Friday, 9 October 2020

" उरे कू सुण भारती " ( चौधरी स्पेशल )

        मै रात बड़ी मुश्किल से सोया था। ख़्वाब में देखा कि कोई मेरा जूता चुरा ले गया ! दयनीय अर्थव्यवस्था के इस दौर में एक बड़ा नुकसान था ! मैं नींद में चोर को बददुआ दे ही रहा था कि धमाका हुआ ! मै जाग गया, बाहर से किसी ने दरवाजा खटखटाया था! मैंने सोचा, हो सकता है चोर जूता वापस देने आया हो ! फिर मेरी नज़र बेड के नीचे रखे जूते पर पड़ी तो मैंने जल्दी से उठ कर दरवाजा खोल दिया ! 
        सामने चौधरी खड़ा था !
            अंदर आकर सोफे पर पसरता हुआ चौधरी बोला, " लेे इब थारी मौज हो - ली ! थारे आत्मनिर्भर होने कौ दिन आ लिए"! 
       " हां, बड़ी मुश्किल से जूते बचे हैं, खैर तुम बताओ कहां रहे दो महीने "!                                                 " गाम ( गांव) लिकड़ गया हा ! के करूं, इतै दिल्ली में  कती उधार खाने बाड़े बैठे सूं ! खून पी लई ठाइस साड में "!
   " मैं जानता हूं कि तुम्हारा इशारा किधर है, खैर उधारी प्यार मुहब्बत के लिए फेवीकोल है ! हां तो तुम किसी खुशखबरी की बात कर रहे थे ?"   " 'कूण बनेगो करोड़पति - देखा है कदी ?'
    " बेगम देखती हैं, मैं नहीं देखता "! 
" इब खुश हो लेे, उपले की तरह सूखी थारी किस्मत का गेट इब  'खुल ज्या सिम सिम ' होने वाडा सै "!
   मै खुश होते होते रह गया, " मैंने तो लॉटरी का कोई टिकट भी नहीं खरीदा था !"
     " परे कर टिकट नै ! मेरे धोरे  'केबीसी ' ते बड़ा प्रोग्राम कौ आइडिया है, थारी आने वाड़ी चौदह जन्मों की किस्मत कौ कुपोषण दूर हो ज्यागा "!
    " मेरा पुनर्जन्म का कोई इरादा नहीं है !"
 " ता  फिर इसी जनम में  आत्मनिर्भर हो लेे! लोकल किस्मत कू  वोकल कर लेे जल्दी ते"!
    " मुझे करना क्या होगा !"
    " करोड़ पति बनना सै"!
  मैं फिर निराश हो गया, "  आख़री वक्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे , खैर प्लान बताओ"!
     " नू लगे, अक - करोड़पति हो कै मुझ पै एहसान कर रहो, खैर तू दोस्त है म्हारो ! सुन, मै एक ऐसा प्रोग्राम लाना चाहूं, जिसमें पूछे जाने वाले सवाड़ इतने आसान होंगे के गधे से गधा आदमी भी केबीसी होने कू बावला हो ज्या "!
         " एकाध सवाल का नमूना बताओ"!
  " म्हारे या प्रोग्राम में  करोड़पति होने खातर कुल  तीन सवाड कौ जवाब देना होगा "!
     " सवाल क्या हैं ?"
    " पहला सवाड़,- गधे के कितने पैर होते हैं?"
                " चार"!
     " गधे कू काफ़ी नज़दीक से जानते हो, खैर दूजा सवाड़ - दिन में सूरज लिकड़ता सै, अर  रात में ?"
       " चांद "!
    " घणा बुद्धिजीवी दीखे , ख़ैर - इब सब ते तगडा सवाड़ कौ बारी ! भैंस अर बैल में दूध कौन देवे ?"
        " भैंस !"
    " करोड़पति होने की घणी जल्दी है तमै !"
 " इन सवालों के जवाब तो कोई भी गधा दे सकता है"!
       "वो तो मन्ने देख लिया "!
  " जीतने वाले कू ईनाम में क्या दोगे"?
         सोने की एक भैंस  "!
   " नहीं" !  मै चिल्लाया !
     "हंबे" चौधरी मुस्कराया " तीनों सवाल कौ सही जवाब देने बाड़े कू सोने की एक भैंस दी ज्यागी ! प्रतियोगिता में हिस्सा लेने बाड़े कू सिर्फ दो हजार रुपए की इंट्री फीस देनी होगी ; समझा कोन्या ?"
         " समझ तो गया, लेकिन तुम भी लगे हाथ समझ लो कि ये सवाल बेहद आसान होने के कारण जीतने वाले इतने होंगे कि पूरा तबेला बेच कर भी तुम एक विजेता को सोने की भैंस नहीं दे पाओगे "!
       चौधरी मुस्कुराया " गलतफहमी है थारी, हम दोनों करोड़पति हो  ज्यांगें "!
      मेरी आंखें उबल पड़ी, " भला वो कैसे ?
           " ठंढ रख, कदी  करोड़पति होने की खुशी में वीरगति कू प्राप्त ना हो ज्या ! देख , आसान सवाड़  अर  सोने की भैंस कू सुन कर अक्ल ते पैदल लोग भी प्रतियोगिता का प्रवेश शुल्क दो हज़ार रुपए जमा कर देंगे ! अगर एक लाख लोगों का पैसा आ गया तो सोच, थारा के होगो भारती"!
     "बीस करोड़ कमाने के चक्कर में हम दोनो कंगाल हो ज्यांगे ! सवाड इतने आसान सूं, अक लाखों लोग विजेता हो ज्यांगें  "! 
   "हम पांच भाग्यशाली विजेताओं का लक्की ड्रॉ लिकाडेंगे! इब अकल पर गिरा गोबर परे कर बावड़े ! विजेता होने अर भाग्यशाली होने में घणा अंतर सै"!
  " फिर भी हमारी लुटिया बिक जाएगी ! एक भैंस का वजन छे सात कुंटल होता है , सोने की एक भैंस" अरबों रुपए की तैयार होगी ! "!
          मुझे देखता हुआ चौधरी धीरे से मुस्करा कर बोला, " मैंने  "सोने की भैंस" देने की बात की है, पर वज़न का कोई जिकर नहीं किया  है ! सोने की भैंस एक टन की भी हो सके, अर - एक "तोले" की भी"! 

