Thursday, 12 November 2020

" दीवाली स्पेशल!"

लक्ष्मी मैया  लिफ्ट करा दो !
कोठी बंगला गिफ्ट करा दो !!

संगम विहार से  ऊब गया मैं!
नॉर्थ ब्लॉक में शिफ्ट करा दो !! 
                                 लक्ष्मी मैया,,,,,,,,!
बहुत  हुई  "आपदा"  "आपदा"!
अब थोड़ा "अवसर" दिलवा दो!! 
                          .  ......लक्षमी मैया,,,,,,!
उल्लू को अब करो रिटायर !
हंसों  के  भी दिन लौटा  दो !!
                             लक्ष्मी मैया,,,,,,,,!
सूख रहा रिश्तों का पोखर!
फिर से बहती नदी बना दो !!
                              लक्ष्मी मैया,,,,,,,!
प्यार , मुहब्बत  - भाईचारा !
घर घर की पहचान बना दो !!
                              लक्ष्मी मैया,,,,,,!
"राम नाम" का चोला पहने!
रावण को बनवास दिला दो!!
                                लक्ष्मी मैया,,,,,,!
भूखा बचपन आंख में आंसू!
चेहरों पर मुस्कान सजा दो!!
                               लक्ष्मी मैया,,,,,,,,!
खुशियों पर अधिकार सभी का!
ऊंच  नीच  का  फर्क  मिटा  दो !!
                                    लक्ष्मी मैया,,,,,!
"नंबर वन"  हो  भारत   अपना !
ताकत - दौलत - प्यार दिला दो!!
                                     लक्ष्मी मैया,,,,,!
"कोरोना"  खा    गया   नौकरी !
अब  तो  ये  तांडव  रुकवा  दो !!
                                    लक्ष्मी मैया,,,,,!
इस "दीवाली"  बस  इतना  ही !
निर्धन को  "सुलतान" बना दो!!
                                   लक्ष्मी मैया,,,,,,,!

  -     (  सुलतान  " भारती" )  -

Tuesday, 10 November 2020

।। "खांसते रहो !"

