने रही सही मेरे नाक की "टीआरपी" ही खत्म कर दी "!
         " मेरे लिए क्या सलाह है भ्राता श्री ?"
" एक बार कटी सो कटी ,  कोशिश करो कि आगे नाक ना कटे ! "! इतनी सलाह देने के बाद इमरान खान ज़ोर ज़ोर से गाने लगे , " दुनियां बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई ! तूने काहे को नाक बनाई "!!

             रावण सर पकड़ कर बैठ गया !

Saturday, 21 November 2020

" कोरोना तुम कब जाओगे"!

           अमा कोरोना मियां, बड़े बेगैरत किस्म के जीव हैं आप ! गुरबत में आये मेहमान की तरह जम कर बैठ गए हो ! हजारों लोगों को निगल कर भी पेट भरा नहीं ! करोड़ों बेरोजगार बददुआ दे रहे हैं और तू बेहयाई से डटा हुआ है! अबे अब तो चीन लौट जा! या फिर चीनी सेना की तरह जूते खाकर वापस जाएगा ! यहां से जाने के सवाल पर  क्यों केजरीवाल के खांसी की तरह ख़ामोश है! अब तो हम आत्मनिर्भर भी हो गए, अब किसलिए रुका है? अब तो हमें छोड़कर - कबूतर जा जा जा !!
       फरवरी में जब तुम आए तो जनता आश्वस्त थी कि अच्छे दिन की तरह तुम भी , सबेरे वाली गाड़ी से , चले जाओगे ! तब कौन जानता था कि तेरा आना मंहगाई की तरह स्थायी होगा ! विरोधी लहते हैं कि उस वक्त तुम और ट्रम्प साथ साथ आए थे! ट्रंप चले गए - कोरोना तुम कब जाओगे ! मार्च में हमारे नेताओं ने कहा था कि गर्मी में तुम्हारा प्रकोप होगा ! तब मुझे उनकी भविष्यवाणी नहीं समझ में आई थी ! बाद में पता चला कि मरकज वाले तुम्हे थैलों में भरकर लाये थे ! ( इसका पता पहले मींडिया को लगा बाद में केजरीवाल को ! ) गरमी जैसे जैसे बढ़ी वैसे वैसे प्राइवेट और सरकारी डॉक्टर तेजी से आत्मनिर्भर हो रहे थे ! तुम दीर्घायु हो रहे थे और लोग बेरोजगार , पर देश आगे बढ़ रहा था !
       तुम्हारा डर बढ़ता गया और लोग बेखौफ होते गए ! तुझे जुलाई अगस्त में ही चले जाना चाहिए था! तब तेरी वापसी सम्मान जनक होती ! अब तू मातम करता हुआ चीन जाकर बतायेगा कि - बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचे में हम आए ! अबे देख किया ना, तुझे कैसे तवायफ की तरह नचा रहे हैं ! कहां कहां तेरा इस्तेमाल हो रहा है, और तू मना भी नहीं कर सकता ! तेरी वजह से कितने घर में मुहर्रम उतर आया और   कितनो के घर दीवाली ! तुझे भी पता नहीं होगा कि पांच रुपए वाला फेस मास्क इतना चमत्कारी हो चुका है !  भारतीय पुलिस तेरी कुंडली बना रही है! वो सड़क पर कार रोक कर फेस मास्क चेक कर रही है! नाक से नीचे खिसके फेस मास्क