   तब से मैं आंखें फाड़े चौधरी को देख रहा हूं!  
                 [ Sultan Bharti]

Thursday, 8 October 2020

" डांस इंडिया डांस"!

          अब मैं कैसे यकीन दिलाऊं कि ज़माना कितना बदल गया है! बचपन में मुझे इस बात का घमंड था कि मुझे नाचना नहीं आता ! आज इसी हीनता के बोझ से कमर की नाप उखड रही है कि मुझे नाचना नहीं आता ! शादी ब्याह में लोगों को नाचते देख कर अपनी अधूरी योग्यता पर गुस्सा आता है और अब्बा श्री की नसीहत पर खीज़ ! नाचना तो दूर - अब्बा श्री नाच देखने के भी विरोधी थे। ( जैसे कि उन्हें पता था कि शादी के बाद तो बाकी जिन्दगी नाचना ही है!)
         वक्त की धार ने कई पुरानी परिभाषाओं की ज़ंग उतार दी है !अब नाचना इज्ज़त की बात है, स्टेट्स सिंबल है ! मैंने कई शादियों में देखा है, पति जब ' डांस ' करता है तो पत्नी उसे ऐसे गर्व से देखती है, गोया पति ने योग्यता की सारी बाधाएं पार कर ली हों और अब वो परमवीर चक्र पाने के करीब है ! कई "खुले विचार" वाले पति अपनी पत्नी को नाचते देख कर ऐसे खुश होते हैं गोया पत्नी ने भरे दरबार में नाच कर उनकी लाज़ रख ली हो। लड़का नाच रहा है, और गर्वित मां बाप वहां मौजूद रिश्तेदारों को अपने होनहार बेटे के बारे में बता रहे हैं, " मैट्रिक में भले तीन साल लगे हों, पर डांस में हमारे चिंटू ने हमेशा बाजी मारी है"!
     पहले हमारे अध्यापक हमें सीख देते थे, - पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब! नाचोगे कूदोगे होंगे खराब !! हम नाच से नवाब की ओर गए, मगर क्या फ़ायदा ! दुविधा में दोनो गए माया मिली न राम ! नवाब बन नहीं पाए, और नाच से वंचित होकर लेखक हो कर रह गए ! ना खुदा ही मिला न विसालेे सनम - न इधर के रहे ना उधर के रहे। बचपना था, नाच के महत्व से अनभिज्ञ था! " मास्साब" की गलत सीख ने मेरे सौभाग्य पर नींबू टपका दिया है। अब इस उम्र में नाच में आत्मनिर्भर होना बड़ा मुश्किल लग रहा है !
                नाचना इतना ग्लैमरस कभी नहीं था! कई चैनल इसी के भरोसे ऑक्सीजन लेे रहे हैं ! बच्चे स्कूल बैग फेंक कर " बूगी वूगी " में करिअर बना रहे हैं ! नाच इंडिया नाच ! क्योंकि नाचने से ही अर्थव्यवस्था में सुधार होगा, आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और कोरोना भाग खड़ा होगा। नाचने से आत्मविश्वास बढ़ता है, और गरीबी दूर करने के लिए आत्मविश्वास ज़रूरी है! देखा जाए तो इस वक्त देश आआत्मविश्वास से ही चल रहा है! नाचना कितना ज़रूरी होगा, कि कुछ चैनल दो दशक से नाच का टैलेंट हंट चला रहे हैं ! कल के नौनिहाल से लेकर चाचा रामपाल तक नाचने आ रहे हैं! बच्चा और चच्चा दोनों नाच रहे है, और देश आगे बढ़ रहा है!
         कोई चैनल बच्चों का टैलेंट हंट चला रहा है तो कोई घरेलू महिलाओं का ! घर का टैलेंट स्टेज़ पर जलवागर है और पति घर के मुन्ने को लोरी सुना रहा है, -" सो जा राजदुलारे सो जा "! पत्नी डांस में लगी है और पति डायपर बदलने में! कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है! पत्नी पाने की ओर अग्रसर है, और पति  गा रहा है, " मेरा चैन वैन सब लूटा - ज़ालिम नजर उठा ले,,,,,,"! पालना छोड़ कर छोटे छोटे बच्चे नाचने आ गए हैं, गोया क्या जीना इसके बिना ! देश का सारा टैलेंट नाचने में ही सिमट गया है!