             आदमी की फितरत देखिए, मरना ही नहीं चाहता ! बीमार होने पर आसानी से अस्पताल नहीं जाना चाहता और कोरोना को मौसमी वॉयरल बताकर डॉक्टरों से बचना चाहता है। विकास की तरह बीमारी भी - हरि अनन्त हरि कथा अनंता - है। डॉक्टर और केमिस्ट की  जन्नत का दरवाजा इसी दोजख से होकर जाता है। कितने  "ज़मीनी भगवान" ( डॉक्टर) तो अपनी बेटी का रिश्ता तक बीमारी का मुहूर्त देखकर तय करते हैं , " लड़के वाले जल्दी मचा रहे थे,पर मैंने शादी की तारीख़ दिसम्बर से हटाकर जून कर दी!  मई जून खांसी, ऐक्सिडेंट, टीबी और हैजा का सीज़न होता है - यू नो !"
        खांसी से पीड़ित लोग अमूमन उतना नहीं घबराते जितना सुनने वाला घबराता है । क्या पता टीबी ना हो ! खांसी की वैरायटी बहुत है। डॉक्टर को भी उतना ज्ञान नहीं होगा जितना यूपी वालों को होगा ! सरसों के खेत में उड़ता हुआ भुनगा गले में घुस जाए तो यूपी वाले ऐसे खांसते हैं गोया गले में पेड़ उग आया हो ! हुक्का पीने वाले बुजुर्ग खांसने पर उतर आएं तो पूरे मोहल्ले का रतजगा करा दें! इतने ज़बरदस्त तरीके से खांसते हैं कि आंतों में रूकी हुई गैस भी ख़ारिज हो जाती है ! हमारे गांव के गियासू भाई बीड़ी के चेन स्मोकर थे, ( खुदा उन्हें जन्नत दे!) जब खांसना शुरू करते तो मुंह के अलावा भी कई जगह से आवाज़ आती थी !
         कुछ लोगों ने खांसने में भी काफी नाम कमाया है! इन्हें अगर वरीयता क्रम में रखा जाए तो  'केजरीवाल' जी की खांसी को गोल्डमेडल मिलेगा ! क्या खांसी थी, उड़ी बाबा! लोग निरूपा रॉय की खांसी भूल गए ! जब खांसने पर उतारू हो जाते तो टीवी देख रहा अभिभावक बीबी को डांटता था, "  बच्चों को टीवी से थोडा़ दूर बिठाया करो "!  उन्होंने खांस खांस कर पूरे देश को इमोशन में ला दिया था ! उनकी खांसी से घबराकर दिल्ली के वोटरों ने  डिसाइड किया कि जिताने से ही जान छूटेगी ! और,,,, जीतते ही उन्होंने मफ़लर और खांसी को अलविदा कर दिया ! अब उनकी खांसी अच्छे दिन की तरह नदारद है और दिल्ली वाले खांस रहे हैं ! विरोधियों का दिल पराली की तरह जल रहा है और केजरीवाल जी मुस्करा कर प्रदूषण पर झाड़ू फेर रहे हैं! आंकड़ों में पराली खाद में बदल रही है और खांसी मुस्कराहट में ! खुशहाल दिल्ली फेस मास्क लगाए आज भी खांस रही है!
         कुछ खांसी सामयिक होती है, कुछ अल्कोहलिक और कुछ मौसमी! एक  "कुकुर खांसी" भी होती है जिसकी दवा है - कुकर सुधा !( नाम से ऐसा लगता है कि इसका आविष्कार  किसी कुत्ते ने किया होगा !) लेकिन इसके इतर एक रहस्यमय खांसी ऐसी ऐसी भी है जो सनातनकाल से चली आ रही है, और आजतक उसका कोई इलाज नहीं है ! अगर आपके याददाश्त का प्लग स्पार्क नहीं कर रहा तो याद दिला देता हूं!
                ये रहस्यमय खांसी की बीमारी हिन्दी फ़िल्मों के गरीब हीरो की विधवा मां को होती थी ! याद कीजिए, गरीब गांव का बचपन से गरीब और अनाथ हीरो ! हीरो की खांसती हुई अम्मा ! पास में सनातनकाल से बनता आ रहा एक बांध ! ( पता नहीं उस बांध का ठेकेदार कौन है !) हर तीसरी फिल्म में माता जी खांस रही हैं और बांध पर डायनामाइट फट रहा है! हीरो पीपल के नीचे वाले गुरुकुल में पढ़ कर भी डायरेक्ट दरोगा हो रहा है! दर्शक सोच रहे हैं कि अब हीरो माता जी के बलगम की जांच ज़रूर कराएगा , पर हीरो इतना हयादार नहीं है वो माता जी के लिए खांसी की दवा लाने की बजाय हीरोइन से इश्क कर रहा है।  खांसी और ज़ालिम जमींदार के बीच में माता जी ऑक्सीजन पीकर खड़ी हैं ! ( मैंने उन्हें किसी फिल्म में खाना खाते नहीं देखा !)

        जब से कोरो ना आया है, हर बीमारी में उसी की छवि नज़र आती है ! तीन दिन पहले  जुकाम हुआ,फिर बुखार और फिर गला ख़राब ! मित्रों ! ये किस बीमारी के लक्षण हैं ! मुझसे आजिज आए दोस्तों की खुशी के लिए बता दूं कि तीन दिन से खांसी भी आ रही है ! कोरो ना सोच कर ख़ुश होने वाले मित्र मुगालते में ना रहें ! आज मैं बिलकुल ठीक हूं ! दर्द और बुखार दोनों ठीक हो चुका है ! क्या कहें -  कुछ लोगों की बददुआ में एंटी बायोटिक की तासीर होती है !
          खांसते रहिए !!     ( सुलतान भारती)

Saturday, 7 November 2020

(व्यंग्य चिंतन) 'अब किसी बात पर नहीं आती'