 को "जमाती" समझा जायेगा ! दो हज़ार का चालान !! दे दाता के नाम - तुझे " कोरोना" समझे !
          तू भी गज़ब का है ! बिहार के इलेक्शन के दौरान कोमा में चला गया ! जनता और जनार्दन दोनो थूथन उठाए विकास बटोरते रहे ! चुनाव में फेस मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की ज़रूरत इसलिए नहीं पड़ी, क्योंकि बड़े बड़े कोरोना चुनाव प्रचार में व्यस्त थे ! तुम्हें बता दिया गया था कि उधर मत जाना - दिशाशूल है ! सेंसेक्स नीचे चला गया और तुम कोमा में ! दिल्ली वाले इस गलतफहमी में स्वेटर खरीदने निकल पड़े कि पटाखे भी फोड़ लिए, अब तो कोरोना पक्का मर गया होगा ! ( हमें तो सदियों से पराली और प्रदूषण की  आदत है !) अब तो ' छठ ' भी निकल गया ! कोरोना तुम कब जाओगे !
                 लो जी, सब निपट गया, अब फिर तुम्हारी ज़रूरत पड़ गई , अत: साजन आन मिलो ! सुना है कि फिर तुम्हारी खुमारी टूट चुकी है !  दिल्ली में अभी चुनाव दूर है, इसलिए केजरीवाल जी दुबारा लॉक डॉउन की सोच रहे हैं ! कोरोना दद्दा ! मान गया तुम्हें, चुनाव से डरते हो - चुन्नीलाल से नहीं ! बाज़ार में विकलांग आलू भी पचास रुपए किलो बिक रहा  है, और जनता बगैर दिहाड़ी के आत्म निर्भर हो रही है ! बेकारी और गुर्बत के इसी रहस्यवाद  से कबीर पैदा हुऐ थे। अब तो  बरसे कंबल भीगे पानी का छायावाद समझ में आ गया होगा ।
गो कोरोना गो ! चीनी जनता तेरी याद में गा रही होगी, - अबहूं ना आए बालमा , सावन बीता जाए!
           हो सकता है इटली, फ्रांस अमेरिका आदि देश तुझे भूल जाएं , पर हम तुझे याद रखेंगे ! याद रखेंगे कि कोई दुश्मन देश से आया था, जिसकी नस्ल हमने बदली थी ! तू हमें इसलिए याद करेगा कि पश्चिमी देश तुझसे डरते थे और तू हमसे ! हमारे ठेके पर लगी भीड़ देखकर तुझे हमारे स्टेमिना का अंदाजा हो गया होगा ! तो,,, मेरे बारे में क्या ख्याल है! नया साल दिसंबर को लेकर चिंतित है! सारे  सांताक्लॉज इस बार बिहार में थैला खाली कर आए हैं ! अब बांटने के लिए तू ही बचा है ! इब हट जा ताऊ पाछे ने ! विकास आने दे ! अभी गनीमत है, सब्र मेरा - अभी लबालब भरा नहीं है !
 घणा खून पी गया !  इब लिकड़ ले बावली पूंछ !!