          टैलेंट की इंतेहा देखिए! पहले लोग सिर्फ पैर के बल नाचते थे, अब सर के बल भी नाच रहे हैं! (टैलेंट सरफिरा हो रहा है!) नाच में जिमनास्ट को घोल दिया गया है! डांस के कास्ट्यूम ऐसे हैं कि दर्शकों को अन्दर का सारा "टैलेंट" साफ साफ नजर आ रहा है! 

      टैलेंट आगे बढ़ रहा है, कोरोना पीछे हट रहा है!!

Wednesday, 7 October 2020

" गॉड इज़ ग्रेट "!

           मै भी कुबूल करता हूं कि ' गॉड इज़ ग्रेट, यानी अल्लाहु अकबर ! अर्थात्  " ईश्वर महान है "! मैं बाकी दुनियां की बात नहीं जानता,पर हमारे देश को तो गॉड इज़ ग्रेट ही चला रहा है। दुनियां और हमारे देश में सबसे बड़ा अंतर ये है कि बाकी देशों के लिए ईश्वर चिंतित होता है, परंतु हमारा देश ईश्वर के लिए चिंतित होने वाला पहला देश है! ईश्वर को  "घर" देना या ना देना मनुष्य तय करता है ! अगर मनुष्य ने तय कर लिया कि ईश्वर के साथ अन्याय हो रहा है तो वह ईश्वर को न्याय दिलाने के लिए अदालत भी जा सकता है! ( बेशक इस धार्मिक अनुष्ठान में कुछ मानव आहुतियां भी देनी पड़ें !)
      कभी ईश्वर चमत्कारी हुआ करता था,अब ये काम भी मनुष्य ने अपने हाथ में ले लिया है! ( एकाधिकार से अहंकार पैदा होता है!) मनुष्य चमत्कारी हो गया किन्तु अहंकारी नहीं। वो अपनी असीमित शक्तियों का क्रेडिट आज भी ईश्वर को दे रहा है, " परसों ट्रैफिक पुलिस से बच बचा कर  साक्षात ईश्वर मेरे घर आए थे! ( उनके पास फेस मास्क नहीं था!) उन्होंने मानव कल्याण के लिए मुझे नॉमिनेट कर दिया ! आज से,ब्लडप्रेशर,गठिया,
शुगर और जवानी दीवानी से सम्बन्धित तमाम दिव्य औषधियों का हकीम लुकमान मैं ही हूं! ये ईश्वर की महान अनुकंपा है मुझ पर ! बगैर अवरोध के " कृपा" आती रही तो मै शीघ्र ही ईश्वर के लिए एक भव्य मन्दिर बनाऊंगा"!
        गॉड इज़ ग्रेट ! कैसे कैसे काम करता है! उसकी मर्ज़ी के बगैर कुछ होता ही नही, और,,,,जो कुछ होता हुआ नजर आता है, उसकी मर्ज़ी मान लें तो आस्था लीक होने लगती है ! बाढ़, सूखा, सूनामी,अकाल, कोरोना आदि को एक्ट ऑफ गॉड मान लेते हैं,पर मॉबलिंचिंग, डकैती, लूट और मासूमों के साथ  बलात्कार को उसकी मर्ज़ी कैसे मान लें ! इन्ही अपराधों पर गहन अध्ययन और चिंतन " दिव्य" बाबाओं के आध्यात्मिक व्यापार को प्रेरणा और प्रोग्रेस देता है!
          ट्रेन के टॉयलेट से लेकर टाटा के ट्रकों तक ऐसे बाबाओं के विज्ञापन छाए हुए हैं, ' खुदा ने चाहा तो खून के आंसू नहीं रोने दूंगा" ( बाबा करामत अली बंगाली) कितना शातिर बाबा है! सारा इल्ज़ाम खुदा पर डाल रहा है ! खुदा ने चाहा तो,,,,,! नुक़सान होने पर हाथ खड़े कर लेगा ," क्या करूं, खुदा ने इस केस में  कोआपरेट  नहीं किया ! थोड़ा और 'लोबान ' डालो!" ये जितने मुस्लिम बंगाली बाबा जन शौचालय में अपना परिचयपत्र छोड़ते हैं, करीब करीब सारे  "वशीकरण" से लैस होते हैं ! सभी बाबा मनचाही लड़की को गर्ल फ्रैंड बनाने से लेकर गुप्त रोग के निवारण में डिप्लोमा लिए बैठे हैं!