                   मैं जो भी कहूंगा, सच कहूंगा ! सच के अलावा,,, (मौका मिला तो काफ़ी सारा झूठ भी बोलूंगा!) यकीन मानों मैं हंसना चाहता हूं! ( कई लोग मेरे इस दुस्साहस पर हैरान होंगे !) पिछले चार महीने से बिलकुल हँसी नहीं आई ! हँसी के विलुप्ति के पीछे कांग्रेस या कोरोना का कोई हाथ नहीं है! बल्कि जब मार्च २०२० में कोरोना आया तो मैं हंस रहा था, -  बेटा  आ तो गया है अब बहुत बे आबरू होकर जायेगा -! आज कोरोना बड़ी साँसत में है! दुनियां के बड़े बड़े ताकतवर देश के नेता उसे सुनकर कांप रहे हैं, लेकिन यहां तो जूता पॉलिश करने वाला भी मास्क नहीं पहनना चाहता ! यहां कोई ये बिदाई गीत भी नहीं गा रहा है, " अब तो फूफा जी (ट्रंप) भी चले गए - कोरोना तुम कब जाओगे " !
             मई २०२० में आख़िरी बार हँसी आई थी, उसके बाद आत्मनिर्भर नहीं हो पाया ! पूरा जून बीस लाख करोड़ का इंतजार करता रहा! हंसना तो बहुत दूर, इतना सीरियस हो गया था कि ख़्वाब में भी कल्कुलेटर लेकर हिसाब लगाने लगता था कि इतनी आत्मनिर्भरता कहां कहां खर्च करना है! ऐसे में हंसना कौन कहे, मुस्कराने की भी फुरसत किसे थी !! अगले दो महीने प्रधान मंत्री मत्स्य पालन योजना में जाल डाल कर बैठा रहा ! इतनी भागदौड़ की कि रोना आ गया , प्रोजेक्ट रिर्पोट नहीं आई ! बार बार दिल कर रहा था कि अपने ऊपर हंसू, पर हलक सूखा हुआ था!
          नवंबर शुरू हो चुका है। मुद्रा और मनोबल दोनों पकड़ से बाहर हैं ! कल वर्मा जी समझा रहे थे कि आदमी को खुश रहना चाहिए ! खुश रहने से सेहत अच्छी रहती है ! ( वर्मा जी की सरकारी नौकरी है!) मैं भी चाहता हूं कि  हँसू और खुश रहूँ, पर कैसे ! हँसी तो मुंह से निकल कर जैसे पेट में गिर चुकी है ! दो तीन बार मुंह पीट कर देख लिया - कोई फायदा नहीं। गलाला करके देख लिया ! बलगम निकल गया, बेवफ़ा हँसी नहीं निकली! एक शेर बरबस जबान पर आ गया -

पहले आती थी हाले दिल पे हँसी !
अब  किसी  बात  पर  नहीं आती !!
                          अतीत  हमेशा सुनहरा ही क्यों होता है ! ( कोई बताता ही नहीं !) ' पहले देश सोने की चिड़िया थी ' ! ( तब शायद विकास की जिम्मेदारी नेताओं पर नहीं थी !) ' पहले दूध घी की नदियां बहती थी '! ( गाय भैंस पानी पीकर नदी में दूध छोड़ देती थीं !) अब क्या प्रॉब्लम है! आज भी देखिए - कलियुग जा रहा है , सतयुग आ रहा है ! चारों ओर धर्मयुद्ध की गर्जना ! मंदिर मस्जिद, शादी ब्याह, फिल्म, विज्ञापन  पटाखे  सब का  "डी एन ए" टटोला जा रहा है ! इसके बावजूद अगर किसी को हँसी नहीं आती तो वो अपराधी है या विद्रोही ! मुझे अपना ही एक शेर राहत देता है ,-

हर एक ज़ख़्म पर हंसने का हुनर पैदा कर !
वगरना   रोने  के  दुनियां  में  सौ  बहाने हैं !!
          तो,,, ताजा नवैयत ये है कि अब मुझे बिलकुल हँसी नहीं आ रही ! कोई  "हकीम लुकमान" या "वैद्य धन्वंतरि" का नुस्खा काम नहीं आया तो मैंने चौधरी को अपनी दिक्कत बताई, - मुझे हँसी नहीं आ रही ?"
     " पर माेय रोना आ रहो ! कूण सा बुरा बखत था जिब मैं थारे धौरे आकर बसा । कती हंसने कू तरस गयो "!
    " मुझे तो छे महीने से हँसी नहीं आ रही ! क्या करूं, कहां जाऊं"? 
       " मेरे बकाया पैसे लौटा दे, उधारी का बोझ हटते ही दोनो हंसने के लायक हो ज्यां गे "!
       