    देर ना हो जाए  कदी  देर ना हो जाए !!

Monday, 16 November 2020

"सच और झूठ के बीच का पर्दा !"

            आज मैं वादा करता हूं कि जो भी बोलूंगा, सच बोलूंगा - सच के अलावा काफ़ी सारा झूठ भी बोलूंगा! और क्यों ना बोलूं ! आफ्टर ऑल,,,, अभिव्यक्ति की आज़ादी है ! लिहाज़ा अब करूंगा गंदी बात !! नहीं, सच और झूठ की बात चल रही है, गंदी बात हमारे संस्कार से बाहर का एजेंडा है! झूठ कितना पॉपुलर और पॉवरफुल है कि अदालत तक को यकीन नहीं कि कोई शख्स बगैर गीता या कुरान को हाथ में लिए सच बोलने का रिस्क उठायेगा ! ( बल्कि किताब पर हाथ रखकर भी लोग झूठ की शरण में चले जाते हैं!) झूठ के सामने खड़ा - सत्यमेव जयते - कितना दीन हीन और अविश्वसनीय लगता है! 
       संस्कृत का एक श्लोक देखिए, सत्यम ब्रूयात - प्रियम ब्रुयात -!(सच बोलना चाहिए , मीठा सच बोलना चाहिए!) ये कैसे होगा ! सच तो कड़वा बताया गया है !! वो  ' परी ' कहां से लाऊं ? आगे कलियुग का समर्थन करते हुए सुझाव दिया गया है, - प्रिय असत्यम ब्रूयात ! अप्रिय सत्यम मा ब्रू यात ! जो स्वादिष्ट लगता हो, वो झूठ बोला जा सकता है ! ( चुनाव में तमाम दलों के नेता इसी श्लोक से प्रेरणा  पाते हैं !) जो कड़वा लगे या कलेजा छील दे, ऐसा अप्रिय सच कभी मत  बोलो ! झूठ की मार्केटिंग में इस श्लोक की बड़ी भागीदारी है ! कााा
                                लोग सच का बोर्ड लगा कर खुलेआम झूठ बेचते हैं! सड़क से संसद तक झूठ का दबदबा है ! झूठ च्यवनप्राश है, अमृत कलश है - वीटो पॉवर है ! झूठ बिकता है, चलता है डिमांड में है! सच कहावतों और कहानियों से ऑक्सीजन लेकर ज़िंदा है !सच हिंदी फिल्मों का आख़री सीन है जिसमें साधनहीन हीरो महाबली खलनायक पर विजय पाता है! हर सरकार सच को बचाने की शपथ लेती है पर  दिनों दिन सच गरीबी रेखा से नीचे जा रहा है ! कोई झूठ के पक्ष में खड़ा नहीं है फिर भी उसके सामने सच कैसे कुपोषित हुआ पड़ा है । 
         आज की दुनियां में तो कुछ चतुर सुजान ने वक्त की डिमांड देखते हुए सच बोलने पर "जीएसटी" लगा दी है, - बोलने का दुस्साहस करोगे तो भारी कीमत चुकाना पड़ेगा ! दूसरी तरफ, झूठ को टैक्स फ्री कर दिया है ! सारे बोलो,,,! सच के रास्ते में पड़ने वाले सारे मैनहोल के ढक्कन हटा दिए गए हैं, जिससे सच को नीचे गिरने में असुविधा न हो ! और,,,,,झूठ के रास्ते में पड़ने वाले सारे स्पीड ब्रेकर हटा दिए गए हैं - ' कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को -'! दोनों की सेहत में ज़मीन आसमान का फर्क देखिए, झूठ का स्टेमिना ऐसा मजबूत है कि कोरोना की पूरी कॉलोनी निगल जाए तो ज़ुकाम भी ना हो ! और,,,,,सच अगर मूली की तस्वीर भी देख ले तो छींकने लगेगा ! इसी झूठ ने कई धर्मों के सच को लहूलुहान किया है ! 
           चूंकि अतीत हमेशा सुनहरा और गौरवशाली होता आया है, इसलिए सच का भविष्य सोच कर सिहर जाता हूं ! एक हिन्दी फिल्म का गाना है - झूठ बोले कौआ काटे -! तो गोया अब झूठ से इन्सानों को कोई परहेज़ नहीं रहा ! सिर्फ कौओं को "घी" हज़म नहीं हो रहा है ! मगर कौए कब से सत्यवादी हो गए ! वो तो खुद झूठ के ब्रांड एंबेसडर बताए जाते हैं ! जबसे कलियुग आया है, कौओं ने हंसो से मोती छीन लिया है और तमाम अमराइयों से कोयल को बेदखल कर दिया है! अगर गलती से कोई कोयल नज़र आ जाए तो कौए ऑफर देते हैं, -' आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा ! मालिश कराना है '!
           झूठ अजर अमर है! झूठ रावण है ! हर बार अपना पुतला छोड़कर भीड़ में खड़ा हो जाता है ! भीड़ पुतला जला कर संतुष्ट है ! रावण  "नाभि" सहलाता हुआ मुस्कराता है ! वो अपने अमरत्व के प्रति आश्वस्त है ! असत्य पर सत्य की विजय से जनता गदगद है और हकीकत से आगाह रावण आश्वस्त! भीड़ में खड़ा "सच" रावण को पहचान रहा है , मगर सत्यमेव जयते के सिंहनाद में खोई जनता पुतले को रावण समझ बैठी है !
"झूठ" के  सांकेतिक दहन से  "सच" की जीत और रामराज की वापसी साफ साफ नजर नज़र आ रही है !

            सिर्फ रावण को असलियत पता है कि  "झूठ" दीर्घायु  हो रहा है !!