     अब कॉलेज के लौंडे को पूरा यकीन है कि अगर चमत्कारी बाबा ने चाहा तो मोहल्ले की सलमा तो क्या "सनी लियोनी" को भी उसके आगे पीछे घूमने पर मजबूर हो जायेगी ! अब वो आस्था का लोबान सुलगा रहा है और शातिर बंगाली बाबा भरोसा दिला रहा है , " खुदा ने चाहा तो सनी लियोनी के साथ सुष्मिता सेन भी तुम्हारे ऊपर फिदा हो सकती हैं! क्या पता तुम्हारे ही चक्कर में सुष्मिता ने आज तक शादी न किया हो! लोबान डालते रहो, गॉड इज़ ग्रेट !"

     ऊपर बैठा गॉड हैरत में पड़ा सोच रहा होगा, - मुझे चुनौती देने वाली ये दिव्य रचना क्या मैंने ही बनाई है !!



Tuesday, 6 October 2020

" नाच मीडिया नाच"

                      मै सिर्फ इतना कह सकता हूं कि शर्म इनको मगर नहीं आती ! खाल इतनी मोटी और चिकनी कर  ली है कि शर्म, हया, संकोच या गैरत आते ही फिसल जाती है। यकीन नहीं होता कि कभी इसी मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था ! मै ये सोच कर सिहर उठता हूं कि अगर ऐसी मीडिया को "स्तंभ" समझ कर प्रजातंत्र की हिफाज़त में लगा दिया जाए तो प्रजातंत्र का क्या हाल होगा ! इन्होंने मीडिया को ख़बर से इतना दूर कर दिया है कि इन्हें तो  "तन्त्र" के आगे "प्रजा" नजर ही नहीं आती  !
                                 ।अब जब प्रजातंत्र और स्तम्भ की बात आ ही गई तो मीडिया पर थोड़ा और मट्ठा मथ लेते हैं। आप टी वी तो देखते हैं न ! मै भी जलभुन कर देख लेता हूं। ( हालांकि बाद में सोचता हूं कि क्यों देखा!) विडम्बना देखिए, जो चैनल जितना बड़ा झूठ बोलता है वो उतनी ज़ोर से दावा करता है , " हम सिर्फ़ सच दिखाते हैं"! ( ऐसा  "सच" दिखाने वाले सारे चैनल दो दिन से कोमा में पड़े हैं, जब से एम्स के डॉक्टर गुप्ता ने खुलासा कर दिया कि सुशांत सिंह राजपूत ने खुदकशी की थी!) अब जनता जानना चाहती है कि जून से अब तक बोला गया टनों झूठ का मकसद क्या था! ( पूछता है "भारती" )
        ऐसे चैनल्स अपने झूठ की मार्केटिंग करते हुए खुद को    "निर्भीक ' और  "निष्पक्ष" ज़रूर बताते हैं ! इधर कोरोना के आने के बाद ये सारे के सारे कुछ ज़्यादा ही निष्पक्ष और निर्भीक हो गए हैं! निर्भीक होने का ये आलम है कि झूठ बोलने में ईश्वर का भी लिहाज़ नहीं करते, और,,,, "निष्पक्ष" इतने कि  सत्ता पक्ष के अलावा और किसी का पक्ष नहीं लेते! पूरी निष्पक्षता का पालन करते हुए  "जन" को अनाथ छोड़ दिया है, और  " तंत्र" की परिक्रमा करते हुए गा रहे हैं, ' तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो,,,"! 
                                      कल के हाहकारी दिन की बात बताऊं! हाथरस रेप केस पर जानकारी के लिए मैंने टीवी खोला ! पहले चैनल पर बैठा मायूस एंकर बिहार चुनाव में "लोजपा" के भविष्य को लेकर खासा चिंतित था ! अगले चैनल पर भयभीत चीन और भिखमंगे पाकिस्तान की दुर्दशा पर ख़बर थी ! बड़ी उम्मीद से अगला कदम उठाया। इस चैनल पर एक  "महान" एंकर ऐसे चीख रहा था - गोया उसे अभी अभी ततैया ने काटा हो ! वो एम्स के डॉक्टर पर बहुत नाराज़ था! मुझे लगा कि सुशांत सिंह राजपूत के पोस्टमार्टम में इसे ना बुलाकर गलती से किसी  "डॉक्टर गुप्ता" को बुला लिया गया था ।