        दो दिन से लगातार छींक आ रही है ! कल से खांसी, जुकाम और बुख़ार भी है ! ये सारे लक्षण "आत्मनिर्भरता" वाले हैं ! दिल को समझा रहा हूं, -' ट्रंप की हार को दिल पर मत ले ! वो हार कर भी मुस्करा रहे हैं और तेरी तो अठन्नी भी  नहीं  गिरी, फिर भी शक्ल से ऐसा लग रहा है जैसे सिर्फ तुम्हारा ही पैसा  लेकर विजय माल्या भागा हो। दिल बेवजह मायूस है और हँसी जैसे कुएं में गिर गई है ! अतीत कितना सुंदर था जब बात बात पर हंस लेते थे ! अब तो विलुप्त होती हुई हंसी  को लेकर शायर कहते हैं -,

या  तो  दीवाना  हंसे  या  तू जिसे  तौफीक़ दे!
वरना इस दुनिया में आकर मुस्कराता कौन है !!

      Sultan bharti   (journalist)

Tuesday, 3 November 2020

" नेता और प्याज़" !

         मैने जब सुना कि नीतीश कुमार जी पर प्याज़ फेंकी गयी तो मुझे अपनी किस्मत पर रोना आया। दुख की जगह मुझे नीतीश जी के भाग्य से ईर्ष्या हुई, - काश ये प्याज़ मेरे ऊपर फेंकी होती तो कम से कम घर के किचन को गुड फील होता। आज कल सब्जी की दुकान पर खड़े होकर प्याज़ का दाम पूछो तो सुनकर कलेजा बैठ जाता है! किस्मत की कलाबाजी देखिए कि उनके ऊपर प्याज फेंकी जा रही है जिसे प्याज़ की कोई चाहत नहीं है !इस वक्त उनकी चिंता वोट को लेकर है, और उन्हें प्याज़ मिल रही है। इसी को कहते हैं,। - बिन मांगे  ' प्याज़ ' मिले,  मांगे मिले ना 'वोट '!
                                नीतीश जी सियासत के घाघ खिलाड़ी हैं, अरसे से विपक्ष के छिलके उतारते आए हैं! इस बार हालात ने समीकरण बिगाड़ रखा है! महंगाई, रोज़गार और भ्रष्टाचार पर विजय पाने से पहले प्याज़ टपक पड़ी ! प्याज़ बड़ी अचूक मिज़ाइल है, जब जब वार करती है - खाली नहीं जाता ! बीजेपी के लिए प्याज़ अशुभ रही है! सुषमा स्वराज ( स्वर्गीय) जब दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं तो दिल्ली में कांग्रेस ने उस वक्त नारा दिया था, - प्याज़ टमाटर तेल खतम !
       बीजेपी का  खेल  खतम !!
          मज़े की बात ये है कि इस चुनाव में कोरोना किसी का मुद्दा नहीं है! ( दैवीय आपदा पर नेताओं का क्या ज़ोर !) देश में कोरोना को इतना अंडर स्टीमेट कर दिया है कि वो ठीक ठीक पैसला नहीं कर पा रहा कि रुके या जाये ! जनता डरने की जगह बगैर फेस मास्क के भीड़ में घूम रही है और कोरोना भीड़ देख कर सदमे में हैं! लोग कोरोना से ज़्यादा प्याज़ से डर रहे हैं ! प्याज़ का इंडेक्स ऊपर जा रहा है, कोरोना का नीचे ! प्याज़ बाउंड्री रेखा के बाहर जा रही है और कोरोना गरीबी रेखा से नीचे ! 
               प्याज़ फेंकने के मामले पर नीतीश का कहना था,- ' फेंकने से कुछ नहीं होगा '! वो ठीक कह रहे हैं कि फेंकने से कुछ नहीं होगा ! देश में पहले से ही एक से एक  " फेंकने" वाले मौजूद हैं ! ऐसे ऐसे फेंकने वाले मौजूद हैं कि एक बार फेंक कर भूल जाते हैं और जनता उसे सच समझ कलियुग के पतझड़ में सतयुग का बसन्त ढूढने लगती है ! नीतीश जी तजुर्बेकार नेता हैं ! तभी वो कह रहे हैं कि फैंकने से कुछ नहीं होगा ! जाने उनका इशारा किस तरफ़ है, पर जानते वो भी हैं कि "फेंकने" से कुछ नहीं होता ! फिर भी लोग फैंकने से बाज नहीं आते , मौका मिलते ही " फेंकने" लगते हैं!
             कल बेगम एक किलो प्याज़ खरीद कर लाई और सीधा मुझ पर हमला कर दिया, " आगे से बाज़ार तुम्हीं जाना, पता तो चलें कि प्याज़ को ढूढने में कितना खतरा है !"
      " प्याज़ खरीदने में कैसा खतरा?"
                  " प्याज़ खरीदने में नहीं, ढूढने में खतरा है! मण्डी में प्याज़ कम है और भीड़ ज़्यादा  ! सस्ती प्याज़ ढूढने पर भी नहीं मिलती, कोरोना भीड़ में कहीं भी मिल  सकता है ! आज लगे इस चाइनीज़ कीड़े में "!

