Thursday, 31 July 2025

[व्यंग्य 'चिंतन'] मिले सुर मेरा तुम्हारा

        (व्यंग्य  ' चिंतन ')

" मिले सुर मेरा तुम्हारा"

      अब मैं क्य़ा कहूँ ,आदमी सामाजिक प्राणी है,  माने,,,सोशल क्रिएचर ! समाज में रहता है और जाने अनजाने सियासत के छींटे खाता है !  उसे बग़ैर मांगे उपदेश दिया  जाता है कि- संघे शक्ति कलियुगे -!  संघठन ही सियासत की संजीवनी है और सत्ता की सीढ़ी ! इसलिए जब  कोर्ट महा मानव समाज सेवा से सियासत की दाण्डी यात्रा शुरू करता है तो उसका पहला प्रयास और प्रवचन- मिले सुर मेरा तुम्हारा-को लेकर होता है! और हो भी क्यूँ न ! सत्ता में ताजपोशी और बनवास का सारा क्रेडिट सुर के संगम पर ही टिका हुआ  है, बुरा मानो या भला!
      सुर से सुर मिल जाए तो अल्पमत वाली सरकार भी 5 साल चल जाती है ! वहीं अगर सरग़म से सुर निकल भागे तो प्राणी मुख्यमंत्री होते होते मायावती होकर रह जाता है! सुर का सुर से मिलना बहुत ज़रूरी होता है ! कभी कभी कुंडली के सितारे सत्ता का राजयोग दिखाते हैँ लेकिन सरग़म के कुछ  सुर  'हृदय परिवर्तन' के संक्रमण का शिकार होकर तराजू से कूद जाते हैँ ! ऐसी  ग्रहदशा में अक्सर सत्ता का बनवास काट रहे कई सुर बहुमत की सरकार बना बैठते हैं! ऐसे मधुमास का श्रेय लेने वाले सियासत के महारथी  को  कुछ लोग  'मौसम वैज्ञानिक' भी कहते हैं!  सरग़म से सुर निकाल कर नया सत्ता सरगम का निर्माण करना कोई आसान काम नहीं है,  बड़े खतरे हैं इस राह में ! दांव उल्टा पड़ा तो,,,"मोह माया" की जगह कुंडली में'मोक्ष'  की इंट्री भी संभव है !
          सियासत के इस शतरंज में हर पार्टी शह और मात के  चौसर बिछाती रहती है ! सभी सशक्त, सजातीय, मजबूत और टिकाऊ सुरों की तलाश में रहते है ! बहुमत न आने पर विपक्षी पार्टियों के बिकाऊ विधायक/सांसद को ऑफर दिया जाता है, -  'खुला है मेरा पिंजरा आ मोरी 'मैना' - !  'आत्मनिर्भर' मॉनसून पाते ही प्राणी सरगरम से निकल कर सशरीर 'सूटकेस   में समा जाता है ! कुछ तो भाव विह्वल हो कर  गाने में ही संकेत देने लगते हैं, - 'आप जैसा कोई मेरी जिन्दगी में आये,,,और  पेट्रोल पंप दे जाये - ! 
      लेकिन,,,, छोड़ो कल की बातें,,,,ये उस दौर की बातेँ हैं जब देश में सतयुग नहीं आया था और,  पता नहीं किसके आदेश से सूरज पूर्व से ही उगा करता था ! विकास पुरूष अवतार ले चुके थे, मगर अज्ञातवास में चल रहे थे ! फिर आया 2014 और जगह जगह आकाशवाणी होने लगी कि - अब वतन आज़ाद है'- ! गांधी जी ने कहा था,  पापी से नहीं पाप से नफ़रत करो -! वर्तमान सतयुग में उसे साक्षात प्रैक्टिकल किया जाने लगा ! पाप से घनघोर नफ़रत और तमाम अंगुलिमाल,गैंगस्टर, क़ातिल, ठग, भ्रस्टाचारी,डाकू, स्मगलर,दंगाई मुख्य धारा में आ गए ! अलबत्ता पाप से नफ़रत करने में आज भी कोई कसर नहीं है ! ऐसा परिवर्तन देख स्वर्ग में बैठे गांधी जी सकते में हैं ! इससे प्रेरणा पाकर समूचे बैंक को गठरी में बाँध कर लोग देश से भागने लगे ! अज्ञानी जनता सन्नाटे में थी और ज्ञानी लोगों ने 'आपदा में अवसर' का गूढ़ अर्थ समझ लिया था ! मिले सुर मेरा तुम्हारा- से  विकास का सारा तिलिस्म खुल जा सिम सिम के करीब था !
    आज प्रचंड विकास की सभी योजनाएं मिले सुर मेरा तुम्हारा, पर आधारित हैं,  फिर भी सुर का सुर से मिलना आसान कहां है! कुछ लोग सुर मिलाने से पहले सुर की बड़ी जांच पड़ताल करते हैं ! जल्दबाजी में कहीं दूसरे सम्प्रदाय के सुर से सुर न मिल जाए , आजकल वैसे भी लव जिहाद और भगवा जेहाद का  'लू' चल रहा है । आस्था इतनी सेंसिटिव हो गई है कि रोड के किनारे ढाबे के बोर्ड पर दूसरे धर्मावलंबी के नाम देख कर ही भूख  मर जाती है ! चुनाव की पुरवाई बहते ही  आस्था सेकुलर हो जाती है, और सभी जाति के वोटर   पूज्यनीय,,, इसलिए जाति कुजाति न देख कर- 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' का नाद शुरू हो  जाता है ! चुनाव परिणाम के बाद  वाणी का शुद्धीकरण कर लिया जाता है  !

      आजकल एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ सुर मिलाने पर कई बेसुरे पसीना बहा रहे हैं ! उधर विदेश में, अपने खटारा सुर को लेकर पूरी पंचायत मे बदनाम हो चुके, ट्रंप के खिलाफ वैश्विक व्यापार मंडल के काफी दूकानदार सुर उठा रहे हैं ! नाटो के गिने चुने चाटुकारों के अलावा सभी उन्हे असुर मान बैठे हैं!वो लाख आफर दें,  ' मिले सुर मेरा तुम्हारा-' ! पर दूसरी तरफ सन्नाटा को तोड़ती एक ही आवाज सुनाई देती है,- ' चुप बैठ रहो तुम बूढे हो '!
          ट्रंप का सठियाना जारी है !

  ( सुलतान 'भारती')

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