              इंफेक्शन का दौर जारी है। मीडिया संक्रमित होकर थोड़ा सा और निष्पक्ष हो गया है। अगले निर्भीक चैनल पर रेप के आरोपियों के पक्ष में सवर्ण सभा की ख़बर है। एंकर भारी धर्मसंकट में हैै , उसे मृतक परिवार की भूमिका भी संदेहास्पद लग रही है ! ( क्या पता इस "किलिंग" के पीछे किसी किस्म का "ऑनर" ना हो ! वैसे कई ऑनर वाली महिला नेताओं के कपडे फाड़ कर रेप के आरोपियों को सबक सिखाया जा चुका है!) दंगे तो बरामद हो गए ! दंगाई लोगों की खोज जारी है ! नया ज्ञान खोज लिया गया है; जहां भी रेप होगा, उसके पीछे बलात्कारी नहीं दंगाई तलाशे जाएं !
      आख़िरी चैनल देखने के लिए कलेजा मजबूत करता हूं। इसके एंकर ने कोलंबस से बड़ी खोज की है ! एंकर बता रहा है , " दो रेपिस्ट तो उस दिन उस वक्त वहां थे ही नहीं "! रहस्य खुलता जा रहा है। निष्पक्ष और निर्भीक खोज का दायरा मासूम बलात्कारियों से हट कर दंगाइयों की ओर जा रहा है। अब मुझे पूरा भरोसा है कि दंगाई बच नहीं पाएंगे । चलो असली गुनहगार की जल्दी पहचान हो गई, वरना चार मासूम सजा काटते। अब देर सबेर दंगाई खुद ही कबूल कर लेंगे कि रेप,कत्ल और दंगे के इस साजिश में  "मृतका" लड़की भी शामिल थी या नहीं !
       एक शेर याद आ रहा है,

अब भला और कहां  ढूंढोगे मेरा  क़ातिल !
तुम मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम हमीं पर रख दो !!


Saturday, 3 October 2020

" वो चिंतित हैं!"

           मै उनको लंबे अरसे से जानता हूं! वो अक्सर चिंतित होते रहते हैं ! वो बड़े जागरूक चिन्तक हैं! पिछले दस साल से मैंने उन्हें चिन्ता व्यक्त करते पाया है। चिन्ता व्यक्त करने के मामले में वो जड़ और चेतन में भेद भाव नहीं करते ! क्षेत्र के पत्रकारों का फोन नंबर उनके पास है, वो फौरन अपनी चिन्ता से मीडिया को अवगत करा देते हैं ! लोगों को मालूम भी होना चाहिए कि नेताजी कितने चिंतित हैं ! वो अपनी चिन्ता को कभी लावारिस नहीं छोड़ते ! वो हमारे मोहल्ले के नेता हैं।
               पिछली बार  बारिश के आने से पहले ही वो बारिश के लिए चिंतित हो गए थे! ( उनका आकलन था कि सूखा पड़ेगा।) जब बारिश हुई तो जाम लगने से चिंतित रहने लगे। दिल्ली में पानी की कमी को लेकर वो साल के चार महीने चिंतित रहते हैं! जब कभी वो अपनी चिन्ता को लेकर क्षेत्रीय विधायक या पार्षद के ऑफिस कूच करते हैं,वो लोग ऑफिस से भाग खड़े होते हैं ! विधायक का आरोप है कि वो  ' पकाते बहुत हैं!' सत्ता में बैठा 'महाबली ' जनता को अनारकली समझता है, देश हित में नाचते रहो, लेकिन नो चिन्ता - ऑनली  सावन ही सावन !
                      इस वक्त वो हाथरस को लेकर चिंतित हैं! लेकिन इस बार चिंतित होने में वो चार दिन लेट हो गए! दरअसल घर का टीवी सेट खराब था और कोरोना की चिन्ता में चौराहे तक भी ना आ सके। लेकिन जैसे ही घटना से अपडेट हुए, फौरन चिन्ता व्यक्त करने लगे, -" हमारी पार्टी सत्ता में थी, तो इस तरह के बलात्कार कभी नहीं हुए ! सरकार को नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए"! ( इतनी शर्म होती तो लोग सियासत में क्योें आते!)
   