  बेगम आग उगल कर चली गईं, और मै कल्पना करने लगा, - काश - "लक्ष्मी मैया"  लिफ्ट करा दे! 
                     प्याज़ टमाटर गिफ्ट करा दे !!


        

Monday, 2 November 2020

" निंदा" में रस बहुत है,,,,,,!

            अगर कोई मुझसे पूछे कि - रस कितने प्रकार के होते हैं , तो मेरा जवाब होगा, ' चाहे जितने तरह का हो पर निंदा रस के सामने सारे भिन्डी हैं ! मीडिल क्लॉस में दाखिले से पहले ही मैं इस रस की महानता से परिचित हो गया था। जब हम लंच में क्लॉस से बाहर जाते तो गणित और विज्ञान के अध्यापकों की निन्दा करते  और फीस टाइम पर ना देने के लिए अध्यापक के सामने अपने मां बाप की निन्दा करते, - मेरी कोई गलती नहीं, फीस मांगने पर अब्बा ने कान ऐंठ दिया था -!  ( ये सरासर झूठ था!) निंदा रस की लज्जत का क्या कहना! अनार और आम के जूस को मूर्छा आए जाए, गन्ना बगैर काटे गिर जाए और संतरा सदमे से गश खा जाए !
        साहित्यिक रस ( वीर रस, श्रृंगार रस, वीभत्स रस, सौन्दर्य रस , करुण रस आदि) मिल कर भी निन्दा रस का मुकाबला नहीं कर सकते! निंदा रस ने सदियों से सबका टीआरपी गिरा रखा है ! सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोंना साबित हुआ है !ये एक ऐसा रस है जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है! किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती ! हमारे वर्मा जी कद में छोटे हैं, पर - घाव करें  गंभीर - की खासियत रखते हैं ! उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है! पहले आओ - पहले पाओ की सहूलियत भी है ! वो बगैर दोस्ती दुश्मनी के भी बिलकुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं !
            पिछले हफ्ते की बात है, मोहल्ले के कवि  बुद्धि लाल " पतंग" के लिए चंदा लेने वर्मा जी मेरे घर आए! मैंने पूछा, ' उनके कविता की  "पतंग" मोहल्ले से बाहर भी उड़ती है या नहीं "?
                बस निंदारस का क्रेटर खुल गया। वर्मा जी बगैर नफा नुक़सान के "अमृत" उगलने लगे, " सारे मंचो से धक्का देकर खदेड़ा हुआ कवि है। पूरे शहर से इसकी पतंग कट गई है, वो तो  मैंने हाथ पकड़ लिया। तुम्हें तो पता है कि मैं कितना दयालु और कृपालु हूं। कोई कुछ भी मांग ले, मैं मना नहीं कर पाता"!
        " मुझे अर्जेंट पांच हज़ार रुपए की जरूरत है"! 
   वर्मा जी के निंदा रस की पाइप लाइन मेरी तरफ घूम गई, '  बाज़ार लगी नहीं कि गिरहकट हाज़िर "! इतना कहकर वो बगैर चन्दा लिए झपाक से निकल लिए!
       कुछ लोगों ने तो अपनी जीभ को निंदा रस का गोदाम बना लिया है ! दिन भर बगैर ऑर्डर के सप्लाई चलती रहती है ! उनके रूटीन में निंदा ही नाश्ता है और निंदा ही उपासना ! उपासना पर हैरत में मत पड़िए, वो गाना सुना होगा, कैसे कैसों को दिया है - ऐसे वैसों को दिया है '! यहां  बन्दा ईश्वर की निन्दा कर रहा है कि " तूने अपने बंदों को छप्पर फाड़कर देने में बड़ी जल्दबाजी की है, पात्र कुपात्र भी नहीं देखा ! मेरे जैसे होनहार और सुयोग्य  के होते हुए भी सारी पंजीरी  " ऐसे वैसों" को बांट दी !" ( कम से कम पूछ तो लेते !)
         कुछ लोग निंदा रस को अपनी लाइफ का आइना बनाकर जीते हैं ! वो अपनी निंदा में अपने चरित्र की परछाईं देखते हैं, ' निंदक नियरे राखिए - आंगन कुटी छवाय "! जब निंदा रस का जिक्र होता है तो महिलाओं को कैसे इग्नोर कर दें ! इस विधा में भी महिलाओं ने बाजी मार रखी है। अपनी आदत से मजबूर कुछ महिलाओं ने इस कला में डिप्लोमा और डिग्री दोनो ले रखी है ! ख़ास कर गांवों में कुछ महिलाओं के योगदान स्वरूप अक्सर दो परिवारों में लाठियां चल जाती हैं! गांव हो या शहर निंदा रस लबालब है। लगभग हर आदमी भुक्तभोगी है। अपने फ्रैंड सर्कल में कंघी मार कर देखिए, कोई ना कोई बरामद हो जायेगा, जिसने आपको कभी ना कभी ज़रूर ये कहा होगा, ' फलां आदमी से आपके रिश्ते ख़राब चल रहे हैं क्या ? परसो ऐसे ही मुलाकात हो गई तो कह रहा था, - किसी से बात ही नहीं करते, बड़े सड़े दिमाग़ के आदमी हैं "!

   आप कई दिन बेचैन रहते हैं! बार बार खुद को सूंघते हैं, क्या पता , कहीं सचमुच तो नहीं सड़  गया !!

Thursday, 29 October 2020

" शान्ति - सेवा - न्याय "!

                         अगर आप सौभाग्यवश पुलिस थाने में घुसते हैं तो बोर्ड पर लिखे तीन शब्दों पर नज़र पड़ती है,- शान्ति, सेवा और न्याय !  ये तीनों चीजें थाने में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं,पर मिलती उसे हैं जिसकी जेब में "सौभाग्य".होता है ! अगर आप के पर्स में सौभाग्य नहीं है तो आप की वापसी शांति पूर्वक संभव नहीं । आप हफ्तों अशांत हो सकते है! शान्ति के लिए कुछ भी करेगा। लोग शान्ति की खोज में हिमालय पर चले जाते हैं, लेकिन यहां थाने में आपका टीए - डीए  बच जाता है ! थाने की यही विशेषता है, यहां शान्ति के साथ शान्ति की उम्मीद में आने वाले अक्सर अशांत और असंतुष्ट होकर बाहर आते हैं ।
        पुलिस ने थाने के दरवाजे पर कंटिया डाल रखी है, 'यहां पर  शान्ति सेवा और न्याय मिलता  है '! कामयाब व्यापारी कभी दाम नहीं लिखता।  आप पहले अंदर तो आओ  फिर बताऊंगा कि शान्ति का बाज़ार भाव क्या है!
अंदर आप अपनी मर्जी से आते हैं,मगर जायेंगे शान्ति की मर्जी से। जब तक बीट कॉन्स्टेबल  संतुष्ट नहीं हो जाता कि अब आप "शान्ति" को अफोर्ड कर लेंगे, आप की कोचिंग चलती रहेगी ! शान्ति  बड़ी मुश्किल से मिलती है, इस हाथ दे - इस हाथ ले ! ( नहीं तो ले तेरी की ,,,!)
        कितनी अच्छी चीज़ हैं -.शान्ति, सेवा और न्याय ! पर लोग लेना ही नहीं चाहते ! थाने जाते हुए पैर कांपते हैं, बीपी बढ़ जाता है! लोग अक्सर अकेले जाने से कतराते हैं ! कोई पंगा हो जाए तो शान्ति के लिए लोग मोहल्ले के लुच्चे नेता को साथ लेकर थाने जाते हैं ! अब शान्ति का रेट थोड़ा और बढ़ जाता है, क्योंकि थोड़ा विकास नेता को भी चाहिए ! थाने वाले नेता को देखते ही ऐसे खिल उठते हैं गोया  आम के पेड़ में पहली बार बौर देखा हो ! तीनों अच्छी चीजें हैं, पर थाने से कोई लाना ही नहीं चाहता ! शरीफ़ आदमी थाने में घुसते हुए ऐसे घबराता है गोया  किसी का बटुआ चुराते हुए पकड़ा गया हो ! नमूने के तौर पर दिन दहाड़े थाने के पास लुटा शरीफ आदमी घबराया हुआ थाने में  "न्याय" की उम्मीद में जाता है ! बीट कॉन्स्टेबल पूछता है, -' के हो गयो ताऊ !"
        " एक बदमाश  मेरा पर्स छीन कर  भागा है "!
  " तो मैं के करूं ! तमै चोर कू दौड़ कर पकड़ना था!"
         " इस उमर में मैं भाग नहीं सकता।"
   " ता फिर इस उमर में नोट लेकर क्यों हांड रहो ताऊ! खैर, कितने रुपए थे?"