       वो मूर्ख नहीं है! वो चिन्ता का महत्व जानते हैं! अभी उनकी चिन्ता में हिंसा नहीं है, इसलिए सरकार को कोई चिन्ता नहीं है! अभी उनकी चिन्ता ने समूह और समाज को समेटा नहीं है, वरना उनका सियासी आभामंडल सीमित न होता ! वो जानते हैं कि राजनीति में चिन्ता की राष्ट्रव्यापी फसल बो कर सत्ता को किस तरह आत्मनिर्भर बनाया जाता है! वो आश्वस्त हैं, जानते हैं कि यही चिन्ता उन्हे दोबारा सिंहासन तक लायेगी !

     चिन्ता लगातार उन्हें उज्ज्वल भविष्य का भरोसा दे रही है! चिन्ता उनके लिए  "अमृत कलश"  है!
     वो सामाजिक चिन्ता के जागरूक परजीवी हैं !

Friday, 2 October 2020

" दवा बनाम दारू "

                            अल्ला दुहाई है दुहाई है ! ये दारू चीज़ क्या बनाई है ! पीने के बहाने लाखों हैं,,,! तभी तो लोग दारू को दवा बताकर पी जाते हैं।एक ऐसी दवा, जो परिवार की जड़ों को खोखला कर देती है! लोग दारू पीकर दोष ईश्वर पर डाल देते हैं -" ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा !" ( अबे बहाना और बोतल दोनो छोड़ !) पीने वाले की क्रोनोलॉजी समझिए, पहले खुशी सेलिब्रेट करने की आड़ में पी गया! अब जब बीबी के गहने बिक गए तो देसी ठर्रा चढ़ा कर गा रहा है,- " गम भुलाने के लिए मै तो पिये जाता हूं "! 
           दारू अच्छी चीज़ है या बुरी चीज़ ! इस बारे में,- मुंडे मुंडे मतिर भिन्ना है! इसे असुरों की दारू समझ कर पियो चाहे देवताओं का सोमरस ! दारू को लेकर   सरकार हमेशा कंफ्यूजन में होती है। देश में देव कम हैं, दानव ज़्यादा ! दोनो  के सहयोग से सरकार बनाई जाती है ! दोनो आपस में प्याले टकराकर सत्ता का  "सोमरस" पीते हैं ! आए दिन लोग ज़हरीली दारू पीकर एक्सपायर होते हैं ! देवता दिखावटी विरोध करते हैं तो दानव दारू से आने वाली एक्साइज ( कमाई) याद दिला देते हैं ! ऊपर से सरकारी कवि समर्थन कर देता है, ' मंदिर मस्जिद बैर कराते  मेल कराती मधुशाला "! (सरकार फौरन देश हित में ढाई हज़र ठेके और खुलवा देती है ! भाईचारा  बहुत ज़रूरी चीज़ है!)
           जब पीना है तो नाली का क्योें, मल्टी नैशनल का पियो ! लिहाज़ा मंदिर मस्जिद में मेल कराने के लिए बाहर की कंपनियां दारू लेकर आ गईं ! गली गली में भाईचारा मजबूत होने लगा। हालांकि घरेलू औरतों ने बहुत कहा कि मोहल्ले में ठेका खुलने से भाईचारे का तो पता नहीं पर उनकी गृहस्थी बर्बाद हो जायेगी ! पर सरकार को " मंदिर मस्जिद" के मेल की ज़्यादा चिन्ता थी। हर मुहल्ले में मेल मिलाप की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए ! भाईचारा और अर्थव्यवस्था इतनी बुरी तरह कभी मजबूत नहीं हुये ! इस नए किस्म का "भाईचारा" मजबूत करने में केजरी वाल का भी उल्लेखनीय योगदान रहा !