        " पांच हजार '!
    बीट कॉन्स्टेबल खड़ा हो गया, " नू लगे अक  कनॉट प्लेस का झपटमार था! इस इलाके के गरीब झपटमार पांच सौ से ऊपर की रकम नहीं छीनते"!
       " क्यों ?"
   " ग़रीब इलाका है, ऊपर से कोरोना का कहर! किसी की जेब में सौ पचास से ऊपर होता हो नहीं ! पिछले महीने एक थैला चीन कर एक  भागा था! बाद में ईमानदार झपटमार ने थैला यहां मालखाने में जमा करा दिया था !"
          " क्यों "? 
   " थैले में दो जोड़ी पुराने जूते थे, जो मरम्मत के लिए कोई ले जा रहा था। झपटमार ने समझा  "प्याज़" है "!
         '' मैं तो लुट गया, मेरी रिपोर्ट लिखो !"
        " कोई फायदा नहीं  ! दुनियां में किसी को ' 'एफ आई आर '  से शान्ति   नहीं मिलती! शान्ति मिलती है गीता के वचन दोहराने से, - ' तेरा था क्या जिसे खोने का शोक मनाते हो ! जो आज तेरा है, कल किसी और का हो जायेगा !  अब आत्मा को  "पर्स"  में नहीं  बल्कि "परमात्मा" में लगाओ! ये झपटमारी नहीं, विधि का विधान है ताऊ !"
     शान्ति के बाद नंबर आता है " सेवा" का ! ये चीज़ थाने में बगैर भेदभाव के मिलती है ! इसी के खौफ से काफ़ी लोग लुटने, पिटने और अपमानित होने के बाद भी थाने नहीं जाते ! सेवा के मामले में नर  नारी का भी भेदभाव नहीं है ! कुछ समय से नारी की  सेवा के लिए नारी पुलिस की व्यवस्था होने लगी है !. कभी कभी "सेवा" बर्दाश्त न कर पाने की वजह से  लोग थाने में ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं ! इस तरह के सेवा भाव से प्राणी को मरणोपरांत मोक्ष मिले ना मिले, पर "सेवादार" को प्रमोशन ज़रूर मिलता है!
         थाने में उपलब्ध तीसरी दुर्लभ चीज़ है "न्याय" ! ये भी शान्ति और सेवा की तरह निराकार  होती है। थानेदार की पूरी कोशिश होती है कि थाने आने वाले सारे श्रद्धालुओं को न्याय की पंजीरी प्राप्त हो, पर नसीब अपना अपना ! दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम ! बीट कॉन्स्टेबल भी यही चाहता है कि वादी और प्रतिवादी दोनो को न्याय की लस्सी मिले! ऐसे में। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है ! "सेवा" के इस मैराथन में जो ज़्यादा "खोता" है - उसे थोड़ा ज़्यादा न्याय मिलता है ! थाने से बाहर आकर वादी और प्रतिवादी दोनो महसूस करते हैं कि न्याय के नाम पर जो कुछ मिला, उसमे से "शान्ति" गायब है!     लेकिन,,,,,,,,,,,

 अब पछताए होत क्या - जब चिड़िया चुग गई खेत !

Wednesday, 28 October 2020

"मन की बात "!

            मैं क्या करूं, बहुत समझाया अपने दिल को - पर दिल है कि मानता नहीं ! मैंने लाख दलील दी कि इस दौर में कोई नहीं सुनेगा, लिहाज़ा सुनाना ही है तो मन की बात किसी पेड़ या सरकारी पुल को सुना दो। ज़्यादा से ज़्यादा सदमे में आ कर पेड़ सूख जायेगा या पुल को लकवा मार जायेगा ! पर जनाब, कोरोना में तपा हुआ दिले नाकारा  काम की बात की जगह मन की बात पर अड गया ! और ज़्यादा समझाने पर मुझ पर ही एहसान लादने लगा , -' शुक्र करो कि मन की बात पर अड़ा हूं, कहीं तुमसे ऑक्सीजन सिलेंडर मांगा होता तो ?"
      " देश में ऑक्सीजन की कोई कमी  नहीं है ! घर में गाय बांधा करो"!
  " कितनी ढिठाई से बता रहे हो ! जैसे मैंने हाथ पकड़ा हो ! अफ़सोस ! सद अफ़सोस !!"
     " किस बात का ?" मैंने दिल से पूछा !
  " मेरे साथ धोखा हुआ, फरिश्तों ने मुझे बताया ही नहीं कि जिसकी बॉडी में मुझे प्लांट कर रहे हैं, वो भविष्य में एक लेखक होने वाला है! काश मैंने तुम्हारी कुंडली देखी होती ! साठ साल के बाद जाऊं तो जाऊं कहां !"
    " तुम्हें तो गर्व करना चाहिए कि तुम एक विख्यात व्यंग्यकार का दिल हो !"
      " जिसके पास कभी कभी दाढ़ी बनवाने का भी पैसा नहीं होता " दिल भड़क उठा - ' कोई इज्जतदार आदमी होता तो कोरोना में निकल लेता या फ़िर खुदकुशी कर लेता ! आज के बाद मेरे मुंह मत लगना , कहे देता हूं!" 
      मुझे भी आदत पड़ गई है!  मन को समझाया,-' दिल की बात सुने दिलवाला ! मन तो मेरा भी करता है कि इकतारा बोले - टून्न टून्  ! पर सुनेगा कौन ! आजकल हर कोई मन की बात सुनाना चाहता है, पर सुनना नहीं चाहता ! मन की बात तो सिर्फ एक की सुनी जाती है ! हमारी तो काम की बात भी कोई नहीं सुनता ! मैं तो लोगों के  मन की बात भी इतनी श्रद्धा से सुनता हूं , गोया  कोई काम की बात हो ! मेरे जैसे निष्काम भक्त को ना काम मिल रहा है ना काम की बात ! हालत ये हो गई है कि मैं जब भी काम की बात करना चाहता हूं, मुंह से मन की बात निकलती है !
           मिर्ज़ा गालिब की भी यही प्रॉब्लम थी ! उनका "दिल" अपने मन की बात तो सुनाता था मगर  खुद गालिब के मन की बात नहीं सुनता था ! दिल की इसी डिप्लोमेसी से खीझ कर चचा गालिब ने एक शेर लिखा था , -
       "दिले नादां"  तुझे  हुआ  क्या  है !
        आखिर इस मर्ज की दवा क्या है !!
     कमाल है! चचा गालिब उसी नामाकूल दिल से दवा का पता पूछ रहे हैं जिसने मर्ज दिया है ! बकौल - तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना - ! मन की बात पर श्रोता की गाइड लाइन नहीं अप्लाई होती ! वो गाना तो सुना  होगा ,-. मै चाहे ये करू मैं चाहे वो करूं,,,,, मेरी मर्ज़ी ! मैं चाहता हूं कि जब मन की बात करूं तो मेरा दिल उसे काम की बात समझ कर - रोजा इफ़तार करे ! खिट खिट ना करे ! दिल में जीडीपी की चिंता नहीं, संतोषम परम् सुखम का होना ज़रूरी है !

                मैंने अपने पड़ोसी दोस्त चौधरी को टटोला, -' आज मैं तुमसे मन की बात करना चाहता हूं '! 
   " ये मुंह  अर - मसूर की दाल ! थारी मन की बात तो म्हारी भैंस भी ना सुने ! मोय पतो सै,  अक थारे मन कौ बात दूध की उधारी चालू करने के खातर होगी ! ना भाई ना , उधार प्रेम कौ कैंची सै। परे कर  मन की बात नै !"

         किससे कहूं मन की बात ! कोई सूरत नज़र नहीं आती !!