           कितना कन्फ्यूजन है दारू के चरित्र को लेकर। विपक्ष में आने से पहले किसी पार्टी को दारू के दुर्गुण ही नहीं नज़र आते। सरकार दारू को ना पीने की दलील नहीं देती, बल्कि दारू पीने की उम्र तय करती है , " बेटा ज़रा एक साल और रुक जाओ ! अगले साल तुम वोट भी दे सकोगे और मुफ्त में पी भी सकोगे - धर लेे धीर जिगरिया में,,,,!"
           पीने वालों को पीने का बहाना चाहीए! कुछ सुपरहिट बहानों की बानगी देखिए, ' ये शराब नहीं - बीयर है!'  '. अरे, ये दारू नहीं, ब्रांडी है! सर्दी के लिए टॉनिक है "! भाई साहब, ये शराब नहीं , मृत संजीवनी सुरा है। ठंड लग जाए तो बच्चे को भी दे सकते हैं"! दारू को प्रमोट करने में फिल्में सबसे आगे हैं! बहुत कम फिल्मों में दिखाया जाता है कि टल्ली होने पर हीरो नाकारा साबित होता है, वरना ज्यादातर फिल्मों में धर्मेद्र, अमिताभ, महाबली सलमान, मिथुन दा पीने के बाद गुण्डो की फौज पर भी भारी पड़ते हैं! युवा तो सुपरमैन बनेगा ही , " चल मेरे भइया दे दारू"!
      सिगरेट की दुकान पर बड़ा सा कट आउट लगा है, - एक आदमी हीरोइन के साथ खड़ा सिगरेट पी रहा है, और नीचे लिखा है -" ज़िन्दगी के शाही मज़े लीजिए "! वहीं सिगरेट के पैकेट पर पुलिस में ईमानदारी की तरह बेहद बारीक शब्दों में लिखा होता है, ' सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ! अब दुकान के सामने खड़ा स्कूल का लौंडा भारी धर्मसंकट में हैै !उसके समझ में नहीं आ रहा है कि वह जिंदगी के शाही मज़े ले,या कैंसर से डरे ! (हीरोइन की तसवीर के सामने कैंसर बड़ा असहाय लग रहा है।)
       हमारे पड़ोसी गांव के हर शरण सिह चाचा पीने के बाद बादशाह हो जाया करते थे। एक बार तो इतना चढ़ा लिया कि कुर्ता उतार फेंका और धोती हाथ में लेकर पैदल ही निकल पड़े। ठेकेवाले ने बड़ी मुश्किल से उन्हें बगैर धोती के जाने से रोका था। वो असली पियक्कड़ थे, बहुत नशा चढ़ जाने पर कहीं भी लेट कर सो जाते थे। कभी पीने के बाद किसी के साथ गाली गलौज नहीं करते थे ! हिन्दू मुसलमान दोनों के चहेते थे।
      अब दारू भी कल्चर का हिस्सा बन गई है। लोग बड़े गर्व से कहते हैं, ' मेरी ब्रांड हर जगह मिलती कहां है। मै या तो प्रिंस हेनरी लेता हूं या  ग्रेट बर्मूथ ! मुझे सिवास रीगल या बोडका सूट ही नहीं करता - यू नो!" ऐसे लोगों को अपने देश के बैंक भी सूट नहीं करता आई इसलिए वो गठरी गठरी फुटकर पाप विदेशी बैंको में जमा करते रहते हैं , और एकदिन खुद भी नीरव मोदी होकर उड़ लेते हैं ! उन्हें देसी ब्रांड कभी नहीं भाता।

     मैंने तो ये नतीजा निकाला कि वफादार और सर्वहारा लोग देसी पीते हैं और  शातिर लोग देश को ! यही विधि का विधान है !

Thursday, 1 October 2020

"साहित्यिक हादसा"

         मैं इस दुनियां में पैदा हुआ, ये मेरे माँ बाप के लिए खुशी की बात हो सकती है! मैं बहुत शैतान बच्चा था, ये मेरे मित्रों के लिए खुशी की बात हो सकती है। पढ़ने में ठीक ठाक था, ये अध्यापकों के लिए सुखद ख़बर हो सकती है! काॅलेज के बाद मेरी शादी वहीं हुई, जहां मैं चाहता था ! ( ये मित्रों के लिए ईर्ष्या भरी खुशी की बात हो सकती है!) गृहस्थी चलाने के लिए सरकारी नौकरी पकड़ने की बजाय साहित्य पकड़ लिया, ये मेरे भविष्य के लिए बिलकुल अच्छी चीज़ नहीं थी। क्योंकि मै जैसे ही साहित्य की ओर गया, फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी ना रही !
                अब चूंकि साहित्य को घर दिखाने का कुसूर मेरा था, लिहाज़ा रेगिस्तान कुंडली में शनि बनकर बैठ गया ! सम्मान और प्रशंसा की सूनामी आ रही थी,मगर दुर्भाग्यवश सम्मान को ब्रेकफास्ट या डिनर में खाने का प्रावधान नहीं था। साहित्यि में कारावास काट रहे साधकों ने समझाया ," नो चिन्ता! धीरे धीरे आपको प्रशंसा से पेट भरना आ जायेगा ! आंतों को हालात से एडजस्ट करना आ जायेगा ! और,,,तब आपको संतोषम परम् सुखम की आदत पड़ जायेगी ! वैसे भी अब आप साहित्य के अलावा किसी काम के नहीं रहे ! लिहाज़ा इस जवानी में भी आप साहित्य साधना में डूब कर कबीर का निर्गुण गाएं , " माया महा ठगिनी हम जानी "!
                       मेरे रिसर्च के मुताबिक अपने देश में साहित्यकारों की तीन प्रजातियां पायी जाती हैं! तीसरी किस्म का साहित्यकार खुद नहीं जानता कि वो साहित्य के लायक है या नहीं! रिटायरमेंट के पहले तक वो साहित्य और साहित्यकार से घोर नफरत करता है! उसे साहित्य से इतनी एलर्जी है कि अख़बार भी वो तभी पढ़ता है जब पेट साफ नहीं होता । वो सत्ता के गलियारों में बैठा नौकरशाह होता है,जिसे करप्शन के सभी बही खातो की जानकारी होती है। बस, रिटायर होते ही वो एक धमाकेदार किताब लिख कर बेस्ट सेलर लेखक बन जाता है !
           दूसरे किस्म का साहित्यकार जुगाड़ू और चोर होता है ! वो प्रतिभा के बल पर विख्यात होने का जोखिम  नहीं उठाता। मगर उसके कॉन्टैक्ट जबरदस्त हैं। उसकी साधारण रचना भी आराम से प्रकाशित हो जाती है ! किताब की समीक्षा और समाचार भी अख़बार में आ जाता है और फटाफट पुरस्कार आने लगते है!  वो जवानी में ही वरिष्ठ और विख्यात हो जाता है।जल्द ही वो अपने संपर्क और जुगाड से साहित्य में "डॉक्टर" हो जाता है । डॉक्टर बनते ही वो स्वस्थ साहित्य की किडनी निकालने लगता है।
              पहले यानी अव्वल किस्म का साहित्यकार दुर्भाग्य वश पैदाइशी साहित्यकार होता है! उस वक्त ईश्वर कतई अच्छे मूड में नहीं होता जब वो किसी सच्चे साहित्यकार को पैदा करता है। अपनी कालजई इस असाधारण रचना को अप्रतिम बुद्धि वैभव के साथ उसे कुंटल भर खुद्दारी भी दे देता है! अब वो इस नश्वर संसार में किसी से कॉम्प्रोमाइज नहीं करेगा , भले उसका पूरा परिवार खुदकशी कर ले !  लेखक के लिए उसूल और आत्मसम्मान परिबार से काफी है! अब कैफियत ये है कि "सरस्वती" उसे शाबासी देती रहेंगी और  "लक्ष्मी" लाठी। बेमिसाल साहित्य देकर भी जीते जी ( अक्सर) वो "अच्छे दिन" के इन्तजार में गाता रहता है," अबहू ना आए बालमा सावन बीता जाए"!!       
         भागने का कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं! कबीर ने शायद लेखकों के बारे में ही कहा था," जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ "! ( मगर ये तब समझ में आया,जब घर को लाईटर दिखा चुका था! आठवीं कक्षा में  "मास्साब"  ने बिलकुल गलत अर्थ बताया था!) मै चालीस साल की उम्र तक तो साहित्यिक हादसों से भागने का रास्ता ढूढता रहा, बाद में इसी दरिया ए में लिंटर डाल दिया। ग़ालिब ने कहा है," दर्द का हद से गुजर जाना है दवा होना "! उसके दर्द का हद एवरेस्ट जितना ऊंचा है ।

      हर सच्चा साहित्यकार शायद ज़िन्दगी का सलीब ढोता हुआ अपने दर्द के हद से गुजरने का इन्तजार करता है, कि,,,,, देखना है ज़ोर कितना,,,,,,,,!!